MURLI 17-09-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

 

17-09-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – अभी इस दुनिया का होपलेस केस है, सभी मर जायेंगे इसलिए इससे ममत्व मिटाओ, मामेकम् याद करो”
प्रश्नः- सर्विस की उछल न आने का कारण क्या है?
उत्तर:- 1- अगर लक्षण ठीक नहीं हैं, बाप को याद नहीं करते तो सर्विस की उछल आ नहीं सकती। कोई न कोई उल्टे कर्म होते रहते हैं इसलिए सर्विस नहीं कर सकते। 2- बाप का जो पहला डायरेक्शन है – आप मुये मर गई दुनिया इसे अमल में नहीं लाते। बुद्धि देह और देह के सम्बन्धों में फँसी हुई है तो सर्विस कर नहीं सकते।
गीत:- ओम् नमो शिवाए:…

ओम् शान्ति। अब यह भक्तिमार्ग का गीत सुना। शिवाय नम: कहते हैं। शिव का नाम घड़ी-घड़ी लेते हैं। रोज़ शिव के मन्दिर में जाते हैं और जो त्योहार हैं वह वर्ष-वर्ष मनाते हैं। पुरुषोत्तम मास भी होता है, पुरुषोत्तम वर्ष भी होता है। शिवाय नम: तो रोज़ कहते रहते हैं। शिव के पुजारी बहुत हैं। रचयिता है शिव ऊंच ते ऊंच भगवान। कहते भी हैं – पतित-पावन परमपिता परमात्मा शिव है। रोज़ पूजा भी करते हैं। तुम बच्चे जानते हो यह संगमयुग है – पुरुषोत्तम बनने का युग। जैसे जिस्मानी पढ़ाई से कोई न कोई ऊंच पद पाते हैं ना। इन लक्ष्मी-नारायण ने यह पद कैसे पाया, विश्व के मालिक कैसे बनें। यह किसको भी पता नहीं। शिवाय नम: भी कहते हैं। तुम मात-पिता… रोज़ महिमा गाते हैं परन्तु यह नहीं जानते कि वह कब आकर मात-पिता बनकर वर्सा देते हैं। तुमको मालूम है कि दुनिया के मनुष्य तो कुछ भी नहीं जानते हैं। भक्ति मार्ग में कितने धक्के खाते हैं। अमरनाथ पर कितने झुण्ड के झुण्ड जाते हैं। कितने धक्के खाते हैं। किसको ऐसा कहो तो बिगड़ पड़े। तुम थोड़े बच्चे हो जिनको अन्दर में बहुत खुशी है। लिखते भी रहते हैं बाबा जबसे आपको पहचाना है, बस अब तो हमारी खुशी का पारावार नहीं रहा है। कुछ भी तकलीफ आदि होती है, फिर भी खुशी में रहना चाहिए। हम बाप के बने हैं, यह कभी भूलना नहीं चाहिए। तुम बच्चे जबकि जानते हो हमने शिवबाबा को पाया है। तो खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। भल लिखते हैं हमको निश्चय है, बाबा को हम जानते हैं फिर भी चलते-चलते ठण्डे पड़ जाते हैं। 6-8 मास, 2-3 वर्ष आते नहीं तो बाबा समझ जाते हैं पूरा निश्चयबुद्धि नहीं है। पूरा नशा नहीं चढ़ा है। ऐसा बेहद का बाप, जिससे 21 जन्मों का वर्सा मिलता है। निश्चय हो जाए तो बहुत खुशी का नशा रहना चाहिए। जैसे किसके बच्चे को राजा गोद में लेने चाहते हैं। बच्चे को मालूम पड़ जाता है कि हमारे लिए ऐसी बात-चीत हो रही है कि राजा चाहता है इस बच्चे को हम वारिस बनायें। तो बच्चे को बहुत खुशी होगी ना। मैं राजा का बच्चा बनता हूँ। जब गरीब का बच्चा साहूकार की गोद लेते हैं तो बहुत खुशी होती है ना। जान जाता है कि मुझे फलाना एडाप्ट करते हैं तो गरीबी का गम भूल जाता है। वह तो है फिर भी एक जन्म की बात। यहाँ बच्चों को खुशी रहती है 21 जन्म वर्सा लेने की। बेहद के