प्रश्न का मन्थन-ध्यान में शरीर जीवित कैसे रहता है?
ध्यान में शरीर जीवित कैसे रहता है?
योग, चेतना और आत्मा के दिव्य अनुभव का रहस्य
(मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती जी के महावाक्यों एवं ब्रह्माकुमारीज के राजयोग ज्ञान पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन)
प्रस्तावना
मनुष्य के मन में सदियों से एक प्रश्न उठता रहा है—यदि आत्मा शरीर को चलाती है, तो जब ध्यान में आत्मा शरीर से न्यारी हो जाती है, तब शरीर जीवित कैसे रहता है? क्या उस समय आत्मा शरीर छोड़ देती है? यदि आत्मा कुछ समय के लिए शरीर की चेतना से ऊपर उठ जाती है, तो सांस क्यों चलती रहती है? हृदय की धड़कन क्यों नहीं रुकती?
राजयोग की गहन साधना में कई साधकों को ऐसे अनुभव होते हैं, जब कुछ क्षणों के लिए शरीर का बोध कम हो जाता है। ऐसा लगता है मानो हम शरीर से परे किसी दिव्य, शांत और प्रकाशमय अवस्था में चले गए हों। इसी अनुभव के कारण अनेक लोगों के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि ध्यान में वास्तव में क्या होता है।
मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती जी के महावाक्य और ब्रह्माकुमारीज का राजयोग ज्ञान इस विषय को अत्यंत सरल और वैज्ञानिक दृष्टि से समझाता है।
1. आत्मा चालक है, शरीर एक साधन है
बापदादा बार-बार स्मृति दिलाते हैं—
“अपने को आत्मा समझो। यह शरीर तुम्हारा साधन है।”
(साकार मुरली)
इस एक वाक्य में सम्पूर्ण राजयोग का सार समाया हुआ है।
आत्मा चालक है और शरीर उसका साधन या वाहन है।
उदाहरण : कार और ड्राइवर
मान लीजिए एक ड्राइवर कार चला रहा है। चलते-चलते उसका मन किसी पुराने प्रसंग में चला जाता है। कुछ क्षणों के लिए वह अपने विचारों में खो जाता है, लेकिन कार से उसका संबंध समाप्त नहीं होता। उसके हाथ अभी भी स्टीयरिंग पर हैं और कार चलती रहती है।
इसी प्रकार आत्मा शरीर में रहते हुए भी अपनी चेतना को कहीं और ले जा सकती है। शरीर के साथ उसका संबंध बना रहता है, इसलिए शरीर जीवित रहता है।
2. शरीर की अनेक क्रियाएँ स्वतः चलती रहती हैं
हमारे शरीर की अनेक प्रक्रियाएँ स्वतः संचालित होती रहती हैं।
- सांस लेना,
- हृदय का धड़कना,
- रक्त संचार,
- पाचन क्रिया,
- मस्तिष्क की अनेक गतिविधियाँ।
इन सबके लिए हमें अलग से सोचना नहीं पड़ता।
उदाहरण : रोटी बनाना
जब कोई बहन पहली बार रोटी बनाना सीखती है, तो उसे हर क्रिया पर ध्यान देना पड़ता है। लेकिन अभ्यास के बाद वही बहन रोटी भी बनाती रहती है और साथ में बातचीत भी करती रहती है।
अनेक कार्य ऑटोमेटिक हो जाते हैं।
इसी प्रकार शरीर की कई प्रक्रियाएँ भी स्वतः चलती रहती हैं। इसलिए ध्यान में आत्मा का शरीर के प्रति बोध कम हो जाने पर भी शरीर जीवित रहता है।
3. ध्यान में आत्मा शरीर को छोड़ती नहीं, केवल देह-बोध कम हो जाता है
राजयोग में आत्मा शरीर से निकलकर कहीं चली नहीं जाती।
बल्कि आत्मा अपनी चेतना को शरीर के बोध से ऊपर उठा लेती है।
उदाहरण : टेलीविजन
कई बार टीवी सामने चल रहा होता है। आवाज भी सुनाई दे रही होती है, लेकिन कोई पूछे कि अभी क्या चल रहा था, तो हमें याद नहीं रहता।
क्यों?
क्योंकि हमारा ध्यान कहीं और था।
टीवी बंद नहीं हुआ था। हमारी सुनने की शक्ति भी समाप्त नहीं हुई थी। केवल चेतना का केंद्र बदल गया था।
ध्यान में भी यही होता है।
शरीर रहता है, सांस चलती रहती है, लेकिन आत्मा की अनुभूति बदल जाती है।
4. नींद भी देह से न्यारे होने का एक साधारण अनुभव है
लोक में कहा जाता है—
“सोया और मरा बराबर।”
इसका अर्थ यह नहीं कि सोते समय मृत्यु हो जाती है।
अर्थ यह है कि नींद में भी आत्मा कुछ समय के लिए शरीर की जागृत चेतना से अलग हो जाती है।
फिर भी शरीर जीवित रहता है।
उदाहरण : प्यास लगने पर जाग जाना
कई बार गहरी नींद में होने पर भी बहुत प्यास लगने पर हम अचानक जाग जाते हैं।
ऐसा क्यों होता है?
