Part-3 (18): “Not Reaction, but the Science of Response.”

RVS.भाग -3(18)“प्रतिक्रिया नहीं, Response का विज्ञान”।

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

अध्याय 18 — प्रतिक्रिया नहीं, Response का विज्ञान

1. जीवन परिवर्तन का तीसरा चरण

राजयोग वैज्ञानिक सिद्धांत के “जीवन परिवर्तन का विज्ञान” भाग में यह 18वाँ विषय है।

इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न बहुत सरल है—

“जब कोई हमारे साथ कुछ करता है, तो हम तुरंत Reaction क्यों करते हैं, और क्या हम उसके स्थान पर श्रेष्ठ Response देना सीख सकते हैं?”

जीवन में परिस्थिति हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलेगी।

कोई प्रशंसा करेगा।
कोई आलोचना करेगा।
कोई सम्मान देगा।
कोई अपमान करेगा।
कोई हमारी अपेक्षा पूरी करेगा।
कोई हमारी अपेक्षा तोड़ देगा।

लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि—

“दूसरे क्या करेंगे?”

प्रश्न यह है—

“मैं क्या बनकर Response दूंगा?”


2. Reaction क्या है?

Reaction यानी प्रतिक्रिया—बिना पर्याप्त विराम और विचार के, भावना या पुराने संस्कार के प्रभाव में तुरंत किया गया व्यवहार।

उदाहरण

किसी ने कहा—

“आपका काम ठीक नहीं है।”

मन में तुरंत विचार आया—

“यह मुझे नीचा दिखा रहा है।”

भावना बनी—

“मुझे गुस्सा आ रहा है।”

और तुरंत उत्तर—

“पहले अपना काम देखिए!”

यह Reaction है।


3. Response क्या है?

Response का अर्थ है—

रुकना → समझना → विचार करना → निर्णय लेना → उत्तर देना।

उसी परिस्थिति में—

“आपने जो बात कही है, उसे मैं समझना चाहता हूं। कृपया बताइए कि किस हिस्से में सुधार की आवश्यकता है।”

यह Response है।

परिस्थिति वही है।

व्यक्ति वही है।

लेकिन स्थिति बदल गई।


4. Reaction क्यों होती है?

Reaction के पीछे कई कारण हो सकते हैं—

① ज्ञान का अभाव

जब परिस्थिति को सही दृष्टिकोण से देखने की समझ कम होती है, तो हम पुराने तरीके से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

② धैर्य की कमी

हम उत्तर देने से पहले रुक नहीं पाते।

③ सहनशक्ति की कमी

छोटी चुनौती भी भीतर बड़ी हलचल पैदा कर देती है।

④ पुराने संस्कार

क्रोध का संस्कार मजबूत हो तो छोटी बात भी Trigger बन सकती है।


5. असली Trigger बाहर है या अंदर?

राजयोग के दृष्टिकोण से एक गहरा आत्मचिंतन है—

दूसरा व्यक्ति परिस्थिति बन सकता है, लेकिन मेरी प्रतिक्रिया मेरे संस्कारों से जुड़ी है।

एक ही शब्द दो लोगों से कहा जाए—

व्यक्ति A

तुरंत क्रोधित।

व्यक्ति B

शांत होकर सुनता है।

यदि शब्द और परिस्थिति समान थे, तो परिणाम अलग क्यों?

क्योंकि अंदर की स्थिति अलग थी।


6. Reaction बनने की प्रक्रिया

इसे सरल रूप में समझें—

परिस्थिति

विचार

भावना

निर्णय

कर्म

उदाहरण—

किसी ने आलोचना की।

विचार:

“यह मेरा अपमान है।”

भावना:

क्रोध।

निर्णय:

“मुझे इसे जवाब देना है।”

कर्म:

ऊंची आवाज में उत्तर।

यही Reaction का चक्र है।

लेकिन इस चक्र में यदि STOP आ जाए, तो पूरा परिणाम बदल सकता है।


7. Emotional Regulation — वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक मनोविज्ञान में भावनात्मक नियमन का व्यापक अर्थ भावनाओं को पहचानने, समझने और परिस्थितियों के अनुरूप अपने व्यवहार को व्यवस्थित करने की क्षमता से जुड़ा है।

