Part-2(09) The Science of Mind and Energy | Emotions are also Vibrations |

RVS. भाग -2(09) मन और ऊर्जा का विज्ञान | भावनाएं भी कंपन (Vibrations) हैं

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राज योग के

वैज्ञानिक सिद्धांत

जिसमें हमने

आठ पाठ किए हैं।

चेतना का विज्ञान।

आज हम
राजयोग

के वैज्ञानिक सिद्धांत का
भाग दो करने जा रहे हैं।

चेतना के विज्ञान के आठ पार्ट थे।
आज हम भाग टू के पार्ट्स करेंगे।

जो आज भाग दो है उसका नाम है मन और ऊर्जा
का विज्ञान।

पहला था हमारा चेतना का विज्ञान।
आज है मन और ऊर्जा का विज्ञान।

आज हम विशेष मन का अध्ययन करेंगे
कि मन से किस प्रकार की ऊर्जा का विकास

होता है।
उसका पहला विषय है

भावनाएं भी
कंपन

वाइबेशंस हैं।

जो हमारी भावनाएं होती हैं उससे कंपन
निकलता है।

वैज्ञानिक सिद्धांत है
इमोशनल एनर्जी।

आध्यात्मिक रूप में भावनाएं भी प्रकंपन
करती हैं

और विज्ञान इसको कहता है इमोशनल एनर्जी।

यह किस प्रकार की भावनाएं होती हैं और यह
कैसे काम करती हैं। इसको हम देखेंगे। आज

के इस
विषय में

कैसे यह भावनाएं श्रेष्ठ भावनाएं
हमारे अंदर से नेगेटिविटी को पॉजिटिव में

लाती है।
जैसी भावना होती है

वैसा कंपन होता है। फिर वैसा जीवन बनता
है। फिर वैसा भविष्य भी बनता है।

इन सब बारीकियों को देखेंगे।

भाग दो है मन और ऊर्जा का विज्ञान।
साइंस ऑफ माइंड एंड एनर्जी।

अध्याय आठ

डिस्क्लेमर: इस वीडियो का उद्देश्य
शिक्षा, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक अध्ययन

है। इसमें प्रस्तुत वैज्ञानिक
विषय आधुनिक मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान

(न्यूरोसाइंस) तथा व्यवहार विज्ञान
(बिहेवियर साइंस) की सामान्य अवधारणाओं के

संदर्भ में समझाए गए हैं, जबकि आत्मा, परमात्मा,
योगबल, मन, बुद्धि, संस्कार और आध्यात्मिक

कंपन (स्पिरिचुअल वाइब्रेशन) से संबंधित
विचार ब्रह्माकुमारी राजयोग एवं मुरली की

शिक्षाओं पर आधारित हैं। इस वीडियो में
“वाइब्रेशंस” शब्द का प्रयोग मुख्यतः आध्यात्मिक

एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संदर्भ में
किया गया है। इससे विद्युत-चुंबकीय तरंगों

या किसी स्थापित भौतिक मापन का
अर्थ नहीं है।

यह वीडियो किसी
चिकित्सकीय,

मनोवैज्ञानिक
या वैज्ञानिक उपचार का विकल्प नहीं है।

कहीं ऐसा न सोचें कि हमारा इलाज करेंगे, इसमें ऐसा
कुछ नहीं है। आज के अद्भुत विषय की ओर

चलते हैं।

अध्याय छह है — भावनाएं भी कंपन (वाइब्रेशंस)
हैं। मतलब भावनाएं जो आती हैं, वह भी

प्रकंपन
करती हैं। इसका वैज्ञानिक सिद्धांत है

इमोशनल एनर्जी।

जो हम संकल्प करते हैं मन में, वह भावनाओं
में बदलता है और वे कंपन हैं। उनके

अंदर एक कंपन होती है जो अनुभव की जा सकती
है। क्या आपने कभी महसूस किया है?

प्रश्न खड़ा होता है — क्या आपने कभी महसूस
किया है कि कुछ लोगों के पास बैठते ही मन

शांत हो जाता है?

कुछ लोगों के पास बैठते ही मन शांत हो
जाता है।

और कुछ लोगों के पास बैठते ही बेचैनी बढ़
जाती है। क्यों?

ऐसा कभी आप में से किसी ने महसूस किया हो
और उसका कुछ अनुभव हो तो वह बता सकता है।

कभी आप किसी के पास बैठे हों और आपको शांति,
खुशी या बेचैनी महसूस हुई हो उसके पास बैठने से।

ऐसा कभी किसी ने महसूस किया?

