AV-04/26-01-1995 – “Two More Steps of Brahma Bap – Obedient and Faithful”

AV-04/26-01-1995-“ब्रह्मा बाप के और दो कदम – फ़रमानबरदार-व़फादार”

“ब्रह्मा बाप के और दो कदम – फ़रमानबरदार-व़फादार”

आज बापदादा चारों ओर के स्नेही और सहयोगी बच्चों को और शक्तिशाली समान बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही सभी बच्चे हैं लेकिन शक्तिशाली यथाशक्ति हैं। स्नेही बच्चों को स्नेह का रिटर्न पद्म गुणा स्नेह और सहयोग प्राप्त होता है। शक्तिशाली समान बच्चों को सदा सहज विजयी भव का रिटर्न मिलता है। मिलता सभी को है। स्नेही बच्चे यथा शक्तिशाली होने के कारण सदा सहज विजय का अनुभव नहीं कर पाते। कभी सहज, कभी मेहनत। बापदादा स्नेही बच्चों को भी मेहनत को सहज करने का सहयोग देते हैं क्योंकि स्नेही आत्मायें सहयोगी भी रहती ही हैं। तो सहयोग के रिटर्न में बापदादा सहयोग जरूर देते हैं लेकिन योग यथार्थ न होने कारण सहयोग मिलते भी प्राप्ति का अनुभव नहीं कर पाते। योग द्वारा ही सहयोग का अनुभव होता है और शक्तिशाली समान बच्चे सदा योगयुक्त हैं इसलिये सहयोग का अनुभव करते सहज विजयी बन जाते हैं। लेकिन बाप को दोनों ही बच्चे प्यारे हैं। प्यार और सदा विजयी रहने की शुभ चाहना सभी बच्चों में रहती है लेकिन शक्ति कम होने के कारण समय पर और सर्व शक्तियाँ कार्य में नहीं लगा सकते। बाप वर्से के अधिकार में सर्व शक्तियों का अधिकार सभी बच्चों को देते हैं। अधिकार देने में बापदादा अन्तर नहीं रखते, सभी को सम्पूर्ण अधिकारी बनाते हैं लेकिन लेने में नम्बरवार बन जाते हैं। बापदादा किसको स्पेशल, किसको अलग ट्युशन देते हैं क्या? नहीं देते। पढ़ाई सबकी एक है, पालना सबकी एक है। पाण्डवों को अलग पालना हो, शक्तियों को अलग हो – ऐसे है क्या? सबको एक जैसी पालना और पढ़ाई है। लेकिन लेने में, रिज़ल्ट में कितना अन्तर हो जाता है! कहाँ अष्ट रत्न और कहाँ 16108 रत्न – कितना अन्तर है! यह अन्तर क्यों हुआ? पढ़ाई और पालना को, वरदानों को धारण करना और कार्य में लगाना – इसमें अन्तर हो जाता है। कई बच्चे धारण भी कर लेते हैं लेकिन समय प्रमाण कार्य में लगाना नहीं आता है। बुद्धि तक बहुत भरपूर होंगे लेकिन कर्म में आने में फर्क पड़ जाता है।

ब्रह्मा बाप नम्बरवन क्यों बना? दो कदम पहले सुनाये ना! तीसरा – सदा बाप, शिक्षक और सद्गुरु के फ़रमानबरदार बनें। हर फ़रमान को जी हाज़िर किया। बाप का फ़रमान है सदा सर्व खजानों के वर्से में सम्पन्न बनना और बनाना। तो प्रत्यक्ष देखा कि सर्व खजाने – ज्ञान, शक्तियाँ, गुण, श्रेष्ठ समय, श्रेष्ठ संकल्पों का खजाना पहले दिन से लेकर लास्ट दिन तक कार्य में लगाया। लास्ट दिन भी समय, संकल्प बच्चों प्रति लगाया। ज्ञान का खजाना, याद की शक्ति और सहनशीलता के गुण का स्वरूप – यह सब खजाने लास्ट समय तक, शरीर को भी भूल सेवा में प्रैक्टिकल में लगाकर दिखाया। तो इसको कहा जाता है फ़रमानबरदार नम्बरवन बच्चा। क्योंकि बाप का विशेष फ़रमान यही है कि याद और सेवा में सदा बाप समान रहो। तो आदि से लेकर अन्त घड़ी तक दोनों ही फ़रमान प्रैक्टिकल में देखा ना? स्नेह की निशानी है फॉलो करना। तो चेक करो – आदि से अब तक सर्व खजानों को स्व के साथ-साथ सेवा में लगाया है? बाप का फ़रमान एक श्वास वा संकल्प, सेकेण्ड व्यर्थ नहीं गँवाना है। तो सारे दिन में ये फ़रमान प्रैक्टिकल में लाया? वा कभी लाया, कभी नहीं लाया? अगर कभी-कभी फ़रमानबरदार बने और कभी नहीं बने तो किस लिस्ट में जायेंगे? अगर बापदादा फ़रमानबरदार की लिस्ट निकाले तो आप किस लिस्ट में होंगे? अपने को तो जानते हो ना? क्योंकि आप सभी सर्व खजानों के ट्रस्टी, मालिक हो। तो एक संकल्प भी बिना बाप के फ़रमान के यूज़ नहीं कर सकते हो। या सोचते हो कि हम बालक सो मालिक हैं, इसलिए व्यर्थ गँवायें या क्या भी करें, इसमें बाप का क्या जाता है! बाप ने दे दिया, अभी हिसाब क्यों लेते हैं? नहीं। आप रोज़ बाप के आगे कहते हो कि सब तेरा है, मेरा नहीं है। कहते हो ना! कि टाइम पर मेरा और टाइम पर तेरा! जब हमारा मतलब हो तो मेरा, वैसे तेरा… ऐसी चतुराई तो नहीं करते हो? ब्रह्मा बाप को देखा – अपना आराम का समय भी विचार सागर मंथन कर बच्चों के प्रति लगाया। रात्रि भी जागकर बच्चों को योग की शक्ति देते रहे। ये चरित्र तो सुने हैं ना? ब्रह्मा की कहानी सुनी है ना? फॉलो फादर किया कि सिर्फ सुन लिया? सुनना अर्थात् करना।

