Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 24-09-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
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मधुबन |
“मीठे बच्चे – सत्य बाप सचखण्ड स्थापन करते हैं, तुम बाप के पास आये हो नर से नारायण बनने की सच्ची-सच्ची नॉलेज सुनने”प्रश्नः-तुम बच्चों को अपने गृहस्थ व्यवहार में बहुत-बहुत सम्भाल कर चलना है – क्यों?उत्तर:-क्योंकि तुम्हारी गत-मत सबसे न्यारी है। तुम्हारा गुप्त ज्ञान है इसलिए विशाल बुद्धि बन सबसे तोड़ निभाना है। अन्दर में समझना है हम सब भाई-भाई वा भाई-बहिन हैं। बाकी ऐसे नहीं स्त्री अपने पति को कहे तुम मेरे भाई हो। इससे सुनने वाले कहेंगे इनको क्या हो गया। युक्ति से चलना है।
ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। रूहानी अक्षर न कह सिर्फ बाप कहें तो भी अन्डरस्टुड है यह रूहानी बाप है। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। सब अपने को भाई-भाई तो कहते ही हैं। तो बाप बैठ समझाते हैं बच्चों को। सबको तो नहीं समझाते होंगे। गीता में भी लिखा हुआ है भगवानुवाच। किसके प्रति? भगवान के हैं सब बच्चे। वह भगवान बाप है तो भगवान के बच्चे सब ब्रदर्स हैं। भगवान ने ही समझाया होगा। राजयोग सिखाया होगा। अभी तुम्हारी बुद्धि का ताला खुला हुआ है, तुम्हारे सिवाए ऐसे ख्यालात और कोई के चल न सकें। जिन-जिन को सन्देश मिलता जायेगा वह स्कूल में आते जायेंगे, पढ़ते जायेंगे। समझेंगे प्रदर्शनी तो देखी, अब जाकर ज्यादा सुनें। पहली-पहली मुख्य बात है ज्ञान सागर पतित-पावन, गीता ज्ञान दाता शिव भगवानुवाच। उनको यह पता पड़े कि इन्हों को सिखलाने वाला, समझाने वाला कौन है। वह सुप्रीम सोल, ज्ञान सागर निराकार है। वह है ही ट्रूथ। वह सत्य ही बतायेगा, फिर उसमें कोई प्रश्न उठ ही नहीं सकता। तुमने सब छोड़ दिया, ट्रूथ के ऊपर। पहले-पहले तो इस पर समझाना है कि हमको परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा राजयोग सिखलाते हैं। यह राजाई पद है, जिसको निश्चय हो जायेगा कि जो सभी का बाप है वह पारलौकिक बाप बैठ समझाते हैं, वही सबसे बड़ी अथॉरिटी है। तो दूसरा कोई प्रश्न उठ ही नहीं सकता। वह है पतित-पावन। वह जब यहाँ आते हैं तो जरूर अपने टाइम पर आते होंगे। तुम देखते भी हो यह वही महाभारत की लड़ाई है। विनाश के बाद वाइसलेस दुनिया होनी है। यह मनुष्य जानते नहीं कि भारत ही वाइसलेस था। बुद्धि चलती नहीं। गॉडरेज का ताला लगा हुआ है। उसकी चाबी एक बाप के पास ही है इसलिए यह किसको पता नहीं है कि तुमको पढ़ाने वाला कौन है। दादा समझ लेते हैं, तब टीका करते हैं, कुछ बोलते हैं इसलिए पहले-पहले यह समझाओ – इसमें लिखा है शिव भगवानु-वाच। वह तो है ही ट्रूथ। बाप है ही नॉलेजफुल। