(43)17-11-1969/Tips to go from rags to riches

AW.(43)17-11-1969/फर्श से अर्श पर जाने की युक्तियाँ

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“फर्श से अर्श पर जाने की युक्तियाँ”

यहाँ भट्ठी में किसलिए आये हो? देह में रहते विदेही हो रहने के अभ्यास के लिये। जब से यहाँ पाँव रखते हो तब से ही यह स्थिति होनी चाहिए। जो लक्ष्य रखा जाता है उसको पूर्ण करने के लिए अभ्यास और अटेन्शन चाहिए। बापदादा हरेक को नई बात के लिये ही बुलाते हैं। अधर कुमारों को विशेष इसलिए बुलाया है – पहले तो अपना जो गृहस्थ व्यवहार बनाया है उसमें जो उल्टी सीढ़ी चढ़ी है, उस उल्टी सीढ़ी से नीचे उतारने के लिए बुलाया है। और उल्टी सीढ़ी से उतार कर फिर किसमें चढ़ाना है? अर्श से फर्श पर, फिर फर्श से अर्श पर। उल्टी सीढ़ी का कुछ न कुछ जो ज्ञान रहता है, उस ज्ञान से अज्ञानी बनाने के लिये और जो सत्य ज्ञान है उसकी पहचान देकर ज्ञान-स्वरूप बनाने के लिए बुलाया है। पहले उतारना है फिर चढ़ाना है। जब तक पूरे उतरे नहीं हैं तो चढ़ भी नहीं सकते। सभी बातों में अपने को उतारने के लिये तैयार हो? कितनी बड़ी सीढ़ी से उतरना है? उल्टी सीढ़ी कितनी लम्बी है? अभी तक जो पुरुषार्थ किया है, उसमें समझते हो कि पूरी ही सीढ़ी उतरे हैं कि कुछ अभी तक उतर रहे हो? पूरी जब उतर जायेंगे तो फिर चढ़ने में देरी नहीं लगेगी लेकिन उतरते-उतरते कहाँ न कहाँ ठहर जाते हो। तो अब समझा, किस लक्ष्य से बुलाया है? 63 जन्मों में जो कुछ उल्टी सीढ़ी चढ़े हो वह पूरी ही उतरनी पड़े। फिर चढ़ना भी है। उतरना सहज है वा चढ़ना सहज है? उतरना सहज है वा उतरना भी मुश्किल है? अभी आप जो पुरुषार्थ कर रहे हो वह उतर कर चढ़ने का कर रहे हो, कि सिर्फ चढ़ने का कर रहे हो? कुछ मिटा रहे हो कुछ बना रहे हो। दोनों काम चलता है ना। आपको मालूम है लास्ट पौढ़ी (सीढ़ी) कौनसी उतरनी है? इस देह के भान को छोड़ देना है। जैसे कोई शरीर के वस्त्र उतारते हो तो कितना सहज उतारते हो। वैसे ही यह शरीर रूपी वस्त्र भी सहज उतार सको और सहज ही समय पर धारण कर सको। सबको यह अभ्यास पूर्ण रीति से सीखना है। लेकिन कोई-कोई का यह देह अभिमान क्यों नहीं टूटता है? यह देह का चोला क्यों सहज नहीं उतरता है? जिसका वस्त्र तंग, टाइट होता है तो उतार नहीं सकते हैं। यह भी ऐसे ही है। कोई न कोई संस्कारों में अगर यह देह का वस्त्र चिपका हुआ है अर्थात् तंग, टाइट है, तब उतरता नहीं है। नहीं तो उतारना, चढ़ाना वा यह देह रूपी वस्त्र छोड़ना और धारण करना बहुत सहज है। जैसे कि स्थूल वस्त्र उतारना और पहनना सहज होता है। तो यही देखना है कि यह देह रूपी वस्त्र किस संस्कार से लटका हुआ है। जब सभी संस्कारों से न्यारा हो जायेंगे तो फिर अवस्था भी न्यारी हो जायेगी। इसलिए बापदादा भी कई बार समझाते हैं कि सभी बातों में इजी रहो। जब खुद सभी में इजी रहेंगे तो सभी कार्य भी इज़ी होंगे। अपने को टाइट करने से कार्य में भी टाइटनेस आ जाती है। वैसे तो जो इतने समय से पुरुषार्थ में चलने वाले हैं उन्हों को अब बहुत ही कर्तव्य में न्यारापन आना ही चाहिए। अभी इस भट्ठी में जो भी टाइटनेस है वह भी, और जो कुछ उल्टी सीढ़ी की पौढियां रही हुई हैं, वह उतारना भी और फिर लिफ्ट में चढ़ना भी। लेकिन लिफ्ट में बैठने के लिये क्या करना पड़ेगा? लिफ्ट में कौन बैठ सकेंगे?

