AW.(19)26-05-1969/“सम्पूर्ण स्नेही की परख”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“सम्पूर्ण स्नेही की परख”
सभी किस स्थिति में बैठे हो? लगन में बैठे या मगन अवस्था में? किस अवस्था में हो? ज्यादा समय लगन लगाने में जाता है या मगन रूप में हो? अपनी चेकिंग तो करते होंगे। अच्छा, सभी की यही इच्छा है कि हमारे पेपर की रिजल्ट का मालूम पड़े। विशेष सभी के दिलों में यही संकल्प चलता रहता है। तो आज रिजल्ट सभी सुना देते हैं। सभी ने जो भी लिखा है यथायोग्य, यथाशक्ति टोटल रिजल्ट यही कहेंगे कि बाप में निश्चय बुद्धि तो हैं लेकिन जितना ही बाप में निश्चय है उतना ही बाप के महावाक्यों में, फरमान में निश्चय बुद्धि होकर चलना वह अभी पुरुषार्थ में 50 प्रतिशत देखने में आता है। बाप में निश्चय तो 100 पर्सेन्ट है लेकिन बाप के फरमान और आज्ञाओं में निश्चय बुद्धि होकर के जो फरमान मिला और किया। ऐसे फरमान में निश्चय बुद्धि मैजारिटी 50 प्रतिशत की रिजल्ट में हैं। ऐसे ही टीचर में निश्चय है लेकिन उनकी पूरी पढ़ाई जो है उसमें पूर्ण रीति से चलना वह भी अपनी परसेन्टेज की रिजल्ट है। ऐसे ही गुरु रूप में भी सद्गुरु है यह पूरा निश्चय है लेकिन उनके श्रीमत पर चलना उसकी टोटल रिजल्ट 50 प्रतिशत तक है। सिर्फ बाप, टीचर, सतगुरु में निश्चय नहीं लेकिन इस निश्चय के साथ-साथ उनके फरमान, उनकी पढ़ाई और उनके श्रीमत पर भी सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि होकर चलना है। इसमें कमी है जिसको अभी भरना है?
स्नेह की निशानी क्या है? सम्पूर्ण स्नेही की परख क्या होती है? उनका मुख्य लक्ष्य क्या होता है? आप सभी ने जो सुनाया वह तो है ही। लेकिन फिर भी वह स्पष्ट करने के लिए जिसके साथ जिसका स्नेह होता है उसकी सूरत में उसी स्नेही की सूरत देखने में आती है। उनके नयनों से वही नूर देखने में आता है। उनके मुख से भी स्नेह के बोल निकलते। उनके हर चलन से स्नेह का चित्र देखने में आयेगा। उसके नयनों में वही स्नेही समाया हुआ होगा। ऐसी अवस्था होनी है। अभी बच्चों और बाप के संस्कारों में बहुत फर्क है। जब समान हो जायेंगे तो आप के संस्कार देखने में नहीं आयेंगे। वही देखने में आयेंगे। एक-एक में बाप को देखेंगे। आप सभी द्वारा बाप का साक्षात्कार होगा। लेकिन अभी वह कमी है। अपने से पूछना है ऐसे स्नेही बने हैं? स्नेह लगाना भी सहज है। स्नेही स्वरूप बनना – यह है फाइनल स्टेज। तो पेपर की रिजल्ट सुनाई। एक तो एक कमी है, दूसरी बात जो सभी ने लिखा है उसमें सहनशक्ति की जो रिजल्ट हैं वह बहुत कम है। जितनी सहनशक्ति होगी उतनी सर्विस में सफलता होगी। संगठन में रहने के लिए भी सहनशक्ति चाहिए। फाइनल पेपर जो विनाश का है उसमें पास होने के लिए भी सहनशक्ति चाहिये। वह सहनशक्ति की रिजल्ट मैजारिटी में बहुत कम है। इसलिए उसको अब बढ़ाओ।
सहनशक्ति कैसे आयेगी? जितना-जितना स्नेही बनेंगे। जितना जिसके प्रति स्नेह होता है तो उस स्नेह में शक्ति आ जाती है। स्नेह में सहनशक्ति कैसे आती है, कभी अनुभव किया है? जैसे देखो, कोई बच्चे की मां है। बच्चे पर आपदा आती है, मां का स्नेह है तो स्नेह के कारण उसमें सहनशक्ति आ जाती है। बच्चे के लिए सब कुछ सहन करने लिए तैयार हो जाती है। उस समय स्नेह में कुछ भी अपने तन का वा परिस्थितियों का कुछ फिक्र नहीं रहता है। तो ऐसे ही अगर निरन्तर स्नेह रहे तो उस स्नेही प्रति सहन करना कोई बड़ी बात नहीं है। स्नेह कम है इसलिए सहनशक्ति भी कम है। यह है आप सभी के पेपर की रिजल्ट। अब एक मास के बाद रिजल्ट देखेंगे। वहाँ तीन-तीन मास बाद पेपर आता है। यहाँ एक मास बाद इसी रिजल्ट को देखेंगे कि स्नेही रूप कितना बने हैं?
