AV-11/17-10-1987-“ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार – ‘पवित्रता’
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार – ‘पवित्रता’”
आज बापदादा अपने विश्व के चारों ओर के विशेष होवनहार पूज्य बच्चों को देख रहे हैं। सारे विश्व में से कितने थोड़े अमूल्य रत्न पूजनीय बने हैं! पूजनीय आत्मायें ही विश्व के लिए विशेष जहान के नूर बन जाते हैं। जैसे इस शरीर में नूर नहीं तो जहान नहीं, ऐसे विश्व के अन्दर पूजनीय जहान के नूर आप श्रेष्ठ आत्मायें नहीं तो विश्व का भी महत्व नहीं। स्वर्ण-युग वा आदि-युग वा सतोप्रधान युग, नया संसार आप विशेष आत्माओं से आरम्भ होता है। नये विश्व के आधारमूर्त, पूजनीय आत्मायें आप हो। तो आप आत्माओं का कितना महत्व है! आप पूज्य आत्मायें संसार के लिए नई रोशनी हो। आपकी चढ़ती कला विश्व को श्रेष्ठ कला में लाने के निमित्त बनती है। आप गिरती कला में आते हो तो संसार की भी गिरती कला होती है। आप परिवर्तन होते हो तो विश्व भी परिवर्तन होता है। इतने महान् और महत्व वाली आत्मायें हो!
आज बापदादा सर्व बच्चों को देख रहे थे। ब्राह्मण बनना अर्थात् पूज्य बनना क्योंकि ब्राह्मण सो देवता बनते हैं और देवतायें अर्थात् पूजनीय। सभी देवतायें पूजनीय तो हैं, फिर भी नम्बरवार जरूर हैं। किन देवताओं की पूजा विधिपूर्वक और नियमित रूप से होती है और किन्हों की पूजा विधिपूर्वक नियमित रूप से नहीं होती। किन्हों के हर कर्म की पूजा होती है और किन्हों के हर कर्म की पूजा नहीं होती है। कोई का विधिपूर्वक हर रोज श्रृंगार होता है और कोई का श्रृंगार रोज़ नहीं होता है, ऊपर-ऊपर से थोड़ा-बहुत सजा लेते हैं लेकिन विधिपूर्वक नहीं। कोई के आगे सारा समय कीर्तन होता और कोई के आगे कभी-कभी कीर्तन होता है। इन सभी का कारण क्या है? ब्राह्मण तो सभी कहलाते हैं, ज्ञान-योग की पढ़ाई भी सभी करते हैं, फिर भी इतना अन्तर क्यों? धारणा करने में अन्तर है। फिर भी विशेष कौनसी धारणाओं के आधार पर नम्बरवार होते हैं, जानते हो?
पूजनीय बनने का विशेष आधार पवित्रता के ऊपर है। जितना सर्व प्रकार की पवित्रता को अपनाते हैं, उतना ही सर्व प्रकार के पूजनीय बनते हैं और जो निरन्तर विधिपूर्वक आदि, अनादि विशेष गुण के रूप से पवित्रता को सहज अपनाते हैं, वही विधिपूर्वक पूज्य बनते हैं। सर्व प्रकार की पवित्रता क्या है? जो आत्मायें सहज, स्वत: हर संकल्प में, बोल में, कर्म में सर्व अर्थात् ज्ञानी और अज्ञानी आत्मायें, सर्व के सम्पर्क में सदा पवित्र वृत्ति, दृष्टि, वायब्रेशन से यथार्थ सम्पर्क-सम्बन्ध निभाते हैं – इसको ही सर्व प्रकार की पवित्रता कहते हैं। स्वप्न में भी स्वयं के प्रति या अन्य कोई आत्मा के प्रति सर्व प्रकार की पवित्रता में से कोई कमी न हो। मानो स्वप्न में भी ब्रह्मचर्य खण्डित होता है वा किसी आत्मा के प्रति किसी भी प्रकार की ईर्ष्या वा आवेश के वश कर्म होता या बोल निकलता है, क्रोध के अंश रूप में भी व्यवहार होता है तो इसको भी पवित्रता का खण्डन माना जायेगा। सोचो, जब स्वप्न का भी प्रभाव पड़ता है तो साकार में किये हुए कर्म का कितना प्रभाव पड़ता होगा! इसलिए खण्डित मूर्ति कभी पूजनीय नहीं होती। खण्डित मूर्तियाँ मन्दिरों में नहीं रहती, आजकल के म्यूज़ियम में रहती हैं। वहाँ भक्त नहीं आते। सिर्फ यही गायन होता है कि बहुत पुरानी मूर्तियाँ हैं, बस। उन्होंने स्थूल अंगों के खण्डित को खण्डित कह दिया है लेकिन वास्तव में किसी भी प्रकार की पवित्रता में खण्डन होता है तो वह पूज्य-पद से खण्डित हो जाते हैं। ऐसे, चारों प्रकार की पवित्रता विधिपूर्वक है तो पूजा भी विधिपूर्वक होती है।