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज समझाते हैं। यह शिक्षा अभी तुमको उस बेहद के बाप से मिलती है। वही सृष्टि का रचयिता है, पतित सृष्टि को पावन बनाने वाला है। तो पहले-पहले बाप का ही परिचय देना है। उस परमपिता परमात्मा से आपका क्या सम्बन्ध है। वह नर से नारायण बनने की सच्ची नॉलेज देते हैं। बच्चे जानते हैं बाप सत्य है, जो बाप ही सचखण्ड बनाते हैं। तुम यहाँ आए ही हो नर से नारायण बनने। बैरिस्टर पास जायेंगे तो समझेंगे हम बैरिस्टर बनने आये हैं। अभी तुमको निश्चय है हमको भगवान पढ़ाते हैं। कई निश्चय करते भी हैं फिर संशय बुद्धि हो जाते हैं, तो उनको सब कहते हैं तुम तो कहते थे – हमें भगवान पढ़ाते हैं। फिर भगवान को क्यों छोड़ आये हो? संशय आने से ही भागन्ती हो जाते हैं। कोई न कोई विकर्म करते हैं। भगवानुवाच – काम महाशत्रु है, उन पर जीत पाने से ही जगतजीत बनेंगे। जो पावन बनेंगे वही पावन दुनिया में जायेंगे। यहाँ है ही राजयोग की बात, तुम जाकर राजाई करेंगे। बाकी जो आत्मायें हैं वह अपना हिसाब चुक्तू कर वापिस चली जायेंगी। यह कयामत का समय है। अब यह बुद्धि कहती है – सतयुग की स्थापना जरूर होनी है। पावन दुनिया सतयुग को कहा जाता है। बाकी सब मुक्तिधाम में चले जायेंगे। उनको फिर अपना पार्ट रिपीट करना है। तुम भी अपना पुरुषार्थ करते रहते हो। पावन बन और पावन दुनिया का मालिक बनने के लिए। मालिक तो अपने को समझेंगे ना। प्रजा भी मालिक है। अभी प्रजा भी कहती है ना – हमारा भारत। तुम समझते हो अभी सब नर्कवासी हैं। अभी हम स्वर्गवासी बनने के लिए राजयोग सीख रहे हैं। सब तो स्वर्गवासी नहीं बनेंगे। बाप कहते हैं जब भक्ति मार्ग पूरा होगा तब ही मैं आऊंगा। मुझे ही आकर सब भक्तों को भक्ति का फल देना है। मैजारिटी तो भक्तों की है ना। सब पुकारते रहते हैं हे गॉड फादर। भक्तों के मुख से ओ गॉड फादर, हे भगवान – यह जरूर निकलेगा। अब भक्ति और ज्ञान में फ़र्क है। तुम्हारे मुख से कभी हे ईश्वर, हे भगवान नहीं निकलेगा। मनुष्यों को तो यह आधाकल्प की प्रैक्टिस पड़ी हुई है। तुम जानते हो वह हमारा बाप है, तुमको हे बाबा थोड़ेही कहना है। बाप से तुमको तो वर्सा लेना है। पहले तो यह निश्चय हो कि हम बाप से वर्सा लेते हैं। बाप बच्चों को वर्सा लेने के अधिकारी बनाते हैं। यह तो सच्चा बाप है ना। बाप जानते हैं हमने जिन बच्चों को ज्ञान अमृत पिलाए, ज्ञान-चिता पर बिठाय विश्व का मालिक देवता बनाया था वही काम-चिता पर बैठ भस्मीभूत हो गये हैं। अब मैं फिर ज्ञान-चिता पर बिठाए, घोर नींद से जगाए स्वर्ग में ले जाता हूँ।