बाप के लिये सारी दुनिया में लायक बच्चे ही श्रेष्ठ सौगात है। तो लिफ्ट में चढ़ने के लिये बाप की गिफ्ट बनना और फिर जो कुछ है वह भी गिफ्ट में देना पड़ेगा। गिफ्ट देनी भी पड़ेगी और बाप की गिफ्ट बनना भी पड़ेगा तब लिफ्ट में बैठ सकेंगे। समझा? अभी देखना है दोनों काम किये हैं – गिफ्ट भी दी है और गिफ्ट बने भी हैं? गिफ्ट को बहुत सम्भाला जाता है और गिफ्ट को शोकेस में सज़ाकर रखते हैं। जैसी जैसी गिफ्ट वैसी-वैसी शोकेस में आगे-आगे रखते हैं। आप सभी भी अपने आप को ऐसी गिफ्ट बनाओ जो लिफ्ट भी मिल जाये और इस सृष्टि के शोकेस में सभी से आगे आ जाओ। तो शोकेस में सभी से आगे रहने के लिये अधरकुमारों को दो विशेष बातों का ध्यान में रखना पड़ेगा। शोकेस में चीज रखी जाती है, उसमें क्या विशेषता होती है? (अट्रैक्टिव) एक तो अपने को अट्रैक्टिव बनाना पड़ेगा और दूसरा एक्टिव। यह दोनों विशेषताएं खास अधरकुमारों को अपने में भरनी हैं। यह दोनों गुण आ जायेंगे तो फिर और कुछ रहेगा नहीं। कहां-कहां एक्टिव बनने में कमी देखने में आती है। तो इस भट्ठी से विशेष कौनसी छाप लगाकर जायेंगे? यही दो शब्द सुनाया – अट्रैक्टिव और एक्टिव। अगर यह छाप लगाकर जायेंगे तो आपकी एक्टिविटी भी बदली होगी। जितनी-जितनी यह छाप वा ठप्पा पक्का लगाकर जायेंगे उतनी एक्टिविटी भी पक्की और बदली हुई देखने में आयेगी। अगर ठप्पा कुछ ढीला लगाकर जायेंगे तो फिर एक्टिविटी में चेंज नहीं देखने में आयेगी। यह तो सुना था ना – भट्ठी में आना अर्थात् अपना रूप रंग दोनों बदलना है।

