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AV-19/27-03-1988-The Best Star — ‘The Star of Success

April 7, 2026April 7, 2026omshantibk07@gmail.com

AV-19/27-03-1988-“सर्वश्रेष्ठ सितारा – ‘सफलता का सितारा’”

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“सर्वश्रेष्ठ सितारा – ‘सफलता का सितारा’”

आज ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा अपने अलौकिक तारामण्डल को देख रहे हैं। यह अलौकिक विचित्र तारामण्डल है जिसकी विशेषता सिर्फ बाप और ब्राह्मण बच्चे ही जानते हैं। हर एक सितारा अपनी चमक से इस विश्व को रोशनी दे रहे हैं। बापदादा हर एक सितारे की विशेषता देख रहे हैं। कोई श्रेष्ठ भाग्यवान लक्की सितारे हैं, कोई बाप के समीप के सितारे हैं और कोई दूर के सितारे हैं। है सभी सितारे लेकिन विशेषता भिन्न-भिन्न होने के कारण सेवा में वा स्व-प्राप्ति में अलग-अलग फल की प्राप्ति अनुभव करने वाले हैं। कोई सदा ही सहज सितारे हैं, इसलिए सहज प्राप्ति का फल अनुभव करने वाले हैं। और कोई मेहनत करने वाले सितारे हैं, चाहे थोड़ी मेहनत हो, चाहे ज्यादा हो लेकिन बहुत करके मेहनत के अनुभव बाद फल की प्राप्ति का अनुभव करते हैं। कोई सदा कर्म के पहले अधिकार का अनुभव करते हैं कि सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार है, इसलिए ‘निश्चय’ और ‘नशे’ से कर्म करने के कारण कर्म की सफलता सहज अनुभव करते हैं। इसको कहा जाता है सफलता के सितारे।

सबसे श्रेष्ठ सफलता के सितारे हैं क्योंकि वह सदा ज्ञान-सूर्य, ज्ञान-चन्द्रमा के समीप हैं, इसलिए शक्तिशाली भी हैं और सफलता के अधिकारी भी हैं। कोई शक्तिशाली है लेकिन सदा शक्तिशाली नहीं हैं, इसलिए सदा एक जैसी चमक नहीं है। वैराइटी सितारों की रिमझिम अति प्यारी लगती है। सेवा सभी सितारे करते हैं लेकिन समीप के सितारे औरों को भी सूर्य, चन्द्रमा के समीप लाने के सेवाधारी बनते हैं। तो हर एक अपने से पूछो कि मैं कौन-सा सितारा हूँ? लवली सितारे हो, लक्की हो, सदा शक्तिशाली हो, मेहनत अनुभव करने वाले हो वा सदा सहज सफलता के सितारे हो? ज्ञान-सूर्य बाप सभी सितारों को बेहद की रोशनी वा शक्ति देते हैं लेकिन समीप और दूर होने के कारण अन्तर पड़ जाता है। जितना समीप सम्बन्ध है, उतना रोशनी और शक्ति विशेष है क्योंकि समीप सितारों का लक्ष्य ही है समान बनना।

इसलिए बापदादा सभी सितारों को सदा यही इशारा देते हैं कि लक्की और लवली – यह तो सभी बने हो, अब आगे अपने को यही देखो कि सदा समीप रहने वाले, सहज सफलता अनुभव करने वाले सफलता के सितारे कहाँ तक बने हैं? अभी गिरने वाले तारे तो नहीं हो वा पूँछ वाले तारे भी नहीं हो। पूँछ वाला तारा उसको कहते हैं जो बार-बार स्वयं से वा बाप से वा निमित्त बनी आत्माओं से ‘यह क्यों’, ‘यह क्या’, ‘यह कैसे’ – पूछते ही रहते हैं। बार-बार पूछने वाले ही पूँछ वाले तारे हैं। ऐसे तो नहीं हो ना? सफलता के सितारे जिनके हर कर्म में सफलता समाई हुई है – ऐसा सितारा सदा ही बाप के समीप अर्थात् साथ है। विशेषतायें सुनीं, अभी इन विशेषताओं को स्वयं में धारण कर सदा सफलता के सितारे बनो। समझा, क्या बनना है? लक्की और लवली के साथ सफलता – यह श्रेष्ठता सदा अनुभव करते रहो। अच्छा!

