AV-04/27-02-1996-“सत्यता का फाउण्डेशन है पवित्रता और निशानी है – चलन वा चेहरे में दिव्यता”
“सत्यता का फाउण्डेशन है पवित्रता और निशानी है – चलन वा चेहरे में दिव्यता”
आज सत-बाप, सत-शिक्षक, सतगुरू अपने चारों ओर के सत्यता के शक्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है। और सत्यता का प्रैक्टिकल प्रमाण चेहरे पर और चलन में दिव्यता होगी। दुनिया में भी अनेक आत्मायें अपने को सत्यवादी कहते हैं वा समझते हैं लेकिन सम्पूर्ण सत्यता पवित्रता के आधार पर होती है। पवित्रता नहीं तो सदा सत्यता रह नहीं सकती है। तो आप सबका फाउण्डेशन क्या है? पवित्रता। तो पवित्रता के आधार पर सत्यता का स्वरूप स्वत: और सहज सदा होता है। सत्यता सिर्फ सच बोलना, सच करना इसको नहीं कहा जाता लेकिन सबसे पहला सत्य जिससे आपको पवित्रता की वा सत्यता की शक्ति आई, तो पहली बात है अपने सत्य स्वरूप को जाना, मैं आत्मा हूँ – ये सत्य स्वरूप पहले नहीं जानते थे। लेकिन पहला सत्य अपने स्वरूप को जाना। मैं फलानी हूँ या फलाना हूँ, बॉडी के हिसाब से वह सत्य स्वरूप था? सत्य स्वरूप है पहले स्व स्वरूप और फिर बाप के सत्य परिचय को जाना। अच्छी तरह से अपना सत्य स्वरूप और बाप का सत्य परिचय जान लिया है? तीसरी बात – इस सृष्टि चक्र को भी सत्य स्वरूप से जाना। यह चक्र क्या है और इसमें मेरा पार्ट क्या है! तो अपना पार्ट अच्छी तरह से स्पष्ट रूप से जान लिया? आपका पार्ट अच्छा है ना? सबसे अच्छा पार्ट संगमयुग का कहेंगे। लेकिन आपका देव आत्मा का पार्ट भी विश्व में सारे चक्र की आत्माओं से श्रेष्ठ है। चाहे धर्म आत्मायें, महान आत्मायें भी पार्ट बजाती हैं लेकिन वो आत्मा और शरीर दोनों से पवित्र नहीं हैं और आप देव आत्मायें शरीर और आत्मा दोनों से पवित्र हैं, जो सारे कल्प में और कोई आत्मा ऐसी नहीं। तो पवित्रता का फाउण्डेशन सिवाए आपके और कोई भी आत्मा का श्रेष्ठ नहीं है। आपको देव आत्मा का पार्ट याद है? पाण्डवों को याद है? देव आत्मा की पवित्रता नेचुरल रूप में रही है। महान आत्मायें, आत्माओं को पवित्र बनाती हैं लेकिन बहुत पुरुषार्थ से, नेचुरल नहीं। न नेचुरल है न नेचर रूप में है। और आपकी आधा कल्प पवित्रता की जीवन नेचुरल भी है और नेचर भी है। कोई पुरुषार्थ वहाँ नहीं है। यहाँ का पुरुषार्थ वहाँ नेचुरल हो जाता है। क्योंकि वहाँ अपवित्रता का नाम-निशान नहीं, मालूम ही नहीं कि अपवित्रता भी होती है। इसलिए आपके पवित्रता का प्रैक्टिकल स्वरूप देवता अर्थात् दिव्यता का है। इस समय दुनिया वाले कितना भी अपने को सत्यवान समझें लेकिन स्व स्वरूप की सत्यता ही नहीं जानते। बाप के सत्य परिचय को ही नहीं जानते। तो सम्पूर्ण सत्य स्वरूप नहीं कहेंगे। आपमें भी सत्यता की शक्ति सदा तब रहेगी जब अपने और बाप के सत्य स्वरूप की स्मृति रहेगी, तो स्वत: ही हर संकल्प भी आपका सत्य होगा। अभी कभी भूल भी जाते हो, बॉडी-कॉन्सेस में आ जाते हो तो संकल्प सदा सत्यता के शक्तिशाली हो, पवित्रता के शक्तिशाली हो, वह सदा नहीं रहता। सदा रहता है कि व्यर्थ भी होता है? तो व्यर्थ को सत्य कहेंगे? झूठ तो बोला ही नहीं तो क्यों नहीं सत्य है? अगर कोई यह समझकर बैठे कि मैं कभी भी झूठ नहीं बोलती, सदा सच बोलती लेकिन सत्यता की परख है कि संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क सबमें दिव्यता अनुभव हो। बोल सच रहे हैं लेकिन दिव्यता नहीं है, देखते हो ना – कई बार-बार कहेंगे मैं सच बोलती, मैं सच बोलती। मैं सदा सच्ची हूँ लेकिन बोल में, कर्म में अगर दिव्यता नहीं है तो दूसरे को आपका सच, सच नहीं लगेगा। यही समझेंगे कि यह अपने को सिद्ध कर रही है लेकिन समझ में नहीं आता कि यह सत्य है। सत्य को सिद्ध करने के लिए सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। अगर अपने सत्य को जिद से सिद्ध करते हैं तो वह दिव्यता दिखाई नहीं देती है। ये साधारणता है, जो दुनिया में भी करते हैं। और बापदादा सत्य की निशानी एक