तो तीसरा कदम सदा जी हाज़िर, सदा हज़ूर हाज़िर और नाज़िर। कभी ब्रह्मा बाप से शिव बाप अलग नहीं हुए, हाज़िर-नाज़िर रहे ना! बच्चे ने कहा बाबा और बाप ने कहा मीठे बच्चे। तो मन की स्थिति में सदा हाज़िर और नाज़िर अनुभव किया। सेवा में सदा जी हाज़िर किया। चाहे रात हो, चाहे दिन हो, सेवा का डायरेक्शन मिला और प्रैक्टिकल किया और कर्म में सदा हाँ जी किया। हाँ जी का पाठ पढ़ाया ना? तो आप क्या फॉलो करते हो? कभी हाँ जी, कभी ना जी तो नहीं करते? तो प्यार का सबूत दिखाओ। ऐसे नहीं सोचो कि जितना बाबा से मेरा प्यार है उतना और किसका नहीं। मेरे दिल में देख लो, क्या दिखाऊं, क्या सुनाऊं… बच्चे ऐसे गीत गाते हैं। लेकिन सबूत दिखाओ। सबूत है फॉलो फादर। तो चेक करो – स्थिति में, सेवा में, कर्म अर्थात् सम्बन्ध-सम्पर्क में, (सम्बन्ध और सम्पर्क में आना ही कर्म है) तीनों में सदा फॉलो फादर हैं? हर फ़रमान सिर्फ बुद्धि तक रहता है या कर्म में भी आता है? रिज़ल्ट में देखा जाता है कि अगर बुद्धि और वाणी में 100 बातें रहती है तो कर्म में 50 हैं। तो उन्हों को फॉलो फादर कहें? अधूरी रिज़ल्ट वालों को फॉलो फादर की लिस्ट में रखें? आप क्या समझते हैं? वे फ़रमानबरदार हैं? कि आप आधे में राजी हैं? थोड़ा-थोड़ा अन्तर पसन्द है! शुरू-शुरू में माला भी बनाते थे, गोल्डन-सिल्वर भी लिस्ट निकालते थे। तो अभी फिर से लिस्ट निकालें? कि सिल्वर में नाम देखकर कॉपर बन जायेंगे?

समय की सूचना बाप तो दे ही रहे हैं लेकिन प्रकृति भी दे रही है। प्रकृति भी चैलेन्ज कर रही है तो समय के प्रमाण आप लोग औरों को भी सूचना देते रहते हो। भाषणों में सबको कहते हो कि समय आ गया है, समय आ गया है। तो अपने को भी कहते हो या सिर्फ दूसरों को कहते हो? दूसरों को कहना तो सहज होता है ना? तो स्वयं भी ये चैलेन्ज स्मृति में लाओ। समय के प्रमाण अपने पुरुषार्थ की गति क्या है? बापदादा एक बात पर अन्दर ही अन्दर मुस्कराते रहते हैं। किस बात पर मुस्कराते हैं, जानते हो? एक तरफ मैजारिटी बच्चे कभी-कभी एक सेकेण्ड ये सोचते हैं कि समय प्रमाण पुरुषार्थ में तीव्रता होनी चाहिये और दूसरे तरफ जब माया अपना प्रभाव डाल देती है तो दूसरे सेकेण्ड ये सोचते हैं कि यह तो सब चलता ही है, ये तो महारथियों से भी परम्परा चला आता है। तो बापदादा क्या करेंगे? गुस्सा तो नहीं करेंगे ना! मुस्करायेंगे। और इसका विशेष कारण है कि समय प्रति समय पुरुषार्थ को बहुत सहज कर दिया है, इज़ी कर लिया है। स्वभाव को इज़ी नहीं करते, स्वभाव में टाइट होते हैं और पुरुषार्थ में इज़ी हो जाते हैं। फिर सोचते हैं सहज योग है ना! लेकिन जीवन में, पुरुषार्थ में इज़ी रहना – इसको सहज योग नहीं कहा जाता। क्योंकि इज़ी रहने से शक्तियाँ मर्ज हो जाती हैं, इमर्ज नहीं होती। आप सभी अपने ब्राह्मण जीवन के आदि का समय याद करो। उस समय कैसा पुरुषार्थ रहा? इज़ी पुरुषार्थ रहा या अटेन्शन वाला पुरुषार्थ रहा? अटेन्शन वाला रहा, उमंग-उत्साह वाला रहा और अभी अलबेलेपन के डनलप के तकिये और बिस्तरे मिल गये हैं। साधनों ने आराम पसन्द ज्यादा बना दिया है। तो अपने आदि के पुरुषार्थ, आदि की सेवा और आदि के उमंग-उत्साह को चेक करो – क्या था? आराम पसन्द थे? (नहीं) और अभी थोड़ा-थोड़ा हैं? साधन सेवा के प्रति हैं, साधन स्वयं को आराम पसन्द बनाने के लिये नहीं हैं। तो अभी डनलप का तकिया और बिस्तरा निकालो। पटरानियाँ बनो, पटराने बनो। भले पलंग पर सोओ लेकिन स्थिति पटरानी-पटराने की हो। देखो, आदि सेवा के समय में साधन नहीं थे, लेकिन साधना कितनी श्रेष्ठ रही। जिस आदि की साधना ने ये सारी वृद्धि की है। तो साधना के बीज को विस्तार में छिपा नहीं दो। जब विस्तार होता है तो बीज छिप जाता है। तो साधना है बीज, साधन है विस्तार। तो साधना का बीज छिपने नहीं दो, अभी फिर से बीज को प्रत्यक्ष करो।

बापदादा ने इस सीज़न में काम दिया था लेकिन किया नहीं। याद है क्या दिया था? कि कापियों में है! काम दिया था कि बेहद के वैराग्य वृत्ति पर स्वयं से भी चर्चा करो और आपस में भी चर्चा करो और प्रैक्टिकल में इस साधना के बीज को प्रत्यक्ष करो। तो किया? कि एक दिन सिर्फ डिबेट कर ली, वर्कशॉप तो हो गई लेकिन वर्क में नहीं आई। तो वर्तमान समय के प्रमाण अभी अपनी सेवा वा सेवा-स्थानों की दिनचर्या बेहद के वैराग्य वृत्ति की बनाओ। अभी आराम की दिनचर्या मिक्स हो गई है। ये अलबेलापन शरीर की छोटी-छोटी बीमारियों के भी बहाने बनाता है। पहले भी तो बीमारी होती थी ना, लेकिन सेवा का उमंग बीमारी को मर्ज कर देता है। जब कोई आपके दिल पसन्द सेवा होती है तो बीमारी याद आती है? अगर आपको इन्चार्ज बहन कहे – नहीं, आपकी तबियत ठीक नहीं है, दूसरे को करने दो, तो करने देंगे? उस समय बुखार वा सिर दर्द कहाँ चला जाता है? और जब सेवा कोई पसन्द नहीं होगी तो क्या होगा? सिर दर्द भी आ जायेगा तो पेट दर्द भी आ जायेगा। सुनाया है ना कि अगर बहानेबाजी में बुखार कहेंगी तो टीचर कहेगी कि थर्मा मीटर लगाओ लेकिन पेट दर्द और सिर दर्द का थर्मा मीटर तो है ही नहीं। मूड ठीक नहीं होगा और कहेंगे कि पेट दर्द है! तो ये अलबेलेपन के बहाने हैं। बेहद की वैराग्य वृत्ति मर्ज हो गई है और बहानेबाजी इमर्ज हो गई है।

