MURLI 24-06-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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24-06-26
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”मातेश्वरी”
मधुबन

“इस कर्मक्षेत्र पर कर्म अनादि चीज़ है, तुम्हें कर्म छोड़ना नहीं है लेकिन कर्मयोगी बनना है”

(जगदम्बा माँ के स्मृति दिवस पर सुनाने के लिए, उनके द्वारा उच्चारे हुए मधुर महावाक्य)

यह सृष्टि कर्म का खेत है, जहाँ हरेक मनुष्य आत्मा अपना-अपना पार्ट प्ले कर रही है, इसमें परमात्मा का भी पार्ट है लेकिन वह आत्माओं के सदृश्य जन्म-मरण में नहीं आते हैं। आत्माओं के सदृश्य उनके कर्म का खाता उल्टा नहीं बनता है। वह कहते हैं मैं तो सिर्फ तुम आत्माओं को लिबरेट करने आता हूँ इसीलिये मुझे लिब्रेटर, बन्धन से छुड़ाने वाला गति सद्गति दाता कहते हैं।

आत्मा पर माया का जो बन्धन चढ़ा है, उसे उतारकर प्युअर बनाते हैं और कहते हैं कि मेरा काम है आत्माओं को सर्व बन्धनों से छुड़ा करके वापस ले जाना, तो सृष्टि के जो अनादि नियम और कायदे हैं उन्हें भी समझना है, फिर इस मनुष्य सृष्टि की वृद्धि किस तरह से होती है, फिर वह टाइम भी आता है जब यह कम होती है। ऐसे नहीं कि बढ़ती है तो बढ़ती ही जाती है, नहीं। कम भी होती है। तो सृष्टि में हर चीज़ का नियम है। अपने शरीर का भी नियम है, पहले बाल, फिर किशोर, फिर युवा, फिर वृद्ध। तो वृद्ध भी जल्दी नहीं, वृद्ध होते-होते जड़जड़ीभूत हो जाते हैं, तो हर बात का बढ़ना और उसका अन्त होना, यह भी नियम है। इसी तरह से सृष्टि की जनरेशन्स का भी नियम है। एक जीवन की भी स्टेजेज़ हैं तो फिर जन्मों की भी स्टेजेज़ हैं, फिर जनरेशन्स भी जो चली उसकी भी स्टेजेज़ हैं, इसी तरह सभी धर्मों की भी स्टेजेज़ हैं। पहला जो धर्म है वह सबसे ताकत वाला है, पीछे आहिस्ते-आहिस्ते जो आते हैं, उनकी ताकत कम होती जाती है। तो धर्मों का बंटना, धर्मों का चलना, हरेक बात नियमों से चलती है, इन सब बातों को भी समझना है।

इसी हिसाब से बाप भी कहते हैं मेरा भी इसमें पार्ट है। मैं भी एक सोल हूँ, मैं गॉड कोई दूसरी चीज़ नहीं हूँ। मैं भी सोल ही हूँ परन्तु मेरा काम बहुत बड़ा और ऊंचा है इसलिये मुझे गॉड कहते हैं। जैसी तुम आत्मा हो मैं भी वैसा ही हूँ। जैसे आपका बच्चा है वो भी तो मनुष्य है, आप भी तो मनुष्य हो, उसमें तो कोई फर्क नहीं है ना। तो मैं भी आत्मा ही हूँ, आत्मा, आत्मा में कोई फर्क नहीं है लेकिन कर्तव्य में बहुत भारी फर्क है इसीलिये कहते हैं मेरा जो कर्तव्य है वह सबसे भिन्न है। मैं कोई हद के एक धर्म का स्थापक नहीं हूँ, मैं तो दुनिया का क्रियेटर हूँ, वो हो गये धर्म के क्रियेटर। जैसे वो आत्मायें अपना काम अपने समय पर करती हैं, वैसे मैं भी अपने समय पर आता हूँ। मेरा कर्तव्य विशाल है, मेरा कर्तव्य महान है और सबसे निराला है इसलिये कहते हैं तेरे काम निराले। उनको सर्वशक्तिवान भी कहते हैं, सबसे शक्तिशाली काम है आत्माओं को माया के बंधनों से छुड़ाना और नई दुनिया का सैपलिंग लगाना इसलिए उनको अंग्रेजी में कहते हैं हेविनली गॉड फादर। जैसे क्राइस्ट को कहेंगे क्रिश्चियनिटी का फादर, उनको हेविनली गॉड फादर नहीं कहेंगे। हेविन का स्थापक परमात्मा है। तो हेविन वर्ल्ड हो गई ना, हेविन कोई एक धर्म नहीं है। तो वह वर्ल्ड का स्थापक हो गया और उस वर्ल्ड में एक धर्म, एक राज्य होगा, तत्व आदि सब चेन्ज हो जायेंगे इसलिये उनको कहते हैं हेविनली गॉड फादर।