बाप को याद करना है और फिर दूसरों को रास्ता बताना है। शिवबाबा पतित-पावन आया हुआ है। समझाते हैं, तुम्हारा मैं बाप हूँ। ऐसे कोई मनुष्य नहीं कह सकते कि मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ। बाप ही समझानी देते हैं मैं 5 हजार वर्ष पहले आया था। तुमको यही अक्षर कहा था कि मामेकम् याद करो। मुझ पतित-पावन बाप को याद करने से ही तुम पतित से पावन बनेंगे और कोई भी उपाय नहीं है – पतित से पावन बनने का। पतित-पावन है ही एक बाप। गीता का भगवान एक पतित-पावन पुनर्जन्म रहित है। पहली-पहली बात यह लिखाओ। बड़े-बड़े आदमियों की लिखत देखेंगे तो समझेंगे ठीक है। कोई साधारण आदमी का देखेंगे तो कहेंगे ब्रह्माकुमारियों ने इनको जादू लगा दिया है तब लिखा है, बड़े आदमी के लिए ऐसा नहीं कहेंगे। तुम कुछ भी कहते हो तो समझते हैं छोटा मुख बड़ी बातें बनाती हैं कि भगवान आया हुआ है। ऐसे तुम बच्चों को सिर्फ कहना नहीं है कि भगवान आया हुआ है, इससे तो कोई समझेंगे नहीं और ही हँसी करेंगे। यह तो समझाना है कि दो बाप हैं। पहले से ही फट से सीधा कहना नहीं है कि भगवान आया हुआ है क्योंकि आजकल दुनिया में भी भगवान कहलाने वाले बहुत हो गये हैं। सब अपने को भगवान का अवतार समझते हैं तो युक्ति से दो बाप का राज़ समझाना चाहिए। एक है हद का बाप, दूसरा है बेहद का बाप। बाप का नाम है शिव। वह सब आत्माओं का बाप है तो जरूर बच्चों को वर्सा देते होंगे। शिव जयन्ती भी मनाते हैं। वही आकर स्वर्ग की स्थापना करते हैं, तो जरूर नर्क का विनाश होना है। उसकी भी निशानी – यह महाभारत लड़ाई है। बाकी सिर्फ भगवान आया है, यह कहने से कोई समझेंगे नहीं। ढिंढोरा पीटते रहते हैं। ऐसी-ऐसी उल्टी सर्विस करने से और ही फिर सर्विस में ढीलापन आ जाता है। एक तरफ कहते भगवान आया हुआ है, भगवान पढ़ाते हैं फिर जाकर शादी करते हैं। तो लोग कहेंगे तुमको फिर क्या हुआ। तुम तो कहते थे कि भगवान पढ़ाते हैं। कहते हैं हमने जो सुना था सो कह दिया। अनेक प्रकार के विघ्न भी पड़ते हैं अपने बच्चों से, जैसे हिन्दू धर्म वालों ने आपेही अपने को चमाट मारी है ना। वास्तव में हैं देवी-देवता धर्म के परन्तु कह देते हम हिन्दू हैं। अपने को चमाट मारी है ना। अभी तुम जानते हो हम ही पूज्य थे तो श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ धर्म था। आसुरी मत पर धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट बन पड़े हैं। हम ही अपने धर्म की ग्लानी शुरू करते हैं, आसुरी माया की मत से इसलिए बाबा ने खुद कहा है – वह है आसुरी सम्प्रदाय। यह है दैवी सम्प्रदाय, जिनको मैं राजयोग सिखलाता हूँ। अभी है कलियुग। जो यह नॉलेज आकर सुनते हैं, वह असुर से बदल देवता बनते हैं। यह नॉलेज है ही देवता बनने के लिए। 5 विकारों पर जीत पाने से देवता बनते हैं, बाकी असुरों और देवताओं की कोई लड़ाई नहीं लगी। यह भी भूल कर दी है फिर दिखाते हैं, जिसकी तरफ साक्षात् भगवान है उनकी विजय हुई, उसमें नाम श्रीकृष्ण का दे दिया है। वास्तव में है तुम्हारी माया से युद्ध।