क्योंकि आत्मा का शरीर से संबंध टूटा नहीं था। शरीर की आवश्यकता का संकेत आत्मा तक पहुँच गया और आत्मा ने तुरंत शरीर की ओर ध्यान दिया।
इसी प्रकार ध्यान में भी आत्मा शरीर से अपना संबंध समाप्त नहीं करती।
5. ध्यान में शरीर क्यों नहीं मरता?
क्योंकि मृत्यु और ध्यान दोनों अलग अवस्थाएँ हैं।
मृत्यु क्या है?
मृत्यु में आत्मा शरीर से अपना संबंध पूर्ण रूप से तोड़ देती है।
इसलिए—
- सांस बंद हो जाती है,
- हृदय की धड़कन रुक जाती है,
- शरीर निष्क्रिय हो जाता है।
ध्यान क्या है?
ध्यान में—
- आत्मा शरीर के भीतर ही रहती है,
- शरीर से उसका सूक्ष्म संबंध बना रहता है,
- केवल चेतना की दिशा बदल जाती है।
इसलिए ध्यान के बाद व्यक्ति वापस सामान्य अवस्था में आ जाता है और अपने अनुभव बता सकता है।
6. देह से न्यारा होने का एक और उदाहरण
मान लीजिए आप किसी दुकान से छोटी-सी वस्तु लेने के लिए गाड़ी से उतरते हैं।
आप जानते हैं कि केवल दो मिनट में वापस आना है।
इसलिए आप गाड़ी का इंजन बंद नहीं करते।
इंजन चलता रहता है।
आप वापस आते हैं और फिर गाड़ी चला देते हैं।
इसी प्रकार आत्मा शरीर में रहते हुए भी कुछ समय के लिए अपने अनुभवों की दुनिया में चली जाती है, लेकिन शरीर से उसका संबंध बना रहता है।
7. चेतना कहीं और, शरीर कहीं और
आज के युग में मोबाइल इसका अच्छा उदाहरण देता है।
आप कमरे में बैठे हैं, लेकिन वीडियो कॉल पर आपका पूरा ध्यान किसी दूसरे शहर में बैठे व्यक्ति पर है।
आप यहाँ भी हैं और आपकी चेतना कहीं और भी है।
इसी प्रकार आत्मा शरीर में रहते हुए भी अपनी चेतना को ऊंची अवस्था में ले जा सकती है।
8. राजयोग का उद्देश्य देह-अभिमान से ऊपर उठाना है
बापदादा बार-बार कहते हैं—
“देही-अभिमानी बनो।”
(साकार मुरली)
और—
“अभ्यास करो कि मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं।”
(साकार मुरली)
राजयोग का अभ्यास हमें यही अनुभव कराता है कि—
मैं शरीर नहीं,
मैं यह नाम नहीं,
मैं यह पद नहीं,
मैं यह संबंध नहीं,
मैं एक ज्योतिबिंदु चेतन आत्मा हूँ।
9. मनसा सेवा में देह का बोध क्यों कम हो जाता है?
जब हम मनसा सेवा में विश्व की आत्माओं को साकाश देते हैं, तब हमारे संकल्प अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली हो जाते हैं।
कई बार हम स्वयं को शरीर से इतना न्यारा अनुभव करते हैं कि शरीर का बोध लगभग समाप्त-सा हो जाता है।
लेकिन उस समय भी—
- सांस चल रही होती है,
- हृदय धड़क रहा होता है,
- शरीर जीवित रहता है।
क्योंकि आत्मा ने शरीर छोड़ा नहीं है; केवल उसकी अनुभूति बदल गई है।
निष्कर्ष
ध्यान में आत्मा शरीर से अलग कोई वस्तु नहीं बन जाती।
वह शरीर में रहते हुए भी शरीर की चेतना से ऊपर उठ जाती है।
ध्यान में—
- शरीर जीवित रहता है,
- सांस चलती रहती है,
- हृदय धड़कता रहता है,
लेकिन आत्मा स्वयं को देह से न्यारा, शांति और प्रकाश स्वरूप अनुभव करने लगती है।
यही राजयोग का अभ्यास हमें देह-अभिमान से निकालकर आत्म-अभिमान में स्थापित करता है।
धीरे-धीरे हमारा ध्यान रूहानी हो जाता है और हम आत्मिक जीवन का अनुभव करने लगते हैं।
मुख्य संदेश
“अपने को आत्मा समझो। यह शरीर तुम्हारा साधन है।”
(साकार मुरली)
“अभ्यास करो कि मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं।”
प्रश्न 1: ध्यान में शरीर जीवित कैसे रहता है?