स्लोगन में कहते हैं, साकार द्वारा भी सुना जो सच्चा होगा वह कैसे दिखाई देगा! सच तो नच। सदा खुशी में नाचता रहेगा। जब जिद करके सिद्ध करते तो आप अपना या दूसरे का चेहरा नोट करेंगे तो वह खुशी का नहीं होगा। थोड़ा सोचने का और थोड़ा उदासी का होगा। नाचने का नहीं होगा। सच तो बिठो नच, सच्चा खुशी में नाचता है। तो खुशी में जीवन के दिन या रात बहुत अच्छी लगती है। और थोड़ा भी सत्य में असत्य मिक्स है तो उस समय की जीवन इतनी अच्छी नहीं लगेगी। तो सत्यता का अर्थ ही है सत्य स्वरूप में स्थित होके चाहे संकल्प, चाहे बोल, चाहे कर्म करना।
आजकल दुनिया वाले तो स्पष्ट कहते हैं कि आजकल सच्चे लोगों का चलना ही मुश्किल है, झूठ बोलना ही पड़ेगा। लेकिन कई समय पर, कई परिस्थितियों में ब्राह्मण आत्मायें भी मुख से नहीं बोलती लेकिन अन्दर समझती हैं कि कहाँ-कहाँ चतुराई से तो चलना ही पड़ता है। उसको झूठ नहीं कहते लेकिन चतुराई कहते हैं। तो चतुराई क्या है? यह तो करना ही पड़ता है! तो वह स्पष्ट बोलते हैं और ब्राह्मण रॉयल भाषा में बोलते हैं। फिर कहते हैं मेरा भाव नहीं था, न भावना थी न भाव था लेकिन करना ही पड़ता है, चलना ही पड़ता है। लेकिन ब्रह्मा बाप को देखा, साकार है ना, निराकार के लिए तो आप भी सोचते हो कि शिव बाप तो निराकार है, ऊपर मजे में बैठा है, नीचे आवे तो पता पड़े क्या है! लेकिन ब्रह्मा बाप तो साकार स्वरूप में आप सबके साथ ही रहे, स्टूडेन्ट भी रहे और सत्यता व पवित्रता के लिए कितनी आपोजीशन हुई तो चालाकी से चला? लोगों ने कितना राय दी कि आप सीधा ऐसे नहीं कहो कि पवित्र रहना ही है, यह कहो कि थोड़ा-थोड़ा रहो। लेकिन ब्रह्मा बाप घबराया? सत्यता की शक्ति धारण करने में सहनशक्ति की भी आवश्यकता है। सहन करना पड़ता है, झुकना पड़ता है, हार माननी पड़ती है लेकिन वह हार नहीं है, उस समय के लिए हार लगती है लेकिन है सदा की विजय।
सत्यता की शक्ति से आज डायमण्ड जुबली मना रहे हैं। अगर पवित्रता और सत्यता नहीं होती तो आज आपके चेहरों से, चलन से आने वालों को जो दिव्यता अनुभव होती है वह नहीं होती। चाहे प्यादा भी है, नम्बरवार तो है ही ना। महारथी भी हैं, नाम के महारथी नहीं, लेकिन जो सच्चे महारथी हैं अर्थात् सत्यता की शक्ति से चलने वाले महारथी हैं। जो परिस्थिति को देखकर सत्यता से ज़रा भी किनारा कर लेते, कहते हैं और कुछ नहीं किया एक दो शब्द ऐसे बोल दिये, दिल से नहीं बोले ऐसे बाहर से थोड़ा बोल दिये तो यह सम्पूर्ण सत्यता नहीं है। सत्यता के पीछे अगर सहन भी करना पड़ता तो वह सहन नहीं है भल बाहर से लगता है कि हम सहन कर रहे हैं लेकिन आपके खाते में वह सहन शक्ति के रूप में जमा होता है। नहीं तो क्या होता कि अगर कोई थोड़ा सा भी सहन करने में कमजोर हो जाता है तो उसे असत्य का सहारा जरूर लेना पड़ता है। तो उस समय ऐसे लगता है जैसे सहारा मिल गया, ठीक हो गया लेकिन उसके खाते में सहनशक्ति जमा नहीं होती है। तो बाहर से ऐसे समझेंगे कि हम बहुत अच्छे चलते हैं, हमको चलने की चतुराई आ गई है, लेकिन अगर अपना खाता देखेंगे तो जमा का खाता बहुत कम होगा। इसलिए चतुराई से नहीं चलो, एक दो को देखकर भी कॉपी करते हैं, यह ऐसे चलती है ना तो इसका नाम बहुत अच्छा हो गया है, यह बहुत आगे हो गई है और हम सच्चे चलते हैं ना तो हम पीछे के पीछे ही रह गये। लेकिन वह पीछे रहना नहीं है, वह आगे बढ़ना है। बाप के आगे, आगे बढ़ते हो और दूसरों के आगे चाहे पीछे दिखाई भी दो लेकिन काम किससे है! बाप से या आत्माओं से? (बाप से) तो बाप के दिल में आगे बढ़ना अर्थात् सारे कल्प के प्रालब्ध में आगे बढ़ना। और अगर यहाँ आगे बढ़ने में आत्माओं को कॉपी करते हो, तो उस समय के लिए आपका नाम होता है, शान मिलता है, भाषण करने वाली लिस्ट में आते हो, सेन्टर सम्भालने की लिस्ट में आते हो लेकिन सारे कल्प की प्रालब्ध नहीं बनती। जिसको बापदादा कहते हैं मेहनत की, बीज डाला, वृक्ष बड़ा किया, फल भी निकला लेकिन कच्चा फल खा