यह भावनाओं को दबाना मात्र नहीं है।

सरल भाषा में—

भावना को पहचानो, समझो और उसके अनुसार विवेकपूर्ण व्यवहार चुनो।

राजयोग की भाषा में इसे आत्म-स्मृति, बुद्धि, योग और श्रेष्ठ संस्कारों के अभ्यास से जोड़ा जा सकता है।


8. राजयोग का मूल सिद्धांत — परिस्थिति नहीं, स्थिति बदलो

परिस्थिति को हमेशा हम नियंत्रित नहीं कर सकते।

लेकिन अपनी स्व-स्थिति को शक्तिशाली बनाने का अभ्यास कर सकते हैं।

मुरली नोट — 17 अप्रैल 1969

ब्रह्माकुमारी मुरली पोर्टल के अनुसार 17 अप्रैल 1969 की अव्यक्त मुरली “पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं” शीर्षक से सूचीबद्ध है और परिस्थितियों/समस्याओं के संदर्भ में स्व-स्थिति और पुरुषार्थ पर बल देती है।

इस अध्याय के लिए इसका व्यावहारिक संदेश:

परिस्थिति को आधार बनाकर अपनी स्थिति कमजोर न करें। अपनी श्रेष्ठ स्थिति से परिस्थिति का सामना करें।


9. “फुल स्टॉप” — Response की शुरुआत

जब कोई ऐसी बात कह दे जिससे आपको तुरंत गुस्सा आए—

रुकिए।

मन को आगे की कहानी बनाने से रोकिए।

“उसने ऐसा क्यों कहा?”
“मैं उसे सबक सिखाऊंगा।”
“मैं भी उसे जवाब दूंगा।”

इन विचारों को आगे बढ़ाने के बजाय—

फुल स्टॉप।

फिर आत्म-स्मृति—

“मैं आत्मा हूं।”

फिर—

“बाबा को याद करना है।”

फिर—

“अब श्रेष्ठ उत्तर क्या होगा?”

मुरली नोट — 23 दिसंबर 1993

23 दिसंबर 1993 की मुरली आधिकारिक पोर्टल पर “पवित्रता के दृढ़ व्रत द्वारा वृत्ति का परिवर्तन” शीर्षक से उपलब्ध है और इसी तिथि को “बिन्दु/पॉइंट” तथा वृत्ति-परिवर्तन के संदर्भ में जोड़ा जा सकता है।


10. STOP — CHECK — CHANGE

यह अध्याय का सबसे व्यावहारिक अभ्यास है।

 STOP — रुकिए

तुरंत प्रतिक्रिया मत दीजिए।

 CHECK — जाँचिए

अपने आप से पूछिए—

  • मैं अभी क्या सोच रहा हूं?
  • मेरे अंदर कौन-सी भावना है?
  • कौन-सा संस्कार सक्रिय है?
  • क्या मेरा विचार श्रेष्ठ है?
  • क्या मेरा उत्तर श्रीमत के अनुरूप होगा?

 CHANGE — बदलें

यदि विचार या भावना श्रेष्ठ दिशा में नहीं है—

विचार बदलें।
वाणी बदलें।
Response बदलें।

मुरली नोट — 31 दिसंबर 1992

आधिकारिक मुरली पोर्टल पर 31 दिसंबर 1992 की मुरली “सफलता प्राप्त करने का साधन – सब कुछ सफल करो” शीर्षक से सूचीबद्ध है और संकल्पों/सफलता के अभ्यास से संबंधित है।


11. “5 सेकंड” का अभ्यास

मान लीजिए किसी ने आपको अपमानित किया।

पहला विकल्प—

तुरंत उत्तर।

दूसरा विकल्प—

कुछ क्षण रुकना।

इन क्षणों में—

“मैं आत्मा हूं।”
“मैं शांत हूं।”
“मुझे प्रतिक्रिया नहीं, श्रेष्ठ उत्तर देना है।”

महत्वपूर्ण नोट

यहाँ 5 सेकंड को एक व्यावहारिक प्रशिक्षण-अभ्यास के रूप में समझें, न कि किसी निश्चित वैज्ञानिक नियम के रूप में।

