MURLI 28-02-2026 |BRAHMA KUMARIS

YouTube player

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

28-02-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय हो, तुम्हें ज्ञान सूर्य बाप मिला है, अभी तुम जागे हो तो दूसरों को भी जगाओ”
प्रश्नः- अनेक प्रकार के टकराव का कारण तथा उसका निवारण क्या है?
उत्तर:- जब देह-अभिमान में आते हो तो अनेक प्रकार के टकराव होते हैं। माया की ग्रहचारी बैठती है। बाबा कहते देही-अभिमानी बनो, सर्विस में लग जाओ। याद की यात्रा में रहो तो ग्रहचारी मिट जायेगी।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों के पास बाप आये हैं श्रीमत देने वा समझाने। यह तो बच्चे समझ गये हैं कि ड्रामा प्लैन अनुसार सारा कार्य होना है। बाकी समय थोड़ा रहा है। इस भारत को रावणपुरी से फिर विष्णुपुरी बनाना है। अब बाप भी है गुप्त। पढ़ाई भी गुप्त है, सेन्टर्स तो बहुत हैं, छोटे-बड़े गांव में छोटे-बड़े सेन्टर्स हैं और बच्चे भी बहुत हैं। अब बच्चों ने चैलेन्ज तो दी है और लिखना भी है, जब कोई लिटरेचर बनाना है तो उसमें लिखना है – हम इस अपनी भारत भूमि को स्वर्ग बनाकर छोड़ेंगे। तुमको भी अपनी भारत भूमि बहुत प्रिय है क्योंकि तुम जानते हो यह भारत ही स्वर्ग था, इनको 5 हज़ार वर्ष हुए हैं। भारत बहुत शानदार था, इनको स्वर्ग कहा जाता है। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली को ही नॉलेज है। इस भारत को श्रीमत पर हमको स्वर्ग जरूर बनाना है। सबको रास्ता बताना है, और कोई खिटपिट की बात ही नहीं। आपस में बैठ राय करनी चाहिए कि इन प्रदर्शनी के चित्रों द्वारा हम ऐसी क्या एडवरटाइजमेंट करें, जो अखबार में भी चित्र दें, आपस में इस पर सेमीनार करना चाहिए। जैसे गवर्मेन्ट के लोग आपस में मिलते हैं, राय करते हैं कि भारत को हम कैसे सुधारें? यह जो इतने मतभेद हो गये हैं, उनको आपस में मिलकर ठीक करें और भारत में शान्ति सुख कैसे स्थापन करें! उस गवर्मेंन्ट का भी पुरुषार्थ चलता है। तुम भी पाण्डव गवर्मेन्ट गाई हुई हो। यह बड़ी ईश्वरीय गवर्मेन्ट है, इनको वास्तव में कहा ही जाता है पावन ईश्वरीय गवर्मेन्ट, पतित-पावन बाप ही पतित बच्चों को बैठ पावन दुनिया का मालिक बनाते हैं। यह बच्चे ही जानते हैं। मुख्य है ही भारत का आदि सनातन देवी देवता धर्म। यह भी बच्चे जानते हैं यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। रूद्र कहा ही जाता है ईश्वर बाप को, शिव को। गाया हुआ है बरोबर बाप ने आकर रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा था। उन्हों ने तो टाइम लम्बा चौड़ा दे दिया है। अज्ञान नींद में सोये हुए हैं। अभी तुमको बाप ने जगाया है, तुमको फिर औरों को जगाना है। ड्रामा प्लैन अनुसार तुम जगाते रहते हो। इस समय तक जिसने जैसे-जैसे, जितना-जितना पुरुषार्थ किया है, उतना ही कल्प पहले भी किया था। हाँ, युद्ध के मैदान में उतराव चढ़ाव तो होता ही है। कभी माया का जोर हो जाता है, कभी ईश्वरीय सन्तान का जोर हो जाता है। कभी-कभी सर्विस बड़ी अच्छी तेजी से चलती है। कभी कहाँ-कहाँ बच्चों में माया के विघ्न पड़ जाते हैं। माया एकदम बेहोश कर देती है। लड़ाई का मैदान तो है ना। रावण माया राम की सन्तान को बेहोश कर देती है। लक्ष्मण के लिए भी कहानी है ना।