मन, वाणी, कर्म (कर्म में सम्बन्ध सम्पर्क आ जाता है) और स्वप्न में भी पवित्रता – इसको कहते हैं सम्पूर्ण पवित्रता। कई बच्चे अलबेलेपन में आने के कारण, चाहे बड़ों को, चाहे छोटों को, इस बात में चलाने की कोशिश करते हैं कि मेरा भाव बहुत अच्छा है लेकिन बोल निकल गया, वा मेरी एम (लक्ष्य) ऐसे नहीं थी लेकिन हो गया, या कहते हैं कि हंसी-मजाक में कह दिया अथवा कर लिया। यह भी चलाना है। इसलिए पूजा भी चलाने जैसी होती है। यह अलबेलापन सम्पूर्ण पूज्य स्थिति को नम्बरवार में ले आता है। यह भी अपवित्रता के खाते में जमा होता है। सुनाया ना पूज्य, पवित्र आत्माओं की निशानी यही है – उन्हों की चारों प्रकार की पवित्रता स्वभाविक, सहज और सदा होगी। उनको सोचना नहीं पड़ेगा लेकिन पवित्रता की धारणा स्वत: ही यथार्थ संकल्प, बोल, कर्म और स्वप्न लाती है। यथार्थ अर्थात् एक तो युक्तियुक्त, दूसरा यथार्थ अर्थात् हर संकल्प में अर्थ होगा, बिना अर्थ नहीं होगा। ऐसे नहीं कि ऐसे ही बोल दिया, निकल गया, कर लिया, हो गया। ऐसी पवित्र आत्मा सदा हर कर्म में अर्थात् दिनचर्या में यथार्थ युक्तियुक्त रहती है। इसलिए पूजा भी उनके हर कर्म की होती है अर्थात् पूरे दिनचर्या की होती है। उठने से लेकर सोने तक भिन्न-भिन्न कर्म के दर्शन होते हैं।
अगर ब्राह्मण जीवन की बनी हुई दिनचर्या प्रमाण कोई भी कर्म यथार्थ वा निरन्तर नहीं करते तो उसके अन्तर के कारण पूजा में भी अन्तर पड़ेगा। मानो कोई अमृतवेले उठने की दिनचर्या में विधिपूर्वक नहीं चलते, तो पूजा में भी उनके पुजारी भी उस विधि में नीचे-ऊपर करते अर्थात् पुजारी भी समय पर उठकर पूजा नहीं करेगा, जब आया तब कर लेगा। अथवा अमृतवेले जागृत स्थिति में अनुभव नहीं करते, मजबूरी से वा कभी सुस्ती, कभी चुस्ती के रूप में बैठते तो पुजारी भी मजबूरी से या सुस्ती से पूजा करेंगे, विधिपूर्वक पूजा नहीं करेंगे। ऐसे हर दिनचर्या के कर्म का प्रभाव पूजनीय बनने में पड़ता है। विधिपूर्वक न चलना, कोई भी दिनचर्या में ऊपर-नीचे होना – यह भी अपवित्रता के अंश में गिनती होता है। क्योंकि आलस्य और अलबेलापन भी विकार है। जो यथार्थ कर्म नहीं है वह विकार है। तो अपवित्रता का अंश हो गया ना। इस कारण पूज्य पद में नम्बरवार हो जाते हैं। तो फाउण्डेशन क्या रहा? पवित्रता।
पवित्रता की धारणा बहुत महीन है। पवित्रता के आधार पर ही कर्म की विधि और गति का आधार है। पवित्रता सिर्फ मोटी बात नहीं है। ब्रह्मचारी रहे या निर्मोही हो गये – सिर्फ इसको ही पवित्रता नहीं कहेंगे। पवित्रता ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार है। तो हर समय पवित्रता के श्रृंगार की अनुभूति चेहरे से, चलन से औरों को हो। दृष्टि में, मुख में, हाथों में, पांवों में सदा पवित्रता का श्रृंगार प्रत्यक्ष हो। कोई भी चेहरे तरफ देखे तो फीचर्स से उन्हें पवित्रता अनुभव हो। जैसे और प्रकार के फीचर्स वर्णन करते हैं, वैसे यह वर्णन करें कि इनके फीचर्स से पवित्रता दिखाई देती है, नयनों में पवित्रता की झलक है, मुख पर पवित्रता की मुस्कराहट है। और कोई बात उन्हें नज़र न आये। इसको कहते हैं पवित्रता के श्रृंगार से श्रृंगारी हुई मूर्त। समझा? पवित्रता की तो और भी बहुत गुह्यता है, वह फिर सुनाते रहेंगे। जैसे कर्मों की गति गहन है, पवित्रता की परिभाषा भी बड़ी गुह्य है और पवित्रता ही फाउण्डेशन है। अच्छा।