बाप बच्चों को कितनी बातें बैठ समझाते हैं परन्तु तमोप्रधान ऐसे हैं जो बिल्कुल समझते ही नहीं। बाप को याद नहीं कर सकते। समझते भी हैं हमारी ऐसी तमोप्रधान बुद्धि है जो याद ही नहीं ठहरती, इसलिए उल्टा काम करता रहता हूँ। अच्छे-अच्छे बच्चे भी याद बिल्कुल नहीं करते। लक्षण सुधारते ही नहीं, इसलिए सर्विस की उछल नहीं आती है। बाप कहते हैं – देह सहित देह के जो भी सम्बन्ध हैं, उनको मारो अथवा भूलो। अब मारो अक्षर वास्तव में है नहीं। कहते हैं आप मुये मर गई दुनिया। यह बाप बैठ समझाते हैं। बुद्धि से भूल जाना है जबकि तुम हमारे बने हो तो इन सबको भूलो, एक बाप को याद करो। जैसे कोई बीमारी का होपलेस केस हो जाता है तो फिर उससे ममत्व मिटाना होता है। फिर उनको कहते हैं राम-राम कहो, बाप भी कहते हैं इस दुनिया का केस बहुत होपलेस है। यह खत्म होनी ही है, सब मर जायेंगे, इसलिए इनसे ममत्व मिटाओ। वह तो राम-राम की धुन लगाते हैं। यहाँ तो एक की बात नहीं। सारी दुनिया विनाश होनी है इसलिए तुमको एक ही मन्त्र देता हूँ मामेकम् याद करो। कितनी समझानी देते रहते हैं, भिन्न-भिन्न प्रकार से। अभी पुरुषोत्तम मास आया तो पुरुषोत्तम युग पर भी समझानी देते रहते हैं। समझाने की बड़ी होशियारी चाहिए। धारणा अच्छी चाहिए। कोई पाप कर्म नहीं करना चाहिए। बिगर छुट्टी कोई चीज़ उठाना, खाना यह भी बहुत गुप्त पाप है। कायदे बड़े कड़े हैं, पाप करते हैं फिर भी बतलाते नहीं, तो फिर पाप वृद्धि को पाते जाते हैं। यहाँ तो तुम बच्चों को पुण्य आत्मा बनना है। हमको पुण्य आत्मा से स्नेह है, पाप आत्मा से विरोध है। भक्ति मार्ग में भी जानते हैं कि अच्छा कर्म करने से अच्छा फल मिलेगा इसलिए दान-पुण्य आदि अच्छे कर्म करते हैं ना। यह ड्रामा है फिर भी कहते हैं भगवान अच्छे कर्मों का फल अच्छा देता है। बाप कहते हैं – मैं सिर्फ यह धन्धा थोड़ेही बैठकर करता हूँ। यह तो सारी ड्रामा में नूँध है। ड्रामा अनुसार बाप को जरूर आना है।