भट्ठी में जो चीज आती है, उनकी जो बुराई होती है वह गल जाती है। जो असली रूप है, असली जो कर्तव्य है वह यहाँ से लेकर के जाना। वह कौनसा रूप है? क्या बदलेंगे? अभी रंग बदलते रहते हैं फिर एक ही रंग पक्का चढ़ जायेगा जिसके ऊपर और कोई रंग चढ़ नहीं सकता और जिस रंग को कोई मिटा नहीं सके और न मिट सके, न और कोई रंग चढ़ सके। सभी बातों में एक्टिव होना है। जैसा समय, जैसी सर्विस उसमें एवररेड़ी। कोई भी कार्य आता है, तो एक्टिव जो होता है, उस कार्य को शीघ्र ही समझ कर सफलता को प्राप्त कर लेता है। जो एक्टिव नहीं होते तो पहले कार्य को सोचते रहते हैं। सोचते-सोचते समय भी गवांयेंगे, सफलता भी नहीं होगी। एक्टिव अर्थात् एवररेडी। और वह हर कार्य को परख भी लेगा। उसमें जुट भी जायेगा और सफलता भी पा लेगा। तीनों बातें उसमें होंगी। जिसमें भारीपन होता है उनको एक्टिव नहीं कहा जाता। पुरुषार्थ में भारी, अपने संस्कारों में भारी – उनको एक्टिव नहीं कहा जायेगा। एक्टिव जो होगा वह एवररेडी और इजी होगा। खुद इजी बनने से सब कार्य भी इजी, पुरुषार्थ भी इजी हो जाता है। खुद इजी नहीं बनते तो पुरुषार्थ और सर्विस दोनों इजी नहीं होते, मुश्किलातों का सामना करना पड़ता है। सर्विस मुश्किल नहीं लेकिन अपने संस्कार, अपनी कमजोरियां मुश्किल के रूप में देखने में आती हैं। पुरुषार्थ भी मुश्किल नहीं। अपनी कमजोरियां मुश्किल बना देती हैं। नहीं तो कोई को सहज, कोई को मुश्किल क्यों भासता। अगर मुश्किल ही है तो सभी को सभी बातें मुश्किल हो। लेकिन वही बात कोई को मुश्किल कोई को सहज क्यों? अपनी ही कमजोरियां मुश्किलात के रूप में आती हैं। इसलिये यह दो बातें धारण करनी हैं।

अट्रैक्टिव भी तब बन सकेंगे जब पहले अपने में विशेषताएं होंगी। आकर्षित बनने लिये हर्षित भी रहना पड़ेगा। हर्षित का अर्थ ही है अतीन्द्रिय सुख में झूमना। ज्ञान को सुमिरण करके हर्षित होना। अव्यक्त स्थिति का अनुभव करते अतीन्द्रिय सुख में झूमना। इसको कहा जाता है हर्षित। हर्षित भी मन से और तन से, दोनों से होना है। ऐसा जो हर्षित होता है वही आकर्षित बनता है। प्रकृति और माया के अधीन न होकर दोनों को अधीन करना चाहिए। अधीन हो जाने के कारण अपना अधिकार खो लेते हैं। तो अधीन नहीं होना है, अधीन करना है, तब अपना अधिकार प्राप्त करेंगे और जितना अधिकार प्राप्त करेंगे उतना प्रकृति और लोगों द्वारा सत्कार होगा तो सत्कार कराने लिये क्या करना पड़ेगा? अधीनपन छोड़कर अपना अधिकार रखो। अधिकार रखने से अधिकारी बनेंगे। लेकिन अधिकार छोड़ कर के अधीन बन जाते हो। छोटी-छोटी बातों के अधीन बन जाते हो। अपनी ही रचना के अधीन बन जाते हैं। लौकिक बच्चे तो भले हैं लेकिन अपनी ही रचना अर्थात् संकल्पों के अधीन हो जाते हैं। जैसे लौकिक रचना से अधीन बनते हो वैसे ही अब भी अपनी रचना संकल्पों के भी अधीन बन जाते हो। अपनी रचना कर्मेइन्द्रियों के भी अधीन बन जाते हो। अधीन बनने से ही अपना जन्म सिद्ध अधिकार खो लेते हो ना। तो बच्चे बने और अधिकार हुआ। सर्वदा सुख, शान्ति और पवित्रता का जन्म सिद्ध अधिकार कहते हो ना। अपने आप से पूछो कि बच्चा बना और पवित्रता, सुख, शान्ति का अधिकार प्राप्त किया। अगर अधिकार छूट जाता है तो कोई बात के अधीन बन जाते हो। तो अब अधीनता को छोड़ो, अपने जन्म सिद्ध अधिकार को प्राप्त करो। यह जो कहते हो कब प्रभाव निकलेगा? यह प्रभाव भी क्यों नहीं निकलता कारण क्या? क्योंकि अब तक कई बातों में खुद ही प्रभावित होते रहते हो। तो जो खुद प्रभावित होता रहता है उसका प्रभाव नहीं निकलता। प्रभाव चाहते हो तो इन सभी बातों में प्रभावित नहीं होना। फिर देखो, कितना जल्दी प्रभाव निकलता है। अपनी एक्टिविटी से अन्दाजा निकाल सकते हो। ऐसा सौभाग्य सारे कल्प में एक ही बार मिलता है। सतयुग में भी लौकिक बाप के साथ रहेंगे। पारलौकिक बाप के साथ नहीं। 84 जन्मों में कितना श्रृंगार किया होगा। भिन्न-भिन्न प्रकार के बहुत श्रृंगार किये? बापदादा का स्नेह यही है कि बच्चों को श्रृंगार कर शोकेस में सृष्टि के सामने लायें। जब सभी सम्पूर्ण बनकर शोकेस अर्थात् विश्व के सामने आयेंगे तो कितने सजे हुए होंगे। सतयुग का श्रृंगार नहीं। गुणों के गहने धारण करने हैं।