मुरली परंपरा में सेकण्ड में फुल स्टॉप और मन को बीच-बीच में रोकने/देखने के अभ्यास पर भी बल मिलता है।

आधिकारिक मुरली पोर्टल पर 30 मार्च 2000 की मुरली में “5 सेकेण्ड भी निकाल कर मन की एक्सरसाइज” करने का संदर्भ सूचीबद्ध है।


12. उदाहरण — घर में बच्चा गलती कर दे

Reaction

बच्चे ने गलती की।

माता-पिता तुरंत—

“तुमसे कुछ ठीक नहीं होता!”

बच्चा भी प्रतिक्रिया कर सकता है।

तनाव बढ़ सकता है।

Response

“गलती हो गई। अब इसे कैसे ठीक करें?”

गलती भी समझाई।

बच्चे को सीख भी मिली।

संबंध भी सुरक्षित रहा।

आत्मचिंतन

मेरे चिल्लाने से गलती कम होगी या केवल तनाव बढ़ेगा?


13. उदाहरण — ऑफिस में आलोचना

कोई कहता है—

“आपकी रिपोर्ट में कई गलतियां हैं।”

Reaction

“आपको मेरे काम की कोई समझ नहीं है!”

Response

“ठीक है, कृपया वे बिंदु बताइए जिन्हें मुझे सुधारना चाहिए।”

फिर तथ्य देखिए।

यदि आलोचना सही है—सुधारिए।

यदि गलत है—शांतिपूर्वक तथ्य रखिए।


14. उदाहरण — परिवार में अपेक्षा पूरी नहीं हुई

आपने किसी से अपेक्षा की थी।

अपेक्षा पूरी नहीं हुई।

Reaction

  • नाराजगी
  • ताना
  • मौन
  • दूरी

Response

संवाद।

“मेरी यह अपेक्षा थी। आपकी परिस्थिति क्या थी, मुझे समझाइए।”

यह संबंध को संघर्ष से संवाद की ओर ले जाता है।


15. सम्मान और अपमान — दोनों में संतुलन

एक महत्वपूर्ण अभ्यास यह भी है कि—

अपमान मिलने पर तुरंत क्रोध न हो।

लेकिन दूसरी ओर—

प्रशंसा मिलने पर अहंकार भी न बढ़े।

यदि बाहरी व्यक्ति की प्रशंसा से मेरा मन बहुत ऊपर और आलोचना से बहुत नीचे चला जाता है, तो मेरी आंतरिक स्थिति बाहरी परिस्थिति से प्रभावित हो रही है।

राजयोगी का अभ्यास है—

स्वमान में स्थिर रहना।

मुरली नोट — 25 नवंबर 2000

आधिकारिक पोर्टल पर 25 नवंबर 2000 की मुरली का विषय है—“बाप समान बनने के लिए दो बातों की दृढ़ता रखो – स्वमान में रहना है और सबको सम्मान देना है।”


16. “मैं आत्मा हूं” — आंतरिक Pause

Response देने से पहले स्वयं को याद दिलाएं—

मैं आत्मा हूं।

फिर—

यह मेरा शरीर है।

फिर—

मैं अपने विचारों को देख सकता हूं।

फिर—

मुझे किस संस्कार को व्यक्त करना है?

फिर—

बाबा की श्रीमत के अनुसार श्रेष्ठ उत्तर क्या है?

यही अभ्यास Reaction को Response में बदलने का माध्यम बन सकता है।


17. मन का मालिक कौन?

राजयोग में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है—

स्वराज्य अधिकारी बनना।

मन मेरा मालिक नहीं।

मैं आत्मा मालिक हूं।

मन मेरा सहयोगी है।

बुद्धि मेरा निर्णय लेने का साधन है।

संस्कारों को पहचानना और श्रेष्ठ संस्कारों को मजबूत करना मेरा पुरुषार्थ है।

मुरली नोट — 9 जनवरी 1996

आधिकारिक मुरली पोर्टल पर 9 जनवरी 1996 की मुरली का विषय है—

“बालक सो मालिकपन के नशे में रहने के लिए मन का राजा बनो।”

इस अध्याय के संदर्भ में इसका सार:

मन को चलाने वाला बनो, मन से चलने वाला नहीं।


18. बुद्धि, भावना और संस्कार

एक प्रश्न—

क्या भावना मेरी बुद्धि की मालिक है?