तुम कहते हो सब मनुष्य कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय ही ऐसे कहते हो, जिनको ज्ञान सूर्य मिला है और जाग उठे हैं, वही समझेंगे। इसमें एक दो को कहने की भी कोई बात नहीं है। तुम जानते हो बरोबर हम ईश्वरीय सम्प्रदाय जागे हैं। बाकी दूसरे सब सोये हुए हैं। वह यह नहीं जानते कि परमपिता परमात्मा आ गया है, बच्चों को वर्सा देने। यह बिल्कुल भूल गये हैं। बाप भारत में ही आते हैं। आकर भारत को स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। भारत स्वर्ग का मालिक था, इसमें कोई संशय नहीं। परमपिता परमात्मा का जन्म भी यहाँ ही होता है। शिवजयन्ती मनाते हैं ना। जरूर उसने आकर कुछ तो किया होगा ना। बुद्धि कहती है जरूर आकर स्वर्ग की स्थापना की होगी। प्रेरणा से थोड़ेही स्थापना होगी। यहाँ तो तुम बच्चों को राजयोग सिखाया जाता है। याद की यात्रा समझाई जाती है। प्रेरणा से कोई आवाज होता ही नहीं। समझते हैं शंकर की भी प्रेरणा होती है तब वह यादव मूसल आदि बनाते हैं। परन्तु इसमें प्रेरणा की तो कोई बात ही नहीं है। तुम समझ गये हो उन्हों का पार्ट है ड्रामा में यह मूसल आदि बनाने का। प्रेरणा की बात नहीं है। ड्रामा अनुसार विनाश तो जरूर होना ही है। गाया हुआ है – महाभारत लड़ाई में मूसल काम आये। तो जो पास्ट हो गया है वह फिर रिपीट होगा।

तुम गैरन्टी करते हो हम भारत में स्वर्ग स्थापन करेंगे, जहाँ एक धर्म होगा। तुम ऐसे नहीं लिखते कि अनेक धर्म विनाश होंगे। वह तो चित्र में लिखा हुआ है – स्वर्ग की स्थापना होती है तो दूसरा कोई धर्म नहीं होता। अभी तुमको समझ में आता है। सबसे बड़ा पार्ट है शिव का, ब्रह्मा का और विष्णु का। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा – यह तो बड़ी गुह्य बातें हैं। विष्णु से ब्रह्मा कैसे बनते हैं, ब्रह्मा से फिर विष्णु कैसे बनते हैं, यह सेन्सीबुल बच्चों की बुद्धि में झट आ जाता है। दैवी सम्प्रदाय तो बनते ही हैं। एक की बात नहीं है। इन बातों को तुम बच्चे समझते हो। दुनिया में एक भी मनुष्य नहीं समझता। भल लक्ष्मी-नारायण वा विष्णु की पूजा भी करते हैं परन्तु उनको यह पता नहीं है कि विष्णु के ही दो रूप लक्ष्मी-नारायण हैं, जो नई दुनिया में राज्य करते हैं। बाकी 4 भुजा वाला कोई मनुष्य नहीं होता। यह सूक्ष्मवतन में एम ऑबजेक्ट दिखलाते हैं प्रवृत्ति मार्ग का। यह सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे चक्र लगाती है, यह कोई नहीं जानते। बाप को ही नहीं जानते तो बाप की रचना को कैसे जान सकते। बाप ही रचना के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज बताते हैं, ऋषि-मुनि भी कहते थे हम नहीं जानते हैं। बाप को जान जाएं तो रचना के आदि-मध्य-अन्त को भी जान जायें। बाप कहते हैं मैं एक ही बार आकर तुम बच्चों को भी सारी नॉलेज समझाता हूँ फिर आता ही नहीं हूँ। तो रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानें ही कैसे? बाप स्वयं कहते हैं – मैं सिवाए संगमयुग के कभी आता ही नहीं हूँ। मुझे बुलाते भी संगम पर हैं। पावन सतयुग को कहा जाता है, पतित कलियुग को कहा जाता है। तो जरूर मैं आऊंगा पतित दुनिया के अन्त में ना। कलियुग के अन्त में आकर पतित से पावन बनाते हैं। सतयुग आदि में पावन हैं, यह तो सहज बात है ना। मनुष्य कुछ भी समझ नहीं सकते कि पतित-पावन बाप कब आयेंगे। अभी तो कलियुग का अन्त कहेंगे। अगर कहते हैं कलियुग में अजुन 40 हज़ार वर्ष पड़े हैं तो और कितना पतित बनेंगे! कितना दु:ख होगा! सुख तो होगा ही नहीं। कुछ भी मालूम न होने कारण बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में हैं। तुम समझ सकते हो। तो बच्चों को आपस में मिलना है। चित्रों पर अच्छी रीति समझाना होता है। यह भी ड्रामा अनुसार चित्र आदि सब निकाले हैं। बच्चे समझते हैं जो समय पास होता है, हूबहू ड्रामा चलता रहता है। बच्चों की अवस्थायें भी कभी नीचे, कभी ऊपर होती रहेंगी। बड़ी समझने की बातें हैं। कभी-कभी ग्रहचारी आकर बैठती है तो उनको मिटाने के लिए कितने प्रयत्न करते हैं।