बापदादा देख रहे थे कि सभी बच्चे बहुत स्नेह से मधुबन में पहुँच गये हैं। तो स्नेह तो दिखाया, उसकी मुबारक हो। बापदादा को भी बच्चों की खुशी देखकर खुशी होती है लेकिन आगे क्या करना है? सिर्फ मधुबन तक पहुँचना है या स्नेह का सबूत दिखाने के लिये फरिश्ते रूप में वतन में पहुँचना है? क्या करना है? मधुबन में पहुँचे उसकी मुबारक है लेकिन फ़रिश्ता बन वतन में कब पहुँचेंगे? चलते-फिरते आप सभी को फ़रिश्ता ही देखें। बोल-चाल, रहन-सहन सब फ़रिश्तों का बन जाये। और फ़रिश्ते का अर्थ ही है डबल लाइट। तो दिनचर्या में लाइट नहीं बनना है लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में, स्थिति में लाइट। तो लाइट बनना आता है कि बोझ खींचता है? बापदादा स्नेह का सबूत देखना चाहते हैं और जब स्नेह का सबूत देंगे तो आपको तालियाँ बजाने की जरूरत नहीं पड़ेगी लेकिन माया भी ताली बजायेगी – वाह विजयी वाह, प्रकृति भी ताली बजायेगी। तो अभी कुछ परिवर्तन करो।

आज इस सीज़न का लास्ट मेला है। फॉरेनर्स की सीज़न अलग है लेकिन इण्डियन प्रोग्राम के प्रमाण तो आज लास्ट है, मेले की बात भी अलग है। वो तो चूंगी में रख दिया है। लेकिन बापदादा देख रहे थे कि सारे सीज़न में मिलना, बहलना, खुशी मनाना – ये तो बहुत अच्छा, लेकिन सबूत क्या है! तो सेन्टर्स पर वा प्रवृत्ति में रहते हुए भी अपने टाइम टेबल, दिनचर्या को परिवर्तन करो। और परिवर्तन क्या करो? बस, सिर्फ फॉलो फादर। ब्रह्मा बाप ने क्या किया? ब्रह्मा बाप अलबेले रहे? सबूत है ना – लास्ट दिन तक आराम किया क्या? तो स्नेह है ना? कितना स्नेह है? (टू मच) और सबूत कितना है? इसमें टू मच नहीं कहा! तो अभी स्वयं को स्नेह के साथ शक्तिशाली बनाओ। स्वयं के परिवर्तन में शक्तिरूप बनो। सहज योगी, सहज योगी करके अलबेलापन नहीं लाओ। बापदादा देखते हैं कि स्व प्रति, चाहे सेवा प्रति, चाहे औरों के सम्बन्ध-सम्पर्क प्रति अलबेलापन ज्यादा आ गया है। ऐसे नहीं सोचो कि सब चलता है। एक-दो को कॉपी नहीं करो, बाप को कॉपी करो। दूसरों को देखने की आदत थोड़ी ज्यादा हो गई है। अपने को देखने में अलबेलापन आ गया है। बापदादा ने सुनाया था ना कि नजदीक की नज़र कमजोर हो गई है और दूर की नज़र तेज हो गई है। तो अभी क्या करेंगे? सीज़न का फल क्या देंगे? कि सिर्फ बाप आया, मिला, मनाया, मुरली सुनी – ये फल है? हर सीजन का फल होता है ना? तो इस सीज़न का फल बापदादा को क्या भोग लगायेंगे? भोग लगाते हो तो फल भी रखते हो ना? वो तो बाजार में मिल जाता है, कोई बड़ी बात नहीं। अब इस सीज़न का फल क्या भेंट करेंगे या भोग लगायेंगे? लगाना है या मुश्किल है? तो देखेंगे कि नम्बरवन भोग कहाँ से आता है। वायदा तो बहुत अच्छा करके जाते हो, कभी भी ना नहीं करते हो, हाँ ही करते हो! खुश कर देते हो। लेकिन अभी क्या करेंगे? टीचर्स नम्बरवन भोग लगायेंगी ना? सभी सेन्टर्स का भोग देखेंगे। प्रवृत्ति वाले भी भोग तो लगाते हो ना कि खुद ही खा जाते हो? तो ये नहीं सोचना कि सिर्फ सेन्टर्स वालों का काम है। सभी का काम है। तो फ़रमानबरदार का कदम प्रैक्टिकल में लाना है।

चौथा कदम है – व़फादार। कभी भी मन से, बुद्धि से, संकल्प से बाप के बेव़फा नहीं बनना। व़फादार का अर्थ ही है सदा एक बाप, दूसरा न कोई। संकल्प में भी देह, देह के सम्बन्ध, देह के पदार्थ वा देहधारी व्यक्ति आकर्षित नहीं करें। जैसे जब पति-पत्नि एक-दो के व़फादार बनते हैं तो स्वप्न में भी अगर पर (दूसरे) की याद आ गई तो व़फादार नहीं कहा जाता। तो ब्रह्मा बाप को देखा, संकल्प भी दूसरे के तरफ नहीं। एक बाप सब कुछ है, इसको कहा जाता है व़फादार। अगर पदार्थ की भी आकर्षण है, साधनों की भी आकर्षण है तो साधना खण्डित हो जाती है, व़फादारी खण्डित हो जाती है। और खण्डित कभी भी सम्पन्न, पूज्य नहीं गाया जाता है। तो चेक करो कि संकल्प में भी कोई आकर्षण बेवफा तो नहीं बना देती? अगर ज़रा भी किसी के प्रति विशेष झुकाव है, थोड़ा भी पर्सनल झुकाव है, चाहे गुण के ऊपर, चाहे सेवा के ऊपर, चाहे अच्छे संस्कारों के ऊपर भी अगर एक्स्ट्रा प्रभावित हैं तो व़फादार नहीं कहा जायेगा। सबकी विशेषता, बेहद की विशेषता पर आकर्षित है, वो दूसरी बात है लेकिन किसी विशेष व्यक्ति या वैभव के ऊपर आकर्षित है तो व़फादार की लिस्ट में खण्डित गाया जायेगा। तो चेक करो कि खण्डित मूर्ति तो नहीं है? पूज्य है? कहाँ एक्स्ट्रा लगाव व झुकाव तो नहीं है? संकल्प मात्र भी झुकाव नहीं। वाचा-कर्मणा की तो बात ही छोड़ो। लेकिन संकल्प मात्र भी है तो खण्डित के लिस्ट में आ जायेंगे। तो चेक करना आता है ना? अच्छा।