फर्श से अर्श पर जाने की युक्तियाँ

Floor से Throne तक — देह-अभिमान से विदेही स्थिति की ओर

 मुरली नोट्स: 04-09-2026
स्थान: मधुबन
विषय: विदेही स्थिति, उल्टी सीढ़ी से उतरना, अट्रैक्टिव और एक्टिव बनना, जन्म-सिद्ध अधिकार और गुणों का श्रृंगार


 अध्याय 1 — भट्ठी में आने का वास्तविक उद्देश्य

भट्ठी में आने का उद्देश्य केवल कुछ दिन साथ रहना या वातावरण का अनुभव करना नहीं है। मुख्य लक्ष्य है—

“देह में रहते हुए विदेही बनने का अभ्यास।”

जैसे ही भट्ठी में कदम रखते हैं, उसी समय से अपनी स्थिति पर अटेन्शन देना है।

Example:

जैसे कोई विद्यार्थी परीक्षा में प्रथम आने का लक्ष्य रखता है, तो केवल लक्ष्य लिखना पर्याप्त नहीं। उसे रोज अभ्यास करना पड़ता है।

उसी प्रकार विदेही बनने का लक्ष्य + निरन्तर अभ्यास + अटेन्शन = श्रेष्ठ अवस्था।


 अध्याय 2 — उल्टी सीढ़ी से पहले उतरना है

बापदादा समझाते हैं कि अधर कुमारों ने गृहस्थ व्यवहार में अनेक प्रकार की उल्टी सीढ़ियाँ चढ़ी हैं।

अब पहले उस उल्टी सीढ़ी से नीचे उतरना है, फिर फर्श से अर्श की ओर चढ़ना है।

अर्थात्—

पहले मिटाना है → फिर बनाना है।

जब तक पुरानी अवस्था और पुराने संस्कारों से पूरी तरह नीचे नहीं उतरेंगे, तब तक ऊँची अवस्था पर चढ़ना कठिन रहेगा।

 Example:

यदि कोई व्यक्ति सीढ़ी पर गलत दिशा में चढ़ गया है और अब सही मंजिल तक पहुँचना चाहता है, तो पहले गलत रास्ते से वापस उतरना पड़ेगा।

इसी प्रकार पुराने संस्कारों, देह-अभिमान और कमजोरियों से नीचे उतरना आवश्यक है।


 अध्याय 3 — देह रूपी वस्त्र को सहज उतारना

मुरली में बहुत सुंदर उदाहरण दिया गया है—जैसे शरीर के वस्त्र को सहज उतारते और पहनते हैं, वैसे ही देह-अभिमान से न्यारे होकर शरीर रूपी वस्त्र को सहज धारण और त्याग करने का अभ्यास करना है।

देह-अभिमान क्यों नहीं टूटता?