आज सभी से मिलना है। बापदादा आज विशेष मिलने के लिए ही आये हैं। सभी का यही लक्ष्य रहता है कि मिलना है। लेकिन बच्चों की लहर को देख करके बाप को सभी बच्चों को खुश करना होता है क्योंकि बच्चों की खुशी में बाप की खुशी है। तो आजकल की लहर है – अलग मिलने की। तो सागर को भी वही लहर में आना पड़ता है। इस सीजन की लहर यह है, इसलिए रथ को भी विशेष सकाश दे चला रहे हैं। अच्छा!

चारों ओर के अलौकिक तारामण्डल के अलौकिक सितारों को, सदा विश्व को रोशनी दे अंधकार मिटाने वाले चमकते हुए सितारों को, सदा बाप के समीप रहने वाले श्रेष्ठ सफलता के सितारों को, अनेक आत्माओं के भाग्य की रेखा परिवर्तन करने वाले भाग्यवान सितारों को, ज्ञान-सूर्य, ज्ञान-चन्द्रमा बापदादा का विशेष यादप्यार और नमस्ते।

पर्सनल मुलाकात के समय वरदान रूप में उच्चारे हुए अनमोल महावाक्य:-

1\. ‘सदा हर आत्मा को सुख देने वाले सुखदाता बाप के बच्चे हैं’ – ऐसा अनुभव करते हो? सबको सुख देने की विशेषता है ना। यह भी ड्रामा अनुसार विशेषता मिली हुई है। यह विशेषता सभी की नहीं होती। जो सबको सुख देता है, उसे सबकी आशीर्वाद मिलती है। इसलिए स्वयं को भी सदा सुख में अनुभव करते हैं। इस विशेषता से वर्तमान भी अच्छा और भविष्य भी अच्छा बन जायेगा। कितना अच्छा पार्ट है जो सबका प्यार भी मिलता, सबकी आशीर्वाद भी मिलती। इसको कहते हैं ‘एक देना हजार पाना’। तो सेवा से सुख देते हो, इसलिए सबका प्यार मिलता है। यही विशेषता सदा कायम रखना।

2\. ‘सदा अपने को सर्वशक्तिमान बाप की शक्तिशाली आत्मा हूँ’ – ऐसा अनुभव करते हो? शक्तिशाली आत्मा सदा स्वयं भी सन्तुष्ट रहती है और दूसरों को भी सन्तुष्ट करती है। ऐसे शक्तिशाली हो? सन्तुष्टता ही महानता है। शक्तिशाली आत्मा अर्थात् सन्तुष्टता के खजाने से भरपूर आत्मा। इसी स्मृति से सदा आगे बढ़ते चलो। यही खजाना सर्व को भरपूर करने वाला है।

3\. ‘बाप ने सारे विश्व में से हमें चुनकर अपना बना लिया’ – यह खुशी रहती है ना। इतने अनेक आत्माओं में से मुझ एक आत्मा को बाप ने चुना – यह स्मृति कितना खुशी दिलाती है! तो सदा इसी खुशी से आगे बढ़ते चलो। बाप ने मुझे अपना बनाया क्योंकि मैं ही कल्प पहले वाली भाग्यवान आत्मा थी, अब भी हूँ और फिर भी बनूँगी – ऐसी भाग्यवान आत्मा हूँ। इस स्मृति से सदा आगे बढ़ते चलो।