आज गुजरात आया है। गुजरात वाले सदा हल्के बन नाचते और गाते हैं। चाहे शरीर में कितने भी भारी हों लेकिन हल्के बन नाचते हैं। गुजरात की विशेषता है – सदा हल्का रहना, सदा खुशी में नाचते रहना और बाप के वा अपने प्राप्तियों के गीत गाते रहना। बचपन से ही नाचते-गाते अच्छा हैं। ब्राह्मण जीवन में क्या करते हो? ब्राह्मण जीवन अर्थात् मौजों की जीवन। गरबा रास करते हो तो मौज में आ जाते हो ना। अगर मौज में न आये तो ज्यादा कर नहीं सकेंगे। मौज-मस्ती में थकावट नहीं होती है, अथक बन जाते हैं। तो ब्राह्मण जीवन अर्थात् सदा मौज में रहने की जीवन, वह है स्थूल मौज और ब्राह्मण जीवन की है मन की मौज। सदा मन मौज में नाचता और गाता रहे। वह लोग हल्के बन नाचने-गाने के अभ्यासी हैं। तो इन्हों को ब्राह्मण जीवन में भी डबल लाइट (हल्का) बनने में मुश्किल नहीं होती। तो गुजरात अर्थात् सदा हल्के रहने के अभ्यासी कहो, वरदानी कहो। तो सारे गुजरात को वरदान मिल गया – डबल लाइट। मुरली द्वारा भी वरदान मिलते हैं ना।
सुनाया ना आपकी इस दुनिया में यथा शक्ति, यथा समय होता है। यथा और तथा। और वतन में तो यथा-तथा की भाषा ही नहीं है। यहाँ दिन भी तो रात भी देखना पड़ता। वहाँ न दिन, न है रात; न सूर्य उदय होता, न चन्द्रमा। दोनों से परे है। आना तो वहाँ है ना। बच्चों ने रूहरिहान में कहा ना कि कब तक? बापदादा कहते हैं कि आप सभी कहो कि हम तैयार हैं तो ‘अभी’ कर लेंगे। फिर ‘कब’ का तो सवाल ही नहीं है। ‘कब’ तब तक है जब तक सारी माला तैयार नहीं हुई है। अभी नाम निकालने बैठते हो तो 108 में भी सोचते हो कि यह नाम डालें वा नहीं? अभी 108 की माला में भी सभी वही 108 नाम बोलें। नहीं, फर्क हो जायेगा। बापदादा तो अभी घड़ी ताली बजावे और ठकाठक शुरू हो जायेगी – एक तरफ प्रकृति, एक तरफ व्यक्तियाँ। क्या देरी लगती। लेकिन बाप का सभी बच्चों में स्नेह है। हाथ पकड़ेंगे, तब तो साथ चलेंगे। हाथ में हाथ मिलाना अर्थात् समान बनना। आप कहेंगे – सभी समान अथवा सभी तो नम्बरवन बनेंगे नहीं। लेकिन नम्बरवन के पीछे नम्बर टू होगा। अच्छा, बाप समान नहीं बनें लेकिन नम्बरवन दाना जो होगा वह समान होगा। तीसरा दो के समान बने। चौथा तीन के समान बने। ऐसे तो समान बनें, तो एक दो के समीप होते-होते माला तैयार हो। ऐसी स्टेज तक पहुँचना अर्थात् समान बनना। 108 दाना 107 से तो मिलेगा ना। उन जैसी विशेषता भी आ जाए तो भी माला तैयार हो जायेगी। नम्बरवार तो होना ही है। समझा? बाप तो कहते – अभी कोई है गैरन्टी करने वाला कि हाँ, सब तैयार हैं? बापदादा को तो सेकेण्ड लगता। दृश्य दिखाते थे ना – ताली बजाई और परियाँ आ गई। अच्छा।
चारों ओर के परम पूज्य श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व सम्पूर्ण पवित्रता के लक्ष्य तक पहुँचने वाले तीव्र पुरूषार्थी आत्माओं को, सदा हर कर्म में विधिपूर्वक कर्म करने वाले सिद्धि-स्वरूप आत्माओं को, सदा हर समय पवित्रता के श्रृंगार में सजी हुई विशेष आत्माओं को बापदादा का स्नेह सम्पन्न यादप्यार स्वीकार हो।
पार्टियों से मुलाकात:-