क्योंकि कोई न कोई संस्कार इस देह रूपी वस्त्र को टाइट करके रखता है।

 Example:

यदि कपड़ा बहुत टाइट हो तो उसे उतारना कठिन होता है।

इसी प्रकार यदि किसी संस्कार से आत्मा बहुत जुड़ी हुई है, तो देह-अभिमान छोड़ना कठिन अनुभव होता है।

इसलिए स्वयं से पूछें:

“कौन-सा संस्कार मुझे देह से चिपकाकर रखता है?”


 अध्याय 4 — Easy बनो, कार्य भी Easy होगा

बापदादा बार-बार समझाते हैं—

“सभी बातों में इजी रहो।”

जब हम स्वयं को बहुत टाइट कर लेते हैं, तो कार्य और पुरुषार्थ भी मुश्किल लगने लगता है।

वास्तव में सेवा मुश्किल नहीं होती और पुरुषार्थ भी मुश्किल नहीं होता। हमारी अपनी कमजोरियाँ ही उन्हें मुश्किल बना देती हैं।

 Example:

एक ही परिस्थिति में दो व्यक्ति होते हैं। एक शांत रहकर तुरंत समाधान निकाल लेता है, दूसरा उसी परिस्थिति में बहुत सोचता और परेशान होता रहता है।

अन्तर परिस्थिति में नहीं, स्थिति में है।


 अध्याय 5 — बाप की गिफ्ट बनो

बाप के लिए सारी दुनिया में लायक बच्चे ही श्रेष्ठ सौगात हैं।

इसलिए लिफ्ट में चढ़ने के लिए दो बातें आवश्यक हैं—

1️⃣ अपना सब कुछ गिफ्ट में देना

2️⃣ स्वयं बाप की गिफ्ट बन जाना

जब आत्मा स्वयं को बाप के हवाले करती है और अपनी विशेषताओं को विश्व सेवा में लगाती है, तब वह श्रेष्ठ सौगात बनती है।

 Example:

जैसे कोई मूल्यवान गिफ्ट बहुत सम्भालकर शोकेस में रखी जाती है, वैसे ही आत्मा को अपने गुणों से इतना श्रेष्ठ बनाना है कि वह विश्व के सामने आकर्षण का केन्द्र बने।


 अध्याय 6 — शोकेस में आगे आने के दो गुण

बापदादा विशेष रूप से दो शब्दों पर अटेन्शन दिलाते हैं—

ATTRACTIVE + ACTIVE

 ATTRACTIVE — आकर्षक

आकर्षक बनने के लिए केवल बाहरी रूप नहीं, बल्कि गुणों का श्रृंगार आवश्यक है।

हर्षित रहना, ज्ञान का सुमिरण करना और अतीन्द्रिय सुख में झूमना आत्मा को आकर्षक बनाता है।

 ACTIVE — एक्टिव

एक्टिव अर्थात्—

Ever Ready + कार्य को परखना + तुरंत जुट जाना + सफलता प्राप्त करना।

जो एक्टिव होता है वह कार्य को केवल सोचता नहीं रहता, बल्कि समय के अनुसार तुरंत कदम उठाता है।

 Example:

दो सेवाधारी हैं। एक कार्य मिलने पर लगातार सोचता रहता है कि कैसे करें। दूसरा स्थिति को समझकर तुरंत तैयारी शुरू कर देता है।

दूसरा सेवाधारी Active और Ever Ready है।


 अध्याय 7 — एक्टिव अर्थात् Ever Ready

सच्चा एक्टिव व्यक्ति तीन विशेषताएँ रखता है:

1. कार्य को परखता है।
2. कार्य में जुट जाता है।
3. सफलता प्राप्त करता है।

भारीपन एक्टिवनेस को कम करता है।

इसलिए पुरुषार्थ में भी हल्कापन चाहिए और संस्कारों में भी हल्कापन चाहिए।

Easy + Active = Success


 अध्याय 8 — हर्षित रहना ही Attractive बनना है

आकर्षक बनने के लिए बापदादा हर्षित रहने की शिक्षा देते हैं।

हर्षित अर्थात् अतीन्द्रिय सुख में झूमना।

ज्ञान को सुमिरण करके हर्षित होना, अव्यक्त स्थिति का अनुभव करना और मन-तन दोनों से हर्षित रहना—यही वास्तविक आकर्षण है।

 Example:

कुछ लोग बिना कुछ कहे भी अपने शांत, प्रसन्न और सकारात्मक चेहरे से दूसरों को आकर्षित करते हैं।

उनका आकर्षण बाहरी सजावट से नहीं, अन्दर की स्थिति से आता है।


 अध्याय 9 — अधीन नहीं, अधिकारी बनो

बापदादा समझाते हैं—

“अधीन नहीं होना है, अधीन करना है।”

प्रकृति, माया, संकल्पों और कर्मेन्द्रियों के अधीन होकर आत्मा अपना जन्म-सिद्ध अधिकार खो देती है।

बच्चा बनना अर्थात् अधिकार प्राप्त करना।

जन्म-सिद्ध अधिकार:

सुख + शान्ति + पवित्रता

इसलिए स्वयं से पूछें:

“मैं किसी परिस्थिति के अधीन हूँ या अपने अधिकार में स्थित हूँ?”


 अध्याय 10 — प्रभाव चाहिए तो पहले स्वयं प्रभावित होना छोड़ो

कई बार हम चाहते हैं कि हमारी स्थिति का प्रभाव दूसरों पर पड़े।

लेकिन यदि हम स्वयं ही छोटी-छोटी बातों से प्रभावित होते रहते हैं, तो प्रभाव कैसे निकलेगा?

इसलिए—

पहले स्वयं प्रभावित होना बंद करो, फिर तुम्हारा प्रभाव स्वतः दिखाई देगा।

 Example:

यदि कोई व्यक्ति किसी की आलोचना सुनकर तुरंत परेशान हो जाता है, तो वह अभी परिस्थिति से प्रभावित है।

लेकिन जो अपनी श्रेष्ठ स्थिति में स्थिर रहता है, वह परिस्थिति को प्रभावित करता है—परिस्थिति उसे प्रभावित नहीं करती।


 अध्याय 11 — गुणों का श्रृंगार करो

बापदादा का स्नेह है कि बच्चे सृष्टि के सामने श्रेष्ठ गिफ्ट बनकर आएँ।यह श्रृंगार सोने, हीरे या बाहरी आभूषणों का नहीं है।यह है— पवित्रता का गहना
शान्ति का गहना
सुख का गहना
प्रेम का गहना
सहनशीलता का गहना
नम्रता का गहना
ज्ञान का गहना
हर्षित रहने का गहना

सतयुग का बाहरी श्रृंगार नहीं, बल्कि गुणों के गहने धारण करने हैं।


 अध्याय 12 — इस भट्ठी से कौन-सी छाप लेकर जाना है?

इस पूरे संदेश की विशेष छाप है:

ATTRACTIVE & ACTIVE

भट्ठी में आने का अर्थ है—

अपना रूप-रंग बदलना।

जैसे भट्ठी में अशुद्धता गल जाती है और असली रूप सामने आता है, वैसे ही आत्मा को अपनी कमजोरियों और पुराने संस्कारों को समाप्त कर अपने वास्तविक गुणों को प्रकट करना है।

 आज का संकल्प:

“मैं आत्मा हूँ।
मैं देह में रहते विदेही स्थिति का अभ्यास करूँगा/करूँगी।
मैं Easy रहूँगा/रहूँगी।
मैं Attractive और Active बनूँगा/बनूँगी।
मैं प्रकृति और माया के अधीन नहीं, अधिकारी बनूँगा/बनूँगी।
मैं सुख, शान्ति और पवित्रता के अपने जन्म-सिद्ध अधिकार में स्थित रहूँगा/रहूँगी।”