बाबा घड़ी-घड़ी कहते हैं – बच्चे, तुम देह-अभिमान में आते हो इसलिए टक्कर होता है, इसमें देही-अभिमानी बनना पड़े। बच्चों मे देह-अभिमान बहुत है। तुम देही-अभिमानी बनो तो बाप की याद रहेगी और सर्विस में उन्नति करते रहेंगे। ऊंच पद जिनको पाना है वह सदैव सर्विस में लगे रहेंगे। तकदीर में नहीं है तो फिर तदबीर भी नहीं होगी। खुद कहते हैं बाबा हमको धारणा नहीं होती। बुद्धि में नहीं बैठता, जिनको धारणा होती है तो खुशी भी बहुत होती है। समझते हैं शिवबाबा आया हुआ है, अब बाप कहते हैं बच्चे तुम अच्छी रीति समझकर फिर औरों को समझाओ। कोई तो सर्विस में ही लगे रहते हैं। पुरुषार्थ करते रहते हैं। यह भी बच्चे जानते हैं जो सेकेण्ड गुज़रता है, वह ड्रामा में नूंध है फिर ऐसे ही रिपीट होगा। बच्चों को समझाया जाता है, बाहर भाषण आदि पर तो अनेक प्रकार के नये आते हैं, सुनने के लिए। तुम समझते हो गीता वेद शास्त्र आदि पर कितने मनुष्य भाषण करते हैं, उनको कोई यह थोड़ेही पता है कि यहाँ ईश्वर अपना और अपनी रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। रचयिता ही आकर सारा ज्ञान सुनाते हैं। त्रिकालदर्शी बनाना, यह बाप का ही काम है। शास्त्रों में यह बातें हैं नहीं। यह नई बातें हैं। बाबा बार-बार समझाते हैं कहाँ भी पहले-पहले यह समझाओ कि गीता का भगवान कौन है – श्रीकृष्ण या निराकार शिव? यह बातें प्रोजेक्टर पर तुम समझा नहीं सकेंगे। प्रदर्शनी में चित्र सामने रखा है, उस पर समझाकर तुम पूछ सकते हो। अब बताओ गीता का भगवान कौन? ज्ञान सागर कौन है? श्रीकृष्ण को तो कह नहीं सकेंगे। पवित्रता, सुख-शान्ति का सागर, लिबरेटर, गाइड कौन है? पहले-पहले तो लिखाना चाहिए, फॉर्म भराना चाहिए फिर सबसे सही लेनी चाहिए।

