(18)क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
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क्या श्री कृष्ण भगवान थे?
आज हम 18वां विषय कर रहे हैं।
क्या श्री कृष्ण की आत्मा भोगेश्वर से योगेश्वर बनती है?
इस विषय पर आज हम मनन-चिंतन करेंगे।
पुजारी से पूज्य बनने तक आत्मा की वापसी यात्रा का अद्भुत रहस्य।
डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति Brahma Kumaris की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य किसी देवी-देवता, धर्म या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।
यह विषय आत्मा की चक्र यात्रा, योग अवस्था, भोग अवस्था और संगम युग के पुरुषार्थ की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है।
दर्शक इसे श्रद्धा एवं मनन की भावना से सुनें।
वापसी की कहानी
आज हम एक अत्यंत प्रेरणादायक प्रश्न पर मनन करेंगे —
क्या श्री कृष्ण की आत्मा भोगेश्वर से योगेश्वर बनती है?
अर्थात जो आत्मा कलियुग में भोग प्रधान अनुभवों से गुजरती है,
क्या वही आत्मा संगम युग में योग की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करती है?
यदि ऐसा है, तो यह केवल कृष्ण की कहानी नहीं —
यह हम सभी की कहानी है।
भोगेश्वर अवस्था क्या है?
सबसे पहले समझेंगे भोगेश्वर अवस्था क्या है।
1. देह-अभिमान
अपने आप को देह समझना।
आज सारी दुनिया अपने आप को देह समझती है।
जब आत्मा पतित देह में आती है तो विकारों के कारण “श्याम” बन जाती है।
यह “काला” होना पाँच विकारों का प्रतीक है।
गोरे से काला होने का अर्थ है —
पावन से पतित होना।
हमने स्वयं को भी देह समझ लिया और ईश्वर को भी देह समझ लिया।
परंतु परमात्मा आकर हमें देह-अभिमान से देही-अभिमानी बनाते हैं।
2. इंद्रिय सुख पर निर्भरता
देह-अभिमान होने के कारण इंद्रिय सुख को ही सुख समझ लिया।
“झूठे सुख को सुख कहे…”
वास्तव में विकार दुख का कारण हैं।
मुरली 13 जनवरी 1969
विकार दुख का कारण है।
पाँचों विकार — नर्क का द्वार।
भोग का अर्थ केवल वस्तु उपयोग नहीं है, बल्कि सुख की निर्भरता है।
उदाहरण:
मोबाइल, नोटिफिकेशन, बाहरी उत्तेजना —
यह सूक्ष्म भोग वृत्ति है।
कृष्ण आत्मा की कलयुगी अवस्था
आध्यात्मिक चक्र के अनुसार —
जो आत्मा सतयुग में पूज्य थी, वही द्वापर में पूजनीय और कलियुग में पुजारी बन गई।
“आप ही पूज्य, आप ही पुजारी”
मुरली 6 अक्टूबर 1969
जो पहले पूज्य थे, वही बाद में पुजारी बनते हैं।
यही भोगेश्वर अवस्था है।
जागृति का क्षण – भोगेश्वर से योगेश्वर
यह यात्रा कहाँ से शुरू होती है?
एक प्रश्न से —
मैं कौन हूँ?
जीवन का उद्देश्य क्या है?
सुख कहाँ है?
जब ये प्रश्न मन में उठते हैं — वही जागृति है।
अंधेरे कमरे में एक दीपक पर्याप्त है।
जागृति वही दीपक है।
संगम युग का महत्व
संगम युग में परमात्मा का आगमन होता है।
कल्प के अंत में परमात्मा आकर पतित से पावन बनाने का कार्य करते हैं।
हम सारा कल्प पुकारते आए —
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
अब परमात्मा आकर बताते हैं —
आप अमर आत्मा हो, देह नहीं।
वे राजयोग सिखाते हैं —
जिससे हम स्वयं के राजा बनते हैं।
मुरली 1 अगस्त 1972
बाप आते हैं पतितों को पावन बनाने।
योगेश्वर अवस्था क्या है?
योगेश्वर अर्थात योग में सिद्ध आत्मा।
इसकी पहचान:
आत्म स्मृति
परमात्म संबंध
पवित्रता
संतोष
मुरली 5 मार्च 1968
योग से शक्ति मिलती है।
राजयोग परमात्मा ही सिखाते हैं।
उदाहरण:
जंग लगा लोहा चुंबक के संपर्क से बदल जाता है।
कमजोर आत्मा परमात्मा के योग से बदलती है।
कृष्ण आत्मा की संगम यात्रा
मुरली 18 जनवरी 1969
जो पहले नंबर में आता है उसकी योग तपस्या पूरी होती है।
अर्थात वही आत्मा जो पतन अनुभव करती है,
वही सर्वोच्च पुरुषार्थ भी करती है।
भोग से योग – ऊर्जा का परिवर्तन
भोग ऊर्जा नकारात्मक नहीं, दिशाहीन है।
योग उसे दिशा देता है।
उदाहरण:
नदी बहे तो बाढ़ लाएगी,
बांध दिया जाए तो ऊर्जा देगी।
ऊर्जा वही — दिशा अलग।
यह यात्रा हमारी भी है
कृष्ण आत्मा की कहानी प्रत्येक आत्मा की कहानी है।
पावन से पतित
पतित से पावन
पतन → जागृति
भूल → योग
खोज → पुनर्स्थापना
गहरा आध्यात्मिक निष्कर्ष
भोगेश्वर — देह चेतना
योगेश्वर — आत्म चेतना
संगम — परिवर्तन
कृष्ण आत्मा सर्वोच्च उदाहरण है।
आत्मचिंतन
क्या हम खोज में हैं?
क्या हम जाग रहे हैं?
क्या हम योग का अभ्यास कर रहे हैं?
क्या हम भोग से थक चुके हैं?
या योग की ओर चल पड़े हैं?
अंतिम संदेश
कृष्ण आत्मा की यात्रा हमें सिखाती है —
गिरावट अंत नहीं है।
भूल दोष नहीं है।
भोग बंधन नहीं है।
जब जागृति आती है —
वही आत्मा योगेश्वर बनती है।
और यही संगम युग का संदेश है —
भोग से लौटो,
योग में जागो।