1\. विश्व में सबसे ज्यादा श्रेष्ठ भाग्यवान अपने को समझते हो? सारा विश्व जिस श्रेष्ठ भाग्य के लिए पुकार रहा है कि हमारा भाग्य खुल जाए… आपका भाग्य तो खुल गया। इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी! भाग्यविधाता ही हमारा बाप है ऐसा नशा है ना! जिसका नाम ही भाग्यविधाता है उसका भाग्य क्या होगा! इससे बड़ा भाग्य कोई हो सकता है? तो सदा यह खुशी रहे कि भाग्य तो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार हो गया। बाप के पास जो भी प्रॉपर्टी होती है, बच्चे उसके अधिकारी होते हैं। तो भाग्यविधाता के पास क्या है? भाग्य का खज़ाना। उस खज़ाने पर आपका अधिकार हो गया। तो सदैव ‘वाह मेरा भाग्य और भाग्य-विधाता बाप’! यही गीत गाते खुशी में उड़ते रहो। जिसका इतना श्रेष्ठ भाग्य हो गया उसको और क्या चाहिए? भाग्य में सब कुछ आ गया। भाग्यवान के पास तन-मन-धन-जन सब कुछ होता है। श्रेष्ठ भाग्य अर्थात् अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। कोई अप्राप्ति है? मकान अच्छा चाहिए, कार अच्छी चाहिए… नहीं। जिसको मन की खुशी मिल गई, उसे सर्व प्राप्तियाँ हो गई! कार तो क्या लेकिन कारून का खजाना मिल गया! कोई अप्राप्त वस्तु है ही नहीं। ऐसे भाग्यवान हो! विनाशी इच्छा क्या करेंगे। जो आज है, कल है ही नहीं – उसकी इच्छा क्या रखेंगे। इसलिए, सदा अविनाशी खज़ाने की खुशियों में रहो जो अब भी है और साथ में भी चलेगा। यह मकान, कार वा पैसे साथ नहीं चलेंगे लेकिन यह अविनाशी खज़ाना अनेक जन्म साथ रहेगा। कोई छीन नहीं सकता, कोई लूट नहीं सकता। स्वयं भी अमर बन गये और खज़ाने भी अविनाशी मिल गये! जन्म-जन्म यह श्रेष्ठ प्रालब्ध साथ रहेगी। कितना बड़ा भाग्य है! जहाँ कोई इच्छा नहीं, इच्छा मात्रम् अविद्या है – ऐसा श्रेष्ठ भाग्य भाग्यविधाता बाप द्वारा प्राप्त हो गया।
2\. अपने को बाप के समीप रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? बाप के बन गये – यह खुशी सदा रहती है? दु:ख की दुनिया से निकल सुख के संसार में आ गये। दुनिया दु:ख में चिल्ला रही है और आप सुख के संसार में, सुख के झूले में झूल रहे हो। कितना अन्तर है! दुनिया ढूँढ रही है और आप मिलन मना रहे हो। तो सदा अपनी सर्व प्राप्तियों को देख हर्षित रहो। क्या-क्या मिला है, उसकी लिस्ट निकालो तो बहुत लम्बी लिस्ट हो जायेगी। क्या-क्या मिला? तन में खुशी मिली, तो तन की तन्दरुस्ती है; मन में शान्ति मिली, तो शान्ति मन की विशेषता है और धन में इतनी शक्ति आई जो दाल-रोटी 36 प्रकार के समान अनुभव हो।
ईश्वरीय याद में दाल-रोटी भी कितनी श्रेष्ठ लगती है! दुनिया के 36 प्रकार हों और आप की दाल-रोटी हो तो श्रेष्ठ क्या लगेगा? दाल-रोटी अच्छी है ना। क्योंकि प्रसाद है ना। जब भोजन बनाते हो तो याद में बनाते हो, याद में खाते हो तो प्रसाद हो गया। प्रसाद का महत्व होता है। आप सभी रोज़ प्रसाद खाते हो। प्रसाद में कितनी शक्ति होती है! तो तन-मन-धन सभी में शक्ति आ गई। इसलिए कहते हैं अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खजाने में। तो सदा इन प्राप्तियों को सामने रख खुश रहो, हर्षित रहो, अच्छा।
3\. अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? ब्राह्मणों को सदा ऊंचे ते ऊंची चोटी दिखाते हैं। चोटी का अर्थ ही हैं ऊंचा। तो संगमयुगी अर्थात् ऊंचे ते ऊंची आत्मायें। जैसे बाप ऊंचे ते ऊंचा गाया हुआ है, ऐसे बच्चे भी ऊंचे और संगमयुग भी ऊंचा है। सारे कल्प में संगमयुग जैसा ऊंचा कोई युग नहीं है क्योंकि इस युग में ही बाप और बच्चों का मिलन होता है। और कोई युग में आत्मा और परमात्मा का मेला नहीं होता है। तो जहाँ आत्मा और परमात्मा का मेला है, वही श्रेष्ठ युग हुआ ना। ऐसे श्रेष्ठ युग की श्रेष्ठ आत्मायें हो! आप श्रेष्ठ ब्राह्मणों का कार्य क्या