उत्तर:
ध्यान में आत्मा शरीर को छोड़कर नहीं जाती, बल्कि अपनी चेतना को देह-बोध से ऊपर उठा लेती है। शरीर के साथ उसका सूक्ष्म संबंध बना रहता है, इसलिए शरीर जीवित रहता है, सांस चलती रहती है और हृदय धड़कता रहता है।
प्रश्न 2: क्या ध्यान में आत्मा शरीर से बाहर निकल जाती है?
उत्तर:
नहीं। राजयोग में आत्मा शरीर से बाहर नहीं निकलती। आत्मा शरीर के भीतर रहते हुए अपनी चेतना को ऊंची और सूक्ष्म अवस्था में ले जाती है। इसलिए ध्यान के बाद व्यक्ति सामान्य अवस्था में लौट आता है और अपने अनुभवों को बता सकता है।
प्रश्न 3: बापदादा शरीर और आत्मा के संबंध को कैसे समझाते हैं?
उत्तर:
बापदादा कहते हैं—“अपने को आत्मा समझो। यह शरीर तुम्हारा साधन है।”
(साकार मुरली)अर्थात आत्मा चालक है और शरीर उसका साधन या वाहन है।
प्रश्न 4: आत्मा और शरीर के संबंध को किस उदाहरण से समझा जा सकता है?
उत्तर:
कार और ड्राइवर के उदाहरण से।जैसे एक ड्राइवर कार चलाते समय कुछ क्षण अपने विचारों में खो जाता है, फिर भी उसका कार से संबंध बना रहता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर में रहते हुए भी अपनी चेतना को कहीं और ले जा सकती है, लेकिन शरीर से उसका संबंध समाप्त नहीं होता।
प्रश्न 5: ध्यान में सांस और हृदय की धड़कन क्यों नहीं रुकती?
उत्तर:
क्योंकि शरीर की अनेक प्रक्रियाएँ स्वतः चलती रहती हैं, जैसे—
- सांस लेना,
- हृदय का धड़कना,
- रक्त संचार,
- पाचन क्रिया,
- मस्तिष्क की कई गतिविधियाँ।
इन प्रक्रियाओं को चलाने के लिए हर क्षण अलग से सोचने की आवश्यकता नहीं होती।
प्रश्न 6: शरीर की स्वतः चलने वाली क्रियाओं को किस उदाहरण से समझा जा सकता है?
उत्तर:
रोटी बनाने के उदाहरण से।शुरुआत में व्यक्ति हर कार्य सोच-समझकर करता है, लेकिन अभ्यास के बाद वही कार्य स्वतः होने लगते हैं।
इसी प्रकार शरीर की अनेक प्रक्रियाएँ स्वतः चलती रहती हैं। इसलिए ध्यान में आत्मा का देह-बोध कम होने पर भी शरीर जीवित रहता है।
प्रश्न 7: ध्यान में वास्तव में क्या बदलता है?
उत्तर:
ध्यान में शरीर नहीं बदलता, बल्कि चेतना का केंद्र बदल जाता है।शरीर वहीं रहता है, लेकिन आत्मा का अनुभव बदल जाता है। आत्मा स्वयं को देह से न्यारा, शांति और प्रकाश स्वरूप अनुभव करने लगती है।
प्रश्न 8: टेलीविजन का उदाहरण ध्यान की अवस्था को कैसे समझाता है?
उत्तर:
कई बार टीवी चल रहा होता है, आवाज भी सुनाई देती है, लेकिन हमारा ध्यान कहीं और होता है। बाद में पूछने पर हमें याद नहीं रहता कि क्या चल रहा था।टीवी बंद नहीं हुआ था। हमारी सुनने की शक्ति भी समाप्त नहीं हुई थी। केवल हमारा ध्यान बदल गया था।
ध्यान में भी यही होता है।
प्रश्न 9: क्या नींद भी देह से न्यारे होने का अनुभव है?
उत्तर:
हाँ, एक सीमा तक।लोक में कहा जाता है—
“सोया और मरा बराबर।”
इसका अर्थ यह नहीं कि सोते समय मृत्यु हो जाती है, बल्कि यह कि नींद में आत्मा कुछ समय के लिए शरीर की जागृत चेतना से अलग हो जाती है, फिर भी शरीर से उसका संबंध बना रहता है।
प्रश्न 10: गहरी नींद में भी प्यास लगने पर हम जाग क्यों जाते हैं?
