MURLI 17-07-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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17-07-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – यह भारत भूमि निराकार बाप की जन्म-भूमि है, यहाँ ही बाप आते हैं तुम्हें राजयोग सिखलाकर राजाई देने, तुम्हारी सेवा करने”
प्रश्नः- शिवबाबा अपने हर एक बच्चे से कौन सी प्रतिज्ञा कराते हैं?
उत्तर:- मीठे बच्चे – प्रतिज्ञा करो कि बाबा हम कोई भी विकर्म नहीं करेंगे। 5 विकारों का हम दान देते हैं। अन्दर में डर रहना चाहिए – अगर हम दान देकर फिर वापिस लेंगे तो बहुत पाप बन जायेगा, जिसकी कड़ी सज़ा खानी पड़ेगी। हरिश्चन्द्र की कहानी भी इसी पर बनी हुई है।

ओम् शान्ति। यह बच्चों की है गॉडली स्टूडेन्ट लाइफ। बच्चे जानते हैं कि हम उनके पास आये हैं। वही कल्प-कल्प भारत-वासी बच्चों को आकर राज्य भाग्य देते हैं। भारत में ही आते हैं ना। यह भारत भूमि है। अपनी भूमि पर बहुत प्यार रिगार्ड होता है। जैसे कोई विलायत का बड़ा आदमी यहाँ मरता है तो उनको विलायत ले जाते हैं अथवा यहाँ का कोई बड़ा आदमी विलायत में मरता है तो उनको यहाँ ले आते हैं। अपनी भूमि का मान रखते हैं। भारत को कहा जाता है भगवान की जन्म भूमि। यह भी जानते हो जिसको भगवान अथवा अल्लाह, परमात्मा कहते हैं उनके सामने अभी तुम बैठे हो। नाम तो जरूर चाहिए ना। अल्लाह कहते हैं तो भी लिंग की पूजा करते हैं। ईश्वर अथवा खुदा कहते हैं तो जरूर उनकी निशानी चाहिए ना। लिंग को सब तरफ पूजते हैं। चित्रों में भी आजकल देवताओं के आगे परमपिता परमात्मा का चित्र लिंग दिखाते हैं। वह है सबसे ऊंच, उनको अपना शरीर नहीं है, इसलिए निराकार कहा जाता है। साकार नहीं है। अभी तुम बच्चे जानते हो हम उनके सामने कल्प-कल्प हाज़िर होते हैं – शिक्षा लेने के लिए। भगवानुवाच है तो जरूर राजयोग सिखलाते होंगे। स्टूडेन्ट को राजयोग सिखाया था और वह राजा रानी बने थे। लड़ाई आदि की तो बात है नहीं। इन लक्ष्मी-नारायण आदि ने लड़ाई से थोड़ेही बादशाही पाई है। बिल्कुल नहीं। दुनिया बिल्कुल नहीं जानती कि इन्होंने सतयुग में राज्य कैसे पाया। अभी तुम बच्चे समझते हो हम बाप से राज्य ले रहे हैं। हम उनके सम्मुख बैठे हैं। वही बाबा है, श्रीकृष्ण नहीं। श्रीकृष्ण तो छोटा बच्चा है, वह है रचना। अभी बरोबर श्रीकृष्ण अपना पद ले रहे हैं जो फिर भविष्य में श्रीकृष्ण कहलायेंगे। यह है सारी पढ़ाई की बात।

तुम जानते हो बाबा हमको राजयोग सिखलाते हैं। जैसे मनुष्य, मनुष्य को बैरिस्टर, इन्जीनियर आदि बनाते हैं। हैं तो मनुष्य ना। तुम समझते हो हम भी मनुष्य हैं, परन्तु हम पतित हैं। अभी बाप पावन भी बनाते हैं और हमें वर्सा भी देते हैं। पावन दुनिया तो नई दुनिया ही होगी। नई दुनिया में है ही राजाई। अभी तुम बाप के सम्मुख बैठे हो। जैसे लौकिक बाप बच्चों को प्यार से बैठ समझाते हैं, यह है पारलौकिक विचित्र बाप। जिसके लिए तुम गाते आये हो त्वमेव माताश्च पिता.. इस समय तुम जानते हो यह अपना पार्ट बजाते हैं, जो भक्ति मार्ग में हम गायन करते हैं। तुम कहते हो हम शिवबाबा के पास आये हैं। चिट्ठी भी लिखते हो – शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा। कोई को तुम पोस्ट दिखाओ तो वन्डर खायेंगे – शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा ऐसा तो कभी सुना नहीं है। शिवबाबा ब्रह्मा में आकर विष्णुपुरी की स्थापना कर रहे हैं, सामने खड़े हैं। ऊपर में है शिवबाबा। शिवबाबा ने ब्रह्मा द्वारा स्थापना की थी, अब फिर से कर रहे हैं। यह है प्रवृत्ति मार्ग। राजविद्या में भी बैरिस्टर पढ़ाते हैं तो मेल फीमेल दोनों पढ़ते हैं। फीमेल भी जज, बैरिस्टर, डाक्टर आदि बनती हैं। यह भी प्रवृत्ति मार्ग है। संन्यासियों का है निवृत्ति मार्ग, वह अलग है। यह भी बाबा ने समझाया है – शंकराचार्य अगर नहीं आता तो पवित्रता का अंश नहीं रहता। भारत बिल्कुल ही जल मरता। यह नूँध है – भारत को थमाने लिए। भारत बहुत पवित्र था फिर अपवित्र बना है। अभी भारत कितना कंगाल है। कहते हैं सोने की लंका समुद्र के नीचे चली गई। अब लंका तो सोने की हो नहीं सकती। यह सब कहानियां बैठ लिखी हैं जिससे फायदा कुछ भी नहीं।