बाप कहते हैं – मुझे आकर सबको रास्ता बताना है। बाकी इसमें कृपा आदि की कोई बात ही नहीं है। कोई-कोई लिखते हैं बाबा आपकी कृपा होगी तो हम आपको कभी नहीं भूलेंगे। बाप कहते हैं – हम कभी कृपा आदि नहीं करते, यह तो भक्ति मार्ग की बातें हैं। तुमको अपने पर कृपा करनी है। बाप को याद करेंगे तो विकर्म विनाश होंगे। भक्ति मार्ग की बातें ज्ञान मार्ग में होती नहीं। ज्ञान मार्ग है ही पढ़ाई। टीचर कोई पर कृपा थोड़ेही करेगा। हर एक को पढ़ना है। बाप श्रीमत देते हैं, उस पर चलना चाहिए ना। परन्तु अपनी मत पर चलने कारण कुछ भी सर्विस नहीं करते। बच्चों को बिल्कुल पुण्य आत्मा बनना है। जरा भी कोई पाप न हो। कई बच्चे अपना पाप बतायेंगे कभी नहीं। बाप भी कहते हैं वह ऊंच पद कभी नहीं पायेंगे। गाया हुआ है चढ़े तो चाखे… बच्चे जानते हैं बहुत ऊंच मर्तबा है। गिरते हैं तो कोई काम के नहीं रहते। अशुद्ध अहंकार है पहला नम्बर, फिर काम, क्रोध, लोभ भी कम नहीं। लोभ, मोह भी सत्यानाश कर देते हैं। बच्चे आदि में मोह होगा तो वह याद आते रहेंगे। आत्मा तो कहती है मेरा तो एक शिवबाबा, दूसरा न कोई और कोई भी याद न पड़े – ऐसा पुरुषार्थ करना है। यह सब तो खत्म होना है। विनाश सामने खड़ा है, वर्सा तो ले नहीं सकेंगे। इनमें क्या मोह रखना है। ऐसे-ऐसे अपने साथ बातें करनी है। सारी दुनिया को बुद्धि से भूलना है। यह तो सब खत्म होना ही है। तूफान ऐसे लगेंगे जो एकदम खत्म हो जायेगा। आग कहाँ लगती है और हवा ज़ोर से आती है तो झट एकदम खलास कर देती है। आधा घण्टे में 100-150 झोपड़ियों को खत्म कर देती है। तुम जानते कि इस भंभोर को आग लगनी ही है, नहीं तो इतने सब मनुष्य कैसे मरेंगे। जो अच्छे बच्चे हैं, लक्षण भी अच्छे हैं तो सर्विस भी अच्छी करते हैं। तुम बच्चों को नशा रहना चाहिए। पूरा नशा तो अन्त में रहेगा, जब कर्मातीत अवस्था हो फिर भी पुरुषार्थ करते रहते हैं। बनारस में शिव के मन्दिर में तो बहुत जाते हैं क्योंकि वह है ऊंच ते ऊंच भगवान। वहाँ शिव की भक्ति बहुत है। बाबा तो कहते रहते हैं वहाँ उनको जाकर समझाओ। यह शिव भगवान इन लक्ष्मी-नारायण को यह वर्सा देते हैं। संगम पर ही यह वर्सा उनसे मिला हुआ है। यह समझाने से फिर ब्रह्मा-सरस्वती की भी समझानी आती है। चित्रों पर बड़ा क्लीयर समझा सकते हैं। इन्हों को यह राज्य कैसे मिला। इन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में भक्ति मार्ग था नहीं। कहेंगे भक्ति तो अनादि है ही। अभी तुमको कितनी नॉलेज मिली है तो नशा चढ़ना चाहिए ना। हमको भगवान पढ़ा रहे हैं, 21 जन्मों का राज्य-भाग्य देने के लिए। तुम स्टूडेन्ट हो ना। जिसको निश्चय होगा – यह ब्रह्माकुमारियां जिस द्वारा सुनकर हमको निश्चय बिठाती हैं वह खुद क्या होगा! ऐसे बाप से तो पहले मिलें। जब तक पूरा निश्चय नहीं होगा तब तक बढ़ेगा नहीं। निश्चय वाला ही झट भागेगा। ऐसे बाप के पास हम जाकर मिलेंगे, छोड़ेंगे नहीं। बस बाबा हम तो आपका बन गया, हम जायेंगे नहीं। गीत भी है ना चाहे प्यार करो चाहे ठुकराओ, यह दीवाना तेरा दर नहीं छोड़ेगा। फिर भी बिठा तो नहीं सकते। सर्विस पर भेजना पड़ता है। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान बनना है। ऐसे लिखकर भी देते हैं फिर बाहर जाने से माया की चकरी में आ जाते हैं। माया इतनी प्रबल है। माया के बहुत विघ्न पड़ते हैं। छोटे से दीवे को माया के तूफान कितने आते हैं। इन गीतों का भी सार बाप आकर समझाते हैं। तुम्हारा पुरुषोत्तम युग चल रहा है। भक्तों का पुरुषोत्तम मास चला गया। बाप कहते हैं – इस संगमयुग पर ही मैं आता हूँ, पतितों को पावन बनाने। समझानी कितनी अच्छी है।