अब कोई नवीनता दिखाओ। नया वर्ष तो शुरू हो गया। बापदादा को आदि का बेहद वैराग्य सदा याद आता है। उसी समय का फल आप लोग हो। अगर बेहद की वैराग्य वृत्ति नहीं होती तो स्थापना की वृद्धि इतनी नहीं हो सकती। ब्रह्मा बाप ने अन्त तक बड़ी आयु होते हुए भी, तन का हिसाब चुक्तू करते हुए भी बेहद के वैराग्य की स्थिति प्रत्यक्ष दिखाई। साधनों को स्व प्रति स्वीकार नहीं किया। सेवा के प्रति अलग चीज़ है। स्व प्रति स्वीकार करना और सेवा प्रति कार्य में लगाना – अन्तर तो जानते हो ना? स्व प्रति बेहद का वैराग्य हो, सेवा प्रति साधन को कार्य में लगाओ। लेकिन साधन अलबेलापन नहीं लाये। तो ये फॉलो फादर करना ही है ना कि जो और आने हैं उनको करना है? आप लोगों को करना है। अच्छा!

बच्चों को सदा क्या कहा जाता है? कुल दीपक। तो ब्राह्मण कुल का सदा जगमगाता हुआ दीपक हो ना? बाप की श्रेष्ठ आशाओं का दीपक जगाने वाले कुल दीपक। ऐसे हो ना?

अच्छा, आज टीचर्स ने आगे बैठने का चांस लिया है – तो सिर्फ बैठने के चांस में खुश नहीं हो जाना। इसमें भी नम्बरवन चांस लेना। अभी आपस में ऐसी दिनचर्या बनाओ तो सब परिवर्तन हो जायेगा। जो आया वो किया, जैसे आया वो किया, नहीं, दिनचर्या को टाइट करो। यह अच्छा है ना कि सहज योगी के बजाय मुश्किल योगी हो जायेंगे?

अच्छा, आज सभी ज़ोन को बापदादा यही विशेष वरदान वा सेवा देते हैं कि सदा बाप को फॉलो करने में नम्बरवन बनो और बापदादा देखेंगे कि कौन-सा सेन्टर कौन-से ज़ोन में फॉलो फादर में नम्बरवन हैं। ऐसे नहीं सोचना कि मैं तो नम्बरवन रहा लेकिन दूसरे नहीं रहे, तो नम्बरवन की प्राइज़ नहीं मिलेगी। अभी जिस ज़ोन में जो नम्बरवन सेवाकेन्द्र होगा उसको बहुत बढ़िया प्राइज़ देंगे। तो सेन्टर्स को रिज़ल्ट दिखानी है। सेन्टर में आने वाले स्टूडेण्ट भी आ जाते हैं। एक सेन्टर साथी और दूसरे आने वाले स्टूडेण्ट दोनों ही नम्बरवन हों। तो कितने टाइम में इनाम लेंगे? जितना कहेंगे उतना देंगे। अगर दो साल कहेंगे तो दो साल भी देंगे। बोलो, दो साल चाहिये? एक साल चाहिये? कितना चाहिये? (6 मास) अच्छा चलो 6 मास ही सही। क्योंकि दूसरी सीज़न 6 मास के बाद ही होनी है। तो पहली बारी में बापदादा रिज़ल्ट वालों को विशेष बहुत अच्छा रहने का प्रबन्ध देंगे। कुंज भवन अच्छा है ना! एक कमरे में दो-दो सोना।

मधुबन वाले तो ओटे सो अर्जुन हैं ही। मधुबन का वायब्रेशन सब तरफ फैलता है। तो मधुबन वाले तो सदा ही जी हाज़िर हैं। हां जी करने वाले हैं ना या थोड़ा-थोड़ा बीच में ना जी भी अच्छा लगता है? बहुत अच्छी प्राइज़ देंगे। बिल्कुल बेहद की वैरागी आत्मा अनुभव हो, मिया मिट्ठू नहीं बनना। दूसरे सर्टीफिकेट दें कि हाँ ये नम्बरवन है। तीन सर्टीफिकेट हैं ना, एक मन पसन्द, दूसरा बाप पसन्द और तीसरा लोक पसन्द। तो तीनों सर्टीफिकेट जो लेंगे उनको एक्स्ट्रा रहने का भी प्रबन्ध देंगे, ब्रह्मा भोजन भी एक्स्ट्रा करायेंगे। सबसे पहले तो विजयी एनाउन्स होंगे, ये कितना बढ़िया होगा। विजयी रत्नों की माला बन जायेगी। सभी नम्बर ले सकते हैं। ऐसे नहीं सिर्फ टीचर्स। प्रवृत्ति वालों को भी टीचर्स सर्टीफिकेट देंगी तो नम्बर मिलेंगे या ये सोचते हो कि मेरी टीचर्स तो देंगी नहीं! अगर ऐसी कोई बात हो तो दादियों से वेरीफाय कराना।

