PH.(05) फरिश्ता किसी की कमजोरी क्यों नहीं देखता?
आज हम इसका पाँचवाँ पार्ट कर रहे हैं।
फरिश्ता
किसी की कमजोरी क्यों नहीं देखता?
फरिश्ता किसी की कमजोरी क्यों नहीं देखता?
यही फरिश्ता जीवन की पहचान है कि वह कभी किसी की भी कमी या कमजोरी को नहीं देखता।
किसी भी आत्मा की कमी और कमजोरी को नहीं देखता।
इस विशेषता पर प्रश्न खड़ा हुआ है कि क्यों नहीं देखता?
जब कमी और कमजोरी है, तो वह फिर देखता क्यों नहीं? कोई भी उसकी वह कमी क्यों नहीं देखता? ऐसी क्या बात है? देखने से क्या कोई नुकसान है, जो वह देखता नहीं?
मनुष्य की दृष्टि क्या रहती है?
वह दूसरों की गलतियाँ देखता है, दोष देखता है, कमजोरी देखता है, नकारात्मकता देखता है, आलोचना देखता है। ठीक न?
ठीक नहीं है।
अब दृष्टि को बदलो।
तो क्या फायदा होगा? सृष्टि बदल जाएगी।
फरिश्ते की दृष्टि क्या होती है?
वह हर आत्मा को उसके मूल रूप से पवित्र मानकर देखता है। वह हर आत्मा को इस दृष्टि से देखता है कि हर आत्मा मूल रूप में पवित्र है।
तो वह विशेषता देखता है, गुण विकसित करता है, सबको सुख देता है, दिल जोड़ता है।
क्या जोड़ता है?
दिल जोड़ता है।
तो उसके जीवन में विशेषता देखो।
अब हमें क्या करना है?
विशेषता देखनी है। शुभ भावना रखनी है। प्रेरणा देनी है। आत्मा को सम्मान दो। शांति पाओ।
आत्मा को क्या दो?
सम्मान दो और अपने जीवन में शांति पाओ।
आज “फरिश्ता कौन है?” का पाँचवाँ एपिसोड है।
**फरिश्ता किसी की कमजोरी क्यों नहीं देखता?**
**दृष्टि बदलो तो सृष्टि बदल जाएगी।**
आज का यही विषय है।
क्या आपने कभी सोचा है?
एक ही व्यक्ति किसी को बहुत अच्छा लगता है।
वही व्यक्ति किसी और को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।
ऐसा क्यों?
क्या व्यक्ति बदल गया है, या देखने वाले की दृष्टि बदल गई है?
क्या कहेंगे?
व्यक्ति बदल गया है या देखने वाले की दृष्टि बदल गई?
क्योंकि व्यक्ति तो एक है।
एक उसे देखकर खुश हो रहा है, दूसरा उसे देखकर दुखी हो रहा है।
कौन बताएगा क्यों?
भाई जी, दृष्टि बदल जाती है। वह सोचता है कि सामने वाला मेरे समान नहीं है।
एक उसको अच्छा क्यों देख रहा है और एक उससे दुखी क्यों है?
जो उसे देखकर खुश हो रहा है, वह क्यों हो रहा है?
जो उसे देखकर दुखी हो रहा है, वह क्यों हो रहा है?
मेरे हिसाब से कर्म के अनुसार दृष्टि बदल जाती है।
कौन स्पष्ट बताएगा?
जिनको उन्होंने दुख दिया था, वे उन्हें देखकर दुखी होंगे। और जिनको उन्होंने सुख दिया था, उन्हें देखकर सुख मिलेगा।
इसमें किसका दोष है?
जिसको देखा जा रहा है या जो देख रहे हैं?
किसी का कोई दोष नहीं है। कर्म के हिसाब से चल रहा है।
फिर भी आदमी तो एक ही है।
सिर्फ उसे देखने वाली दो आत्माएँ हैं।
एक दुखी हो रहा है और एक खुश हो रहा है।
दृष्टि का ही तो फर्क है।
हाँ जी।
दृष्टि भी है, कार्मिक अकाउंट भी है।
अब यहाँ एक बात देखो।
दो लोग एक ही व्यक्ति को देख रहे हैं।
एक खुश हो रहा है और दूसरा दुखी।
यह दृष्टि है भाई। देखने का अपना-अपना तरीका है कि वह किस तरह से उसे देख रहा है।
क्योंकि व्यक्ति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
सिर्फ एक ही व्यक्ति है।
उसे देखकर एक को दुख आ रहा है और दूसरे को खुशी।
एक ने उसका गुण देखा और दूसरे ने उसका अवगुण।
सिर्फ देखने की दृष्टि पर निर्भर करता है कि आप किस नजर से देखते हो।
जिसने उसकी विशेषता देखी, उसे वह अच्छा लगा।
जिसने उसका अवगुण देखा, उसे वह अच्छा नहीं लगा।
क्योंकि गुण अच्छे लगते हैं और अवगुण अच्छे नहीं लगते।
कोई किसी बहुत साधारण या टेढ़े-मेढ़े व्यक्ति में भी उसका गुण ढूँढ़ लेता है, तो उसे वह अच्छा लगेगा।
लेकिन कई लोग केवल उसके अवगुणों को ही देखते हैं।
आज का विषय है — **फरिश्ता।**
आज हम फरिश्ते की एक विशेषता पर ध्यान दे रहे हैं कि फरिश्ता कभी किसी में अवगुण नहीं देखता।
वह उसके अवगुण को भी गुण के रूप में देखने का प्रयास करता है। उसमें भी सकारात्मकता देखता है।
यदि हमारी दृष्टि बदल जाए, तो क्या हमारा परिवार बदल सकता है?