अच्छा – दिन-प्रतिदिन सेवा की वृद्धि के लिए नई-नई युक्तियां निकलती रहेंगी। अच्छे-अच्छे चित्र बनते जायेंगे। कहते हैं ना – देर पड़े काम दुरस्त होते हैं। तैयार माल मिलता है, जिससे फट से कोई समझ जाए। सीढ़ी बहुत अच्छी है। इस समय कोई यह नहीं कह सकते कि हम पावन हैं। पावन दुनिया सतयुग को ही कहा जाता है। पावन दुनिया के मालिक यह लक्ष्मी-नारायण हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जरा भी कोई बड़ा अथवा सूक्ष्म पाप न हो, इसका बहुत-बहुत ध्यान रखना है। कभी कोई चीज़ छिपाकर नहीं लेनी है। लोभ मोह से भी सावधान रहना है।

2) अशुद्ध अहंकार जो सत्यानाश करने वाला है, उसे त्याग देना है। एक बाप के सिवाए दूसरा कोई भी याद न पड़े, यही पुरुषार्थ करना है।

वरदान:- देह के भान को अर्पण कर समर्पण होने वाले योगयुक्त, बंधनमुक्त भव
जो देह-अभिमान को अर्पण करता है उनका हर कर्म दर्पण बन जाता है। जैसे कोई चीज़ अर्पण की जाती है तो वह अर्पण की हुई चीज़ अपनी नहीं समझी जाती है। तो देह के भान को भी अर्पण करने से जब अपनापन मिट जाता है तो लगाव भी मिट जाता है। उन्हें ही सम्पूर्ण समर्पण कहा जाता है। ऐसे समर्पण होने वाले सदा योगयुक्त और बन्धनमुक्त होते हैं। उनका हर संकल्प, हर कर्म युक्तियुक्त होता है।
स्लोगन:- सर्वशक्तिमान् को साथी बना लो तो सफलता आपके चरणों में आ जायेगी।

 

ये अव्यक्त इशारे – अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

अपने को सदैव दाता अथवा महादानी समझना है। महाज्ञानी बनने के बाद महादानी का कर्तव्य चलता है। महाज्ञानी की परख महादानी बनने से होती है। अभी आपकी मूर्त में ऐसी झलक होनी चाहिए जो कोई भी अपना वर्सा लेने से वंचित न रहे। ऐसे अपने को दाता के बच्चे दाता समझना है, देने वालों में जो फलक और झलक रहती है, अभी उन संस्कारों को इमर्ज करो।

प्रश्न 1: इस दुनिया के बारे में बाप क्या समझाते हैं?

उत्तर: बाप समझाते हैं कि अभी इस दुनिया का होपलेस केस है और सभी को मरना है, इसलिए इससे ममत्व मिटाकर एक बाप को याद करना है।

प्रश्न 2: सर्विस की उछल न आने का मुख्य कारण क्या है?

उत्तर: जब लक्षण ठीक नहीं होते और बाप की याद नहीं रहती, तब सर्विस की उछल नहीं आती। उल्टे कर्म होते रहने से भी सर्विस नहीं कर सकते।

प्रश्न 3: बाप का पहला डायरेक्शन क्या है?

उत्तर: “आप मुये मर गई दुनिया” अर्थात् बुद्धि से देह और देह के सम्बन्धों को भूलकर एक बाप को याद करना है।

प्रश्न 4: संगमयुग को कौन-सा युग कहा गया है?

उत्तर: संगमयुग को पुरुषोत्तम बनने का युग कहा गया है।

प्रश्न 5: बाप को पहचानने के बाद बच्चों की कैसी अवस्था होनी चाहिए?

उत्तर: बच्चों में खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। चाहे कोई तकलीफ आए, फिर भी यह निश्चय और खुशी रहे कि हम बाप के बने हैं।

प्रश्न 6: बच्चों को कितने जन्मों के वर्से की खुशी रहती है?