है? ब्राह्मणों का काम है पढ़ना और पढ़ाना। नामधारी ब्राह्मण भी शास्त्र पढ़ेंगे और दूसरों को सुनायेंगे। तो आप ब्राह्मणों का काम है ईश्वरीय पढ़ाई पढ़ना और पढ़ाना जिससे ईश्वर के बन जायें। तो ऐसे करते हो? पढ़ते भी और पढ़ाते अर्थात् सेवा भी करते हो। यह ईश्वरीय ज्ञान देना ही ईश्वरीय सेवा है। सेवा का सदा ही मेवा मिलता है। कहावत है ना – “करो सेवा तो मिले मेवा।” तो ईश्वरीय सेवा करने से अतीन्द्रिय सुख का मेवा मिलता है, शक्तियों का मेवा मिलता है, खुशी का मेवा मिलता है। तो ऐसा मेवा मिला है ना? कितनी पात्र आत्मायें हों जो इस ईश्वरीय फल के अधिकारी बन गई! आप ब्राह्मणों के सिवाए और कोई भी इस फल के अधिकारी नहीं बन सकते। अधिकारी भी कौन बने हैं? जिनमें किसी की उम्मीद नहीं, वह उम्मीदवार बन गये! दुनिया वाले माताओं के लिए कहते हैं – इनका कोई अधिकार नहीं है और बाप ने माताओं को विशेष अधिकारी बनाया है, माताओं को इस सेवा की विशेष जिम्मेवारी दी है। दुनिया वालों ने पांव की जुत्ती बना दिया और बाप ने सिर का ताज बना दिया। तो साधारण मातायें नहीं हो, अभी तो बाप के सिर के ताज बन गई।
4\. सदा अपने को बेफिकर अनुभव करते हो? प्रवृत्ति का या कोई भी कार्य का फिकर तो नहीं रहता है? बेफिकर रहते हो? बेफिकर कैसे बने? सब कुछ तेरा करने से। मेरा कुछ नहीं, बस तेरा है। जब तेरा है तो फिकर किस बात का? जिन्होंने सब कुछ तेरा किया, वही बेफिकर बादशाह बनते हैं। ऐसे नहीं जो चीज़ मतलब की है वह मेरी है, जो चीज़ मतलब की नहीं वह तेरी। जीवन में हर एक बेफिकर रहना चाहता है। जहाँ फिकर नहीं, वहाँ सदा खुशी होगी। तो तेरा कहने से, बेफिकर बनने से खुशी के खजाने भरपूर हो जाते हैं। बादशाह के पास खजाना भरपूर होता है। तो आप बेफिकर बादशाहों के पास अनगिनत, अखुट, अविनाशी खजाने हैं जो सतयुग में नहीं होंगे। इस समय के खजाने श्रेष्ठ खजाने हैं। तो मातायें बेफिकर बादशाह बनीं? जब मेरा-मेरा है तो फिकर है। जब ‘तेरा’ कह दिया तो बाप जाने, बाप का काम जाने, आप निश्चिंत हो गये। ‘तेरा’ और ‘मेरा’ शब्द में थोड़ा-सा अन्तर है। ‘तेरा’ कहना – सब प्राप्त होना, ‘मेरा’ कहना – सब गंवाना। द्वापर से मेरा-मेरा कहा तो क्या हुआ? सब गंवा दिया ना। तन्दरुस्ती भी चली गई, मन की शान्ति भी चली गई और धन भी चला गया। कहाँ विश्व के राजन और कहाँ छोटे-मोटे दफ्तर में क्लर्क बन गये, बिजनेसमैन हो गये जो विश्व महाराजा के आगे कुछ नहीं है। तो मेरा-मेरा कहने से गंवाया और तेरा-तेरा कहने से जमा हो जाता। तो जमा करने में होशियार हो? मातायें एक-एक पैसा इकट्ठा करके जमा करती हैं। जमा करने में मातायें होशियार होती हैं। तो यह जमा करना आता है? यहाँ खर्च करना भी खर्च नहीं है, जमा करना है। जितना खर्चा करते हो अर्थात् दूसरों को देते हो, उतना पद्मगुणा होता है। एक देना और पद्म लेना। अच्छा।
5\. सदा याद और सेवा के बैलेन्स से बाप की ब्लैसिंग अनुभव करते हो? जहाँ याद और सेवा का बैलेन्स है अर्थात् समानता है, वहाँ बाप की विशेष मदद अनुभव होती है। तो मदद की आशीर्वाद है। क्योंकि बापदादा और अन्य आत्माओं के माफिक आशीर्वाद नहीं देते हैं। बाप तो है ही अशरीरी, तो बापदादा की आशीर्वाद है – सहज, स्वत: मदद मिलना जिससे जो असम्भव बात हो वह सम्भव हो जाये। यही मदद अर्थात् आशीर्वाद है। लौकिक गुरुओं के पास भी आशीर्वाद के लिए जाते हैं। तो जो असम्भव बात होती, वह अगर सम्भव हो जाती तो समझते हैं यह गुरु की आशीर्वाद है। तो बाप भी असम्भव से सम्भव कर दिखाते हैं। दुनिया वाले जिन बातों को असम्भव समझते हैं, उन्हीं बातों को आप सहज समझते हो। तो यही आशीर्वाद है। एक कदम उठाते हो और पद्मों की कमाई जमा होती है। तो यह आशीर्वाद हुई ना। तो ऐसे बाप की व सतगुरु की आशीर्वाद के पात्र आत्मायें हो। दुनिया वाले पुकारते रहते हैं और आप प्राप्ति स्वरूप बन गये।
ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार – ‘पवित्रता’
(अव्यक्त मुरली, 18-01-1987 से प्रेरित)
1️⃣ विश्व के “जहान के नूर” – पूज्य आत्माओं का महत्व
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“पूजनीय आत्मायें ही विश्व के लिए जहान के नूर बन जाती हैं।”
बापदादा कहते हैं — जैसे शरीर में नूर न हो तो जीवन नहीं, वैसे ही विश्व में पूज्य आत्माएँ न हों तो विश्व का महत्व नहीं।
उदाहरण:
यदि दीपक में प्रकाश न हो तो दीपक का क्या मूल्य?
ऐसे ही आत्मा में पवित्रता का प्रकाश न हो तो वह विश्व परिवर्तन का निमित्त कैसे बने?
🔹 स्वर्ण युग का आरम्भ पूजनीय आत्माओं से होता है।
🔹 आपकी चढ़ती कला से विश्व की चढ़ती कला जुड़ी है।
🔹 आपका पतन, विश्व का पतन।
🔹 आपका उत्थान, विश्व का उत्थान।
2️⃣ ब्राह्मण से देवता – पर नम्बरवार क्यों?
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“सभी देवतायें पूजनीय हैं, फिर भी नम्बरवार हैं।”
सभी ब्राह्मण ज्ञान-योग करते हैं। फिर पूजा में अन्तर क्यों?
कारण: धारणा में अन्तर।
उदाहरण:
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कोई देवता का रोज विधिपूर्वक श्रृंगार होता है।
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किसी का कभी-कभी।
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किसी के हर कर्म की पूजा होती है।
-
किसी के केवल नाम की।
आधार क्या? पवित्रता की गहराई।
3️⃣ सम्पूर्ण पवित्रता क्या है?
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“मन, वाणी, कर्म और स्वप्न में भी पवित्रता – यही सम्पूर्ण पवित्रता है।”
चार प्रकार की पवित्रता:
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मन में पवित्र संकल्प
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वाणी में मधुरता और शुद्धता
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कर्म व सम्बन्ध में पवित्रता
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स्वप्न में भी पवित्रता
उदाहरण:
यदि स्वप्न में भी ईर्ष्या, क्रोध, ब्रह्मचर्य में खण्डन हो — तो पवित्रता में कमी मानी जायेगी।
खण्डित मूर्ति मंदिर में नहीं रहती — म्यूज़ियम में रहती है।
ऐसे ही खण्डित पवित्रता पूज्य पद से नीचे ले आती है।
4️⃣ अलबेलापन – सूक्ष्म अपवित्रता
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“अलबेलापन भी अपवित्रता के खाते में जमा होता है।”
कभी कहते हैं:
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“भाव तो अच्छा था…”
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“हँसी-मज़ाक में कह दिया…”
-
“ऐसा इरादा नहीं था…”
यह भी चलाना है।
उदाहरण:
अगर अमृतवेला नियमित नहीं, तो पुजारी भी समय पर पूजा नहीं करेगा।
दिनचर्या में ढीलापन = पूजा में ढीलापन।
5️⃣ पवित्रता – ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“पवित्रता ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार है।”
पवित्रता केवल ब्रह्मचर्य नहीं है।
यह जीवन की आभा है।
पहचान क्या?