दूसरा, गॉड इज़ ट्रूथ कहते हैं, तो ट्रूथ क्या चीज़ है, किसमें ट्रूथ? यह भी समझने की बात है। कई समझते हैं कि जो सच बोलता है वही गॉड है। गॉड कोई और चीज़ नहीं है, बस सच बोलना चाहिए। परन्तु नहीं, गॉड इज ट्रूथ का मतलब ही है कि गॉड ने ही आ करके सभी बातों की सच्चाई बताई है, गॉड इज ट्रूथ माना गॉड ही ट्रूथ बतलाता है, उसमें ही सच्चाई है, तब तो उनको नॉलेजफुल कहते हैं। ओशन ऑफ नॉलेज, ओशन ऑफ ब्लिस, गॉड नोज़, (ईश्वर जानता है)… तो जरूर विशेष कुछ जानने की बात है ना! तो वह कौनसी जानकारी है? यह नहीं कि इसने चोरी की, गॉड नोज़। भले वह जानता सबकुछ है परन्तु उसकी महिमा जो है ना, वह इसी पर है कि हमारी दुनिया जो नीचे गिरी है वह ऊंची कैसे चढ़े, इस चक्र की बातों को वह जानता है इसलिये कहते हैं गॉड नोज़। तो परमात्मा की महिमा उस तरीके से आती है जो मनुष्य से भिन्न है क्योंकि उनका जानना सबसे भिन्न है। मनुष्य का जानना हद है, कहते भी हैं मनुष्य अल्पज्ञ है और परमात्मा के लिए कहते हैं वह सर्वज्ञ है, जिसको अंग्रेजी में नॉलेजफुल कहते हैं यानि सर्व का ज्ञाता अथवा जानने वाला है। तो जो सर्वज्ञ है वही ट्रूथ को जान सकता है, यथार्थ बातों की नॉलेज जिसके पास होगी, जरूर वह सबको देगा ना। अगर खुद जाने, दूसरों को न दे तो उससे हमें क्या फायदा! जानने दो। परन्तु नहीं। उसके जानकारी से हमें कोई फायदा मिला है, तब तो हम उसकी क्वालिफिकेशन्स गाते हैं। उसके पीछे पड़ते हैं। कभी कुछ भी होता है तो कहते हैं हे भगवान! अब तू यह कर! खैर कर, रहम कर, मेरा दु:ख दूर कर, तो हम उससे मांगते हैं ना। उससे कुछ सम्बन्ध है ना इसलिए उस तरीके से याद करते हैं, जैसे उसने हमारे पर कोई एहसान किया है। अगर कभी किया ही नहीं होता तो हम क्यों उसके लिये माथाकुटी करते। जब कोई मुसीबत के समय मदद करता है तो दिल में आता है कि इसने बड़ी मुसीबत के समय मुझे हेल्प की थी। समय पर मेरी रक्षा की थी, तो उसके प्रति दिल में प्रेम रहता है। तो परमात्मा के प्रति भी ऐसा ही प्रेम आता है कि उसने हमारी समय पर मदद की है। परन्तु ऐसे नहीं कि कभी कोई मनुष्य का अच्छा हो गया तो कहें यह भगवान ने किया… बस भगवान ऐसा ही करता है। लेकिन उसका बड़ा काम है, वर्ल्ड का काम है, दुनिया के सम्बन्ध की बात है। बाकी ऐसे नहीं कि किसी को थोड़ा पैसा मिल गया, यह भगवान ने किया, यह तो हम भी अच्छे कर्म करते हैं, तो उस कर्म का फल मिलता है। अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब चलता है, उसका भी हम पाते रहते हैं लेकिन परमात्मा ने आ करके जो कर्म सिखाया उसका जो फल है, वह अलग है। अल्पकाल का सुख तो बुद्धि के आधार पर भी मिलता है। परन्तु उसने जो नॉलेज दी उससे हम सदा सुख पाते हैं। तो परमात्मा का काम भिन्न हो गया ना, इसलिए कहते हैं कि मैं ही आ करके कर्म की जो यथार्थ नॉलेज है वो सिखाता हूँ, जिसको कहा है कर्मयोग श्रेष्ठ है। इसमें कर्म को, घर गृहस्थ को छोड़ने की बात नहीं है। सिर्फ तुम अपने कर्मों को पवित्र कैसे बनाओ, उसकी नॉलेज मैं बतलाता हूँ। तो कर्म को पवित्र बनाना है, कर्म छोड़ना नहीं है। कर्म तो अनादि चीज़ है। यह कर्मक्षेत्र भी अनादि है। मनुष्य है तो कर्म भी है, परन्तु उस कर्म को तुम श्रेष्ठ कैसे बनाओ वह आ करके सिखाता हूँ जिससे फिर तुम्हारे कर्म का खाता अकर्म रहता है। अकर्म का मतलब है कोई बुरा खाता नहीं बनता है।