गये, हमेशा के लिए प्रालब्ध का फल खत्म हो जाता है। तो अल्पकाल के शान, मान, नाम के लिए कॉपी नहीं करो। यहाँ नाम नहीं है लेकिन बाप के दिल में नम्बर आगे नाम है। इसलिए डायमण्ड बनना है तो यह सब चेकिंग करो। ज़रा भी रॉयल रूप का दाग डायमण्ड में छिपा हुआ तो नहीं है? तो सत्यता की शक्ति से दिव्यता को धारण करो। कुछ भी सहन करना पड़े, घबराओ नहीं। सत्य समय प्रमाण स्वयं सिद्ध होगा। कहते भी हो ना कि सत्य की नाव डोलती है लेकिन डूबती नहीं, तो किनारा तो ले लेंगे ना। निर्भय बनो। अगर कहाँ भी सामना करना पड़ता है तो ब्रह्मा बाप के जीवन को आगे रखो। ब्रह्मा बाप के आगे दुनिया की परिस्थितियां तो थी लेकिन वैराइटी बच्चों की भी परिस्थितियां रहीं लेकिन संगठन में होते, जिम्मेवारी होते सत्यता की शक्ति से विजयी हो गये। बच्चों की खिटखिट ब्रह्मा बाप ने नहीं देखी क्या? ब्रह्मा बाप के आगे भी वैराइटी संस्कार वाली आत्मायें रही, लेकिन इतनी सब परिस्थितियां होते हुए सत्यता की स्व स्थिति ने सम्पूर्ण बना दिया।
तो आप सबको क्या बनना है? चतुराई तो नहीं है ना! बहुत अच्छा बोलते हैं – मैंने कुछ नहीं किया थोड़ा चतुराई से तो चलना ही पड़ता है। लेकिन कब तक? तो सहनशक्ति धारण कर असत्य का सामना करो। प्रभाव में नहीं आ जाओ। कई समझते हैं कि हमने महारथियों में भी ऐसे देखा ना तो फॉलो तो महारथियों को करना है ना, अभी ब्रह्मा बाबा तो सामने हैं नहीं, महारथी हैं उसको फॉलो किया। लेकिन अगर महारथी भी मिक्स करता है, चतुराई से चलता है तो उस समय महारथी, महारथी नहीं है। उस समय ग्रहचारी में है न कि महारथी है। इसीलिए बाप ने क्या स्लोगन दिया – फॉलो फादर या सिस्टर ब्रदर? तो साकार कर्म में ब्रह्मा बाप को आगे रखो, फॉलो करो और अशरीरी बनने में निराकार बाप को फॉलो करो। चाहे अच्छे-अच्छे बच्चे भी हैं लेकिन वह भी फॉलो फादर करते हैं। तो आपको क्या करना है? फॉलो फादर। पक्का या थोड़ा-थोड़ा एडॅवान्टेज मिलता है तो ले लो भविष्य में देखा जायेगा? कई ऐसे भी सोचते हैं कि सतयुग में चाहे कम पद पायेंगे लेकिन सुखी तो होंगे ही। दुख तो होगा ही नहीं। सब प्राप्तियां तो होंगी। चाहे प्रजा की भी प्रजा होगी तो भी अप्राप्ति तो होगी नहीं, तो अभी तो मज़ा ले लें, पीछे देखा जायेगा। लेकिन यह अल्पकाल का मज़ा, सज़ा के भागी बना देगा। तो वह मंजूर है, सजा खायेंगे थोड़ी! वह भी मज़ा ले लो? नहीं!
तो तीनों बातें याद रखो – पवित्रता, सत्यता और दिव्यता। ऐसे साधारण बोल नहीं, साधारण संकल्प नहीं, साधारण कर्म नहीं, दिव्यता। दिव्यता का अर्थ ही है दिव्य गुण द्वारा कर्म करना, संकल्प करना, वही दिव्यता है। जैसे लोग पूछते हैं ना कि पाप कर्म क्या होता है? तो आप कहते हो कि कोई भी विकार के वश कर्म करना यह पाप है। ऐसे समझाते हो ना! तो दिव्यता अर्थात् दिव्य गुण के आधार पर मन-वचन और कर्म करना। तो सत्यता का महत्व जाना! (ड्रिल)
एक सेकेण्ड में अपने को अशरीरी बना सकते हो? क्यों? संकल्प किया मैं अशरीरी आत्मा हूँ, तो कितना टाइम लगा? सेकेण्ड लगा ना! तो सेकेण्ड में अशरीरी, न्यारे और बाप के प्यारे – ये ड्रिल सारे दिन में बीच-बीच में करते रहो। करने तो आती है ना? तो अभी सब एक सेकेण्ड में सब भूलकर एकदम अशरीरी बन जाओ। (बापदादा ने 5 मिनट ड्रिल कराई) अच्छा।
चारों ओर के सर्व पवित्रता के फाउण्डेशन को सदा मजबूत रखने वाले, सदा सत्यता की शक्ति से विश्व में भी सत युग अर्थात् सत्यता की शक्ति के वायब्रेशन फैलाने वाले सदा हर समय मन-वाणी-कर्म तीनों में दिव्यता धारण करने वाले, सदा फॉलो फादर करने के नेचुरल अभ्यास वाली आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