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नयनों में पवित्रता की झलक
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मुख पर पवित्र मुस्कान
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चलन में शुद्धता
-
वाणी में अर्थपूर्णता
उदाहरण:
जैसे किसी के फीचर्स की चर्चा होती है, वैसे कहा जाए —
“इनके चेहरे से पवित्रता झलकती है।”
6️⃣ गुजरात की मौज और ब्राह्मण जीवन
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“ब्राह्मण जीवन अर्थात् मौजों की जीवन।”
गुजरात वालों की विशेषता — हल्के रहना, नाचते-गाते रहना।
स्थूल गरबा रास की मौज
ब्राह्मण जीवन की मन की मौज
उदाहरण:
जब मन हल्का हो, तब सेवा में थकावट नहीं होती।
डबल लाइट स्थिति ही सच्ची मौज है।
7️⃣ “कब तक?” – माला कब तैयार होगी?
मुरली बिंदु (18-01-1987):
“जब माला तैयार होगी, तब ‘कब’ समाप्त हो जायेगा।”
108 की माला में भी नाम समान नहीं।
समानता का अर्थ —
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समान गुण
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समान पवित्रता
-
समान लक्ष्य
एक नम्बरवन के पीछे नम्बर टू,
दो के पीछे तीन —
ऐसे समान बनते-बनते माला तैयार होगी।
8️⃣ भाग्यवान आत्मा – अविनाशी खजाना
मुरली संवाद:
“वाह मेरा भाग्य और भाग्य-विधाता बाप!”
उदाहरण:
दुनिया कार और मकान चाहती है।
आपको अविनाशी खजाना मिला।
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तन में खुशी
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मन में शांति
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धन में शक्ति
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सेवा में मेवा
दाल-रोटी भी प्रसाद बन जाती है जब याद में खाई जाए।
9️⃣ बेफिक्र बादशाह कैसे बनें?
मुरली बिंदु:
“‘तेरा’ कहने से बेफिक्र बादशाह बन जाते हैं।”
‘मेरा’ = फिक्र
‘तेरा’ = बेफिक्री
उदाहरण:
द्वापर से “मेरा-मेरा” कहा — सब गंवा दिया।
अब “तेरा” कहो — सब जमा हो जायेगा।
🔟 याद और सेवा का बैलेन्स
जहाँ याद और सेवा में समानता है —
वहाँ स्वतः बाप की मदद मिलती है।
असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।
यही सच्ची आशीर्वाद है।
निष्कर्ष
पवित्रता ही ब्राह्मण जीवन की नींव और श्रृंगार है।
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मन में शुद्धता
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वाणी में मधुरता
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कर्म में यथार्थता
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स्वप्न में भी निर्मलता
जब यह चारों सम्पूर्ण होंगे —
तब ही विधिपूर्वक पूज्य पद मिलेगा।
आओ संकल्प लें —
सिर्फ नियमों की पवित्रता नहीं,
बल्कि स्वभाविक, सहज, निरन्तर पवित्रता अपनाएँ।
1. पूजनीय आत्माओं को “जहान के नूर” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि जैसे शरीर में नूर (प्रकाश) न हो तो जीवन नहीं, वैसे ही विश्व में पूजनीय आत्माएँ न हों तो विश्व का महत्व नहीं। ब्राह्मण आत्माएँ ही नये विश्व की आधारमूर्ति हैं। उनकी चढ़ती कला से विश्व की चढ़ती कला जुड़ी है। जब वे परिवर्तन होते हैं, तो विश्व परिवर्तन होता है।
2. सभी ब्राह्मण ज्ञान-योग पढ़ते हैं, फिर भी नम्बरवार क्यों हो जाते हैं?
उत्तर:
अन्तर “धारणा” में है।
सभी पढ़ते हैं, लेकिन सभी समान रूप से धारण नहीं करते।
जितनी गहरी पवित्रता की धारणा, उतना ऊँचा पूज्य पद।
3. पूजनीय बनने का मुख्य आधार क्या है?