या—

मेरी बुद्धि भावनाओं को दिशा देती है?

राजयोग की दृष्टि से विषय इससे भी गहरा है।

हमारी बुद्धि पर—

  • ज्ञान,
  • संग,
  • संस्कार,
  • अनुभव,
  • विचारों

का प्रभाव पड़ता है।

इसलिए श्रेष्ठ Response के लिए केवल उस क्षण की भावना को बदलना पर्याप्त नहीं।

संग बदलना होगा।

संकल्प बदलने होंगे।

संस्कारों पर पुरुषार्थ करना होगा।


19. संस्कार परिवर्तन का अभ्यास

पुराना संस्कार सक्रिय हुआ।

पहले—

“मैं ऐसा ही हूं।”

यह सोचने के बजाय—

“यह मेरा पुराना संस्कार है; मैं इसे बदलने का अभ्यास कर सकता हूं।”

फिर STOP–CHECK–CHANGE।

बार-बार श्रेष्ठ चुनाव करने से श्रेष्ठ व्यवहार को अभ्यास का हिस्सा बनाया जा सकता है।

मुरली नोट — 15 मार्च 1999

आधिकारिक पोर्टल पर 15 मार्च 1999 की मुरली का विषय है—“कर्मातीत अवस्था तक पहुँचने के लिए कन्ट्रोलिंग पॉवर को बढ़ाओ, स्वराज्य अधिकारी बनो।”

यह अध्याय के Self-Control और स्वराज्य वाले हिस्से के लिए उपयुक्त मुरली-संदर्भ है।


20. क्या लोग मेरे पास शांति अनुभव करते हैं?

यह अध्याय हमें एक बहुत गहरा प्रश्न देता है—

“क्या लोग मेरे पास आकर शांति अनुभव करते हैं?”

केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि—

“दूसरे मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं?”

यह भी देखना है—

“मेरे व्यवहार से दूसरे क्या अनुभव करते हैं?”

क्या मेरी वाणी—

शांति देती है?

क्या मेरी दृष्टि—

सम्मान देती है?

क्या मेरी उपस्थिति—

सुरक्षा और सहयोग देती है?


21. पाँच श्रेष्ठ दैनिक अभ्यास

अभ्यास 1 — सुबह का संकल्प

सुबह स्वयं से कहें—

“मैं परिस्थितियों का दास नहीं हूं। मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा हूं।”

“मैं Reaction नहीं, श्रेष्ठ Response दूंगा।”


अभ्यास 2 — प्रतिक्रिया से पहले Pause

कोई Trigger आए—

STOP.

कुछ क्षण रुकें।

आत्म-स्मृति।

फिर उत्तर।


अभ्यास 3 — दिन के लिए मानसिक तैयारी

सुबह सोचें—

आज परिवार में, ऑफिस में, समाज में और जिन-जिन आत्माओं से मेरा संपर्क होगा—

“मैं हर आत्मा को सम्मान दूंगा।”


अभ्यास 4 — शाम की Check

रात को स्वयं से पूछें—

आज कहाँ Reaction हुआ?

कहाँ Response दिया?

कौन-सा संस्कार सक्रिय हुआ?

अगली बार क्या बदलना है?


अभ्यास 5 — मन की Exercise

दिन के बीच में भी कुछ क्षण निकालकर स्वयं को Check करें—

“अभी मेरे मन में क्या चल रहा है?”

आधिकारिक मुरली सूची में 30 मार्च 2000 की मुरली विशेष रूप से बीच-बीच में कुछ सेकण्ड निकालकर मन की “एक्सरसाइज” करने का उल्लेख करती है।


22. मुरली का गहरा संदेश — स्वराज्य

राजयोग का उद्देश्य केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलना नहीं है।

पहले—

स्वयं पर राज्य।

फिर—

विचारों पर नियंत्रण।
वाणी में शांति।
कर्म में श्रेष्ठता।
संस्कारों में परिवर्तन।

यही स्वराज्य का अभ्यास है।


23. परिस्थिति मुझे चलाएगी या मैं परिस्थिति को संभालूंगा?