जी, यही तो सीखना है।
क्या हमारा परिवार बदल सकता है?
क्या हमारे संबंध बदल सकते हैं?
क्या हमारा जीवन बदल सकता है?
बाप-दादा कहते हैं—
किसी की कमजोरी नहीं देखना।
किसी की गलती नहीं देखना।
किसी के अवगुण नहीं देखना।
वह गलती करे, छोड़ दो।
उसमें कोई अवगुण है, छोड़ दो।
उसमें कोई कमजोरी है, छोड़ दो।
क्या देखो?
उसमें कौन-सा गुण है।
बस।
बाकी जो अवगुण उसके अंदर हैं, बाबा कहते हैं—उन्हें मत देखो।
उसमें कोई-न-कोई गुण तो होगा।
उसमें दस अवगुण हैं और एक गुण है।
आप उस एक गुण को देखकर उससे प्यार करो।
बाकी दस अवगुणों को अनदेखा करो।
ऐसे-ऐसे सूत्र बाबा बताते हैं।
क्या यह सूत्र अपनाया जा सकता है?
उसमें दस अवगुण हैं, उन्हें मत देखो।
एक गुण है, वही देखो।
हर मनुष्य में कोई-न-कोई गुण अवश्य होता है।तभी तो ड्रामा चलेगा।
तो वो फिर क्रोध मेरे ऊपर करेगा।
मैंने लोभ किया, मैंने मोह किया, मैं काम विकार में आया। मैंने जो कुछ भी किया, वो अपने आप को गिराया। एक ने तो पहल की ना।
जिसने पहल नहीं की उसने क्या किया?
दोनों में से एक तो पहल करेगा और दूसरा क्या करेगा?
स्वीकार करेगा। वो भी उन विकारों को अपने जीवन में स्वीकार करेगा।
तो लेगा, तो उसे फिर देना भी पड़ेगा।
जब देना पड़ेगा तो उसके अंदर वो विकार जागृत होंगे।
एक ने देकर के अपने आप को बिगाड़ा।
दूसरे ने लेकर के अपने आप को बिगाड़ा।
और अब हमने ना लेना है और ना देना है।
क्योंकि हमें एक लाइन पढ़ाई है। कौन सी लाइन है वो?
**सुख लो।
सुख दो।**
ना दुख लो, ना दुख दो।
कोई कुछ भी देने के लिए आए, हमने लेना ही नहीं।
हमने किसी में अवगुण देखा।
उसने अवगुण या बुराई…
मैंने देखी, अब वो मेरे जीवन का भी हिस्सा बन जाएगा।
वो बहुत लालची है। आपने देखा, वो बहुत लालची है।
उसके घर मौज हो रही है। खूब रिश्वत लेकर ऐसा करके, वैसा करके कर रहा है।
भैंस के दूध में, गाय के दूध में पानी मिलाकर मौज कर रहा है।
अब वह अवगुण आपने उनमें देखा। अब वो अवगुण आपके अंदर आ गया।
एक विकार…
और एक यह अवगुण देखना।
अवगुण देखा तो धीरे-धीरे आपको भी पैसों की जब दिक्कत आएगी, आप भी सोचेंगे, “आज मैं भी दूध में पानी मिला देता हूँ।”
भाई जी, अब तो ऐसा नहीं सोचेंगे।
मतलब इसी को तो बाबा कह रहे हैं—किसी में अवगुण देखोगे तो वह अवगुण आपके जीवन में आ जाएगा।
फरिश्ता जानता है कि हर आत्मा मूल रूप से पवित्र है।
कमजोरियाँ आत्मा का स्वभाव नहीं हैं।
ये देह का स्वभाव है।
जो आप आज भी बच्चों के लिए तुलना करते हैं—फलाँ का बच्चा ऐसा, फलाँ का बच्चा वैसा—ये मन में रहने वाली बातें हैं।
कमजोरियाँ आत्मा का स्वभाव नहीं हैं। यह देह के कारण आई हैं।
वह केवल संस्कारों की धूल है।
गंदी आदतों की धूल है।
धूल हट सकती है।
संस्कार परिवर्तन हो सकता है।
लेकिन…
हीरा अपना मूल्य कभी नहीं खोता।
हीरे पर धूल पड़ जाए तो क्या हीरे की वैल्यू कम हो जाती है?