(चिड़ियाओं का आवाज़ हुआ) देखो कितना झगड़ती हैं। इस समय सारी दुनिया में लड़ाई-झगड़ा ही है। मनुष्य भी आपस में लड़ते रहते हैं। मनुष्य में ही समझने की बुद्धि है। 5 विकार भी मनुष्य में गाये जाते हैं। जानवरों की तो बात ही नहीं। यह है विशश वर्ल्ड। वर्ल्ड मनुष्यों के लिए ही कहा जाता है। कलियुग में हैं आसुरी सम्प्रदाय, सतयुग में हैं दैवी सम्पद्राय। अभी तुमको इस सारे कान्ट्रास्ट का पता है। तुम सिद्ध कर बता सकते हो। सीढ़ी में भी बड़ा क्लीयर दिखाया हुआ है। नीचे हैं पतित, ऊपर में हैं पावन। इनमें बड़ा क्लीयर है। सीढ़ी ही मुख्य है – उतरती कला और चढ़ती कला। ये सीढ़ी बड़ी अच्छी है, इनमें ऐसा क्या डालें जो मनुष्य बिल्कुल अच्छी रीति समझ जाएं कि बरोबर यह पतित दुनिया है, पावन दुनिया स्वर्ग थी। यहाँ सब पतित हैं, पावन एक भी हो नहीं सकता। रात-दिन यह ख्यालात चलना चाहिए। आत्म प्रकाश बच्चा लिखता है – बाबा यह चित्र बनायें, बाबा कहते हैं भल विचार सागर मंथन कर कोई भी चित्र बनाओ, परन्तु सीढ़ी बड़ी अच्छी बननी चाहिए। इस पर बहुत समझा सकते हैं। 84 जन्म पूरे कर फिर पहला नम्बर जन्म लिया है फिर उतरती कला से चढ़ती कला में जाना पड़े, इसमें हर एक का विचार चलना चाहिए। नहीं तो सर्विस कैसे कर सकेंगे। चित्रों पर समझाना बहुत सहज होता है। सतयुग के बाद सीढ़ी उतरनी होती है। यह भी बच्चे जानते हैं – हम पार्टधारी एक्टर्स हैं। यहाँ से ट्रांसफर हो सीधा सतयुग में नहीं जाते, पहले शान्तिधाम में जाना है। हाँ तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं जो अपने को पार्टधारी समझते हैं इस ड्रामा में। दुनिया में ऐसा कोई कह न सके कि हम पार्टधारी हैं। हम लिखते भी हैं कि पार्टधारी एक्टर्स होते हुए भी ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर, आदि-मध्य-अन्त को नहीं जान सकते तो वह फर्स्टक्लास बेसमझ हैं। यह तो भगवानुवाच है। शिव भगवानुवाच ब्रह्मा तन द्वारा। ज्ञान सागर वह निराकार है, उनको अपना शरीर है नहीं। बड़ी समझने की युक्तियाँ हैं। तुम बच्चों को बड़ा नशा रहना चाहिए, हम किसकी ग्लानि थोड़ेही करते हैं। यह तो राइट बात है ना। जो भी बड़े-बड़े हैं उन सबके चित्र तुम डाल सकते हो। सीढ़ी कोई को भी दिखला सकते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) भारत में सुख-शान्ति की स्थापना करने वा भारत को स्वर्ग बनाने के लिए आपस में सेमीनार करना है, श्रीमत पर भारत की ऐसी सेवा करनी है।

2) सर्विस में उन्नति करने वा सर्विस से ऊंच पद पाने के लिए देही-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है।

वरदान:- पवित्रता के आधार पर सुख-शान्ति का अनुभव करने वाले नम्बरवन अधिकारी भव
जो बच्चे “पवित्रता” की प्रतिज्ञा को सदा स्मृति में रखते हैं, उन्हें सुख-शान्ति की अनुभूति स्वत: होती है। पवित्रता का अधिकार लेने में नम्बरवन रहना अर्थात् सर्व प्राप्तियों में नम्बरवन बनना इसलिए पवित्रता के फाउण्डेशन को कभी कमजोर नहीं करना तब ही लास्ट सो फास्ट जायेंगे, इसी धर्म में सदा स्थित रहना – कुछ भी हो जाए – चाहे व्यक्ति, चाहे प्रकृति, चाहे परिस्थिति कितना भी हिलाये, लेकिन धरत परिये धर्म न छोड़िये।
स्लोगन:- व्यर्थ से इनोसेन्ट बनो तो सच्चे-सच्चे सेन्ट बन जायेंगे।

 

ये अव्यक्त इशारे – एकता और विश्वास की विशेषता द्वारा सफलता सम्पन्न बनो

बापदादा चाहते हैं कि हर बच्चा एकरस श्रेष्ठ स्थिति के आसनधारी, एकान्तवासी, अशरीरी, एकता स्थापक, एकनामी, एकॉनामी का अवतार बने। एक दो के विचारों को समझ, सम्मान दे, एक दो को इशारा दे, लेन-देन कर आपस में संगठन की शक्ति का स्वरूप प्रत्यक्ष करो क्योंकि आपके संगठन के एकता की शक्ति सारे ब्राह्मण परिवार को संगठन में लाने के निमित्त बनेगी।

प्रश्न 1: अनेक प्रकार के टकराव का कारण तथा उसका निवारण क्या है?

 उत्तर:

जब बच्चे देह-अभिमान में आ जाते हैं, तब अनेक प्रकार के टकराव उत्पन्न होते हैं। देह-अभिमान के कारण माया की ग्रहचारी बैठ जाती है और आपसी खिटपिट, मतभेद तथा असन्तोष बढ़ जाता है।

निवारण:

  • देही-अभिमानी बनो।

  • बाप की याद में रहो (याद की यात्रा)।

  • सर्विस में व्यस्त रहो।

जब आत्म-अभिमान में रहते हैं तो ग्रहचारी मिट जाती है और स्वभाव में शान्ति आ जाती है।


 प्रश्न 2: हमें “जागे हुए” क्यों कहा जाता है?