4\. ‘सदा निश्चिन्त बन सेवा करने का बल आगे बढ़ाता रहता है’। इसने किया या हमने किया – इस संकल्प से निश्चिन्त रहने से निश्चित सेवा होती है और उसका बल सदा आगे बढ़ाता है। तो निश्चिंत सेवाधारी हो ना? गिनती करने वाली सेवा नहीं। इसको कहते हैं निश्चिंत सेवा। तो जो निश्चिंत हो सेवा करते हैं, उनको निश्चित ही आगे बढ़ने में सहज अनुभूति होती है। यही विशेषता वरदान रूप में आगे बढ़ाती रहेगी।

5\. सेवा भी अनेक आत्माओं को बाप के स्नेही बनाने का साधन बनी हुई है। देखने में भल कर्मणा सेवा है लेकिन कर्मणा सेवा मुख की सेवा से भी ज्यादा फल दे रही है। कर्मणा द्वारा किसकी मन्सा को परिवर्तन करने वाली सेवा है, तो उस सेवा का फल ‘विशेष खुशी’ की प्राप्ति होती है। कर्मणा सेवा भल देखने में स्थूल आती है लेकिन सूक्ष्म वृत्तियों को परिवर्तन करने वाली होती है। तो ऐसी सेवा के हम निमित्त हैं – इसी खुशी से आगे बढ़ते चलो। भाषण करने वाले भाषण करते हैं लेकिन कर्मणा सेवा भी भाषण करने वालों की सेवा से ज्यादा है क्योंकि इसका प्रत्यक्षफल अनुभव होता है।

6\. ‘सदा पुण्य का खाता जमा करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ’ – ऐसे अनुभव होता हैं? यह सेवा, नाम सेवा है, लेकिन पुण्य का खाता जमा करने का साधन है। तो पुण्य के खाते सदा भरपूर हैं और आगे भी भरपूर रहेंगे। जितनी सेवा करते हो, उतना पुण्य का खाता बढ़ता जाता है। तो पुण्य का खाता अविनाशी बन गया। यह पुण्य अनेक जन्म भरपूर करने वाला है। तो पुण्य आत्मा हो और सदा ही पुण्यात्मा बन औरों को भी पुण्य का रास्ता बताने वाले। यह पुण्य का खाता अनेक जन्म साथ रहेगा, अनेक जन्म मालामाल रहेंगे – इसी खुशी में सदा आगे बढ़ते चलो।

7\. ‘सदा एक बाप की याद में रहने वाली, एकरस स्थिति का अनुभव करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ’ – ऐसे अनुभव करते हो? जहाँ एक बाप याद है, वहाँ एकरस स्थिति स्वत: सहज अनुभव होगी। तो एकरस स्थिति श्रेष्ठ स्थिति है। एकरस स्थिति का अनुभव करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ – यह स्मृति सदा ही आगे बढ़ाती रहेगी। इसी स्थिति द्वारा अनेक शक्तियों की अनुभूति होती रहेगी।

अध्याय: सर्वश्रेष्ठ सितारा – ‘सफलता का सितारा’

मुरली तिथि (संदर्भ): 24-01-1982 (अव्यक्त बापदादा)


 1. अलौकिक तारामण्डल का रहस्य

आज ज्ञान-सूर्य और ज्ञान-चन्द्रमा बापदादा अपने अलौकिक तारामण्डल को देख रहे हैं।
यह कोई सामान्य तारे नहीं, बल्कि ब्राह्मण आत्माएँ हैं — जो इस संसार को रोशनी दे रही हैं।

 हर आत्मा एक सितारा है, लेकिन सबकी चमक अलग-अलग है।

 सितारों के प्रकार:

  • लक्की सितारे – जिनका भाग्य बहुत ऊँचा है
  • समीप के सितारे – जो सदा बाप के साथ रहते हैं
  • दूर के सितारे – जो कभी-कभी दूर हो जाते हैं
  • मेहनती सितारे – जिन्हें सफलता मेहनत के बाद मिलती है
  • सहज सफलता के सितारे – जिन्हें सफलता स्वाभाविक मिलती है

मुरली पॉइंट:
“हर सितारा है, लेकिन विशेषता अनुसार फल अलग-अलग अनुभव करता है।”


 2. सफलता का सितारा कौन?