सभी ज़ोन ने क्या सोचा? सभी नम्बरवन बनेंगे! अच्छा, इन्दौर नम्बरवन बनेगा! भोपाल भी नम्बरवन, 100 ज्ञ् ! और इन्दौर 100 ज्ञ् से भी 10-20 नम्बर ज्यादा! और पंजाब 1000ज्ञ् ! पंजाब को तो चार लाख की माला लानी थी! पक्का है ना! भूल तो नहीं गये! देखेंगे चार लाख में से अगले सीज़न तक एक लाख तो लाओ। पंजाब वाले क्या करेंगे? अभी पंजाब के निमित्त (दादी चन्द्रमणी) में ज्ञान सरोवर का बीज पड़ गया है, डबल जिम्मेदारी हो गई है। तो पंजाब की टीचर्स करेंगी ना? हाँ जी तो बोलो। करेंगी? अच्छा। दिल्ली कितना नम्बर लेगी? सभी नम्बरवन लेंगे! दिल्ली वालों को कहना चाहिये ए-वन। दिल्ली को तो निमित्त बनना चाहिये ना? अगली बार सभी ज़ोन को ड्यूटी दी थी, याद है क्या करना है? छोटे माइक नहीं लाना, बड़े-बड़े माइक संगठन रूप में लाना है। इन्दौर को सेठों का झुण्ड लाना है। भोपाल को, संगठित रूप में लाना है। पंजाब ऐसा संगठन लाये जो विश्व में नाम हो जाये। किससे नाम होगा? जो बड़े ते बड़े आतंकवादी हैं वो अन्तर्मुखी हो जायें। तो गवर्नमेंट ब्रह्माकुमारीज़ को इनाम देंगी। नामीग्रामी आतंकवादी जो प्रसिद्ध हो, जिसके लिये इनाम मुकरर हो। कमाल तो ऐसी करो ना। मिनिस्टर तो आते ही रहते हैं। पंजाब वाले कर सकते हैं? कि आतंकवादियों से डरते हैं! देखेंगे, कौन-सा सेन्टर किसको लाता है? कोई नई बात करके दिखाओ, देखो एक डाकू आया तो भी कितनी सर्विस हो गई। लेकिन उन्हों को डाकू से ब्राह्मण बनाकर लाओ, ऐसे नहीं लाना। यहाँ आये और बाहर जाकर ऐसी कोई हिंसा का काम करे तो ब्रह्माकुमारियों का नाम भी खराब। इसलिये परिवर्तन करके लाओ। अच्छा।

इस्टर्न क्या करेंगे? नम्बरवन लेंगे? नेपाल बोलो। नम्बरवन लेंगे, पक्का? सारा इस्टर्न लेगा या नेपाल लेगा? बिहार वाले क्या करेंगे, नम्बर लेंगे? (बापदादा ने अलग-अलग स्टेट के भाई-बहिनों से हाथ उठवाया) तो सभी कौन-सा नम्बर लेंगे? फर्स्ट या सेकेण्ड? अच्छा!

महाराष्ट्र क्या करेंगे? लाख परसेन्ट इनाम लेंगे या सौ परसेन्ट! जितना करो उतना अपना ही वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ बनाते हो। अच्छा। गुजरात सबसे आगे जायेगा ना। कर्नाटक कमाल करके दिखायेगा। धमाल नहीं करना। जब संख्या ज्यादा हो जाती है ना तो थोड़ी-थोड़ी धमाल भी शुरू होती है। तो सदा कमाल करके दिखाना। आन्ध्रा विश्व का सेकेण्ड में अंधकार दूर कर देगा। पहले अपना करेंगे तभी विश्व का होगा। अच्छा है आन्ध्रा वाले भी उमंग-उत्साह में हैं। तो सदा उमंग-उत्साह से आगे बढ़ते रहना। और तामिल क्या करेगा? तामिल तमोगुण को खत्म कर दो। सब सतोप्रधान हो जायें। केरला और तामिल है छोटा लेकिन कमाल करने वाले हैं। राजस्थान वाले क्या कमाल करेंगे? रिजल्ट में भी सबसे राजा बन जाना। समझा! राजा बनना अर्थात् नम्बर आगे लेना। राजस्थान है ही राज्य का स्थान। तो रिजल्ट में भी राजा का इनाम लेना।

यू.पी. वाले क्या कमाल करेंगे? सभी भक्ति मार्ग के तीर्थों को आबू तीर्थ में समा लेंगे। कमाल करेंगे ना, कोई भी तीर्थ करने जाये तो कहाँ जाये? आबू तीर्थ में आये, महान तीर्थ में आये। तो सब तीर्थ महान तीर्थ में समा जायें। आगरा है छोटा, लेकिन बापदादा हमेशा कहते हैं छोटा सो शुभान अल्ला तो आगरा वाले ऐसी कोई कमाल करके दिखाओ।

डबल विदेशी:- डबल विदेशी क्या करेंगे? इण्डिया से भी डबल काम करेंगे। डबल कमाल दिखायेंगे – कौन-सी? जो सभी आकर्षित हो भारत में बाप से मिलने के लिये। ऐसी जिज्ञासा उन्हों में उत्पन्न करो जो सभी भारत में आकर्षित होकरके आये। पहले माइक लायेंगे ना। विदेश के माइक भी बुलन्द आवाज़ करने वाले हैं। इसलिये विदेश के माइक अनेकों को बुलन्द आवाज़ से जगाते रहे हैं, जगाते रहेंगे। विदेश में ही ब्रह्माकुमारीज़ को पीस प्राइज़ मिली ना! तो ये सेवा का सबूत दिखाया और विदेश ने बाप की विशेष आशा पूर्ण की, जो मुख्य स्थान पर (लण्डन में कल 27 तारीख को वहाँ के मुख्य स्थान पर म्यूजियम का उद्घाटन है) अनेक आत्माओं को सन्देश मिलना है। आज के दिन सभी ब्राह्मण विशेष सेवा के निमित्त बन रहे हैं। भारत में ऐसे मेन स्थान पर अभी तक नहीं किया है। ये तो गली-गली में म्यूजियम खोल दिया है लेकिन मेन स्थान पर म्यूजियम हो, इसमें नम्बरवन फॉरेन गया। तो नम्बरवन वालों को मुबारक भी नम्बरवन। अच्छा!