 उत्तर:

क्योंकि हमें ज्ञान सूर्य परमपिता परमात्मा शिव का ज्ञान मिला है।

दुनिया अज्ञान की नींद में सोई हुई है, जैसे कुम्भकरण की नींद। परन्तु हम ईश्वरीय सम्प्रदाय के बच्चे जाग चुके हैं — हमें पता है कि परमात्मा संगमयुग पर आकर स्वर्ग की स्थापना करते हैं।

अब हमारा कर्तव्य है —
जैसे हम जागे हैं, वैसे औरों को भी जगाना।


 प्रश्न 3: भारत को स्वर्ग बनाने की जिम्मेदारी किसकी है?

 उत्तर:

भारत को रावणपुरी से विष्णुपुरी बनाना — यह कार्य ईश्वरीय सन्तानों का है।

हम श्रीमत पर चलकर, राजयोग सिखाकर, ज्ञान का प्रचार करके भारत को फिर से स्वर्ग बनाएंगे।

यह कोई प्रेरणा से नहीं होगा, बल्कि:

  • राजयोग की शिक्षा से

  • याद की यात्रा से

  • आत्मा को पावन बनाने से


 प्रश्न 4: सेवा में उन्नति कैसे होगी?

 उत्तर:

जो ऊँच पद पाना चाहते हैं, वे सदा सेवा में लगे रहते हैं।

  • ज्ञान का विचार सागर मंथन करो

  • चित्रों द्वारा स्पष्ट समझाओ

  • आपस में सेमीनार कर नई-नई युक्तियाँ निकालो

  • देही-अभिमानी बनकर सेवा करो

देह-अभिमान सेवा में बाधा है, आत्म-अभिमान सेवा में उन्नति है।


 प्रश्न 5: “रूद्र ज्ञान यज्ञ” का क्या अर्थ है?

 उत्तर:

रूद्र अर्थात निराकार परमात्मा शिव।

यह वर्तमान संगमयुग में रचा गया ज्ञान यज्ञ है जिसमें:

  • अज्ञान की आहुति दी जाती है

  • विकारों का त्याग किया जाता है

  • आत्मा को पावन बनाया जाता है

इसी यज्ञ से नई दुनिया की स्थापना होती है।


 प्रश्न 6: गीता का भगवान कौन है?

 उत्तर:

ज्ञान सागर, पवित्रता और शान्ति का सागर — निराकार शिव।

श्रीकृष्ण नई दुनिया के प्रथम राजकुमार हैं, परन्तु ज्ञान देने वाले त्रिकालदर्शी निराकार परमात्मा ही हैं।

इसलिए पहले-पहले लोगों से पूछना चाहिए —
गीता का भगवान कौन है? श्रीकृष्ण या निराकार शिव?


 प्रश्न 7: ग्रहचारी मिटाने का मुख्य उपाय क्या है?

 उत्तर:

  • निरन्तर याद की यात्रा

  • देही-अभिमान का अभ्यास

  • सेवा में व्यस्तता

  • विचार सागर मंथन

जब आत्मा बाप से जुड़ती है तो माया का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

मीठेबच्चे, ईश्वरीयसम्प्रदाय, ज्ञानसूर्यबाप, शिवबाबा, राजयोग, यादकीयात्रा, देहीअभिमानी, देहअभिमान, मुरलीपॉइंट्स, ब्रह्माकुमारीज, संगमयुग, भारतसेस्वर्ग, रूद्रज्ञानयज्ञ, पवित्रताशक्ति, आत्मज्ञान, श्रीमत, आध्यात्मिकज्ञान, गीता_का_भगवान, त्रिकालदर्शी, संगठनकीशक्ति, OmShanti, BKKnowledge, SpiritualIndia, GodlyService, WorldTransformation,Sweet children, Godly community, Father, the Sun of Knowledge, Shiv Baba, Raj Yoga, the journey of remembrance, soul conscious, body conscious, Murli Points, Brahma Kumaris, Confluence Age, heaven from India, Rudra Gyan Yagya, power of purity, self-knowledge, Shrimat, spiritual knowledge, Lord of the Gita, Trikaldarshi, power of organization, Om Shanti, BKKnowledge, Spiritual India, Godly Service, World Transformation,