इस ड्रिल को दिन में जितना बार ज्यादा कर सको उतना करते रहना। चाहे एक मिनट करो। तीन मिनट, दो मिनट का टाइम न भी हो एक मिनट, आधा मिनट यह अभ्यास करने से लास्ट समय अशरीरी बनने में बहुत मदद मिलेगी। बन सकते हैं? अभी सभी अशरीरी हुए या युद्ध में, मेहनत करते-करते टाइम पूरा हो गया? सेकेण्ड में बन सकते हो! बहुत काम है फिर भी बन सकते हो? मुश्किल नहीं है? यू.एन. में बहुत भाग दौड़ कर रही हो और अशरीरी बनने की कोशिश करो, होगा? अगर यह अभ्यास समय प्रति समय करेंगे तो ऐसे ही नेचुरल हो जायेगा जैसे शरीर भान में आना, मेहनत करते हो क्या? मैं फलानी हूँ, यह मेहनत करते हो? नेचुरल है। तो यह भी नेचुरल हो जायेगा। जब चाहो अशरीरी बनो, जब चाहो शरीर में आओ। अच्छा काम है आओ इस शरीर का आधार लो लेकिन आधार लेने वाली मैं आत्मा हूँ, वह नहीं भूले। करने वाली नहीं हूँ, कराने वाली हूँ। जैसे दूसरों से काम कराते हो ना। उस समय अपने को अलग समझते हो ना! वैसे शरीर से काम कराते हुए भी कराने वाली मैं अलग हूँ, यह प्रैक्टिस करो तो कभी भी बॉडी-कॉन्सेस की बातों में नीचे ऊपर नहीं होंगे। समझा।
डबल विदेशी आगे जाने चाहते हो ना! हैं भी अच्छे, अटेन्शन अच्छा है। सेवा में भी उमंग-उत्साह अच्छा है। और बढ़ता रहेगा।
डबल विदेशियों से पूछ रहे हैं कि सभी ने इस वर्ष जो सेवा की, जो प्रोजेक्ट मिला, उसमें सन्तुष्ट रहे? सभी ने प्रोग्राम किया ना? तो सन्तुष्ट हैं? हाँ या ना? कुछ भी सेवा करो चाहे जिज्ञासू कोर्स वाले आवे या नहीं आवे लेकिन स्वयं, स्वयं से सन्तुष्ट रहो। निश्चय रखो कि अगर मैं सन्तुष्ट हूँ तो आज नहीं तो कल यह मैसेज काम करेगा, करना ही है। इसमें थोड़ा सा उदास नहीं बनो। खर्चा तो किया… प्रोग्राम भी किया… लेकिन आया कोई नहीं। स्टूडेन्ट नहीं बढ़े, कोई हर्जा नहीं आपने तो किया ना। आपके हिसाब-किताब में जमा हो गया और उन्हों को भी सन्देश मिल गया। तो टाइम पर सभी को आना ही है, इसलिए करते जाओ। खर्चा बहुत हुआ, उसको नहीं सोचो। अगर स्वयं सन्तुष्ट हो तो खर्चा सफल हुआ। घबराओ नहीं, पता नहीं क्या हुआ! कई बच्चे ऐसे कहते हैं मेरा योग ठीक नहीं था, तभी यह हुआ। किससे योग था? और कोई है क्या जिससे योग था? योग है और सदा रहेगा। बाकी कोई सीजन का फल है, कोई हर समय का फल है। तो अगर आया नहीं तो सीजन का फल है, सीजन आयेगी। दिलशिकस्त नहीं बनो। क्योंकि श्रीमत को तो माना ना। श्रीमत प्रमाण कार्य किया। इसीलिए श्रीमत को मानना यह भी एक सफलता है। बढ़ते जाओ, करते जाओ। और ही पश्चाताप करके आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कहा हमने नहीं माना। यहाँ ही आप देवियां बनेंगी। आपके पांव पर पड़ेंगे, तभी तो भक्ति में भी पांव पड़ेंगे ना। तो वह टाइम भी आना है जो सब आपके पांव पड़ेंगे कि आपने कितना अच्छा हमारा कल्याण किया।
अभी तो आई.पी. भी अच्छे-अच्छे लाते ही हो। बापदादा के पास तो रिजल्ट आती ही है तो अच्छे-अच्छे वी.आई.पी., आई.पी. भी लाये, वह भी सफलता हुई। आगे बच्चों का प्रोग्राम भी किया ना। बच्चों में कितने बच्चे फारेन के थे? (100) एक सौ फारेन के थे और अभी फिर महिलाओं का कर रहे हो। वह भी तैयारी कर रहे हो। तो आगे बढ़ रहे हो ना? पहले जब कहते थे आई.पी. लाओ तो कहते थे फारेन से बहुत मुश्किल है, बहुत मुश्किल है, यह जयन्ति बोलती थी। अभी क्या बोलती है? सहज। और यह डायमण्ड जुबली है ना तो देखो भारत में भी जो प्रोग्राम हुए हैं वह भी मैजारिटी सभी जगह बहुत सफल हुआ है। क्योंकि यह जो विधि रखी है ना कि सभी डायमण्ड जुबली के कारण दीपक जगाने आवें, तो वह समझते हैं हमको कोई पोजीशन मिला। वैसे कहेंगे आओ सुनने तो नहीं आते। तो डायमण्ड जुबली की विधि के कारण अभी आई.पी. कनेक्शन में अच्छे आये हैं और आते रहेंगे। क्योंकि अज्ञानी हैं ना तो सिर्फ सुनने जाना है, तो देह अभिमान आता है। और कुछ करना है तो समझते हैं कुछ पोजीशन है। तो जिसको जो चाहिए वह दे दिया, आपका काम हो गया, अभी दीपक जगाने में वैसे सोचो तो क्या है? लेकिन वह खुश हो जाते हैं। समझते हैं हमारा रिगार्ड रखा। तो देश विदेश में डायमण्ड जुबली की जो सेवा कर रहे हो वह सफल है और रहेगी। अच्छा।
महिलायें कितनी आ रही हैं? (180) उनके निमित्त कौन-कौन हैं? सेवा अच्छी लगती है ना? थकते तो नहीं?