मुख्य है निर्भयता का गुण। जो पेपर में नही दिया था। क्योंकि उसकी बहुत कमी है। एक मास के अन्दर इस निर्भयता के गुण को भी अपने में पूरा भरने की कोशिश करनी है। निर्भयता कैसे आयेगी? उसके लिए मुख्य क्या पुरुषार्थ हैं? निराकारी बनना। जितना निराकारी अवस्था में होंगे उतना निर्भय होंगे। भय तो शरीर के भान में आने से होता है। यह एक मास का चार्ट पहले बता देते हैं। कुमारियों का ट्रेनिंग क्लास पूरा होगा तो यह भी पूछेंगे कि सहनशक्ति, निर्भय और निश्चय की परख जो बताई वह कहाँ तक है। इन तीनों बातों का पेपर फिर लेंगे।
कुमारियों से बापदादा का स्नेह विशेष क्यों होता है? कौन-सी खास बात है जो बापदादा का खास स्नेह रहता है? क्योंकि बापदादा समझते हैं अगर इन्हों को ईश्वरीय स्नेह नहीं मिलेगा तो और किसी के स्नेह में लटक जायेंगी। बाप रहमदिल है ना। तो रहम के कारण स्नेह है। भविष्य बचाव के कारण विशेष स्नेह रहता है। अब देखेंगे बापदादा के स्नेह का जवाब क्या देती हैं। अपने को बचाना है यह है बापदादा के स्नेह का रेस्पान्ड। किन-किन बातों में बचाना है मालूम है? एक तो मन्सा सहित प्युरिटी हो। मन्सा में कोई संशय न आये और दूसरी बात अपनी वाचा भी ऐसी रखनी है जो मुख से कोई ऐसा बोल न निकले। वाणी में भी कन्ट्रोल, मन्सा में भी कन्ट्रोल। वाचा ऐसी रखनी है जैसे साकार में बापदादा की थी। कर्म भी ऐसा करना है जैसे साकार तन द्वारा करके दिखाया। आपका कर्म ऐसा हो जो और भी देखकर ऐसा करें। यह है कुमारियों के लिए खास। और किससे बचना है? संगदोष से तो बचना ही है, एक और विशेष बात है। अब बहुत रूप से, आत्मा के रूप से, शरीर के रूप से आप सभी को बहकाने वाले बहुत रूप सामने आयेंगे। लेकिन उसमें बहकना नहीं है। बहुत परीक्षायें आयेंगी लेकिन है कुछ नहीं। परीक्षाओं में पास कौन हो सकता है? जिसको परख पूरी होगी। परखने की जितनी शक्ति होगी उतना ही परीक्षाओं में पास होंगे। परखने की शक्ति कम रखते हो, परख नहीं सकते हो कि यह किस प्रकार का विघ्न है, माया किस रूप में आ रही है और क्यों मेरे सामने यह विघ्न आया है, इससे रिजल्ट क्या है? यह परख कम होने के कारण परीक्षाओं में फेल हो जाते हैं। परख अच्छी होगी वह पास हो सकते हैं।
“सम्पूर्ण स्नेही की असली परख क्या है? निश्चय, सहनशक्ति और निर्भयता का Final Paper | अव्यक्त महावाक्य”
वैकल्पिक Title
“बाप से स्नेह है तो ये 3 गुण जरूर होंगे! निश्चय • सहनशक्ति • निर्भयता | अव्यक्त वाणी”
अध्याय 1 — आज अपनी रिजल्ट चेक करने का समय है
बापदादा बच्चों की आध्यात्मिक पढ़ाई की रिजल्ट बताते हुए कहते हैं कि केवल बाप में निश्चय होना पर्याप्त नहीं है। निश्चय का वास्तविक प्रमाण है—बाप के फरमान, टीचर की पढ़ाई और सतगुरु की श्रीमत पर चलना।
वर्तमान रिजल्ट
- बाप में निश्चय: लगभग 100%
- बाप के फरमान पर चलना: लगभग 50%
- टीचर की पूरी पढ़ाई पर चलना: अभी कमी
- सतगुरु की श्रीमत पर चलना: लगभग 50%
उदाहरण:
विद्यार्थी को अपने शिक्षक पर पूरा विश्वास हो, लेकिन वह शिक्षक द्वारा दिए गए होमवर्क को न करे, तो केवल विश्वास से परीक्षा में सफलता नहीं मिलेगी।
मुरली नोट
निश्चय + फरमान का पालन + पूरी पढ़ाई + श्रीमत पर चलना = सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि।
अध्याय 2 — सम्पूर्ण स्नेही की पहचान क्या है?