तुम बच्चे जानते हो बरोबर बाबा हमको बिल्कुल सहज याद के बल से कितना ऊंच बनाते हैं। बाप प्रतिज्ञा करते हैं, अगर निरन्तर याद करने का पुरुषार्थ करेंगे तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। भक्ति मार्ग में भी याद करने का पुरुषार्थ किया है ना। क्यों याद करते हैं? कि हमको साक्षात्कार हो। ऐसे नहीं याद करते कि कृष्णपुरी में हमको बादशाही मिल जाये वा हम नर से नारायण बन जायें, नहीं। तुमको भी यह आश नहीं थी कि हम मनुष्य से देवता बनें। गाते भी हैं मनुष्य से देवता किये… तुम देखते हो बरोबर कलियुग के बाद सतयुग आयेगा। कलियुग में इतने मनुष्य हैं। सतयुग में एक धर्म होगा। अभी तुमको आत्मा और परमात्मा का भी ज्ञान मिला है, दुनिया में एक भी मनुष्य नहीं जिसको आत्मा का ज्ञान हो। आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट कैसे नूँधा हुआ है, यह कोई जानते नहीं। यह अक्षर भी कभी कोई से नहीं सुने हैं। बाप तो है ज्ञान का सागर, पतित-पावन, निराकार। तुम जानते हो हमारी आत्मा अब पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बन रही है। सतयुग में तो हैं सब पुण्य आत्मायें। यहाँ हैं पाप आत्मायें। ऐसे नहीं कि बहुत दान-पुण्य करने वालों को पुण्य आत्मा कहा जाता है। नहीं। पुण्य आत्मा होते ही हैं सतयुग में। यहाँ जो मनुष्य दान पुण्य करते हैं, उनको पुण्य आत्मा समझते हैं। वहाँ तुमको दान पुण्य आदि करने की दरकार नहीं रहती। वहाँ गरीब कोई होता ही नहीं। तुम वहाँ सदैव के लिए पुण्य आत्मा हो ही। तुम तन-मन-धन सब बेहद के बाप अर्थ देते हो, जिसको बलिहार जाना कहा जाता है। बाप कहते हैं पहले मैं बलिहार जाता हूँ वा तुम? बाबा कहते हैं – पहले तुम बलिहार जाते हो तब फिर 21 जन्मों के लिए बलिहारी मिलेगी। यह बातें अभी तुम अच्छी रीति समझते हो, डायरेक्ट सुनते हो। घर में रहते हो तो वहाँ मुरली आती है। दूर से सुनते हो। अभी तो बाप के सम्मुख बैठे हो। बाप कहते हैं – बच्चों, मैं तुम्हारा बाप भी हूँ। यहाँ अन्धश्रद्धा की कोई बात नहीं। बाप भी है, टीचर भी है। बाप का बनने से वह शिक्षा देते हैं, तुम्हारी बुद्धि में अब सारा ज्ञान है। 84 का चक्र भी तुमको समझाया जाता है। जो 84 जन्म लेने वाले नहीं होंगे वह समझेंगे नहीं। तुम समझते हो बरोबर हम 84 का चक्र लगाकर अब वापिस जाते हैं। बाप कहते हैं – तुम आत्मा अशरीरी आई थी फिर अशरीरी होकर वापिस जाना है। तुम पवित्र आत्मायें होकर जाती हो। पवित्र बनने के लिए तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। योगबल अर्थात् यादबल से तुम पवित्र बन जायेंगे। योग अक्षर शास्त्रों का है। राइट अक्षर है याद। स्त्री को पति की अथवा पुरुष को पत्नी की याद रहती है ना। योग का अर्थ ही है याद। बाप भी कहते हैं – मामेकम् याद करो और संग बुद्धियोग तोड़ मुझ अपने बाप के साथ बुद्धि योग जोड़ो। याद करो। जितना याद करेंगे उतना तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बरोबर भारत को कल्प-कल्प वर्सा मिलता है। शिव जयन्ती भी मशहूर है। जैसे बुद्ध, क्राइस्ट आदि की जयन्ती है वैसे निराकार शिव की जयन्ती है। वह ऊंच ते ऊंच हो गया। कृष्ण जयन्ती भी मशहूर है। परन्तु वह क्या आकर करते हैं, यह किसको भी पता नहीं हैं। श्रीकृष्ण सतयुग का प्रिन्स था। जरूर उनको कोई ने ऐसा कर्म सिखाया होगा, जो सतयुग का प्रिन्स बना है। छोटा बच्चा तो पवित्र ही है। वहाँ विकार की बात नहीं होती। बच्चा शुद्ध रहता है। भगवान तो एक ही निराकार है, गॉड इज़ वन। बाकी सारी है रचना। रचना से कभी रचना को वर्सा नहीं मिल सकता है। वर्सा बाप से मिलेगा। भाई को भाई से वर्सा नहीं मिल सकता। तुम सब भाई-भाई हो। ब्रदरहुड कहते हैं ना। बाप तो एक ही है, वर्सा बाप से मिलेगा। सर्व भाईयों का सद्गति दाता एक बाप है। सभी आत्माओं को बाप से वर्सा मिल रहा है। बाप कहते हैं – मैं आत्माओं को आकर पढ़ाता हूँ, आत्माओं को सद्गति देता हूँ। बाप बैठ राजयोग सिखलाते हैं। इस पढ़ाई का पद तुमको यहाँ नहीं पाना है। वह बैरिस्टर आदि इस जन्म में बनते हैं, फिर दूसरा जन्म लेकर फिर से पढ़ेंगे।