टीचर्स हाथ उठाओ। टीचर्स थकती हो? जो थोड़ा-थोड़ा कभी थकता हो? वह तो हाथ उठायेंगे नहीं। जो कभी थकता नहीं टीचर्स में वह हाथ उठाओ। पाण्डव हाथ उठा रहे हैं, बहनों ने नहीं उठाया तो पाण्डव पास हो गये। मुबारक। थको नहीं। जिस समय थकावट फील हो ना तो कहाँ भी जाकर डांस शुरू कर दो। चाहे बाथरूम में। क्या है इससे मूड चेंज हो जायेगी। चाहे मन की खुशी में नाचो, अगर वह नहीं कर सकते हो तो स्थूल में गीत बजाओ और नाचो। फारेन में डांस तो सबको आता है। डांस करने में तो होशियार हैं। फरिश्ता डांस तो आता है। अच्छा।
(शील दादी और रामी बहन बापदादा के सम्मुख आई तथा गले मिली) अपने घर मधुबन में पहुंच गई ना। खुश है ना? खुश रहती हो और सदा खुश रहो। बहुत अच्छा हिम्मत से हिसाब-किताब को चुक्तू किया। हिम्मत अच्छी है। डायमण्ड जुबली मनाने आई हो ना। (रामी से) ठीक है?
(मधुबन के प्रफुल भाई ने एक्सीडेंट में शरीर छोड़ा है) बच्चा अच्छा था और सेवा के उमंग-उत्साह में भी रहा लेकिन हिसाब-किताब का टाइम बनता है तो कोई न कोई कारण से बन ही जाता है। बाकी बच्चा स्वयं ठीक था।
(बाबा जब बच्चों को मदद करता है तो उस टाइम क्यों नहीं की?) उनका हिसाब उसी ड्राइवर से उसी स्थान से होता है। भावी को नहीं टाल सकते। (डॉक्टरों ने बचाने के बहुत प्रयास किये) सभी का प्यार भी था। मृत्यु की डेट टल नहीं सकती। भगवान भी बदल नहीं सकता।
ज्ञान सरोवर में स्पार्क मीटिंग (रिसर्च) के लिए आये हुए भाई बहिनों से :-
सभी रिसर्च करने के लिए इकट्ठे हुए हैं। अच्छा है जितना अन्तर्मुखता के कमरे में बैठ रिसर्च करेंगे उतना अच्छे से अच्छी टचिंग होंगी। और इसी टचिंग से अनेक आत्माओं को लाभ मिलेगा। तो अच्छा है। करते रहो लेकिन प्रयोग और योग दोनों का बैलेन्स रखते आगे बढ़ते चलो। बाकी अच्छा है। जितना मनन करो उतना ही मक्खन निकलता है। तो कोई न कोई अच्छा माखन निकालेंगे जो सबमें शक्ति भरे।
अध्याय: सत्यता का फाउण्डेशन — पवित्रता, निशानी — दिव्यता
मुरली: 27 फरवरी 1996
स्थान: मधुबन
मुख्य विषय: सत्यता की शक्ति, पवित्रता, दिव्यता, सहनशक्ति और Follow Father
मुख्य संदेश: सत्यता केवल सच बोलना नहीं है; सत्यता तब सम्पूर्ण होती है जब मन, वाणी, कर्म और सम्बन्ध-सम्पर्क में दिव्यता दिखाई दे।
1. सत्यता की असली नींव क्या है?
बापदादा स्पष्ट करते हैं कि सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है।
सिर्फ सच बोल देना ही सम्पूर्ण सत्यता नहीं है। यदि बोल सच है लेकिन उसमें कठोरता, अहंकार, देह-अभिमान या किसी को नीचा दिखाने की भावना है, तो वहाँ सत्यता के साथ दिव्यता नहीं है।
मुरली नोट
“सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है और सत्यता का प्रैक्टिकल प्रमाण चेहरे पर और चलन में दिव्यता होगी।”
सरल उदाहरण
किसी व्यक्ति की गलती बतानी है।
साधारण सत्य:
“तुमने गलत किया है।”
दिव्यता सहित सत्य:
“इस कार्य में शायद सुधार की आवश्यकता है। हम इसे मिलकर बेहतर कर सकते हैं।”
दोनों में तथ्य सत्य हो सकता है, लेकिन दूसरे में पवित्र भावना और दिव्यता है।
2. सम्पूर्ण सत्यता के तीन सत्य
मुरली में सत्यता को केवल व्यवहार तक सीमित नहीं रखा गया है। पहले अपने मूल सत्य को पहचानना आवश्यक है।
पहला सत्य — मैं आत्मा हूँ
शरीर मेरा वास्तविक परिचय नहीं है।
मेरा पहला सत्य स्वरूप है—
“मैं आत्मा हूँ।”
दूसरा सत्य — बाप का सत्य परिचय
अपने सत्य स्वरूप को जानने के बाद परमात्मा के सत्य परिचय को जानना आवश्यक है।
तीसरा सत्य — सृष्टि चक्र और अपना पार्ट
यह समझना कि—
- सृष्टि चक्र क्या है?
- इसमें मेरा पार्ट क्या है?
- संगमयुग का महत्व क्या है?
- देव आत्मा के रूप में मेरी विशेषता क्या है?
मुरली नोट
स्व-स्वरूप + बाप का सत्य परिचय + सृष्टि चक्र का ज्ञान = सत्यता की मजबूत स्मृति।
जब यह स्मृति रहती है, तब संकल्प भी सत्य और शक्तिशाली बनने लगते हैं।
3. सत्यता की निशानी — चेहरे और चलन में दिव्यता
सच्चाई का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि हम बार-बार कहें—
“मैं सच बोलता हूँ।”
बल्कि लोग हमारे चेहरे और व्यवहार से अनुभव करें—
“इस आत्मा में कुछ दिव्यता है।”
याद रखने योग्य सूत्र
सत्य → पवित्रता → दिव्यता
और व्यवहार में—
संकल्प → बोल → कर्म → सम्बन्ध-सम्पर्क
इन चारों में दिव्यता दिखाई देनी चाहिए।
4. “मैं सच बोलता हूँ” — फिर भी सत्यता अधूरी क्यों?