नहीं होती।
वह आत्मा पवित्र है।
अवगुणों की धूल उसके ऊपर पड़ गई है।
इसलिए फरिश्ता उस धूल को नहीं देखता।
वो आत्मा को देखता है।
वो इस धूल भरी देह को नहीं देखता।
हीरा देखता है।
आत्मा को देखता है।
**बापदादा की शिक्षा**
बापदादा कहते हैं—
**विशेषता देखो,
कमजोरी मत देखो।**
क्योंकि जिसे हम बार-बार देखेंगे, वह हमारी चेतना का हिस्सा बन जाता है।
वह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है।
यदि हम हर समय दोष देखेंगे,
तो मन दोषों से भर जाएगा।
वह बार-बार बुद्धि को वही दोष दिखाएगा।
और जीवन का वह दोष हिस्सा बन जाएगा।
यदि हम गुण देखेंगे,
दोष नहीं देखेंगे,
तो हमारा मन गुणों से भर जाएगा।
विज्ञान भी यही कहता है।
आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि हमारा मस्तिष्क जिस बात पर बार-बार ध्यान देता है, वही उसे अधिक दिखाई देने लगती है।
यदि हम केवल कमियाँ खोजेंगे,
तो आपको हर जगह कमियाँ ही दिखाई देंगी।
यदि आप अच्छाइयाँ खोजेंगे,
तो हर जगह अच्छाई ही दिखाई देगी।
वही मन का स्वभाव बन जाएगा।
इसलिए दृष्टि बदलना सिर्फ आध्यात्मिक शिक्षा नहीं,
जीवन का विज्ञान भी है।
**एक छोटा सा उदाहरण**
मान लीजिए,
एक सफेद कागज़ पर
एक छोटा सा काला बिंदु बना दिया जाए।
अधिकांश लोग क्या देखेंगे?
काला बिंदु देखेंगे।
लेकिन पूरा सफेद कागज़ कोई नहीं देखेगा।
यही हमारी दृष्टि बन गई है।
एक छोटी सी कमी,
और हम पूरी आत्मा का निर्णय कर देते हैं।
फरिश्ता ऐसा नहीं करता।
वह पूरे सफेद कागज़ को देखता है,
काले निशान को नहीं।
**परमात्मा हमें कैसे देखते हैं?**
सोचो।
भगवान हमें कैसे देखते हैं?
क्या समझ में आया?
भगवान हमारे पवित्र स्वरूप को देखते हैं।
परमात्मा हर आत्मा के संपूर्ण रूप को देखते हैं।
जैसे आप परमधाम में थे।
वर्तमान में आपमें क्या कमियाँ हैं,
इसको नहीं देखते।
यदि परमात्मा भी हमारी केवल गलतियाँ ही देखते,
तो क्या हममें परिवर्तन की आशा रहती?
नहीं।
परमात्मा हमारी संभावना देखते हैं।
वे कहते हैं—
**तुम देवता बन सकते हो।**
**तुम फरिश्ता बन सकते हो।**
**तुम विश्व परिवर्तक बन सकते हो।**
यदि परमात्मा हमारी विशेषता देखते हैं,
तो हमें भी हर आत्मा में वही विशेषता,
वही संभावना देखनी चाहिए।
हर आत्मा में वही संभावना देखनी चाहिए।
फरिश्ते की दृष्टि—
फरिश्ता जब किसी को देखता है,
तो वह नहीं सोचता कि यह बहुत क्रोधी है।
वो सोचता है—
**इसके अंदर शांति का बीज भी है।**
वह नहीं सोचता—
**यह बहुत अहंकारी है।**
वह सोचता है—
**इस आत्मा में भी विनम्र बनने की क्षमता है।**
यही दिव्य दृष्टि है।
यही शुभ भावना है।
यही शुभकामना है।
**आज का अभ्यास**
आज से हर दिन कम से कम पाँच लोगों की एक-एक विशेषता लिखिए।
अपने समीप के तीन-पाँच लोगों की
एक-एक विशेषता,
एक-एक योग्यता लिखिए।
घर में, कार्यालय में, सेवा में—
जहाँ भी जाएँ,
जो भी मिले,
उसमें देखना है कि इस आत्मा में कौन-सा गुण है।
कमियाँ अपने आप छोटी लगने लगेंगी।
और आश्चर्य की बात—
जिन लोगों के गुण आप देखना शुरू करेंगे,
वे भी धीरे-धीरे बदलने लगेंगे।
क्योंकि
हम जिस ऊर्जा से देखते हैं,
हमें खुशी होती है,
उमंग-उत्साह बढ़ता है,
जब हमने किसी का गुण देखा।
वही ऊर्जा सामने वाले तक पहुँचती है।
कर्म-बंधन कटते हैं।
**आज का संकल्प**
आज से
मैं किसी की कमजोरी नहीं देखूँगा।
मैं किसी की कमजोरी नहीं,
विशेषता देखूँगा।
मैं दोष नहीं,
गुण देखूँगा।
मैं आलोचना नहीं,
प्रेरणा दूँगा।
मैं निर्णय नहीं,
शुभ भावना रखूँगा।
क्योंकि
**दृष्टि बदलती है तो सृष्टि बदलती है।**
और यही फरिश्ता जीवन की सबसे बड़ी पहचान है।