बाप कहते हैं मैं इस छोटे से संगमयुग में तुम्हारे देश, इस कार्पोरियल दुनिया में तुम्हारे लिये ही आया हूँ, तो कम से कम जितना टाइम है उतना टाइम तो कुछ हमारा ख्याल करो। बाबा के बने हो तो कम से कम इतना टाइम तो शुद्ध रहो। फिर तो तुम्हारी ऐसी प्रालब्ध बन जायेगी जो तुम्हें उस दुनिया में मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। अभी थोड़ी मेहनत की बात है, अभी तुम कैसे भी करके, मर मिट करके भी पवित्र रहने की प्रतिज्ञा करो। अपनी दृढ़ता रखो, अपनी धारणाओं में रहने का पूरा प्रयत्न करो। बाप तुम्हें साफ-साफ बतलाते हैं तुम सिर्फ इतने थोड़े टाइम के लिए यह मेहनत करो। मैं तुम्हें और कोई मेहनत नहीं कराता हूँ, तुम्हें जितना मिलता है उसकी भेंट में कोई मेहनत ही नहीं है।

ऐसे नहीं सिर्फ कहते रहो कि मैं यह करूँगा, वह करूँगा…., दुनिया क्या कहेगी, वह क्या कहेंगे.. अरे दुनिया क्या कहेगी… छोड़ दो इसे। अभी यह दुनिया ही जाने वाली है। अब तो मौत सामने खड़ा है। तुम इतना लम्बा-चौड़ा जो बनाकर बैठे हो यह सब वेस्टेज़ कर रहे हो। अभी बाप कहते हैं उस वेस्टेज़ को बचाओ। इस शरीर निर्वाह के लिये जितना चाहिए उतना भले करो, जितना तुम्हारा क्रियेशन के साथ हिसाब-किताब है, उतना करो, मैं कहाँ सम्भालूँगा। इसे तुमको ही सम्भालना है। जो जरूरी है वह तो तुमको फ्री करता हूँ, लेकिन अभी यह जो एक्स्ट्रा रच रहे हो उसके लिये मना करता हूँ क्योंकि अभी वह तो गिरना ही है क्यों अपना फालतू समय गंवा रहे हो। इन फालतू के झंझटों से ही तुम दु:खी हुए हो, उन झंझटों से तुम कैसे छूटो, वही तो तुम्हें बतलाता हूँ। फिर भी बैठ करके अनेक बहाने लगाना, यह कहाँ की रीति है? फिर बाप भी कहते हैं कि देख लेना, अभी अगर मुझे सीधी अंगुली नहीं देते हो, हाथ नहीं देते हो, तो फिर मैं ऐसे नाक पकड़के ले चलूँगा। नाक पकड़ेगा तो फिर दम घुटेगा, फिर दु:ख होगा, सज़ायें खानी पड़ेंगी ना! इसलिये कहते हैं अभी हाथ में हाथ देकर सीधा चलने का टाइम आ गया है। अगर सीधी तरह से नहीं चलेंगे तो फिर मेरे हाथ में तुम्हारा नाक भी तो आयेगा, फिर देख लेना। फिर उस समय कुछ नहीं हो सकेगा, न कुछ कर सकेंगे इसलिए बाप कहते हैं बच्चे, अब तुम मेरे हो करके, मेरे पास आ करके, मेरी बातों को सुन करके, अगर फिर भी कुछ नहीं किया तो उनके लिये बहुत कड़ी सज़ायें हैं, इसलिये जिन बिचारों को पता नहीं उसकी तो बात अलग है। बाकी जिन्हों को पता है, जो बैठके, सुनके फिर इन्हीं बातों में गफलत की तो उनकी तो खैर नहीं। जैसे 10 गुणा फायदा, वैसे 10 गुणा नुकसान होगा। तब कहते हैं अपने नुकसान को, घाटे को.. अच्छी तरह से समझो। अच्छी तरह से कुछ तो अपनी बुद्धि खोलो। अभी बाप से बुद्धियोग लगायेंगे तो ताकत मिलेगी। तो इन सभी बातों को समझो, भूलो मत।