सिर्फ किसी से प्रेम या स्नेह रखना ही पर्याप्त नहीं है। स्नेही स्वरूप बनना फाइनल स्टेज है।
जिसके साथ सच्चा स्नेह होता है, उसकी—
- सूरत में उसी की झलक दिखाई देती है।
- नयनों में उसी का नूर दिखाई देता है।
- मुख से उसी के स्नेह के बोल निकलते हैं।
- हर चलन में उसी के संस्कार दिखाई देते हैं।
आध्यात्मिक लक्ष्य
बच्चों के संस्कार इतने समान बनें कि एक-एक बच्चे में बाप का साक्षात्कार हो।
उदाहरण:
जैसे किसी व्यक्ति के चेहरे, बोलने के ढंग और व्यवहार में उसके माता-पिता की झलक दिखाई देती है, वैसे ही सम्पूर्ण स्नेही आत्मा के व्यवहार में बाप के संस्कार दिखाई देने चाहिए।
अध्याय 3 — स्नेह लगाना सहज, स्नेही स्वरूप बनना कठिन
बाप से स्नेह करना सहज हो सकता है, लेकिन स्नेह के स्वरूप में स्थित होना पुरुषार्थ का अंतिम लक्ष्य है।
अपने से प्रश्न करें:
“क्या मेरे नयनों, वाणी, व्यवहार और कर्म से बाप दिखाई देते हैं?”
यदि नहीं, तो अभी संस्कारों में परिवर्तन की आवश्यकता है।
मुरली नोट
स्नेह की अंतिम निशानी = अपने संस्कारों में बाप के संस्कार दिखाई देना।
अध्याय 4 — सहनशक्ति क्यों आवश्यक है?
बापदादा ने रिजल्ट में दूसरी बड़ी कमी सहनशक्ति की बताई।
सहनशक्ति आवश्यक है क्योंकि—
- सेवा में सफलता के लिए सहनशक्ति चाहिए।
- संगठन में रहने के लिए सहनशक्ति चाहिए।
- परिस्थितियों को पार करने के लिए सहनशक्ति चाहिए।
- अन्तिम परीक्षा में पास होने के लिए सहनशक्ति चाहिए।
उदाहरण:
जैसे मजबूत नाव लहरों के बीच भी आगे बढ़ती रहती है, वैसे ही सहनशक्ति वाली आत्मा परिस्थितियों के बीच भी अपनी स्थिति नहीं छोड़ती।
अध्याय 5 — स्नेह से सहनशक्ति कैसे आती है?
जहाँ सच्चा स्नेह होता है, वहाँ सहनशक्ति स्वतः बढ़ती है।
उदाहरण:
माँ अपने बच्चे के लिए कठिन से कठिन परिस्थिति सहन कर लेती है। बच्चे के प्रति स्नेह के कारण उसे अपने शरीर या परिस्थितियों की चिंता कम रहती है।
इसी प्रकार परमात्मा से निरन्तर स्नेह हो तो उनके लिए आने वाली परिस्थितियों को सहन करना कठिन नहीं लगता।
मुख्य सूत्र:
स्नेह कम → सहनशक्ति कम
स्नेह अधिक → सहनशक्ति अधिक
अध्याय 6 — अगली रिजल्ट: एक महीने का पेपर
बापदादा बच्चों को एक चुनौती देते हैं कि अब एक महीने बाद फिर रिजल्ट देखी जाएगी।
इसलिए इस महीने का लक्ष्य केवल सुनना नहीं, बल्कि अपने अंदर परिवर्तन लाना है।
रोज चेक करें:
☑️ मेरा स्नेही स्वरूप कितना रहा?