उत्तर:
क्योंकि आत्मा और शरीर का संबंध टूटा नहीं होता।जब शरीर की कोई आवश्यकता अधिक बढ़ जाती है, तो उसका संकेत आत्मा तक पहुँचता है और आत्मा तुरंत शरीर की ओर अपना ध्यान ले आती है।
प्रश्न 11: मृत्यु और ध्यान में क्या अंतर है?
उत्तर:
मृत्यु में—
- आत्मा शरीर से अपना संबंध पूरी तरह तोड़ देती है।
- सांस बंद हो जाती है।
- हृदय की धड़कन रुक जाती है।
- शरीर निष्क्रिय हो जाता है।
ध्यान में—
- आत्मा शरीर के भीतर रहती है।
- शरीर से उसका सूक्ष्म संबंध बना रहता है।
- केवल चेतना की दिशा बदल जाती है।
इसीलिए ध्यान के बाद व्यक्ति सामान्य अवस्था में लौट आता है।
प्रश्न 12: इंजन चालू गाड़ी का उदाहरण क्या समझाता है?
उत्तर:
यदि हम दो मिनट के लिए गाड़ी से उतरते हैं, तो कई बार इंजन बंद नहीं करते क्योंकि हमें तुरंत लौटना होता है।इसी प्रकार आत्मा भी शरीर से अपना संबंध समाप्त नहीं करती। वह चेतना के सूक्ष्म अनुभवों में चली जाती है, लेकिन शरीर के साथ जुड़ी रहती है।
प्रश्न 13: मोबाइल और वीडियो कॉल का उदाहरण क्या बताता है?
उत्तर:
आप कमरे में बैठे हैं, लेकिन आपका पूरा ध्यान वीडियो कॉल पर किसी दूसरे शहर में बैठे व्यक्ति पर है।आप यहाँ भी हैं और आपकी चेतना कहीं और भी है।
इसी प्रकार आत्मा शरीर में रहते हुए भी अपनी चेतना को ऊंची अवस्था में ले जा सकती है।
प्रश्न 14: राजयोग का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
राजयोग का उद्देश्य देह-अभिमान से ऊपर उठाकर आत्म-अभिमान में स्थापित करना है।बापदादा कहते हैं—
“देही-अभिमानी बनो।”
(साकार मुरली)और—
“अभ्यास करो कि मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं।”
(साकार मुरली)
प्रश्न 15: देही-अभिमानी बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
देही-अभिमानी बनने का अर्थ है—
- मैं शरीर नहीं हूं।
- मैं यह नाम नहीं हूं।
- मैं यह पद नहीं हूं।
- मैं यह संबंध नहीं हूं।
- मैं एक ज्योतिबिंदु, चेतन, अविनाशी आत्मा हूं।
प्रश्न 16: मनसा सेवा में शरीर का बोध कम क्यों हो जाता है?
उत्तर:
जब हम विश्व की आत्माओं को साकाश देते हैं, तब हमारे संकल्प अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली हो जाते हैं। कई बार हम अपने संकल्पों में इतने लीन हो जाते हैं कि शरीर का बोध कम हो जाता है।फिर भी—
- सांस चल रही होती है,
- हृदय धड़क रहा होता है,
- शरीर जीवित रहता है।
क्योंकि आत्मा ने शरीर छोड़ा नहीं है, केवल उसकी अनुभूति बदल गई है।
प्रश्न 17: ध्यान का अंतिम अनुभव क्या है?
उत्तर:
ध्यान का अंतिम अनुभव यह है कि आत्मा शरीर में रहते हुए भी स्वयं को देह से न्यारा, शांत, ज्योतिर्मय और परमात्म स्मृति में स्थित अनुभव करती है।धीरे-धीरे हमारा ध्यान रूहानी हो जाता है और हम आत्मिक जीवन का अनुभव करने लगते हैं।
मुख्य संदेश
“अपने को आत्मा समझो। यह शरीर तुम्हारा साधन है।”
(साकार मुरली)“अभ्यास करो कि मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं।”
(साकार मुरली)निष्कर्ष:
ध्यान में शरीर नहीं मरता, क्योंकि आत्मा शरीर को छोड़ती नहीं है। वह शरीर में रहते हुए अपनी चेतना को देह-बोध से ऊपर उठा लेती है। यही राजयोग का विज्ञान और आत्मिक अनुभव का रहस्य है।Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज की आध्यात्मिक शिक्षाओं, मुरली एवं मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती जी के महावाक्यों पर आधारित है। इसमें बताए गए अनुभव और व्याख्याएँ आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती हैं। विभिन्न धर्मों, दार्शनिक परंपराओं तथा विज्ञान की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हो सकती हैं। हमारा उद्देश्य किसी की मान्यता का खंडन करना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चिंतन एवं आत्म-अनुभूति की दिशा में प्रेरित करना है।
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