उत्तर:
पूजनीय बनने का विशेष आधार पवित्रता है।
जितना सर्व प्रकार की पवित्रता को अपनाते हैं, उतना ही सर्व प्रकार से पूजनीय बनते हैं।
4. “सर्व प्रकार की पवित्रता” से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सर्व प्रकार की पवित्रता का अर्थ है –
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मन में पवित्र संकल्प
-
वाणी में शुद्धता
-
कर्म और सम्बन्ध में पवित्रता
-
स्वप्न में भी कोई खण्डन न हो
यदि स्वप्न में भी ईर्ष्या, क्रोध या विकार का अंश आता है, तो वह भी पवित्रता का खण्डन माना जाता है।
5. खण्डित पवित्रता का क्या परिणाम होता है?
उत्तर:
खण्डित मूर्ति मंदिर में नहीं रखी जाती, म्यूज़ियम में रखी जाती है।
इसी प्रकार पवित्रता में खण्डन होने पर आत्मा पूज्य पद से नीचे आ जाती है।
चारों प्रकार की पवित्रता विधिपूर्वक होगी तो पूजा भी विधिपूर्वक होगी।
6. क्या केवल ब्रह्मचर्य ही पवित्रता है?
उत्तर:
नहीं।
पवित्रता केवल ब्रह्मचर्य तक सीमित नहीं है।
यह तो ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार है।
हर संकल्प, हर शब्द, हर कर्म और हर दृष्टि में शुद्धता ही वास्तविक पवित्रता है।
7. “अलबेलापन” को अपवित्रता क्यों कहा गया है?
उत्तर:
जब कोई कहता है —
“भाव तो अच्छा था, बोल निकल गया”
“हँसी-मजाक में कह दिया”
तो यह भी चलाना है।
यह ढीलापन पवित्रता की सूक्ष्म कमी है और पूज्य पद को नम्बरवार बना देता है।
8. दिनचर्या का पूज्य बनने से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
यदि अमृतवेला, योग, सेवा आदि में विधिपूर्वक नहीं चलते, तो पूजा में भी अन्तर पड़ता है।
जो आत्मा अपने हर कर्म में यथार्थ और युक्तियुक्त रहती है, उसकी पूरे दिनचर्या की पूजा होती है।
9. “पवित्रता का श्रृंगार” दिखाई कैसे देता है?
उत्तर:
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नयनों में शुद्धता की झलक
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मुख पर पवित्र मुस्कान
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चलन में मर्यादा
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वाणी में अर्थपूर्णता
ऐसी आत्मा को देखकर ही पवित्रता अनुभव होती है।
10. ब्राह्मण जीवन को “मौजों की जीवन” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
ब्राह्मण जीवन का अर्थ है — मन की मौज।
जब आत्मा हल्की और डबल लाइट रहती है, तो सेवा में थकावट नहीं होती।
सच्ची मौज बाहरी नहीं, आन्तरिक हल्केपन की होती है।
11. 108 की माला कब तैयार होगी?
उत्तर:
जब सभी आत्माएँ समानता के समीप पहुँचेंगी।
नम्बरवन के पीछे नम्बर टू, फिर तीन —
ऐसे समान गुण और पवित्रता अपनाने से माला तैयार होगी।
12. सच्चा श्रेष्ठ भाग्य क्या है?
उत्तर:
भाग्यविधाता बाप को पाना ही सर्वोच्च भाग्य है।
जिसके पास मन की शांति और आत्मिक खुशी है, उसके लिए कोई अप्राप्ति नहीं।
विनाशी वस्तुएँ साथ नहीं जाएँगी, पर अविनाशी खजाना अनेक जन्म साथ रहेगा।
13. “बेफिक्र बादशाह” कैसे बनें?
उत्तर:
“मेरा” से फिक्र आती है।
“तेरा” से निश्चिन्तता आती है।
जब सब कुछ बाप को अर्पण कर दिया, तो चिंता समाप्त।
तेरा कहना = सब प्राप्त करना
मेरा कहना = सब गंवाना
14. याद और सेवा का बैलेन्स क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
जहाँ याद और सेवा में समानता है, वहाँ स्वतः बाप की मदद मिलती है।
असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।
यही सच्ची आशीर्वाद है।
Disclaimer
यह आध्यात्मिक अध्याय Brahma Kumaris की अव्यक्त मुरली (18-01-1987) पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति है। यह किसी भी धर्म, समुदाय या व्यक्ति की आलोचना हेतु नहीं है। दर्शक इसे आत्म-अनुभव और मनन के रूप में ग्रहण करें।
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