बाप ने समझाया है – तुम आत्मायें वहाँ शान्तिधाम और सुखधाम में रहती हो। सुखधाम को कहा जाता है वाइसलेस वर्ल्ड, सम्पूर्ण निर्विकारी। वहाँ देवतायें रहते हैं और वह है स्वीट होम, आत्माओं का घर। सभी एक्टर्स उस शान्तिधाम से आते हैं, यहाँ पार्ट बजाने। हम आत्मायें यहाँ की रहवासी नहीं हैं। वह एक्टर्स यहाँ के रहवासी होते हैं। सिर्फ घर से आकर ड्रेस बदली कर पार्ट बजाते हैं। तुम तो समझते हो हमारा घर शान्तिधाम है, जहाँ हम फिर वापिस जाते हैं। जब सभी एक्टर्स स्टेज पर आ जाते हैं तब बाप आकर सबको ले जायेंगे, इसलिए उनको लिबरेटर, गाइड भी कहा जाता है। दु:ख हर्ता, सुख कर्ता है तो इतने सारे मनुष्य कहाँ जायेंगे। विचार तो करो – पतित-पावन को बुलाते हैं किसलिए? अपने मौत के लिए। दु:ख की दुनिया में रहने नहीं चाहते हैं, इसलिए कहते हैं घर ले चलो। यह सब मुक्ति को ही मानने वाले हैं। भारत का प्राचीन योग भी कितना मशहूर है, विलायत में भी जाते हैं प्राचीन राजयोग सिखलाने। क्रिश्चियन में बहुत हैं जो संन्यासियों का मान रखते हैं। गेरू कफनी की जो पहरवाइस है – वह है हठयोग की। तुमको तो घरबार छोड़ना नहीं है। न कोई सफेद कपड़े का बन्धन है। परन्तु सफेद अच्छा है। तुम भट्ठी में रहे हो तो ड्रेस भी यह हो गई है। आजकल सफेद पसन्द करते हैं। मनुष्य मरते हैं तो सफेद चादर डालते हैं। तो पहले कोई को भी बाप का परिचय देना है। दो बाप हैं, यह बातें समझने में टाइम लेती हैं। प्रदर्शनी में इतना समझा नहीं सकेंगे। सतयुग में एक बाप, इस समय हैं तुमको तीन बाप, क्योंकि भगवान आते हैं प्रजापिता ब्रह्मा के तन में। वह भी तो बाप है सबका। अच्छा अब तीनों बाप में ऊंच वर्सा किसका? निराकार बाप वर्सा कैसे दें? वह फिर देते हैं ब्रह्मा द्वारा। ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते और ब्रह्मा द्वारा वर्सा भी देते हैं। इस चित्र पर तुम बहुत अच्छी रीति समझा सकते हो। शिवबाबा है, फिर यह प्रजापिता ब्रह्मा आदि देव, आदि देवी। यह है ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। बाप कहते हैं मुझ शिव को ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर नहीं कहेंगे। मैं सबका बाप हूँ। यह है प्रजापिता ब्रह्मा। तुम हो गये भाई-बहिन, आपस में क्रिमिनल एसाल्ट कर न सकें। अगर दोनों की आपस में विकार की दृष्टि खींचती है तो फिर गिर पड़ते हैं, बाप को भूल जाते हैं। बाप कहते हैं – तुम हमारा बच्चा बन काला मुँह करते हो। बेहद का बाप बच्चों को समझाते हैं। तुमको यह नशा चढ़ा हुआ है। जानते हो गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। लौकिक सम्बन्धियों को भी मुँह देना है। लौकिक बाप को तुम बाप कहेंगे ना। उनको तो तुम भाई नहीं कह सकते। आर्डनरी वे में बाप को बाप ही कहेंगे। बुद्धि में है कि यह हमारा लौकिक बाप है। ज्ञान तो है ना। यह ज्ञान बड़ा विचित्र है। आजकल करके नाम भी ले लेते हैं परन्तु कोई विजीटर आदि बाहर के आदमी के सामने भाई कह दो तो वह समझेंगे इनका माथा खराब हुआ है। इसमें बड़ी युक्ति चाहिए। तुम्हारा गुप्त ज्ञान, गुप्त सम्बन्ध है। अक्सर करके स्त्रियाँ पति का नाम नहीं लेती हैं। पति स्त्री का नाम ले सकते हैं। इसमें बड़ी युक्ति से चलना है। लौकिक से भी तोड़ निभाना है। बुद्धि चली जानी चाहिए ऊपर। हम बाप से वर्सा ले रहे हैं। बाकी चाचे को चाचा, बाप को बाप कहना पड़ेगा ना। जो ब्रह्माकुमार-कुमारी नहीं बने हैं वह भाई-बहन नहीं समझेंगे। जो बी.