कई बार व्यक्ति अपनी बात को सही सिद्ध करने में इतना जोर लगा देता है कि उसकी सच्चाई में जिद दिखाई देने लगती है।
बापदादा का संकेत है कि सत्य को सिद्ध करने के लिए अत्यधिक जिद की आवश्यकता नहीं होती।
उदाहरण
यदि कोई कहे:
“मैं बिल्कुल सही हूँ! मैंने सच ही कहा था! आप समझ क्यों नहीं रहे?”
तो तथ्य सही होने पर भी सामने वाले को वहाँ अहंकार या जिद महसूस हो सकती है।
इसके विपरीत:
“मेरी भावना आपको स्पष्ट नहीं हुई होगी। मैं अपनी बात शांतिपूर्वक समझाता हूँ।”
यहाँ सत्य के साथ दिव्यता भी दिखाई देती है।
5. “सच तो नच” — सत्य और खुशी का सम्बन्ध
मुरली का बहुत सुंदर संकेत है—
“सच तो नच।”
अर्थात् सच्ची आत्मा के जीवन में खुशी दिखाई देगी।
जब मन में सत्यता और पवित्रता होती है तो चेहरा हल्का, प्रसन्न और शक्तिशाली रहता है।
लेकिन जब सत्य में असत्य, दिखावा, जिद या स्वार्थ मिल जाता है तो भीतर का बोझ चेहरे पर भी दिखाई देने लगता है।
आत्म-चेकिंग
अपने आपसे पूछें:
- क्या मेरी सच्चाई मुझे खुश बनाती है?
- क्या मेरी बात से दूसरे को शक्ति मिलती है?
- क्या मेरे सत्य में नम्रता है?
- क्या मेरे चेहरे पर प्रसन्नता है?
6. “चतुराई” के नाम पर असत्य
आज की दुनिया में अक्सर कहा जाता है—
“सच्चे रहोगे तो चलना मुश्किल है।”
कभी-कभी आध्यात्मिक जीवन में भी व्यक्ति स्वयं को समझाता है—
“मैंने झूठ नहीं बोला, बस थोड़ी चतुराई की।”
लेकिन प्रश्न यह है:
क्या उस चतुराई से मेरी पवित्रता और सत्यता सुरक्षित रही?
यदि किसी परिस्थिति में असत्य का सहारा लेना पड़ता है, तो तत्काल समस्या शायद हल हो जाए, लेकिन सहनशक्ति का खाता जमा नहीं होता।
7. सहनशक्ति — सत्यता की असली शक्ति
सत्य पर चलने के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है।
सहनशक्ति चाहिए।
कभी झुकना पड़ेगा।
कभी चुप रहना पड़ेगा।
कभी अपनी बात सिद्ध नहीं करनी होगी।
कभी ऐसा भी लगेगा कि हम हार गये।
लेकिन—
अल्पकाल की हार = दीर्घकाल की विजय हो सकती है।
ब्रह्मा बाबा के जीवन को इसके उदाहरण के रूप में सामने रखा गया है—पवित्रता और सत्यता के मार्ग पर विरोध के बावजूद उन्होंने सत्यता से किनारा नहीं किया।
8. दूसरों की कॉपी या Follow Father?
कभी हम किसी प्रसिद्ध, वरिष्ठ या प्रभावशाली व्यक्ति को देखकर सोचते हैं—
“वह ऐसे करते हैं, इसलिए हमें भी ऐसा ही करना चाहिए।”
लेकिन मुरली का स्पष्ट मार्गदर्शन है—
Follow Father
साकार कर्मों में ब्रह्मा बाप को आगे रखो।
और अशरीरी बनने की स्थिति में निराकार बाप को फॉलो करो।
आत्म-चेकिंग
जब कोई परिस्थिति आए तो पूछें:
“मैं अभी व्यक्ति को फॉलो कर रहा हूँ या Father को?”
यह प्रश्न बहुत-सी सूक्ष्म कमजोरियों से बचा सकता है।
9. अल्पकाल का नाम-मान या सारे कल्प की प्रालब्ध?
मुरली में बहुत गहरी चेतावनी है।
कभी-कभी हम दूसरों को देखकर जल्दी आगे बढ़ना चाहते हैं—
- नाम मिले
- मान मिले
- पद मिले
- मंच मिले
- जिम्मेदारी मिले
- लोग हमें श्रेष्ठ समझें
लेकिन यदि इसके लिए सत्यता से थोड़ा भी समझौता किया, तो अल्पकालीन उपलब्धि मिल सकती है, पर आंतरिक जमा कम हो जाता है।
सुंदर उदाहरण
बापदादा समझाते हैं कि जैसे किसी ने बीज बोया, वृक्ष बड़ा किया, फल भी निकला लेकिन कच्चा फल खा लिया, तो भविष्य के लिए फल समाप्त हो गया।
इसलिए—
अल्पकाल के शान-मान के लिए सत्यता को मत छोड़ो।
10. डायमण्ड बनने की चेकिंग
यदि डायमण्ड बनना है तो अपने अंदर के सूक्ष्म दाग भी देखना होगा।
दैनिक आत्म-चेक
क्या मेरे अंदर कोई रॉयल रूप का दाग है?