 मुरली का मुख्य सार

फर्श से अर्श पर जाने के लिए पहले उल्टी सीढ़ी से उतरना है।

देह-अभिमान से न्यारे बनना है।
पुराने संस्कारों को छोड़ना है।
Easy और Ever Ready बनना है।
बाप की गिफ्ट बनना है।
Attractive और Active बनना है।
अधीनता छोड़ अधिकारी बनना है।
और अन्त में गुणों का श्रृंगार धारण करके विश्व के सामने श्रेष्ठ स्वरूप बनना है।

अंतिम संदेश

“फर्श से अर्श की यात्रा बाहर की नहीं, अपनी स्थिति को ऊँचा करने की यात्रा है।”

फर्श से अर्श पर जाने की युक्तियाँ — प्रश्न एवं उत्तर

1. भट्ठी में आने का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

उत्तर: भट्ठी में आने का वास्तविक उद्देश्य केवल कुछ दिन साथ रहना या वातावरण का अनुभव करना नहीं, बल्कि देह में रहते हुए विदेही बनने का अभ्यास करना है। इसके लिए अपनी स्थिति पर निरन्तर अटेन्शन देना आवश्यक है।

2. फर्श से अर्श पर जाने से पहले क्या करना है?

उत्तर: सबसे पहले उल्टी सीढ़ी से नीचे उतरना है। अर्थात् देह-अभिमान, पुराने संस्कारों और कमजोरियों को समाप्त करना है। पहले मिटाना है, फिर नया स्वरूप बनाना है।

3. देह-अभिमान को वस्त्र के उदाहरण से कैसे समझाया गया है?

उत्तर: जैसे हम शरीर के वस्त्र को सहज रूप से पहनते और उतारते हैं, वैसे ही आत्मा को देह से न्यारी होकर शरीर रूपी वस्त्र को सहज धारण और त्याग करने का अभ्यास करना है।

4. कौन-सी चीज आत्मा को देह-अभिमान से चिपकाकर रखती है?

उत्तर: कोई न कोई पुराना संस्कार या कमजोरी आत्मा को देह-अभिमान से जोड़े रखती है। इसलिए स्वयं से पूछना चाहिए—“कौन-सा संस्कार मुझे देह से चिपकाकर रखता है?”

5. पुरुषार्थ और सेवा को Easy कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर: स्वयं को हर परिस्थिति में Easy रखना चाहिए। परिस्थिति कठिन होने के बजाय कई बार हमारी अपनी कमजोरियाँ उसे कठिन बना देती हैं। स्थिति हल्की और शांत होगी तो कार्य भी सहज लगेगा।

6. बाप की गिफ्ट बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर: अपना सब कुछ बाप को अर्पित करके अपनी विशेषताओं और गुणों को विश्व सेवा में लगाना ही बाप की श्रेष्ठ गिफ्ट बनना है।

7. Attractive बनने के लिए किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?

उत्तर: वास्तविक आकर्षण बाहरी रूप से नहीं, बल्कि गुणों के श्रृंगार से आता है। हर्षित रहना, ज्ञान का सुमिरण करना और अतीन्द्रिय सुख में झूमना आत्मा को आकर्षक बनाता है।

8. Active का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: Active अर्थात् Ever Ready रहना—कार्य को परखना, समय के अनुसार तुरंत जुट जाना और सफलता प्राप्त करना। केवल सोचते रहना Active होना नहीं है।

9. Active व्यक्ति की तीन विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:

  • कार्य को परखना।
  • कार्य में तुरंत जुट जाना।
  • सफलता प्राप्त करना।

10. Easy और Active का क्या संबंध है?

उत्तर: जब व्यक्ति हल्का और सहज रहता है तो उसकी एक्टिवनेस बढ़ती है। इसलिए Easy + Active = Success कहा जा सकता है।

11. Attractive बनने का सबसे सरल तरीका क्या है?

उत्तर: हर्षित रहना। ज्ञान का सुमिरण करके अतीन्द्रिय सुख में रहना और अपने मन तथा तन से प्रसन्नता प्रकट करना वास्तविक आकर्षण है।

12. “अधीन नहीं होना है, अधीन करना है” का क्या अर्थ है?