के. बने हैं, वही इन बातों को समझेंगे। बाहर वाले तो पहले ही चमकेंगे। इसमें समझने की बुद्धि अच्छी चाहिए। बाप तो बच्चों को विशालबुद्धि बनाते हैं। तुम पहले हद की बुद्धि में थे। अभी बुद्धि चली जाती है बेहद में। वह हमारा बेहद का बाप है। यह सब हमारे भाई-बहिन हैं। लेकिन घर में सासू को सासू ही कहेंगे, बहन थोड़ेही कहेंगे। घर में रहते बड़ी युक्ति से चलना है, नहीं तो लोग कहेंगे यह तो पति को भाई, सासू को बहन कह देते, यह क्या है? यह ज्ञान की बातें तुम ही जानो और न जाने कोई। कहते हैं ना – प्रभू तेरी गति मत तुम ही जानो। अब तुम उनके बच्चे बनते हो तो तुम्हारी गत मत तुम ही जानो। बड़ी सम्भाल से चलना पड़ता है। कहाँ कोई मूँझे नहीं।
प्रदर्शनी में तो पहले-पहले तुम बच्चों को यह समझाना है कि हमको पढ़ाने वाला भगवान है। अब तुम बताओ भगवान कौन? निराकार शिव या देहधारी श्रीकृष्ण। जो गीता में भगवानुवाच है वह शिव परमात्मा ने महावाक्य उच्चारे हैं या श्रीकृष्ण ने? श्रीकृष्ण तो है स्वर्ग का पहला प्रिन्स। ऐसे तो कह नहीं सकते कि श्रीकृष्ण जयन्ती सो शिव जयन्ती। शिव जयन्ती के बाद फिर श्रीकृष्ण जयन्ती। शिव जयन्ती से स्वर्ग का प्रिन्स श्रीकृष्ण कैसे बना, वह है समझने की बात। शिव जयन्ती फिर गीता जयन्ती फिर फट से है श्रीकृष्ण जयन्ती क्योंकि बाप राजयोग सिखलाते हैं ना। बच्चों की बुद्धि में आया है ना। जब तक शिव परमात्मा ना आये तब तक शिव जयन्ती मना नहीं सकते। जब तक शिव आकर कृष्णपुरी स्थापन न करे तो श्रीकृष्ण जयन्ती भी कैसे मनाई जाये। श्रीकृष्ण का जन्म तो मनाते हैं परन्तु समझते थोड़ेही हैं। श्रीकृष्ण फर्स्ट प्रिन्स था तो जरूर सतयुग में होगा ना। देवी-देवताओं की राजधानी होगी जरूर। सिर्फ एक श्रीकृष्ण को बादशाही तो नहीं मिलेगी ना। जरूर कृष्णपुरी होगी ना! कहते भी हैं कृष्णपुरी… और फिर यह है कंसपुरी। कृष्णपुरी नई दुनिया, कंसपुरी है पुरानी दुनिया। कहते हैं देवताओं और असुरों की लड़ाई लगी। देवताओं ने जीता। परन्तु ऐसे तो है नहीं। कंसपुरी खत्म हुई फिर कृष्णपुरी स्थापन हुई ना। कंसपुरी पुरानी दुनिया में होगी। नई दुनिया में थोड़ेही यह कंस दैत्य आदि होंगे। यहाँ तो देखो कितने मनुष्य हैं। सतयुग में बहुत थोड़े हैं। यह भी तुम समझ सकते हो, अभी तुम्हारी बुद्धि चलती है। देवताओं ने तो कोई लड़ाई की नहीं। दैवी सम्प्रदाय सतयुग में ही होते हैं। आसुरी सम्प्रदाय यहाँ हैं। बाकी न देवताओं और असुरों की लड़ाई हुई, न कौरवों और पाण्डवों की हुई है। तुम रावण पर जीत पाते हो। बाप कहते हैं – इन विकारों पर जीत पानी है तो जगतजीत बन जायेंगे। इसमें कोई लड़ना नहीं है। लड़ने का नाम लें तो वॉयलेन्स (हिंसक) बन जायें। रावण पर जीत पानी है परन्तु नॉनवायलेन्स। सिर्फ बाप को याद करने से हमारे विकर्म विनाश होते हैं। भारत का प्राचीन राजयोग मशहूर है।