चारों ओर के स्नेह का सबूत देने वाले, हर फ़रमान को संकल्प, बोल और कर्म में लाने वाले, सदा स्वयं को बाप समान सिम्पल और सैम्पल बनाने वाले, ब्रह्मा बाप के हर कदम पर कदम रखने वाले ऐसे शक्तिशाली बाप समान बनने के दृढ़ संकल्पधारी सर्व बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

दादी जी से:- बेफिक्र बादशाह है इसलिये कार्य सहज होता है। जो स्वयं समर्पित स्थिति में रहते हैं उनको सर्व का सहयोग स्वत: ही मिलता है। सहयोग भी उनके आगे समर्पित होता है। और दिल से जो समर्पित हैं तो सहयोग भी दिल से सामने आता है। जहाँ दिल का स्नेह है तो सहयोग मिलता है। स्नेह नहीं तो सहयोग नहीं। तो सबका सहयोग दिल से है ना? हरेक क्या समझता है? हमारा काम है या दादियों का काम है? हमारा मधुबन है या मधुबन वालों का मधुबन है? तो बाप भी कहते हैं पहले आप। अच्छा, सभी ठीक हैं? ऐसे नहीं समझना सिर्फ दादियाँ आगे जाती हैं। दादियों में आप सब समाये हुए हैं। दूर लगता है या समीप लगता है? समीप हैं ना। चाहे पीछे वाले भी हैं ना, लास्ट कुर्सी पर जो बैठे हैं, वो भी समीप हैं। सभी सदा कहाँ रहते हो? दिल में रहते हो ना? कि फॉरेन में रहते हो? पंजाब में रहते हैं, बाम्बे में रहते हैं, नैरोबी में रहते हैं, कहाँ रहते हैं? सभी दिल में हैं तो दिल कहाँ है, दूर है, नजदीक है? तो सभी दिल में हैं इसीलिये दूर नहीं है। अगर दूर होते हो तो बाप को फिर ढूंढकर लाना पड़ता है। अगर बच्चे घर के दरवाजे से बाहर चले जायें तो क्या करेंगे? उनको लेने जायेंगे ना? कि छोड़ देंगे? तो बाप भी देखते हैं कि ये दिल के दरवाजे से बाहर चले गये हैं। और कामों में बिज़ी हो जाते हो ना, तो थोड़ा दरवाजे से बाहर निकल जाते हो। फिर बाप को बुलाना पड़ता है या पकड़कर लाना पड़ता है।

अच्छा, सभी खुश है ना? कोई कम्पलेन्ट नहीं कि वहाँ जाकर कहेंगे कि थोड़ा-थोड़ा ये हुआ था। आप स्वयं भी सोचो कि बड़े संगठन में थोड़ा-बहुत तो होता ही है। फिर भी कुम्भ के मेले से तो हज़ार गुणा अच्छा है। बढ़िया ब्रह्मा भोजन तो मिलता है ना! भोजन में तो कोई मुश्किलात नहीं हुई? नाश्ता नहीं मिला तो किसको भूख तो नहीं लगी?

ब्रह्मा बाप के तीसरे और चौथे कदम

फ़रमानबरदार और वफ़ादार बनने की सम्पूर्ण साधना

(अव्यक्त बापदादा मुरली – AV-04 | दिनांक: 26 जनवरी 1995)


📌 Murli Information

  • Murli Type: Avyakt BapDada Murli
  • Date: 26 January 1995
  • Reference: AV-04
  • Main Theme:
    “ब्रह्मा बाप के तीसरे और चौथे कदम—फ़रमानबरदार और वफ़ादार बनकर Follow Father करना।”

अध्याय 1

स्नेही और शक्तिशाली आत्मा में अंतर

बापदादा बताते हैं कि सभी बच्चे प्रिय हैं, लेकिन सभी समान रूप से शक्तिशाली नहीं हैं।

स्नेही आत्मा

  • बाबा से प्रेम करती है।
  • सहयोग भी प्राप्त करती है।
  • कभी जीतती है, कभी मेहनत करती है।

शक्तिशाली आत्मा

  • सदा योगयुक्त रहती है।
  • समय पर हर शक्ति का प्रयोग करती है।
  • सहज विजयी बनती है।

उदाहरण

दो विद्यार्थी समान शिक्षक से पढ़ते हैं।

एक केवल पढ़ता है।

दूसरा पढ़कर जीवन में उतारता भी है।

दोनों को समान शिक्षा मिली, लेकिन परिणाम अलग आया।

ऐसे ही बाबा सभी को समान अधिकार देते हैं, लेकिन धारण करने में नम्बरवार बन जाते हैं।


Murli Notes

✔ प्रेम पर्याप्त नहीं।

✔ योग शक्ति अनुभव कराता है।

✔ अधिकार सबको समान मिलता है।

✔ परिणाम धारण करने पर निर्भर है।


अध्याय 2

ब्रह्मा बाबा नम्बरवन क्यों बने?

ब्रह्मा बाबा के तीसरे कदम का रहस्य—

फ़रमानबरदार बनना

ब्रह्मा बाबा ने

  • कभी “ना” नहीं कहा।
  • हर आज्ञा पर “जी हाज़िर” कहा।
  • अन्तिम श्वास तक सेवा की।

उन्होंने

  • ज्ञान
  • योग
  • समय
  • गुण
  • शक्तियाँ

सभी खजानों को स्वयं भी उपयोग किया और सेवा में भी लगाया।


उदाहरण

यदि किसी कम्पनी का मालिक स्वयं सबसे पहले नियमों का पालन करे, तो कर्मचारी स्वतः प्रेरित होते हैं।

इसी प्रकार ब्रह्मा बाबा स्वयं Follow Father के सर्वोच्च उदाहरण बने।


Murli Notes

✔ याद और सेवा दोनों साथ।

✔ एक भी सेकण्ड व्यर्थ नहीं।

✔ सुनना ही पर्याप्त नहीं।

✔ Murli = करना।


अध्याय 3

“हाँ जी” का जीवन

फ़रमानबरदार बनने का अर्थ केवल सुनना नहीं बल्कि तुरंत करना है।

ब्रह्मा बाबा

  • दिन हो या रात
  • सेवा मिले या तपस्या

हर समय तैयार रहे।


स्वयं से पूछें

क्या मैं…

  • Murli सुनता हूँ?
  • या पालन भी करता हूँ?