तुम जानते हो इस पढ़ाई से हम 21 जन्म के लिए प्रालब्ध पाते हैं। वहाँ सतयुग में डाक्टर आदि कोई होते नहीं। वहाँ बीमारी ही नहीं होती। वहाँ तुम गर्भ महल में रहते हो। यहाँ गर्भजेल में रहते हो जहाँ बहुत सजायें मिलती हैं, तब पुकारते हैं इस जेल से बाहर निकालो, हम फिर कोई भूल नहीं करेंगे। धर्मराज से प्रतिज्ञा करते हैं। यहाँ तुमको शिवबाबा से प्रतिज्ञा करनी है। बाबा हम कभी विकर्म नहीं करेंगे। 5 विकार हम आपको दे देते हैं। यह भी बाप जानते हैं कि विकार कोई ऐसे फट से नहीं छूटेंगे। अन्दर डर रहना चाहिए, हम विकारों का दान देकर फिर लेंगे तो बड़ा पाप हो जायेगा। जैसे राजा हरिश्चन्द्र का मिसाल है। बाप जानते हैं ऐसे नहीं कि 5 विकार झट से छूट जाते हैं। नहीं, टाइम लगता है। तुम्हारी कर्मातीत अवस्था होगी तब लड़ाई लगेगी। यह 5 विकार हैं बड़े दुश्मन। उसमें भी मुख्य एक है देह-अभिमान। उसका दान देना कितना मुश्किल है। घड़ी-घड़ी बाप कहते हैं – अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। परन्तु यह होता नहीं है। देह-अभिमानी बनने से फिर काम की चोट लगती है। देह-अभिमान सबसे तीखा है। देही-अभिमानी बनने की मेहनत है। मुख्य देह-अभिमान आने से ही पाप हुए हैं। 5 विकार दान में देना पड़े, इसमें समय लगता है। साजन बिगर सजनियां तो जा न सकें। पहले साज़न को जाना है फिर सजनियां। साज़न को आकर सब आत्माओं को ले जाना है। जब तक कर्मातीत अवस्था हो तब तक पुरुषार्थ करना है। देह-अभिमान आने से ही फिर भूलें होती हैं। कहते हैं बाबा देह-अभिमान में आकर विकार में गिरे। तूफान तो बहुत आयेंगे। विकार का संकल्प आये परन्तु कर्मेन्द्रियों से कभी कोई पाप नहीं करना। माया को जीतने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। बाप कहते हैं – अगर शादी की हुई है तो पवित्र रहकर दिखाओ तो संन्यासी भी देखेंगे। तुमको आमदनी देखो कितनी भारी है। पवित्र रह दिखाया तो बहुत ऊंच पद पायेंगे। तुम पर तो सब कुर्बान जायेंगे। बाबा भी महिमा करते हैं। भल पवित्र भी रहे परन्तु फिर योग भी चाहिए। योग में ही घड़ी-घड़ी विघ्न पड़ते हैं। देह-अभिमान आ जाता है। पवित्र रहते हैं सो तो ठीक, पवित्रता से ही पवित्र दुनिया में वर्सा पायेंगे। परन्तु फिर माया भी जोर रखेगी, माया बहुत वार करती है। बाप समझाते हैं यह सब होगा। बहादुरी दिखलाते हैं परन्तु साथ-साथ निरन्तर याद भी रहे तब ही विकर्म विनाश होंगे। रूसतम जो बनते हैं उनको माया भी बहुत सताती है। याद में मुश्किल रह सकते हैं। जो रह सकते हैं उनसे अनुभव पूछना चाहिए। क्या समझते हैं, कैसे रहते हैं। याद में रहने से विकर्म विनाश होंगे। यह बात ही बिल्कुल न्यारी नई है। यहाँ बैठे हो तो नशा चढ़ा हुआ है। यह भी समझते हैं भगवान एक ही निराकार है, न कि श्रीकृष्ण। वास्तव में श्रीकृष्ण के लिए शास्त्रों में बातें लिख दी हैं – ओखली से बांधा, यह किया… वह कोई बातें हैं नहीं। यह भी उनकी ग्लानी करते हैं, इनसल्ट करते हैं। श्रीकृष्ण में तो कोई भी अवगुण नहीं था। चंचलता करना यह भी एक अवगुण है ना। श्रीकृष्ण तो बिल्कुल ही मर्यादा पुरुषोत्तम है। उनकी महिमा गाते हैं – सर्वगुण सम्पन्न… गाया जाता है गुरू ब्रह्मा, गुरू विष्णु… बोलो गुरू तो हमारा है नहीं। हम इनको न तो गुरू, न ईश्वर मानते हैं। पतित-पावन तो एक ही निराकार है ना। साकार गुरू कोई पतित-पावन हो न सके। इस समय तुम परमपिता परमात्मा की सारी जीवन कहानी को जानते हो। 5 हजार वर्ष में शिवबाबा का क्या पार्ट बजता है – यह तुम जानते हो, बाप द्वारा। नॉलेजफुल तो बाप है ना। सुख-शान्ति, आनंद का सागर…. यह महिमा उनकी है। बाप के पास खजाना है तो जरूर बच्चों को भी देते होंगे ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कर्मातीत अवस्था को प्राप्त करने के लिए इन कर्मेन्द्रियों से कोई भी भूल नहीं करनी है। पवित्र रहने के साथ-साथ याद में भी मजबूत होना है।