☑️ मेरी सहनशक्ति कितनी रही?
☑️ मैंने परिस्थितियों में अपनी स्थिति छोड़ी या नहीं?
☑️ क्या मैंने बाप के फरमान को निश्चय से अपनाया?
अध्याय 7 — निर्भयता: सबसे जरूरी गुण
एक विशेष गुण बताया गया—निर्भयता।
यह गुण पेपर में पहले नहीं था, लेकिन इसकी कमी बहुत दिखाई देती है।
निर्भयता कैसे आयेगी?
निराकारी बनने से।
जितना आत्मा शरीर के भान से ऊपर उठकर निराकारी स्थिति में रहेगी, उतना भय कम होगा।
मुरली नोट
शरीर का भान → भय
निराकारी स्थिति → निर्भयता
उदाहरण:
जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मानता है तो मान-अपमान, बीमारी, नुकसान और परिस्थितियों का भय अधिक होता है। आत्मिक स्थिति में इनका प्रभाव कम होता जाता है।
अध्याय 8 — कुमारियों के लिए विशेष स्नेह क्यों?
बापदादा कुमारियों से विशेष स्नेह इसलिए रखते हैं क्योंकि उन्हें भविष्य की सुरक्षा और आध्यात्मिक जीवन की रक्षा की चिंता है।
यदि उन्हें ईश्वरीय स्नेह नहीं मिलेगा तो वे किसी अन्य आकर्षण या संबंध के स्नेह में फँस सकती हैं।
इसलिए बापदादा का स्नेह उनके लिए रहम और भविष्य की सुरक्षा का साधन है।
स्नेह का सही Return
अपने को बचाना।
अध्याय 9 — अपने को किन बातों से बचाना है?
कुमारियों के लिए विशेष रूप से चार स्तरों पर पवित्रता और नियंत्रण की शिक्षा दी गई है:
1. मन्सा
मन में शुद्धता हो और संशय न हो।
2. वाचा
वाणी पर नियंत्रण हो। ऐसा कोई शब्द न निकले जिससे किसी को दुःख पहुँचे या स्वयं की स्थिति कमजोर हो।
3. कर्म
कर्म ऐसे हों जिन्हें देखकर दूसरे भी श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा लें।
4. संग
संगदोष से स्वयं को बचाना आवश्यक है।
मुरली नोट
मन्सा शुद्ध → वाचा नियंत्रित → कर्म श्रेष्ठ → संग सुरक्षित।
अध्याय 10 — परीक्षा में पास होने की चाबी: परख शक्ति
आगे अनेक प्रकार की परीक्षाएँ सामने आ सकती हैं।
माया अनेक रूपों में आकर्षित या विचलित करने का प्रयास कर सकती है।
इसलिए केवल हिम्मत ही नहीं, परखने की शक्ति भी आवश्यक है।
स्वयं से पूछें:
- यह परिस्थिति किस प्रकार का विघ्न है?
- माया किस रूप में मेरे सामने आई है?
- यह मेरे सामने क्यों आई?
- इसका मेरी स्थिति पर क्या प्रभाव होगा?
- इसका परिणाम क्या होगा?