उदाहरण

डॉक्टर की सलाह सुनना और दवा न लेना किसी लाभ का कारण नहीं बनता।

Murli भी तभी फल देती है जब जीवन में उतरे।


अध्याय 4

समय के अनुसार पुरुषार्थ

बापदादा कहते हैं—

समय तीव्र हो चुका है।

लेकिन कई बच्चे सोचते हैं—

“सब चलता है।”

यही अलबेलापन है।


पहले

  • उमंग
  • उत्साह
  • तपस्या
  • त्याग

अब

  • आराम
  • सुविधा
  • बहाने

उदाहरण

मोबाइल चार्ज हो लेकिन उपयोग न किया जाए तो बैटरी व्यर्थ है।

शक्तियाँ भी अभ्यास न होने पर मर्ज हो जाती हैं।


Murli Notes

✔ Easy life ≠ Easy Yoga

✔ Attention = Power

✔ Comfort Zone आध्यात्मिक प्रगति रोक देता है।


अध्याय 5

बेहद का वैराग्य

बापदादा याद दिलाते हैं—

साधन सेवा के लिए हैं।

स्वयं के आराम के लिए नहीं।


साधना

बीज है।

साधन

विस्तार है।

यदि विस्तार बढ़ गया और साधना कम हो गई,

तो बीज छिप जाता है।


उदाहरण

एक माली पौधे की सजावट करता रहे लेकिन जड़ों में पानी न डाले—

तो वृक्ष सूख जाएगा।


Murli Notes

✔ सुविधा से अधिक साधना।

✔ सेवा का उमंग बीमारी को भी भुला देता है।

✔ बहाने वैराग्य को समाप्त करते हैं।


अध्याय 6

फरिश्ता जीवन

बापदादा केवल मधुबन तक आने की नहीं,

वतन तक पहुँचने की प्रेरणा देते हैं।

फरिश्ता अर्थात्

  • Double Light
  • हल्का
  • निस्वार्थ
  • देह-अभिमान से मुक्त

उदाहरण

हवाई जहाज़ तभी उड़ता है जब उसका भार सीमित हो।

इसी प्रकार आत्मा भी हल्की होकर ऊँची स्थिति अनुभव करती है।


अध्याय 7

चौथा कदम—वफ़ादार

यह मुरली का सबसे गहरा संदेश है।

वफ़ादार अर्थात्—

“एक बाप, दूसरा न कोई।”


वफ़ादारी केवल कर्म में नहीं

बल्कि

  • मन
  • बुद्धि
  • संकल्प

तीनों में होनी चाहिए।


यदि

  • किसी व्यक्ति,
  • वस्तु,
  • सुविधा,
  • सम्बन्ध

के प्रति अतिरिक्त आकर्षण है,

तो वफ़ादारी खण्डित हो जाती है।


उदाहरण

चुम्बक यदि दो दिशाओं में खिंचने लगे

तो उसकी शक्ति कम हो जाती है।

मन भी ऐसा ही है।


Murli Notes

✔ Extra Attachment = Spiritual Weakness

✔ Attraction destroys concentration.

✔ Complete loyalty brings complete inheritance.


अध्याय 8

स्वयं को जाँचने के प्रश्न

प्रतिदिन स्वयं से पूछें—

क्या…

  • मैं हर Murli Point पर “हाँ जी” कहता हूँ?
  • मेरा समय व्यर्थ तो नहीं जा रहा?
  • क्या मैं किसी व्यक्ति या वस्तु से अधिक प्रभावित हूँ?
  • क्या मैं Follow Father कर रहा हूँ?
  • क्या मेरी साधना साधनों से ऊपर है?

अध्याय 9

इस मुरली के मुख्य सूत्र

✔ Follow Father

✔ जी हाज़िर

✔ एक सेकण्ड भी व्यर्थ नहीं

✔ साधना पहले

✔ बेहद का वैराग्य

✔ Double Light

✔ एक बाप दूसरा न कोई

✔ कर्म में प्रमाण


Daily Practice

प्रतिदिन सुबह संकल्प लें—

“मैं आज हर कार्य में फ़रमानबरदार रहूँगा।”

दोपहर में—

“क्या मैं Follow Father कर रहा हूँ?”

रात्रि में—

“क्या आज मेरा मन केवल एक बाबा के साथ रहा?”


अंतिम संदेश

बापदादा का स्पष्ट संदेश है—

सिर्फ़ प्रेम करना पर्याप्त नहीं।

प्रेम का प्रमाण है—

  • फ़रमानबरदार बनना।
  • वफ़ादार बनना।
  • ब्रह्मा बाबा के हर कदम पर कदम रखना।
  • स्वयं को बाप समान बनाना।

तभी स्नेही आत्मा से आगे बढ़कर शक्तिशाली, सहज विजयी और नम्बरवन आत्मा बनने का अनुभव होता है।


 Quick Murli Revision Notes

Murli Date: 26 जनवरी 1995 (AV-04)

मुख्य विषय: ब्रह्मा बाबा के तीसरे और चौथे कदम

5 Golden Words

  1. फ़रमानबरदार
  2. वफ़ादार
  3. Follow Father
  4. बेहद का वैराग्य
  5. Double Light

एक पंक्ति का सार:

“सच्चा प्रेम वही है जो हर संकल्प, बोल और कर्म में ‘हाँ जी बाबा’ बनकर एक बाप के प्रति सम्पूर्ण वफ़ादारी निभाए।”


Disclaimer

यह अध्याय ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली (दिनांक: 26 जनवरी 1995, AV-04) के आध्यात्मिक संदेशों का अध्ययन, चिंतन और सरल प्रस्तुतीकरण है। इसमें दिए गए उदाहरण, शीर्षक, अध्याय-विभाजन और अध्ययन-नोट्स मूल मुरली के संदेश को समझने में सहायक व्याख्यात्मक सामग्री हैं। आधिकारिक अध्ययन एवं संदर्भ के लिए मूल अव्यक्त मुरली का नियमित अध्ययन करें।

ब्रह्मा बाप के तीसरे और चौथे कदम – फ़रमानबरदार और वफ़ादार

अव्यक्त मुरली (AV-04) | 26 जनवरी 1995


Q1. इस मुरली का मुख्य विषय क्या है?

उत्तर:
ब्रह्मा बाप के तीसरे और चौथे कदम—फ़रमानबरदार (आज्ञाकारी) और वफ़ादार (एक बाप के प्रति सम्पूर्ण निष्ठावान) बनकर Follow Father करना।


Q2. स्नेही और शक्तिशाली आत्मा में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • स्नेही आत्मा बाबा से प्रेम करती है, लेकिन हर समय शक्तियों का प्रयोग नहीं कर पाती।
  • शक्तिशाली आत्मा सदा योगयुक्त रहती है और सहज विजयी बनती है।

Q3. बाबा सभी बच्चों को क्या समान रूप से देते हैं?

उत्तर:
ज्ञान, शक्तियाँ, गुण, समय और सर्व खजानों का समान अधिकार देते हैं। अन्तर केवल धारण करने और कर्म में लाने में होता है।


Q4. ब्रह्मा बाबा नम्बरवन क्यों बने?