जैसे—
- अपने को सही सिद्ध करने की जिद
- छिपी हुई चतुराई
- दिखावे की सेवा
- नाम की इच्छा
- दूसरों को कॉपी करना
- परिस्थिति देखकर सत्यता छोड़ देना
- सच बोलते हुए भी कठोरता
- सेवा में परिणाम न मिलने पर दिलशिकस्त होना
11. तीन मुख्य शब्द — पवित्रता, सत्यता, दिव्यता
इस मुरली का सार तीन शब्दों में याद किया जा सकता है:
पवित्रता + सत्यता + दिव्यता
पवित्रता
विचार, भावना और दृष्टि में स्वच्छता।
सत्यता
अपने सत्य स्वरूप में स्थित होकर संकल्प, बोल और कर्म करना।
दिव्यता
दिव्य गुणों के आधार पर मन, वचन और कर्म करना।
एक लाइन का सूत्र
पवित्रता आधार है → सत्यता शक्ति है → दिव्यता पहचान है।
12. अशरीरी बनने की एक सेकण्ड की ड्रिल
मुरली में विशेष रूप से अशरीरी ड्रिल कराई गई।
अभ्यास:
“मैं अशरीरी आत्मा हूँ।”
बस एक सेकण्ड के लिए शरीर, भूमिका, जिम्मेदारी और परिस्थितियों से न्यारा होकर आत्म-स्वरूप में स्थित होना।
दिन में अभ्यास
- 30 सेकण्ड
- 1 मिनट
- 2 मिनट
- 3 मिनट
जब भी समय मिले।
धीरे-धीरे यह अभ्यास नेचुरल बन सकता है।
Practical Example
काम करते हुए अचानक रुकें:
“मैं आत्मा हूँ… यह शरीर मेरा साधन है… मैं कराने वाली आत्मा हूँ।”
फिर कार्य में लौटें।
13. “करने वाली नहीं, कराने वाली”
यह बहुत शक्तिशाली अभ्यास है।
जब हम सोचते हैं—
“मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ।”
तो जिम्मेदारी का बोझ बढ़ता है।
लेकिन आत्मिक स्मृति में—
“मैं आत्मा हूँ, शरीर मेरा साधन है।”
इससे शरीर और भूमिका से थोड़ी दूरी बनती है और न्यारेपन का अनुभव बढ़ता है।
14. सेवा में सफलता न मिले तो?
मुरली का यह हिस्सा विशेष रूप से सेवाधारी आत्माओं के लिए प्रेरणादायक है।
कभी बहुत मेहनत की—
- कार्यक्रम किया
- खर्च किया
- समय दिया
- मेहनत की
- लेकिन जिज्ञासु नहीं आए
तो क्या करें?
दिलशिकस्त नहीं बनना है।
यदि कार्य श्रीमत प्रमाण किया है और अपनी ओर से ईमानदारी से सेवा की है, तो वह प्रयास व्यर्थ नहीं गया।
आज परिणाम नहीं दिखा तो कल दिखाई दे सकता है।
सेवा का सही मापदण्ड
सिर्फ यह नहीं—
“कितने लोग आए?”
बल्कि यह भी—
“क्या मैंने अपनी ओर से श्रेष्ठ विधि से सेवा की?”
15. प्रयोग और योग का बैलेंस
रिसर्च करने वाले भाई-बहनों को भी संदेश दिया गया कि केवल प्रयोग या शोध पर्याप्त नहीं है।
आवश्यक है:
प्रयोग + योग = श्रेष्ठ परिणाम
जितना अन्तर्मुख होकर मनन करेंगे, उतनी अच्छी टचिंग मिलेंगी।
और उस टचिंग से अनेक आत्माओं को लाभ मिल सकता है।
मुरली नोट
“जितना मनन करो उतना ही मक्खन निकलता है।”
अर्थात् मनन से ज्ञान का सार, अनुभव और शक्ति बाहर आती है।
16. मुरली से मिलने वाले 10 Practical Lessons
- सच बोलना ही सम्पूर्ण सत्यता नहीं है।
- सत्यता की नींव पवित्रता है।
- सत्यता का प्रमाण दिव्य चेहरा और दिव्य चलन है।
- सत्य को जिद से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं।
- सहनशक्ति सत्यता की सुरक्षा करती है।
- चतुराई के नाम पर असत्य का सहारा न लें।
- अल्पकाल के नाम-मान के लिए सत्यता न छोड़ें।
- व्यक्तियों को नहीं, Father को Follow करें।
- अशरीरी बनने की ड्रिल बार-बार करें।
- मन-वचन-कर्म में पवित्रता, सत्यता और दिव्यता लाएँ।
17. आज की आत्म-चेकिंग
आज रात सोने से पहले स्वयं से पाँच प्रश्न:
1. क्या आज मेरे किसी बोल में सत्य तो था, लेकिन दिव्यता नहीं थी?
2. क्या मैंने कहीं चतुराई के नाम पर सत्यता से समझौता किया?
3. क्या मैंने किसी व्यक्ति को कॉपी किया या Father को Follow किया?
4. क्या परिस्थिति में मेरी सहनशक्ति जमा हुई?
5. क्या आज मैंने कम-से-कम कुछ बार अशरीरी बनने का अभ्यास किया?
प्रश्न 1: सत्यता का फाउण्डेशन क्या है?
उत्तर: सत्यता का फाउण्डेशन पवित्रता है। पवित्रता के आधार पर सत्यता का स्वरूप सहज और सदा बना रहता है।
प्रश्न 2: सत्यता की प्रैक्टिकल निशानी क्या है?
उत्तर: सत्यता की प्रैक्टिकल निशानी चलन और चेहरे में दिव्यता दिखाई देना है।
प्रश्न 3: सम्पूर्ण सत्यता किसे कहा जाता है?