दो विकल्प हैं—

विकल्प A

परिस्थिति → मेरी स्थिति तय करे।

विकल्प B

मेरी श्रेष्ठ स्थिति → परिस्थिति का सामना करे।

पहले विकल्प में—

मैं परिस्थिति का दास हूं।

दूसरे में—

मैं स्वराज्य अधिकारी हूं।


24. Reaction से Response तक की यात्रा

इसे एक सरल सूत्र में याद रखें—

Trigger

कोई घटना हुई।

STOP

तुरंत मत बोलो।

SELF

मैं आत्मा हूं।

CHECK

मेरे अंदर क्या चल रहा है?

SHRIMAT

श्रेष्ठ मार्ग क्या है?

RESPONSE

अब उत्तर दो।


25. अंतिम निष्कर्ष

दूसरे लोग हमारे जीवन में घटनाएं ला सकते हैं।

लेकिन—

उन घटनाओं के प्रति हमारा Response हमारे पुरुषार्थ का क्षेत्र है।

Reaction कहता है—

“उसने ऐसा किया, इसलिए मैंने ऐसा किया।”

Response कहता है—

“उसने जो किया, वह उसकी स्थिति है; मैं क्या करूंगा, यह मेरी स्थिति और मेरा चुनाव है।”

प्रश्न–उत्तर | Raj Yoga Scientific Principles

प्रश्न 1. राजयोग वैज्ञानिक सिद्धांत का अध्याय 18 किस विषय पर आधारित है?

उत्तर: अध्याय 18 का विषय है— “प्रतिक्रिया नहीं, Response का विज्ञान।” इसमें Reaction और Response के अंतर तथा परिस्थितियों में अपनी स्थिति को शक्तिशाली बनाने का अभ्यास समझाया गया है।

प्रश्न 2. Reaction और Response में क्या अंतर है?

उत्तर:
Reaction बिना सोचे, भावना के प्रभाव में तुरंत होने वाली प्रतिक्रिया है।
Response सोचकर, समझकर, बुद्धि और मूल्यों के आधार पर दिया गया श्रेष्ठ उत्तर है।

प्रश्न 3. हम Reaction क्यों करते हैं?

उत्तर: इसके प्रमुख कारण हैं— ज्ञान का अभाव, धैर्य की कमी, सहनशक्ति की कमी और पुराने संस्कार।

प्रश्न 4. राजयोग Reaction के मूल कारण को क्या मानता है?

उत्तर: राजयोग के अनुसार केवल दूसरा व्यक्ति हमारी प्रतिक्रिया का कारण नहीं है। हमारी प्रतिक्रिया में हमारे संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 5. Emotional Regulation क्या है?

उत्तर: Emotional Regulation का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें पहचानना, समझना और उचित दिशा में व्यक्त या नियंत्रित करना सीखना है।

प्रश्न 6. राजयोग में परिस्थिति और स्थिति का क्या संबंध है?

उत्तर: परिस्थिति हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होती, लेकिन अपनी स्थिति को शक्तिशाली बनाना हमारे पुरुषार्थ का विषय है। इसलिए संदेश है— “परिस्थिति नहीं, अपनी स्थिति बदलो।”

प्रश्न 7. “फुल स्टॉप” का राजयोग में क्या अर्थ है?

उत्तर: घटना होते ही तुरंत प्रतिक्रिया न देकर एक क्षण रुकना, व्यर्थ विचारों को रोकना और आत्म-स्मृति में आना—इसे फुल स्टॉप के अभ्यास के रूप में समझा जा सकता है।

प्रश्न 8. फुल स्टॉप के बाद क्या करना चाहिए?

उत्तर: पहले स्वयं को आत्मा समझना, बाबा को याद करना, अपने विचारों को Check करना और फिर श्रीमत के अनुसार श्रेष्ठ निर्णय लेकर Response देना चाहिए।

प्रश्न 9. “मैं आत्मा हूं” की स्मृति Response में कैसे मदद करती है?