2) सदा पुण्य आत्मा बनने के लिए तन-मन-धन से बाप पर बलिहार जाना है। एक बार बलिहार जाने से 21 जन्म के लिए पुण्य आत्मा बन जायेंगे।

वरदान:- सहजयोग को नेचर और नैचुरल बनाने वाले हर सबजेक्ट में परफेक्ट भव
जैसे बाप के बच्चे हो – इसमें कोई परसेन्टेज़ नहीं है, ऐसे निरन्तर सहजयोगी वा योगी बनने की स्टेज में अब परसेन्टेज खत्म होनी चाहिए। नैचुरल और नेचर हो जानी चाहिए। जैसे कोई की विशेष नेचर होती है, उस नेचर के वश न चाहते भी चलते रहते हैं। ऐसे यह भी नेचर बन जाए। क्या करूं, कैसे योग लगाऊं – यह बातें खत्म हो जाएं तो हर सबजेक्ट में परफेक्ट बन जायेंगे। परफेक्ट अर्थात् इफेक्ट और डिफेक्ट से परे।
स्लोगन:- सहन करना है तो खुशी से करो, मज़बूरी से नहीं।

 

ये अव्यक्त इशारे – ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो

पावरफुल योग अर्थात् लगन की अग्नि, ज्वाला रूप की याद ही भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि को समाप्त करेगी और सर्व आत्माओं को सहयोग देगी, इससे ही बेहद की वैराग्य वृत्ति प्रज्वलित होगी। याद की अग्नि एक तरफ उस अग्नि को समाप्त करेगी दूसरी तरफ आत्माओं को परमात्म सन्देश की, शीतल स्वरूप की अनुभूति करोयगी, इससे ही आत्मायें पापों की आग से मुक्त हो सकेंगी।

मीठे बच्चे – भारत भूमि निराकार बाप की जन्मभूमि है | विकर्मों से बचने की प्रतिज्ञा

प्रश्न 1.