उत्तर: केवल सच बोलना या सच करना सम्पूर्ण सत्यता नहीं है। संकल्प, बोल, कर्म और सम्बन्ध-संपर्क में दिव्यता का अनुभव होना ही सत्यता की वास्तविक पहचान है।
प्रश्न 4: सबसे पहला सत्य क्या है?
उत्तर: सबसे पहला सत्य है अपने सत्य स्वरूप को जानना—“मैं आत्मा हूँ।” इसके बाद परमात्मा के सत्य परिचय और सृष्टि-चक्र में अपने पार्ट को जानना आवश्यक है।
प्रश्न 5: सत्यता की शक्ति कब सदा बनी रहती है?
उत्तर: जब अपने सत्य स्वरूप और बाप के सत्य स्वरूप की स्मृति रहती है, तब सत्यता की शक्ति सदा बनी रहती है और संकल्प भी शक्तिशाली तथा सत्य होते हैं।
प्रश्न 6: क्या केवल झूठ न बोलना ही सत्यता है?
उत्तर: नहीं। व्यक्ति झूठ न बोले, फिर भी यदि उसके संकल्प, बोल, कर्म और व्यवहार में दिव्यता नहीं है, तो उसे सम्पूर्ण सत्यता नहीं कहा जा सकता।
प्रश्न 7: “सच तो नाच” का क्या अर्थ है?
उत्तर: सच्चा व्यक्ति सदा खुशी में रहता है। सत्यता की शक्ति जीवन में होगी तो चेहरे और चलन में खुशी और दिव्यता दिखाई देगी।
प्रश्न 8: सत्यता के मार्ग में सहनशक्ति क्यों आवश्यक है?
उत्तर: सत्यता की शक्ति धारण करने के लिए कई परिस्थितियों में सहन करना, झुकना और परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह बाहरी रूप से हार जैसा लग सकता है, लेकिन वास्तव में यही सदा की विजय का आधार बनता है।
प्रश्न 9: चतुराई से चलने के बजाय क्या करना चाहिए?
उत्तर: चतुराई का सहारा लेने के बजाय सहनशक्ति धारण करके असत्य का सामना करना चाहिए और सत्यता से आगे बढ़ना चाहिए।
प्रश्न 10: “Follow Father” का क्या अर्थ है?
उत्तर: साकार कर्मों में ब्रह्मा बाप को आगे रखकर उनका अनुसरण करना और अशरीरी बनने में निराकार बाप को फॉलो करना है।
प्रश्न 11: पवित्रता, सत्यता और दिव्यता का आपस में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर: पवित्रता सत्यता का फाउण्डेशन है और सत्यता की शक्ति का प्रैक्टिकल स्वरूप दिव्यता है। इसलिए जीवन में तीनों को धारण करना आवश्यक है।
प्रश्न 12: दिव्यता का अर्थ क्या है?
उत्तर: दिव्यता अर्थात् दिव्य गुणों के आधार पर संकल्प करना, बोलना और कर्म करना।
प्रश्न 13: एक सेकण्ड में अशरीरी बनने का अभ्यास कैसे करें?
उत्तर: एक संकल्प करें—“मैं अशरीरी आत्मा हूँ।” इस अभ्यास को दिन में बार-बार करने से धीरे-धीरे अशरीरी अवस्था नेचुरल बन सकती है।
प्रश्न 14: अशरीरी बनने की ड्रिल कितनी बार करनी चाहिए?
उत्तर: जितनी बार सम्भव हो, दिन में बीच-बीच में यह अभ्यास करना चाहिए। एक मिनट या आधा मिनट भी मिले तो अभ्यास किया जा सकता है।
प्रश्न 15: शरीर का आधार लेते समय क्या स्मृति रखनी है?
उत्तर: यह स्मृति रखनी है कि “मैं आत्मा अलग हूँ और शरीर मेरा आधार है।” शरीर से कार्य करते हुए भी स्वयं को कराने वाली चेतन सत्ता समझना है।
प्रश्न 16: दूसरों की कॉपी करने से क्या नुकसान हो सकता है?
उत्तर: अल्पकाल के नाम, मान और शान के लिए दूसरों की कॉपी करने से स्थायी प्रालब्ध नहीं बनती। लक्ष्य होना चाहिए कि बाप के दिल में नम्बर आगे आएँ।
प्रश्न 17: सत्यता और सहनशक्ति से क्या जमा होता है?
उत्तर: परिस्थितियों में सत्यता पर कायम रहते हुए सहन करने से सहनशक्ति खाते में जमा होती है। असत्य का सहारा लेने से यह शक्ति जमा नहीं होती।
प्रश्न 18: आज के संदेश की तीन मुख्य बातें कौन-सी हैं?
उत्तर:
पवित्रता — सत्यता — दिव्यता।
इन तीनों को मन, वचन और कर्म में धारण करना ही संदेश का मुख्य सार है।
प्रश्न 19: सत्यता की शक्ति से जीवन में क्या परिवर्तन आता है?
उत्तर: सत्यता की शक्ति से व्यक्ति परिस्थितियों में निर्भय रहता है, सहनशक्ति बढ़ाता है और उसके चेहरे, चलन, संकल्प और कर्म में दिव्यता दिखाई देने लगती है।
प्रश्न 20: इस संदेश का मुख्य अभ्यास क्या है?
उत्तर: अपने सत्य स्वरूप को याद रखना, पवित्रता को मजबूत करना, सत्यता की शक्ति धारण करना, दिव्य गुणों से कर्म करना और हर परिस्थिति में Follow Father का अभ्यास करना।
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