बाप कहते हैं – मेरे साथ बुद्धि का योग लगाओ तो तुम्हारे पाप भस्म होंगे। बाप पतित-पावन है तो बुद्धि योग उस बाप से ही लगाना है, तो तुम पतित से पावन बन जायेंगे। अभी तुम प्रैक्टिकल में उनसे योग लगा रहे हो, इसमें लड़ाई की कोई बात ही नहीं। जो अच्छी रीति पढ़ेंगे, बाप के साथ योग लगायेंगे, वही बाप से वर्सा पायेंगे – कल्प पहले मुआफिक। इस पुरानी दुनिया का विनाश भी होगा। सब हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगे। फिर क्लास ट्रांसफर हो नम्बरवार जाकर बैठते हैं ना। तुम भी नम्बरवार जाकर वहाँ राज्य करेंगे। कितनी समझ की बातें हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस कयामत के समय जबकि सतयुग की स्थापना हो रही है तो पावन जरूर बनना है। बाप और बाप के कार्य में कभी संशय नहीं उठाना है।
2) ज्ञान और सम्बन्ध गुप्त है, इसलिए लौकिक में बहुत युक्ति से विशाल बुद्धि बनकर चलना है। कोई ऐसे शब्द नहीं बोलने हैं जो सुनने वाले मूँझ जाएं।
वरदान:-नॉलेज की लाइट माइट द्वारा कमजोर संस्कारों को समाप्त करने वाले शक्ति सम्पन्न भवनॉलेज से अपने कमजोर संस्कारों का मालूम तो पड़ जाता है और जब उस बात की समझानी मिलती है तो वे संस्कार थोड़े समय के लिए अन्दर दब जाते हैं लेकिन कमजोर संस्कार समाप्त करने के लिए लाइट और माइट के एकस्ट्रा फोर्स की आवश्यकता है। इसके लिए मास्टर सर्वशक्तिवान, मास्टर नॉलेजफुल के साथ-साथ चेकिंग मास्टर बनो। नॉलेज द्वारा स्वयं में शक्ति भरो, मनन शक्ति को बढ़ाओ तो शक्ति सम्पन्न बन जायेंगे।स्लोगन:-जहाँ सर्व प्राप्तियां हैं वहाँ प्रसन्नता है।
ये अव्यक्त इशारे – अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
अगर देने के बाद यह भी संकल्प आता है कि मैंने इतना दिया, मुझे इससे कुछ मान-शान वा महिमा मिलनी चाहिए, तो यह भी लेने की भावना हुई। दाता के बच्चे अगर यह लेने का संकल्प भी करते हैं तो दाता नहीं हुए। यह भी लेना, देने वाले के आगे शोभता नहीं है।
“सत्य बाप से नर से नारायण बनने की सच्ची नॉलेज”
नीचे दिए गए प्रश्न–उत्तर मुरली के मुख्य बिंदुओं के आधार पर तैयार किए गए हैं।
1. प्रश्न: तुम बच्चों को अपने गृहस्थ व्यवहार में बहुत-बहुत सम्भाल कर चलना है—क्यों?
उत्तर: क्योंकि तुम्हारी गति-मति सबसे न्यारी है। तुम्हारा ज्ञान और सम्बन्ध गुप्त है। इसलिए विशाल बुद्धि बनकर, युक्ति से चलते हुए लौकिक सम्बन्धों को भी निभाना है और अन्दर से समझना है कि हम सब आत्माएँ भाई-भाई हैं।
2. प्रश्न: बाप बच्चों को सबसे पहले कौन-सी मुख्य बात समझाने के लिए कहते हैं?