भारत भूमि को भगवान की जन्मभूमि क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
क्योंकि परमपिता शिव स्वयं भारत भूमि पर अवतरित होकर राजयोग सिखाते हैं, पतित आत्माओं को पावन बनाते हैं और नई दुनिया की स्थापना करते हैं। इसलिए भारत को भगवान की जन्मभूमि कहा जाता है।


प्रश्न 2.

शिवबाबा अपने प्रत्येक बच्चे से कौन-सी प्रतिज्ञा कराते हैं?

उत्तर:
शिवबाबा कहते हैं—”मीठे बच्चे, प्रतिज्ञा करो कि अब कोई भी विकर्म नहीं करेंगे और पाँच विकारों का दान एक बार देकर फिर कभी वापस नहीं लेंगे।”


प्रश्न 3.

पाँच विकार कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार (देह-अभिमान) ये पाँच मुख्य विकार हैं, जो आत्मा को पतित बनाते हैं।


प्रश्न 4.

सबसे बड़ा विकार कौन-सा माना गया है?

उत्तर:
देह-अभिमान सबसे बड़ा विकार है। इसी से अन्य सभी विकार उत्पन्न होते हैं।


प्रश्न 5.

विकर्मों का विनाश कैसे होता है?

उत्तर:
निरंतर शिवबाबा की याद (राजयोग) और आत्म-अभिमानी स्थिति में रहने से विकर्मों का विनाश होता है।


प्रश्न 6.

राजयोग का सरल अर्थ क्या है?

उत्तर:
राजयोग का अर्थ है स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा शिव से बुद्धियोग जोड़ना और निरंतर उनकी याद में रहना।


प्रश्न 7.

बाबा “मामेकम् याद करो” क्यों कहते हैं?

उत्तर:
क्योंकि केवल एक परमपिता शिव की याद से ही आत्मा पवित्र बनती है और विकर्मों का हिसाब समाप्त होता है।


प्रश्न 8.

सच्चा वर्सा किससे मिलता है?

उत्तर:
सच्चा और अविनाशी वर्सा केवल परमपिता परमात्मा शिव से मिलता है, किसी मनुष्य या देवता से नहीं।


प्रश्न 9.

संगमयुग में सबसे बड़ा पुरुषार्थ क्या है?

उत्तर:
देह-अभिमान छोड़कर आत्म-अभिमानी बनना, पवित्र रहना, निरंतर योग में रहना और श्रेष्ठ कर्म करना।


प्रश्न 10.

पुण्य आत्मा बनने का सबसे श्रेष्ठ साधन क्या है?

उत्तर:
तन, मन और धन को ईश्वर सेवा में समर्पित करना तथा हर कर्म श्रीमत अनुसार करना।


प्रश्न 11.

पवित्र रहने के साथ-साथ किस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है?

उत्तर:
सिर्फ पवित्र रहना पर्याप्त नहीं है; निरंतर शिवबाबा की याद में रहना भी आवश्यक है, तभी विकर्म नष्ट होते हैं।


प्रश्न 12.

कर्मातीत अवस्था कैसे प्राप्त होती है?

उत्तर:
निरंतर राजयोग, आत्म-अभिमान, पवित्र जीवन और विकर्मों से बचते हुए श्रेष्ठ पुरुषार्थ करने से कर्मातीत अवस्था प्राप्त होती है।


प्रश्न 13.

बाबा के अनुसार सबसे बड़ी बहादुरी क्या है?

उत्तर:
गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी पवित्र रहना, माया पर विजय प्राप्त करना और निरंतर याद में स्थित रहना।


प्रश्न 14.

आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर:
परमात्मा शिव भारत में आकर आत्माओं को राजयोग सिखाते हैं। पाँच विकारों का त्याग करके, निरंतर उनकी याद में रहकर और विकर्मों से बचकर ही आत्मा पुण्यात्मा बनती है तथा 21 जन्मों का सुखद राज्य प्राप्त करती है।


 आज की मुरली का सार (One Line)

“एक शिवबाबा की याद ही विकर्मों का विनाश करती है और आत्मा को पापात्मा से पुण्यात्मा बनाकर पुरुषोत्तम जीवन का अधिकारी बनाती है।”

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