उत्तर: बेहद के बाप से 21 जन्मों का वर्सा मिलने की खुशी रहती है।

प्रश्न 7: पतित से पावन बनने का सहज उपाय क्या है?

उत्तर: पतित-पावन बाप को याद करना ही पतित से पावन बनने का उपाय है। इसके अलावा कोई उपाय नहीं बताया गया है।

प्रश्न 8: परमपिता परमात्मा शिव का मुख्य परिचय क्या है?

उत्तर: शिव परमपिता परमात्मा हैं, सभी आत्माओं के बाप हैं और उनका नाम शिव है। वे पतित-पावन हैं।

प्रश्न 9: लोगों को भगवान के आने की बात किस युक्ति से समझानी चाहिए?

उत्तर: सीधे यह कहने के बजाय कि “भगवान आया हुआ है”, पहले दो बापों का राज़ समझाना चाहिए—एक हद का बाप और दूसरा बेहद का बाप।

प्रश्न 10: बेहद का बाप कौन है और वह क्या वर्सा देते हैं?

उत्तर: शिव बेहद के बाप हैं। वे बच्चों को स्वर्ग की स्थापना का वर्सा देते हैं।

प्रश्न 11: देवता बनने के लिए बच्चों को किस पर विजय पानी है?

उत्तर: पाँच विकारों पर विजय प्राप्त करके असुर से देवता बनना है।

प्रश्न 12: वास्तव में देवताओं और असुरों की लड़ाई किससे है?

उत्तर: वास्तविक लड़ाई माया के विकारों से है। पाँच विकारों पर विजय प्राप्त करना ही देवता बनने का आधार है।

प्रश्न 13: बाप बच्चों को क्या भूलने की शिक्षा देते हैं?

उत्तर: देह सहित देह के सम्बन्धों को बुद्धि से भूलकर एक बाप को याद करना है।

प्रश्न 14: पाप कर्मों के विषय में बच्चों को क्या सावधानी रखनी है?

उत्तर: जरा भी बड़ा अथवा सूक्ष्म पाप नहीं करना है। कोई चीज़ बिना अनुमति के लेना या खाना भी गुप्त पाप बताया गया है।

प्रश्न 15: बाप के अनुसार अपने ऊपर कृपा कैसे करनी है?

उत्तर: बाप कहते हैं कि वे कृपा नहीं करते; बच्चों को अपने ऊपर स्वयं कृपा करनी है, अर्थात् बाप को याद करके विकर्मों का विनाश करना है।

प्रश्न 16: कौन-से विकार आत्मा की उन्नति को रोकते हैं?

उत्तर: अशुद्ध अहंकार, काम, क्रोध, लोभ और मोह आत्मा की उन्नति में बाधा डालते हैं। विशेष रूप से अशुद्ध अहंकार को बहुत नुकसानदायक बताया गया है।

प्रश्न 17: मोह के सम्बन्ध में मुख्य धारणा क्या रखनी है?

उत्तर: आत्मा को एक शिवबाबा में ही सच्चा मोह रखना है। बाकी सम्बन्धों को ट्रस्टी होकर सम्भालना है और बुद्धि में रखना है कि यह सब खत्म होना है।

प्रश्न 18: गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए बच्चों को कैसे रहना है?

उत्तर: गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान रहना है और माया के विघ्नों से सावधान रहना है।

प्रश्न 19: दाता स्वरूप की परख किससे होती है?

उत्तर: महाज्ञानी बनने के बाद महादानी बनना है। महाज्ञानी की परख महादानी बनने से होती है। सभी को ज्ञान और वर्से का अधिकारी बनाने की भावना रखनी है।

प्रश्न 20: आज की मुरली का मुख्य स्लोगन क्या है?

उत्तर: “सर्वशक्तिमान् को साथी बना लो तो सफलता आपके चरणों में आ जायेगी।”

 मुख्य संदेश

ममत्व मिटाओ, एक बाप को याद करो, पाप कर्मों से बचो, पाँच विकारों पर विजय पाओ और महाज्ञानी से महादानी बनकर सेवा में वृद्धि करो।

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