सफलता का सितारा वह है —

  • जो हर कर्म में निश्चय और नशा रखता है
  • जो मानता है — “सफलता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”

 उदाहरण:

अगर कोई आत्मा सेवा करते समय सोचती है —
“देखते हैं होगा या नहीं…” 
तो उसे मेहनत करनी पड़ती है

लेकिन अगर कोई आत्मा सोचती है —
 “यह तो होना ही है, क्योंकि बाप साथ है” 
तो सफलता स्वतः मिलती है

मुरली पॉइंट:
“निश्चय और नशे से किया हुआ कर्म सदा सफल होता है।”


 3. समीप रहने का रहस्य

 जो आत्मा ज्ञान-सूर्य के समीप रहती है, वही सबसे ज्यादा शक्तिशाली होती है।

 क्यों?

  • समीपता = अधिक शक्ति
  • दूरी = कम अनुभव

 उदाहरण:

जैसे सूर्य के पास रहने से गर्मी और प्रकाश अधिक मिलता है,
वैसे ही बाप के पास रहने से शक्ति और सफलता अधिक मिलती है।

मुरली पॉइंट:
“जितना समीप सम्बन्ध, उतनी रोशनी और शक्ति।”


 4. पूँछ वाले तारे कौन हैं?

 बापदादा ने एक खास प्रकार के सितारों का भी वर्णन किया — “पूँछ वाले तारे”

 उनकी निशानियाँ:

  • बार-बार सवाल करना
    • “यह क्यों?”
    • “यह कैसे?”
    • “यह क्या?”

 ऐसे आत्माएँ संदेह में रहती हैं, इसलिए आगे नहीं बढ़ पातीं

मुरली पॉइंट:
“बार-बार प्रश्न करने वाले पूँछ वाले तारे हैं।”


 5. स्वयं से पूछने का प्रश्न

 हर आत्मा को खुद से पूछना चाहिए:

  • क्या मैं लक्की सितारा हूँ?
  • क्या मैं समीप का सितारा हूँ?
  • या मेहनत करने वाला सितारा हूँ?
  • या सहज सफलता का सितारा हूँ?

लक्ष्य:
 “लक्की + लवली + सफलता का सितारा बनना”


 वरदान रूप महावाक्य (पर्सनल मुलाकात से)


 1. सुखदाता बनने का वरदान

 “मैं सुखदाता बाप का बच्चा हूँ”

 उदाहरण:

अगर कोई व्यक्ति गुस्सा करता है,
और आप शान्ति से जवाब देते हैं —
 आप उसे सुख दे रहे हैं

फल:
 सबकी आशीर्वाद मिलती है
 “एक देना, हजार पाना”


 2. शक्तिशाली आत्मा का अनुभव

 “मैं सर्वशक्तिमान बाप की शक्तिशाली आत्मा हूँ”

 विशेषता:

  • स्वयं सन्तुष्ट
  • दूसरों को भी सन्तुष्ट करने वाली

मुरली पॉइंट:
“सन्तुष्टता ही महानता है।”


 3. चुनी हुई आत्मा का नशा

“मुझे बाप ने करोड़ों में से चुना है”

 उदाहरण:

जब यह स्मृति रहती है,
तो आत्मा में अंदर से खुशी और आत्मविश्वास स्वतः आ जाता है


 4. निश्चिंत सेवा का बल

 “मैं निश्चिंत सेवाधारी हूँ”

 यह नहीं सोचना:

  • “किसने किया?”
  • “मैंने किया या उसने किया?”