अभी यह जो समय चल रहा है, इसे पहचानो, जरा आंखे खोलो, बुद्धि खोलो और समय का पूरा फायदा लो। अपनी पूरी तकदीर जगाओ। कहते भी हैं जैसा संग वैसा रंग होता है, इसलिये जिसमें अभी यह धारणा पूरी नहीं होगी तो माया के संग का रंग लग जायेगा, तब तो कहते हैं हियर नो इविल, सी नो इविल, टॉक नो इविल… कई ऐसे इविल्स हैं जो यहाँ भी कईयों को छोड़ते नहीं हैं, फिर एक दो के संगदोष में आ जाते हैं। तो कहते हैं ऐसे संगदोष से बचे रहो। ऐसे मत समझो कि संगदोष बाहर है, यहाँ नहीं है। नहीं, यहाँ भी वह घूमते रहते हैं, क्योंकि उनका राज्य है ना, इसलिये बाप कहते हैं अच्छी तरह से कवच पहनकर रहो। कवच होगा तो उसकी गोली लगेगी नहीं। योग का ही कवच है, ज्ञान की तलवार है। इन सभी अस्त्र-शस्त्रों को अपने पास अच्छी तरह से सम्भालके रखो।

कहते भी हैं जो करता है वह पाता है, यह तो भविष्य प्रालब्ध बनाने की बातें हैं। यहाँ तो प्रालब्ध नहीं भोगनी है ना, यहाँ तो कोई गुरू बन करके नहीं बैठना है। इसमें कोई मिसअण्डरस्टैण्ड न करे, इसलिये यह सब समझाया जाता है। तो यह सब बातें ध्यान में रख करके अपने को सेफ रखना है। यहाँ कोई खर्चे आदि की बात नहीं होनी चाहिए। अभी यह सब खर्चा दूसरों के कल्याणार्थ ही यूज़ करना है। एक एक पाई भी सब इसी कार्य में लगाना है। अच्छा।

ऐसे बापदादा और माँ के मीठे-मीठे बहुत अच्छे, खबरदार रहने वाले बच्चों के प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। अच्छा।

प्रश्न:- मम्मा हम चलते फिरते योग की ऊंची अवस्था में कैसे स्थित हो सकते हैं?

उत्तर:- वास्तव में अपनी यह लाइफ नेचुरल योग की हो जानी चाहिए क्योंकि योग है निश्चय। तो हरदम निश्चय को कायम रख प्रैक्टिकल वह स्वरूप बन जाना है। निश्चय रूप बन कर्मेन्द्रियों से कर्म करो, भल स्थूल कर्मेन्द्रियां कोई भी कार्य करती रहें मगर खुद को उस ही सुख स्वरूप अवस्था में लवलीन रहना है। आपका चेहरा सदा सुख स्वरूप रमणीक दिखाई दे। कोई भी अशुद्ध संकल्प विकल्प न रहें। ईश्वरीय आनंद में आन्तरिक मगन अवस्था में रहो तो फिर कोई भी अशुद्ध संकल्प विकल्प की उत्पत्ति नहीं होगी। शुद्ध प्युअर धरनी में जो भी संकल्प उत्पन्न होगा वह लोक संग्रह प्रति अथवा अपनी उन्नति प्रति होगा। यह अति मीठी सुन्दर अवस्था है जो समय पर मदद करती है। ऐसे ईश्वरीय अलौकिक मीठी प्युअर लाइफ बनाने का अब ही गोल्डन चांस तुम्हें मिला हुआ है। तो ऐसी अवस्था बनाने के लिए थोड़ी मेहनत करो।