अध्याय 11 — परख शक्ति कम तो परीक्षा में फेल
यदि आत्मा यह पहचान ही न सके कि सामने आया विघ्न किस प्रकार का है, तो वह आसानी से प्रभावित हो सकती है।
लेकिन परख शक्ति मजबूत होगी तो परीक्षा में पास होना सहज होगा।
उदाहरण:
एक अनुभवी चालक सड़क पर आने वाले खतरे को पहले ही पहचान लेता है और दुर्घटना से बच जाता है। अनुभवहीन चालक खतरे को पहचान नहीं पाता।
इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में परख शक्ति सुरक्षा की शक्ति है।
अध्याय 12 — सम्पूर्ण स्नेही बनने का Final Formula
सम्पूर्ण स्नेही बनने के लिए केवल भावना पर्याप्त नहीं।
चार मुख्य बातें:
बाप में निश्चय
पढ़ाई में सम्पूर्णता
श्रीमत और फरमान पर चलना
स्नेह से सहनशक्ति और निर्भयता धारण करना
और इसके साथ—
परख शक्ति + पवित्रता + निराकारी स्थिति = परीक्षा में सफलता।
मुख्य मुरली सूत्र
“सिर्फ बाप में निश्चय नहीं, उनके फरमान, उनकी पढ़ाई और उनकी श्रीमत पर भी सम्पूर्ण निश्चय बुद्धि होकर चलना है।”
“स्नेही स्वरूप बनना—यह है फाइनल स्टेज।”
“जितना स्नेही बनेंगे, उतनी सहनशक्ति आयेगी।”
“जितना निराकारी अवस्था में होंगे, उतना निर्भय होंगे।”
“परखने की जितनी शक्ति होगी, उतना ही परीक्षाओं में पास होंगे।”
मुरली नोट
विषय: सम्पूर्ण स्नेही की परख
मुख्य शिक्षाएँ: निश्चय बुद्धि, फरमान पर चलना, पढ़ाई में सम्पूर्णता, श्रीमत का पालन, स्नेही स्वरूप, सहनशक्ति, निर्भयता, निराकारी स्थिति, पवित्रता और परख शक्ति।
एक महीने के विशेष पुरुषार्थ के तीन मुख्य लक्ष्य:
1. निश्चय
2. सहनशक्ति
3. निर्भयता
साथ ही अपनी परख शक्ति को इतना मजबूत करना है कि माया के किसी भी रूप और विघ्न को समय रहते पहचानकर परीक्षा में पास हो सकें।
प्रश्न 1. बापदादा की आज की रिजल्ट के अनुसार बच्चों में मुख्य कमी क्या दिखाई देती है?
उत्तर: बाप में निश्चय लगभग पूर्ण है, लेकिन बाप के फरमान पर निश्चय बुद्धि होकर चलना लगभग 50 प्रतिशत दिखाई देता है। इसी प्रकार टीचर की पढ़ाई और सतगुरु की श्रीमत पर पूरी तरह चलने में भी कमी है।
प्रश्न 2. सच्ची निश्चय बुद्धि की निशानी क्या है?
उत्तर: केवल बाप में निश्चय रखना पर्याप्त नहीं। बाप के फरमान, टीचर की पूरी पढ़ाई और सतगुरु की श्रीमत पर निश्चय बुद्धि होकर चलना ही सच्ची निश्चय बुद्धि की निशानी है।
प्रश्न 3. सम्पूर्ण स्नेही की मुख्य पहचान क्या है?
उत्तर: जिसके साथ सच्चा स्नेह होता है, उसकी सूरत, नयन, वाणी और हर चलन में उसी के संस्कार दिखाई देते हैं। सम्पूर्ण स्नेही की अवस्था में बच्चों के संस्कारों में बाप के संस्कार दिखाई देने लगते हैं।
प्रश्न 4. स्नेह लगाने और स्नेही स्वरूप बनने में क्या अन्तर है?
उत्तर: बाप से स्नेह लगाना सहज है, लेकिन अपने हर संकल्प, बोल और कर्म में बाप के संस्कार दिखाई देना—स्नेही स्वरूप बनना है। यही फाइनल स्टेज है।
प्रश्न 5. सहनशक्ति को इतना महत्वपूर्ण क्यों बताया गया है?
उत्तर: सहनशक्ति से सेवा में सफलता मिलती है, संगठन में मिलकर रहना सहज होता है और अन्तिम परीक्षाओं में पास होने की शक्ति आती है।
प्रश्न 6. स्नेह और सहनशक्ति का क्या संबंध है?
उत्तर: जितना गहरा स्नेह होगा, उतनी ही सहनशक्ति बढ़ेगी। सच्चे स्नेह के कारण व्यक्ति अपने सुख-सुविधा और परिस्थितियों की परवाह किए बिना बहुत कुछ सहन कर सकता है।
प्रश्न 7. एक महीने के पुरुषार्थ में किन बातों पर विशेष ध्यान देना है?