उत्तर: आत्म-स्मृति हमें परिस्थिति और भावना से थोड़ा अलग होकर देखने की शक्ति देती है। इससे बुद्धि को शांत होकर श्रेष्ठ निर्णय लेने का अवसर मिलता है।

प्रश्न 10. Reaction कैसे बनती है?

उत्तर: सामान्य रूप से इसे इस क्रम में समझ सकते हैं:

परिस्थिति → विचार → भावना → निर्णय → कर्म → प्रतिक्रिया

यदि बीच में जागरूकता और विराम आ जाए, तो यही प्रक्रिया श्रेष्ठ Response में बदल सकती है।

प्रश्न 11. यदि किसी के अंदर क्रोध का संस्कार है तो क्या होगा?

उत्तर: छोटी परिस्थिति भी उसे जल्दी विचलित कर सकती है और वह तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है।

प्रश्न 12. यदि धैर्य और सहनशीलता का संस्कार है तो क्या होगा?

उत्तर: बड़ी परिस्थिति में भी व्यक्ति शांत रह सकता है और सोच-समझकर उचित Response दे सकता है।

प्रश्न 13. STOP–CHECK–CHANGE का क्या अर्थ है?

उत्तर:
STOP — रुकिए।
CHECK — अपने विचार और भावना को देखिए।
CHANGE — यदि आवश्यक हो तो विचार और प्रतिक्रिया को श्रेष्ठ दिशा में बदल दीजिए।

प्रश्न 14. पाँच सेकंड का अभ्यास क्यों उपयोगी बताया गया है?

उत्तर: किसी Trigger के तुरंत बाद कुछ क्षण रुकने से स्वचालित Reaction को रोकने और सोच-समझकर Response चुनने का अवसर मिलता है। इसे एक व्यावहारिक अभ्यास के रूप में समझना चाहिए, न कि कोई निश्चित वैज्ञानिक समय-सीमा।

प्रश्न 15. यदि कोई हमारा अपमान करे तो Reaction क्या होगी?

उत्तर: तुरंत क्रोधित होना, ऊंची आवाज में जवाब देना, बहस करना या बदला लेने की भावना रखना Reaction हो सकता है।

प्रश्न 16. उसी परिस्थिति में Response क्या होगा?

उत्तर: शांत रहना, पहले परिस्थिति को समझना, आत्म-स्मृति में आना, तथ्य देखना और आवश्यकता के अनुसार सम्मानपूर्वक उत्तर देना Response है।

प्रश्न 17. यदि कोई हमारी प्रशंसा करे तो क्या अत्यधिक खुश होना भी Reaction हो सकता है?

उत्तर: हां। यदि हमारी आंतरिक स्थिति पूरी तरह बाहरी प्रशंसा या सम्मान पर निर्भर हो जाए, तो वह भी बाहरी परिस्थिति से प्रभावित प्रतिक्रिया हो सकती है।

प्रश्न 18. बच्चे के गलती करने पर Reaction और Response क्या होंगे?

उत्तर:
Reaction: तुरंत चिल्लाना।
Response: शांत होकर गलती समझाना और उसे सुधारने का अवसर देना।

प्रश्न 19. ऑफिस में आलोचना होने पर श्रेष्ठ Response क्या होगा?

उत्तर: तुरंत बहस करने के बजाय शांत होकर आलोचना को सुनना, तथ्य देखना और आवश्यक हो तो स्पष्ट एवं सम्मानपूर्ण उत्तर देना।

प्रश्न 20. परिवार में किसी ने अपेक्षा पूरी नहीं की तो क्या करना चाहिए?

उत्तर: नाराजगी और ताने के बजाय संवाद करना चाहिए—अपनी अपेक्षा स्पष्ट करें और सामने वाले की परिस्थिति को भी समझने का प्रयास करें।

प्रश्न 21. क्या हम अपने संस्कार बदल सकते हैं?