उत्तर: आत्मा को प्रकृति, माया, संकल्पों और कर्मेन्द्रियों के अधीन नहीं होना है। अपने जन्म-सिद्ध अधिकार में स्थित होकर अधिकारी बनना है।

13. आत्मा का जन्म-सिद्ध अधिकार क्या है?

उत्तर: आत्मा का जन्म-सिद्ध अधिकार है—सुख, शान्ति और पवित्रता।

14. दूसरों पर प्रभाव डालने से पहले हमें क्या करना चाहिए?

उत्तर: पहले स्वयं प्रभावित होना छोड़ना चाहिए। यदि छोटी-छोटी परिस्थितियाँ और बातें हमें प्रभावित करती रहेंगी, तो हमारा प्रभाव दूसरों पर नहीं पड़ सकेगा।

15. गुणों का श्रृंगार किन गहनों से करना है?

उत्तर: आत्मा को बाहरी आभूषणों के बजाय पवित्रता, शान्ति, सुख, प्रेम, सहनशीलता, नम्रता, ज्ञान और हर्षित रहने के गुणों से सजाना है।

16. भट्ठी से कौन-सी विशेष छाप लेकर जानी है?

उत्तर: भट्ठी से ATTRACTIVE और ACTIVE बनने की छाप लेकर जाना है। अपनी कमजोरियों और पुराने संस्कारों को समाप्त करके वास्तविक गुणों को प्रकट करना है।

17. देह-अभिमान छोड़ने के लिए सबसे पहले क्या पहचानना चाहिए?

उत्तर: सबसे पहले अपनी उन कमजोरियों और संस्कारों को पहचानना चाहिए जो हमें देह और देह-संबंधी बातों से जोड़े रखते हैं। पहचान के बाद उन्हें समाप्त करने का अभ्यास करना चाहिए।

18. फर्श से अर्श की यात्रा वास्तव में किसकी यात्रा है?

उत्तर: यह बाहर की कोई यात्रा नहीं, बल्कि अपनी स्थिति को ऊँचा करने की यात्रा है—देह-अभिमान से विदेही स्थिति की ओर, अधीनता से अधिकारीपन की ओर और कमजोरी से गुणों की ओर जाने की यात्रा।

19. फर्श से अर्श पर जाने की मुख्य युक्ति क्या है?

उत्तर: पहले उल्टी सीढ़ी से उतरना, पुराने संस्कारों और देह-अभिमान को छोड़ना, फिर Easy, Ever Ready, Attractive और Active बनकर अपने जन्म-सिद्ध अधिकार में स्थित होना।

20. इस पूरे संदेश का मुख्य सार क्या है?

उत्तर:
देह-अभिमान से न्यारे बनो।
पुराने संस्कारों को मिटाओ।
Easy और Ever Ready बनो।
बाप की गिफ्ट बनो।
Attractive और Active बनो।
अधीनता छोड़ अधिकारी बनो।
और सुख, शान्ति तथा पवित्रता के जन्म-सिद्ध अधिकार में स्थित रहो।

आज का संकल्प

“मैं आत्मा हूँ।
मैं देह में रहते हुए विदेही स्थिति का अभ्यास करूँगा/करूँगी।
मैं Easy, Attractive और Active बनूँगा/बनूँगी।
मैं प्रकृति और माया के अधीन नहीं, अधिकारी बनूँगा/बनूँगी।
मैं सुख, शान्ति और पवित्रता के अपने जन्म-सिद्ध अधिकार में स्थित रहूँगा/रहूँगी।”

 अंतिम संदेश

“फर्श से अर्श की यात्रा बाहर की नहीं, अपनी स्थिति को ऊँचा करने की यात्रा है।”

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