जब हम योग में बैठते हैं तो अन्दर में मन्त्र पूजा जप आदि कुछ भी नहीं करते हैं, जैसे भक्तिमार्ग में कोई कोई अन्दर ही अन्दर प्रार्थना करते हैं, माला जपते हैं, मूर्ति को सामने रख फूल चढ़ाते हैं, वह सबकुछ अन्दर ही अन्दर करते हैं जिसको मन्सा पूजा कहेंगे। लेकिन हमारे योग में हम सिर्फ अपने स्व स्वरूप में स्थित हो सुख स्वरूप बन जाते हैं। अपने मन सहित सभी कर्मेन्द्रियों को कन्ट्रोल कर एकाग्रचित बन ईश्वरीय सुख स्वरूप हो जाते हैं इसके लिए योग का टाइम पर्सनल मुकरर है। जहाँ एक टाइम पर बैठकर अभ्यास करते हैं। सिर्फ व्यक्त बातों से नाता तोड़कर अव्यक्त सम्बन्ध से नाता जोड़कर रखना है तो याद सहज हो जायेगी। अच्छा। ओम् शान्ति।

वरदान:- बाप-दादा के साथ द्वारा माया को दूर से ही मूर्छित करने वाले मायाजीत, जगतजीत भव
जैसे बाप के स्नेही बने हो ऐसे बाप को साथी बनाओ तो माया दूर से ही मूर्छित हो जायेगी। शुरू-शुरू का जो वायदा है तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूं, तुम्हीं से रूह को रिझाऊं…इसी वायदे प्रमाण सारी दिनचर्या में हर कार्य बाप के साथ करो तो माया डिस्टर्ब कर नहीं सकती, उसका डिस्ट्रक्शन हो जायेगा। तो साथी को सदा साथ रखो, साथ की शक्ति से वा मिलन में मगन रहने से मायाजीत, जगतजीत बन जायेंगे।
स्लोगन:- अपनी ऊंची वृत्ति से प्रवृत्ति की परिस्थितियों को चेंज करो।

 

ये अव्यक्त इशारे – सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

अव्यक्त स्थिति रूपी दर्पण को साफ और स्पष्ट करने के लिए सरलता, श्रेष्ठता और सहनशीलता इन तीन बातों पर ध्यान दो। अगर तीनों में से एक भी बात की कमी है तो दर्पण पर भी कमी का दाग दिखाई पड़ेगा इसलिए जो भी कार्य करते हो, उसमें साधारणता दिखाई न दे। साधारणपन को श्रेष्ठता में बदली करो, हर कार्य में सहनशीलता और वाणी में सरलता को धारण करो तब सर्विस में सफलता दिखाई देगी।

शीर्षक : कर्मयोगी जीवन – कर्म करते हुए भी बन्धनमुक्त और सुखस्वरूप कैसे बनें?

प्रश्न 1: इस कर्मक्षेत्र पर मनुष्य को क्या समझना चाहिए?

उत्तर:
यह सृष्टि कर्म का खेत है, जहाँ प्रत्येक आत्मा अपना-अपना पार्ट निभा रही है। मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म अनादि है, इसलिए कर्म छोड़ना नहीं है, बल्कि कर्मयोगी बनकर कर्म करना है।


प्रश्न 2: परमात्मा का इस सृष्टि में क्या विशेष पार्ट है?

उत्तर:
परमात्मा भी आत्मा हैं, लेकिन उनका कर्तव्य सबसे भिन्न और महान है। वे जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते, बल्कि माया के बन्धनों से आत्माओं को मुक्त करने, उन्हें पवित्र बनाने और नई दुनिया की स्थापना करने आते हैं।


प्रश्न 3: परमात्मा को ‘लिब्रेटर’ और ‘सद्गति दाता’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
क्योंकि परमात्मा आत्माओं को माया और दुःख के बन्धनों से मुक्त करके उन्हें पवित्र बनाते हैं और वापस शान्तिधाम ले जाने का मार्ग बताते हैं। इसलिए उन्हें गति-सद्गति दाता और लिब्रेटर कहा जाता है।


प्रश्न 4: ‘गॉड इज़ ट्रूथ’ का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
इसका अर्थ केवल सच बोलना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है कि परमात्मा ही संसार, आत्मा, कर्म और सृष्टि चक्र की सम्पूर्ण सच्चाई बताने वाले हैं। वे नॉलेजफुल हैं और यथार्थ ज्ञान प्रदान करते हैं।


प्रश्न 5: परमात्मा की महिमा मनुष्य से भिन्न क्यों है?

उत्तर:
मनुष्य अल्पज्ञ है, जबकि परमात्मा सर्वज्ञ हैं। वे सम्पूर्ण सृष्टि चक्र, आत्मा और कर्मों के रहस्य को जानते हैं तथा आत्माओं को सदा सुख प्राप्त करने का ज्ञान देते हैं।


प्रश्न 6: कर्मयोग क्या है?