उत्तर: स्नेही स्वरूप बनने, सहनशक्ति बढ़ाने और अपने अंदर निर्भयता का गुण भरने पर विशेष ध्यान देना है।
प्रश्न 8. निर्भयता कैसे प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर: निराकारी अवस्था में स्थित होने से निर्भयता आती है। जितना शरीर के भान से ऊपर उठकर आत्मिक स्थिति में रहेंगे, उतना भय कम होगा।
प्रश्न 9. भय का मुख्य कारण क्या बताया गया है?
उत्तर: शरीर का भान भय का मुख्य कारण है। आत्मा जितना स्वयं को निराकारी और आत्मिक स्वरूप में अनुभव करेगी, उतनी ही निर्भय बनेगी।
प्रश्न 10. कुमारियों से बापदादा का विशेष स्नेह क्यों है?
उत्तर: बापदादा रहमदिल होकर कुमारियों को ईश्वरीय स्नेह देते हैं, ताकि वे अन्य आकर्षणों या गलत संबंधों में न फँसें और अपना भविष्य सुरक्षित रखें।
प्रश्न 11. कुमारियों के लिए बापदादा के स्नेह का सही रेस्पॉन्स क्या है?
उत्तर: अपने को बचाना ही बापदादा के स्नेह का सच्चा रेस्पॉन्स है—प्युरिटी में रहना, संगदोष से बचना और मन-वाणी-कर्म पर नियंत्रण रखना।
प्रश्न 12. मन्सा में कैसी पवित्रता रखनी है?
उत्तर: मन्सा में पवित्रता होनी चाहिए और किसी भी प्रकार का संशय या अशुद्ध संकल्प प्रवेश न करे।
प्रश्न 13. वाणी पर नियंत्रण क्यों आवश्यक है?
उत्तर: वाणी ऐसी होनी चाहिए जिससे कोई गलत या दुःख देने वाला बोल न निकले। वाणी में नियंत्रण श्रेष्ठ संस्कारों की निशानी है।
प्रश्न 14. संगदोष से बचना क्यों जरूरी है?
उत्तर: संग का प्रभाव आत्मा की स्थिति और संस्कारों पर पड़ता है। इसलिए श्रेष्ठ स्थिति बनाए रखने के लिए संगदोष से स्वयं को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
प्रश्न 15. आगे आने वाली परीक्षाओं में कौन पास हो सकता है?
उत्तर: जिसकी परख शक्ति अच्छी होगी, वही परीक्षाओं में पास हो सकेगा। उसे पहचान होगी कि कौन-सा विघ्न किस रूप में आया है और उसका परिणाम क्या होगा।
प्रश्न 16. परख शक्ति कमजोर होने से क्या होता है?
उत्तर: परख शक्ति कम होने पर आत्मा यह नहीं पहचान पाती कि माया किस रूप में सामने आई है, विघ्न क्यों आया है और उसका परिणाम क्या होगा। इसी कारण परीक्षा में फेल होने की सम्भावना बढ़ती है।
प्रश्न 17. माया के विघ्न को पहचानने के लिए किन बातों पर विचार करना चाहिए?
उत्तर: यह पहचानना चाहिए कि सामने आया विघ्न किस प्रकार का है, माया किस रूप में आई है, यह मेरे सामने क्यों आया है और इसका मेरी स्थिति पर क्या परिणाम पड़ेगा।
प्रश्न 18. सम्पूर्ण स्नेही बनने के लिए किन गुणों की आवश्यकता है?
उत्तर: निश्चय, फरमान पर चलना, पढ़ाई को जीवन में धारण करना, श्रीमत पर चलना, सहनशक्ति, निर्भयता, पवित्रता और परख शक्ति आवश्यक हैं।
प्रश्न 19. सम्पूर्ण स्नेही की अंतिम अवस्था कैसी होती है?
उत्तर: ऐसी अवस्था जिसमें आत्मा के नयन, वाणी, व्यवहार और कर्म में बाप के संस्कार दिखाई दें और दूसरों को उस आत्मा के द्वारा बाप का साक्षात्कार हो।
प्रश्न 20. इस अव्यक्त महावाक्य की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: केवल बाप से स्नेह रखना पर्याप्त नहीं; स्नेही स्वरूप बनना है। निश्चय को फरमान, पढ़ाई और श्रीमत के पालन में लाना है तथा सहनशक्ति, निर्भयता और परख शक्ति को बढ़ाकर हर परीक्षा में पास होना है।
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