उत्तर:
क्योंकि उन्होंने हर फ़रमान पर “जी हाज़िर” कहा और अन्तिम श्वास तक याद, सेवा और सभी खजानों का श्रेष्ठ उपयोग किया।


Q5. फ़रमानबरदार बनने का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
हर मुरली आज्ञा को केवल सुनना नहीं, बल्कि तुरंत जीवन में उतारना।


Q6. बाबा का विशेष फ़रमान क्या है?

उत्तर:
सदा याद और सेवा में बाप समान रहना तथा एक भी श्वास या सेकण्ड व्यर्थ न गंवाना।


Q7. स्नेह का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है?

उत्तर:
Follow Father करना।


Q8. बाबा हमें प्रतिदिन कौन-सी जाँच करने को कहते हैं?

उत्तर:

  • क्या आज मैंने एक भी सेकण्ड व्यर्थ गंवाया?
  • क्या मैं हर फ़रमान पर “हाँ जी” कहता हूँ?
  • क्या मैं कर्म में मुरली को उतार रहा हूँ?

Q9. बाबा ने “हाँ जी” का क्या अर्थ बताया?

उत्तर:
हर समय, हर परिस्थिति और हर सेवा में तत्पर रहना।


Q10. समय के अनुसार पुरुषार्थ कैसा होना चाहिए?

उत्तर:
तीव्र, जागरूक, उमंग-उत्साह से भरपूर और अटेन्शन वाला।


Q11. “सब चलता है” यह सोच किसकी निशानी है?

उत्तर:
अलबेलेपन और पुरुषार्थ में ढील की।


Q12. बाबा ने साधना और साधन में क्या अंतर बताया?

उत्तर:

  • साधना बीज है।
  • साधन विस्तार हैं।

बीज मजबूत होगा तो विस्तार सफल होगा।


Q13. बेहद का वैराग्य क्या है?

उत्तर:
सुविधाओं का उपयोग सेवा के लिए करना, स्वयं के आराम के लिए नहीं।


Q14. सेवा का सच्चा उमंग क्या कर देता है?

उत्तर:
बीमारी और बहानों को भी समाप्त कर देता है।


Q15. फरिश्ता किसे कहा गया है?

उत्तर:
जो डबल लाइट हो—देह-अभिमान और बोझ से मुक्त।


Q16. चौथा कदम कौन-सा है?

उत्तर:
वफ़ादार बनना।


Q17. वफ़ादार का अर्थ क्या है?

उत्तर:
एक बाप, दूसरा न कोई।


Q18. किन आकर्षणों से वफ़ादारी खण्डित हो जाती है?

उत्तर:
देह, सम्बन्ध, व्यक्ति, पदार्थ, साधन या किसी विशेष व्यक्ति के प्रति अतिरिक्त आकर्षण से।


Q19. क्या केवल कर्म में वफ़ादारी पर्याप्त है?

उत्तर:
नहीं। मन, बुद्धि और संकल्प में भी पूर्ण वफ़ादारी आवश्यक है।


Q20. बाबा किस प्रकार की आत्मा को खण्डित कहते हैं?

उत्तर:
जिसके संकल्प किसी अन्य आकर्षण की ओर झुकते हों।


Q21. बाबा किस परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं?

उत्तर:
स्नेही बनने के साथ-साथ शक्तिशाली बनना और जीवन में Follow Father को प्रमाणित करना।


Q22. इस मुरली के अनुसार सच्चा प्रेम किसका प्रमाण है?

उत्तर:
आज्ञापालन और जीवन में मुरली को कर्मरूप में लाने का।


Q23. बाबा ने किसे कॉपी करने को कहा?

उत्तर:
दूसरों को नहीं, केवल ब्रह्मा बाप को।


Q24. “Double Light” बनने का अर्थ क्या है?

उत्तर:
मन, बुद्धि और जीवन से हर प्रकार का बोझ समाप्त कर हल्का रहना।


Q25. बाबा का अंतिम संदेश क्या है?

उत्तर:
“फ़रमानबरदार बनो, वफ़ादार बनो, Follow Father करो और स्वयं को बाप समान बनाओ।”

ब्रह्मा कुमारीज, अव्यक्त मुरली, मुरली 26 जनवरी 1995, AV 04 मुरली, बापदादा, ब्रह्मा बाबा, फॉलो फादर, फरमानबरदार, वफादार, मुरली क्लास, मुरली नोट्स, मुरली प्रश्न, बीके मुरली, बीके हिंदी, शिव बाबा, राजयोग, राजयोग मेडिटेशन, आध्यात्मिक ज्ञान, ईश्वरीय ज्ञान, मधुबन, ब्रह्मा कुमारीज मुरली, डेली मुरली, मुरली स्टडी, बीके स्टूडेंट्स, दिव्य शिक्षा, आध्यात्मिक जीवन, सहज योग, डबल लाइट, बेहद वैराग्य, आत्मा चेतना, बाबा की मुरली, बीके विजडम, हिंदी आध्यात्मिकता, बीके क्लास, बीके मेडिटेशन, बाबा की शिक्षाएं, आत्मज्ञान, राजयोग, ब्रह्माकुमारीज, अव्यक्त मुरली, बापदादा, ब्रह्मा बाबा, फरमानबरदार, वफादार, सहज योग, बेहद वैराग्य, फॉलो फादर, डबल लाइट, याद और सेवा, मुरली नोट्स, मुरली प्रश्न उत्तर, 26 जनवरी 1995 मुरली, बीके,Brahma Kumaris, Avyakt Murli, Murli 26 January 1995, AV 04 Murli, BapDada, Brahma Baba, Follow Father, Obey, Faithful, Murli Class, Murli Notes, Murli Questions, BK Murli, BK Hindi, Shiv Baba, Rajyoga, Rajyoga Meditation, Spiritual Knowledge, Divine Knowledge, Madhuban, Brahma Kumaris Murli, Daily Murli, Murli Study, BK Students, Divine Teachings, Spiritual Life, Sahaja Yoga, Double Light, Extreme Detachment, Soul Consciousness, Baba’s Murli, BK Wisdom, Hindi Spirituality, BK Class, BK Meditation, Baba’s Teachings, Self-knowledge, Rajyoga, Brahma Kumaris, Avyakt Murli, BapDada, Brahma Baba, Obey, Faithful, Sahaja Yoga, Extreme Detachment, Follow Father, Double Light, Remembrance and Service, Murli Notes, Murli Questions and Answers, 26 January 1995 Murli, BK,