 बस सेवा करते जाना

फल:
 सेवा स्वतः सफल होती है


 5. कर्मणा सेवा की महानता

 कर्म से की गई सेवा सबसे शक्तिशाली है

 उदाहरण:

  • किसी को भाषण देना = मुख सेवा
  • अपने व्यवहार से बदलना = कर्मणा सेवा

 कर्मणा सेवा सीधे दिल और संस्कार बदलती है

मुरली पॉइंट:
“कर्मणा सेवा का प्रत्यक्ष फल अनुभव होता है।”


 6. पुण्य का खाता जमा करना

 हर सेवा = पुण्य का जमा

 परिणाम:

  • वर्तमान सुखी
  • भविष्य मालामाल

 उदाहरण:

किसी को ज्ञान देना = पुण्य
किसी को खुशी देना = पुण्य


 7. एकरस स्थिति का अनुभव

 “मैं एक बाप की याद में रहने वाली आत्मा हूँ”

 लाभ:

  • मन स्थिर रहता है
  • शक्तियाँ स्वतः अनुभव होती हैं

मुरली पॉइंट:
“एकरस स्थिति श्रेष्ठ स्थिति है।”


 निष्कर्ष (Conclusion)

 बापदादा का संदेश स्पष्ट है:

 सिर्फ लक्की और लवली बनना पर्याप्त नहीं
 अब बनना है — सफलता का सितारा

 ऐसा सितारा:

  • जो हर कर्म में सफल हो
  • जो सदा बाप के समीप हो
  • जो औरों का भाग्य बदलने वाला हो
  • प्रश्न 1: अलौकिक तारामण्डल क्या है?

    उत्तर:
    अलौकिक तारामण्डल ब्राह्मण आत्माओं का समूह है, जो ज्ञान-सूर्य बापदादा की संतान बनकर इस संसार को रोशनी दे रही हैं। हर आत्मा एक सितारा है, लेकिन उसकी विशेषता और चमक अलग-अलग है।


     प्रश्न 2: सभी सितारों में अंतर क्यों होता है?

    उत्तर:
    सभी सितारे होने के बावजूद उनकी विशेषताएँ अलग होती हैं — जैसे कोई लक्की है, कोई समीप है, कोई मेहनती है और कोई सहज सफलता पाने वाला है। इसी कारण सभी को अलग-अलग फल की प्राप्ति होती है।

    मुरली पॉइंट:
    “विशेषता अनुसार हर आत्मा अलग फल अनुभव करती है।”


    प्रश्न 3: सफलता का सितारा किसे कहा जाता है?

    उत्तर:
    सफलता का सितारा वह आत्मा है —
     जो हर कर्म में निश्चय (Faith) और नशा (Spiritual intoxication) रखती है
     जो मानती है कि “सफलता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”

    मुरली पॉइंट:
    “निश्चय और नशे से किया हुआ कर्म सदा सफल होता है।”


     प्रश्न 4: सफलता सहज कैसे बनती है?

    उत्तर:
    जब आत्मा यह विश्वास रखती है कि बाप साथ है, तो वह बिना डर और संदेह के कर्म करती है, जिससे सफलता स्वतः मिल जाती है।

    उदाहरण:
     “देखते हैं होगा या नहीं” — मेहनत करनी पड़ेगी
     “यह तो होना ही है” — सफलता सहज मिलेगी


     प्रश्न 5: बाप के समीप रहने का क्या लाभ है?

    उत्तर:
    जो आत्मा ज्ञान-सूर्य के समीप रहती है, उसे अधिक शक्ति, रोशनी और सफलता का अनुभव होता है।

    मुरली पॉइंट:
    “जितना समीप सम्बन्ध, उतनी रोशनी और शक्ति।”


     प्रश्न 6: पूँछ वाले तारे कौन होते हैं?

    उत्तर:
    पूँछ वाले तारे वे आत्माएँ हैं जो बार-बार संदेह में आकर प्रश्न करती रहती हैं —
     “यह क्यों?”
     “यह कैसे?”
     “यह क्या?”

     ऐसे आत्माएँ आगे बढ़ने में रुकावट अनुभव करती हैं।

    मुरली पॉइंट:
    “बार-बार प्रश्न करने वाले पूँछ वाले तारे हैं।”


     प्रश्न 7: आत्मा को स्वयं से क्या प्रश्न करना चाहिए?