उत्तर:
कर्मयोग का अर्थ कर्मों का त्याग करना नहीं, बल्कि कर्म करते हुए स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा से योग जोड़ना और अपने कर्मों को पवित्र एवं श्रेष्ठ बनाना है।


प्रश्न 7: ‘कर्म का खाता अकर्म हो जाता है’ इसका क्या अर्थ है?

उत्तर:
जब आत्मा ईश्वरीय ज्ञान और योग की स्थिति में रहकर कर्म करती है, तो उसके कर्म बन्धनकारी नहीं बनते। ऐसे कर्मों से कोई नया बुरा कर्म-खाता नहीं बनता।


प्रश्न 8: संगमयुग को ‘गोल्डन चांस’ क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि यही वह छोटा-सा समय है जिसमें थोड़ी मेहनत, पवित्रता और योग द्वारा आत्मा अपनी अनन्तकाल की श्रेष्ठ प्रालब्ध बना सकती है।


प्रश्न 9: बाप बच्चों को ‘वेस्टेज’ से बचने की प्रेरणा क्यों देते हैं?

उत्तर:
क्योंकि समय, शक्ति और जीवन को अनावश्यक इच्छाओं, झंझटों और संग्रह में व्यर्थ करने से आत्मा दुःखी होती है। बाप कहते हैं कि आवश्यक कार्य करो, लेकिन फालतू उलझनों में अपना समय नष्ट मत करो।


प्रश्न 10: बाप की बातों को जानते हुए भी गफलत करने का क्या परिणाम होता है?

उत्तर:
जिसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसके लिए जिम्मेदारी अधिक है। यदि वह जानकर भी गफलत करता है, तो उसे अधिक नुकसान और कठोर सजाओं का सामना करना पड़ सकता है।


प्रश्न 11: माया के संगदोष से बचने का उपाय क्या है?

उत्तर:
योग का कवच और ज्ञान की तलवार धारण करनी है। बुरे संग, बुरे विचार और अशुद्ध वातावरण से स्वयं को बचाकर ईश्वरीय स्मृति में रहना ही संगदोष से सुरक्षा है।


प्रश्न 12: मम्मा के अनुसार चलते-फिरते योग की ऊँची अवस्था में कैसे स्थित हो सकते हैं?

उत्तर:
योग का अर्थ है निश्चय। हर समय निश्चय रूप बनकर, कर्मेन्द्रियों से कर्म करते हुए भी स्वयं को सुखस्वरूप आत्मा समझकर ईश्वरीय आनन्द में मगन रहना ही नेचुरल योग की अवस्था है।


प्रश्न 13: योग में बैठते समय क्या करना चाहिए?

उत्तर:
योग में कोई मन्त्र-जप, पूजा या कल्पना नहीं करनी होती। केवल अपने आत्मस्वरूप में स्थित होकर, मन और कर्मेन्द्रियों को शान्त कर, परमात्मा से सम्बन्ध जोड़कर ईश्वरीय सुख का अनुभव करना होता है।


प्रश्न 14: मायाजीत और जगतजीत बनने का सहज साधन क्या है?

उत्तर:
हर कार्य में बाप को अपना साथी बनाना है। ‘तुम्हीं से खाऊँ, तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से रूह को रिझाऊँ’—इस वायदे के अनुसार जीवन जीने से माया दूर से ही मूर्छित हो जाती है और आत्मा मायाजीत एवं जगतजीत बन जाती है।


प्रश्न 15: परिस्थितियों को बदलने की वास्तविक शक्ति क्या है?

उत्तर:
अपनी वृत्ति को ऊँचा, पवित्र और सकारात्मक बनाना। जब वृत्ति बदलती है, तो प्रवृत्ति और परिस्थितियाँ स्वतः बदलने लगती हैं।


स्लोगन

“अपनी ऊँची वृत्ति से प्रवृत्ति की परिस्थितियों को चेंज करो।”

“कर्म छोड़ना नहीं है, कर्मयोगी बनकर कर्म को पवित्र बनाना है।”

डिस्क्लेमर:
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरलियों, अव्यक्त वाणियों तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित अध्ययनात्मक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, सकारात्मक चिंतन और राजयोग के सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाना है। यह किसी व्यक्ति, धर्म, सम्प्रदाय या मान्यता का विरोध नहीं करता, बल्कि आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की प्रेरणा प्रदान करता है।

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