उत्तर: सबसे पहले परमपिता परमात्मा का परिचय देना है—कि हमें पढ़ाने वाला भगवान है और वही ज्ञान सागर, पतित-पावन तथा सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान देने वाला है।
3. प्रश्न: तुम यहाँ किस उद्देश्य से आये हो?
उत्तर: नर से नारायण बनने की सच्ची नॉलेज सुनने और राजयोग सीखकर पावन बन पावन दुनिया के अधिकारी बनने आये हैं।
4. प्रश्न: बाप को सबसे बड़ी अथॉरिटी क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि परमपिता परमात्मा ही सर्वोच्च ज्ञानदाता और सत्य स्वरूप हैं। वही सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त का राज समझाते हैं।
5. प्रश्न: संशय बुद्धि बनने का क्या परिणाम होता है?
उत्तर: संशय आने से बाप और पढ़ाई से सम्बन्ध कमजोर हो जाता है। मुरली में समझाया गया है कि संशय बुद्धि बनने से बच्चे पुरुषार्थ में ढीले पड़ जाते हैं और बाप को छोड़ने की स्थिति तक पहुँच सकते हैं।
6. प्रश्न: बाप के अनुसार जगतजीत बनने के लिए किस पर जीत पानी है?
उत्तर: काम सहित विकारों पर जीत पानी है। बाप कहते हैं कि विकारों पर विजय प्राप्त करने से जगतजीत बन सकते हैं।
7. प्रश्न: पावन बनने वालों को क्या प्राप्ति होती है?
उत्तर: जो आत्माएँ पावन बनती हैं, वे पावन दुनिया अर्थात् सतयुग में जाती हैं और वहाँ अपना राज्य-पार्ट बजाती हैं।
8. प्रश्न: सुखधाम और शान्तिधाम को किस रूप में समझाया गया है?
उत्तर: शान्तिधाम आत्माओं का स्वीट होम है, जहाँ से आत्माएँ अपना पार्ट बजाने आती हैं। सुखधाम को वाइसलेस वर्ल्ड अर्थात् सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया कहा गया है।
9. प्रश्न: बाप को लिबरेटर और गाइड क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि जब सभी एक्टर्स अपना पार्ट बजाने के लिए आ जाते हैं, तब बाप आकर आत्माओं को वापस शान्तिधाम ले जाते हैं। इसलिए उन्हें लिबरेटर और गाइड कहा जाता है।
10. प्रश्न: बच्चों को गृहस्थ व्यवहार छोड़ने के बारे में क्या शिक्षा दी गई है?
उत्तर: गृहस्थ व्यवहार छोड़ना नहीं है। लौकिक सम्बन्धों को निभाते हुए बुद्धि को बेहद के बाप से जोड़कर चलना है।
11. प्रश्न: ज्ञान को गुप्त रखने के लिए किस बात की आवश्यकता है?
उत्तर: युक्ति और विशाल बुद्धि की आवश्यकता है। बाहरी व्यवहार में सम्बन्धों को उचित नाम से ही सम्बोधित करना है, लेकिन बुद्धि में आत्मिक सम्बन्ध की स्मृति रखनी है।
12. प्रश्न: सतयुग में कौन-सी दुनिया होती है?
उत्तर: सतयुग को पावन, वाइसलेस और निर्विकारी दुनिया कहा जाता है। वहाँ देवी-देवता रहते हैं और सुखधाम की स्थापना होती है।
13. प्रश्न: शिव जयन्ती और श्रीकृष्ण जयन्ती के बीच क्या सम्बन्ध समझाया गया है?
उत्तर: पहले परमात्मा शिव का अवतरण होता है और वे राजयोग की शिक्षा देकर नई दुनिया की स्थापना कराते हैं। उसके बाद सतयुग में श्रीकृष्ण का जन्म होता है। इसलिए शिव जयन्ती के बाद श्रीकृष्ण जयन्ती आती है।
14. प्रश्न: कृष्णपुरी और कंसपुरी से क्या तात्पर्य समझाया गया है?