    उत्तर:
    हर आत्मा को स्वयं से यह पूछना चाहिए:

    • मैं कौन-सा सितारा हूँ?
    • क्या मैं लक्की हूँ?
    • क्या मैं समीप हूँ?
    • या मैं सफलता का सितारा हूँ?

    लक्ष्य:
     “लक्की + लवली + सफलता का सितारा बनना”


     वरदान आधारित प्रश्नोत्तर


     प्रश्न 8: सुखदाता बनने की विशेषता क्या है?

    उत्तर:
    जो आत्मा हर किसी को सुख देती है, उसे सबकी आशीर्वाद प्राप्त होती है और वह स्वयं भी सदा सुखी रहती है।

    उदाहरण:
    कोई गुस्सा करे और आप शान्त रहें — यही सुख देना है

    मुरली सार:
    “एक देना, हजार पाना”


     प्रश्न 9: शक्तिशाली आत्मा की पहचान क्या है?

    उत्तर:
    शक्तिशाली आत्मा वह है जो स्वयं भी सन्तुष्ट रहती है और दूसरों को भी सन्तुष्ट करती है।

    मुरली पॉइंट:
    “सन्तुष्टता ही महानता है।”


     प्रश्न 10: चुनी हुई आत्मा का नशा क्या है?

    उत्तर:
    यह स्मृति कि “मुझे बाप ने करोड़ों में से चुना है” — आत्मा को अपार खुशी और आत्मविश्वास देती है।


     प्रश्न 11: निश्चिंत सेवा क्या है?

    उत्तर:
    निश्चिंत सेवा वह है जिसमें आत्मा बिना तुलना और गिनती के सेवा करती है।

     “मैंने किया या उसने किया?”
     केवल सेवा करते रहना

    फल:
     सफलता स्वतः मिलती है


     प्रश्न 12: कर्मणा सेवा क्यों श्रेष्ठ है?

    उत्तर:
    कर्मणा सेवा (व्यवहार से सेवा) सीधे आत्मा के संस्कार और मन को बदलती है, इसलिए यह सबसे प्रभावशाली सेवा है।

    उदाहरण:
     बोलकर समझाना = मुख सेवा
     व्यवहार से बदलना = कर्मणा सेवा

    मुरली पॉइंट:
    “कर्मणा सेवा का प्रत्यक्ष फल अनुभव होता है।”


     प्रश्न 13: पुण्य का खाता कैसे जमा होता है?

    उत्तर:
    हर अच्छी सेवा, हर खुशी देना, हर ज्ञान देना — पुण्य का खाता जमा करता है।

    फल:
     वर्तमान में सुख
     भविष्य में सम्पन्नता


     प्रश्न 14: एकरस स्थिति क्या है?

    उत्तर:
    जब आत्मा सदा एक बाप की याद में रहती है और मन स्थिर रहता है, तो उसे एकरस स्थिति कहते हैं।

    मुरली पॉइंट:
    “एकरस स्थिति श्रेष्ठ स्थिति है।”


     अंतिम प्रश्न (Final Reflection)

     प्रश्न 15: हमें क्या बनना है?

    उत्तर:
     केवल लक्की या लवली नहीं
     बल्कि सदा सफल रहने वाला “सफलता का सितारा” बनना है

    ✔ जो हर कर्म में सफल हो
    ✔ जो सदा बाप के समीप हो
    ✔ जो औरों का भाग्य बदलने वाला हो

  • Disclaimer (डिस्क्लेमर)
  • यह वीडियो/सामग्री ब्रह्माकुमारीज की आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं मुरली पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक ज्ञान, आत्म-विकास और सकारात्मक जीवन दृष्टिकोण प्रदान करना है। यह किसी भी धर्म, पंथ या व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं करता। दर्शकों से निवेदन है कि इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझें और अपने विवेक से अपनाएँ।
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