उत्तर: राजयोग के अभ्यास के अनुसार आत्म-जागरूकता, ज्ञान, श्रेष्ठ संग, योग और बार-बार सही चुनाव करने से संस्कारों को बदलने और श्रेष्ठ संस्कारों को मजबूत करने का पुरुषार्थ किया जा सकता है।

प्रश्न 22. “मन का मालिक बनो” का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि मन हमारी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित न करे। आत्मा को अपने मन, बुद्धि और संस्कारों पर स्वराज्य का अभ्यास करना है।

प्रश्न 23. बुद्धि और संस्कारों का क्या संबंध है?

उत्तर: हमारे संस्कार और संग हमारी सोच और निर्णयों को प्रभावित करते हैं। साथ ही जागरूक बुद्धि के अभ्यास से संस्कारों को पहचानने और उन्हें बदलने का पुरुषार्थ भी किया जा सकता है।

प्रश्न 24. राजयोग का उद्देश्य क्या केवल दुनिया को बदलना है?

उत्तर: नहीं। राजयोग का प्रमुख अभ्यास स्वयं को बदलना है। जब हमारी दृष्टि, स्थिति और प्रतिक्रिया बदलती है, तो हमारे संबंध और जीवन के अनुभव भी बदलने लगते हैं।

प्रश्न 25. क्या दूसरे लोग हमारी प्रतिक्रिया तय करते हैं?

उत्तर: वे परिस्थिति उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन उस परिस्थिति में हमारा Response चुनना हमारे पुरुषार्थ का क्षेत्र है।

प्रश्न 26. Reaction किसका परिणाम है?

उत्तर: इस अध्याय की भाषा में Reaction को कमजोर या पुराने संस्कारों की स्वतः प्रतिक्रिया के रूप में समझाया गया है।

प्रश्न 27. Response किसकी पहचान है?

उत्तर: Response को जागरूक आत्मा, आत्म-स्मृति और श्रेष्ठ निर्णय की पहचान के रूप में समझाया गया है।

प्रश्न 28. प्रतिदिन सुबह कौन-सा संकल्प किया जा सकता है?

उत्तर:

“मैं परिस्थितियों का दास नहीं हूं। मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा हूं। मैं Reaction नहीं, श्रेष्ठ Response दूंगा। मेरी वाणी शांति का माध्यम होगी।”

प्रश्न 29. दिन के अंत में आत्मचिंतन के लिए कौन-से प्रश्न पूछने चाहिए?

उत्तर:

  • आज मैंने कहाँ Reaction किया?
  • कहाँ मैंने Response दिया?
  • कौन-सा संस्कार सक्रिय हुआ?
  • अगली बार मैं क्या बदल सकता हूं?
  • क्या लोग मेरे संपर्क में शांति अनुभव करते हैं?

प्रश्न 30. इस पूरे अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर:

“परिस्थिति मेरे नियंत्रण में न भी हो, लेकिन अपनी स्थिति और Response को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास मैं कर सकता हूं।”

Reaction में परिस्थिति मालिक बनती है।
Response में आत्मा मालिक बनती है।

 स्मृति मंत्र

“मैं आत्मा हूं।
मैं परिस्थितियों का दास नहीं, स्वराज्य अधिकारी हूं।
मैं रुकूंगा, Check करूंगा और श्रेष्ठ Response चुनूंगा।
Reaction नहीं—श्रेष्ठ Response।”

Disclaimer | अस्वीकरण

यह वीडियो शिक्षा, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक अध्ययन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।

इस अध्याय में Emotional Regulation अर्थात् भावनात्मक संतुलन की आधुनिक मनोवैज्ञानिक अवधारणा को ब्रह्माकुमारी राजयोग एवं मुरली की शिक्षाओं के संदर्भ में समझाया गया है।

आधुनिक मनोविज्ञान और राजयोग की भाषा, पद्धति तथा मूल धारणाएं अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए इस वीडियो में दोनों के बीच विचारात्मक एवं अध्ययनात्मक संवाद प्रस्तुत किया गया है, न कि यह दावा कि आध्यात्मिक अवधारणाएं आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रमाणित विकल्प हैं।

यह सामग्री किसी चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक या वैज्ञानिक उपचार का विकल्प नहीं है। मानसिक या भावनात्मक स्वास्थ्य से संबंधित गंभीर समस्या होने पर योग्य स्वास्थ्य-विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।

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