उत्तर: कृष्णपुरी नई, पावन और सतयुगी दुनिया का प्रतीक है, जबकि कंसपुरी पुरानी, विकारी दुनिया को कहा गया है। पुरानी दुनिया के परिवर्तन के बाद नई दुनिया की स्थापना होती है।
15. प्रश्न: रावण पर जीत कैसे प्राप्त करनी है?
उत्तर: किसी बाहरी लड़ाई या हिंसा से नहीं, बल्कि बाप की याद और राजयोग द्वारा अपने विकारों पर विजय प्राप्त करनी है। यही अहिंसक विजय है।
16. प्रश्न: बाप से बुद्धि का योग लगाने से क्या होता है?
उत्तर: बाप समझाते हैं कि बुद्धि का योग परमपिता परमात्मा से लगाने से विकर्म विनाश होते हैं और आत्मा पतित से पावन बनने की ओर बढ़ती है।
17. प्रश्न: बाप से वर्सा कौन प्राप्त करता है?
उत्तर: जो बच्चे अच्छी रीति पढ़ते हैं, बाप को याद करते हैं और राजयोग का पुरुषार्थ करते हैं, वे बाप से वर्सा प्राप्त करते हैं।
18. प्रश्न: इस समय भारत की स्थिति को किस प्रकार समझाया गया है?
उत्तर: वर्तमान समय को पुरानी, पतित दुनिया का समय बताया गया है, जबकि सतयुग की पावन दुनिया की स्थापना होनी है। इसलिए बच्चों को पावन बनने का पुरुषार्थ करना है।
19. प्रश्न: कमजोर संस्कारों को समाप्त करने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: केवल नॉलेज से संस्कारों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। नॉलेज के साथ लाइट और माइट की शक्ति चाहिए। मनन शक्ति बढ़ाकर, स्वयं को चेकिंग मास्टर बनाकर और नॉलेज द्वारा शक्ति भरकर कमजोर संस्कारों को समाप्त करना है।
20. प्रश्न: दाता स्वरूप की पहचान क्या है?
उत्तर: सच्चा दाता देने के बाद बदले में मान, शान या महिमा की इच्छा नहीं रखता। यदि देने के बाद कुछ पाने की भावना आती है, तो वह दाता स्वरूप नहीं रहता।
21. प्रश्न: इस मुरली का मुख्य धारणा बिंदु क्या है?
उत्तर: सतयुग की स्थापना के समय पावन बनना है, बाप और बाप के कार्य में संशय नहीं रखना है तथा गुप्त ज्ञान और सम्बन्ध को समझकर लौकिक व्यवहार में युक्ति और विशाल बुद्धि से चलना है।
22. प्रश्न: मुरली का वरदान क्या है?
उत्तर: “नॉलेज की लाइट-माइट द्वारा कमजोर संस्कारों को समाप्त करने वाले शक्ति सम्पन्न भव।” नॉलेज के साथ मनन शक्ति और आत्मिक शक्ति को बढ़ाकर मास्टर सर्वशक्तिवान और चेकिंग मास्टर बनना है।
23. प्रश्न: आज का स्लोगन क्या है?
उत्तर: “जहाँ सर्व प्राप्तियां हैं वहाँ प्रसन्नता है।”
24. प्रश्न: अव्यक्त इशारे के अनुसार दाता स्वरूप को कैसे प्रत्यक्ष करना है?
उत्तर: देते समय यह संकल्प नहीं होना चाहिए कि मैंने इतना दिया है, इसलिए मुझे मान-शान या महिमा मिलनी चाहिए। सच्चे दाता का स्वरूप लेने की इच्छा से रहित होता है।
Disclaimer (डिस्क्लेमर):यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्रस्तुत प्रातः मुरली के अध्ययन एवं चिंतन के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दिए गए विचार एवं शिक्षाएँ ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक दृष्टिकोण के संदर्भ में प्रस्तुत की गई हैं। यह सामग्री व्यक्तिगत आध्यात्मिक चिंतन और समझ के लिए है। दर्शक इन शिक्षाओं को अपने विवेक एवं समझ के अनुसार ग्रहण करें।
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