बेचैनी का तो महसूस किया है बहुत बार।

मतलब हम किसी के पास बैठते हैं तो उसकी
नेगेटिविटी के कारण हमें ऐसा लगता है कि

यहां से उठकर चले जाएं।

हाँ जी।
क्या महसूस किया आपने वहाँ?

इतनी नेगेटिविटी होती है कि हर बात में वो
नेगेटिव ही सोचते हैं।

पॉजिटिव उनकी बातों में होता ही नहीं है।

तो वहाँ बैठने का दिल नहीं करता। दिल करता
है कि यहाँ से उठ जाएं।

जैसे आपके अपने, जिन्हें आप अपना
समझते हैं, जो आपके शुभचिंतक हैं, जिनसे

आपको प्यार है, जिन्हें आपसे प्यार है,

उनके जो थॉट होते हैं, जैसे माँ के पास
बच्चे को बैठने में बड़ा आराम मिलता है।

क्यों मिलता है? क्योंकि उसको माँ से वो
वाइब्रेशंस आती हैं जिनमें प्यार होता है।

अपनापन होता है। वो उठना नहीं चाहता। वो
जाना नहीं चाहता। वो छोड़ना भी नहीं चाहता

उसको।

और किसी और के पास जाने से वो रुकता है।

क्योंकि उसकी वाइब्रेशंस, उसके प्रकंपन उसे
महसूस हो रहे हैं। बच्चा उसके पास जाना

नहीं चाह रहा है।

एक बच्चा भी महसूस करता है, बड़ा कैसे नहीं
महसूस करेगा।

कहते हैं रोटी खाते हैं, उनको समझ में आ
जाता है।

ये क्या है? यह प्रकंपन है। यह प्रकंपन
पशु-पक्षी भी नोट करते हैं। हमें देखकर

उनको महसूस होता है कि जिनके थॉट
पॉजिटिव होते हैं,

पक्षी उनके पास आकर बैठ जाते हैं।

उनके कंधे पर बैठ जाते हैं। उनके सिर पर
बैठ जाते हैं। उनके हाथ में बैठ जाते हैं।

उनके हाथ से ले भी लेते हैं।

परंतु उन्हें डाउट हो जाए कि इनके प्रकंपन
ठीक नहीं हैं तो उनके हाथ से लेंगे नहीं।

और कुछ लोगों के पास बैठते ही बेचैनी बढ़
जाती है। क्यों? क्या केवल उनके शब्दों का

प्रभाव होता है?

या उनके भीतर से कुछ और भी निकल रहा होता
है।

राजयोग कहता है — हर विचार एक ऊर्जा है और

जब विचार भावना बन जाता है

तो वह हमारे व्यवहार, चेहरे, आवाज और

वातावरण पर प्रभाव डालता है।

इसी प्रभाव को आध्यात्मिक भाषा में

वाइब्रेशन कहा जाता है।

क्या भावनाएं वास्तव में शक्ति रखती हैं?

प्रश्न उठता है — क्या भावनाएं वास्तव में
शक्ति रखती हैं?

क्या आपकी भावना में कोई ताकत होती है?

क्योंकि जैसी आपकी भावना होगी, आप बहुत से
भाई-बहनों को अपने साथ बिठा सकते हैं।

और यदि आपकी भावना ठीक नहीं है तो लोग
आपसे उठकर चले जाएंगे।

उनका दिल नहीं करेगा कि वहाँ रहें।

जब हम क्रोधित होते हैं,

तो क्या कोई हमारे पास बैठेगा?

कोई हमें लाइक करेगा?

हम क्रोध कर रहे हों और कोई कहे — बहुत
अच्छा, बहुत अच्छा?

तो केवल मन ही प्रभावित नहीं होता।

हमारा चेहरा बदल जाता है।

हमारी आवाज बदल जाती है।

हृदय की गति बढ़ जाती है।

रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) बढ़ जाता है।

तनाव के हार्मोन बढ़ सकते हैं।

और पूरा शरीर उस भावनात्मक अवस्था का

अनुभव करता है।

इसी प्रकार जब हम प्रेम, करुणा, शांति

या कृतज्ञता का अनुभव करते हैं

तो शरीर में अलग प्रकार की जैव-रासायनिक

प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं।

इसलिए विज्ञान यह स्वीकार करता है कि

भावनाएं शरीर और मस्तिष्क को प्रभावित

करती हैं।

राजयोग इससे एक कदम आगे कहता है।

राजयोग क्या कहता है?

भावनाएं केवल शरीर को ही नहीं,

हमारे संबंधों और वातावरण

को भी प्रभावित करती हैं।

(आगे का शेष पाठ भी इसी प्रकार बिना टाइमलाइन के प्रस्तुत किया जा सकता है।)

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