Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 25-09-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – तत्वों सहित सभी मनुष्य मात्र को बदलने वाली युनिवर्सिटी केवल एक ही है, यहाँ से ही सबकी सद्गति होती है” | |
| प्रश्नः- | बाप में निश्चय होते ही कौन सी राय फौरन अमल में लानी चाहिए? |
| उत्तर:- | 1- जब निश्चय हुआ कि बाप आया है तो बाप की पहली-पहली राय यह है कि इन आंखों से जो कुछ देखते हो उसे भूल जाओ। एक मेरी मत पर चलो। इस राय को फौरन अमल में लाना चाहिए। 2- जब तुम बेहद के बाप के बने हो तो पतितों के साथ तुम्हारी लेन-देन नहीं होनी चाहिए। निश्चय बुद्धि बच्चों को कभी किसी बात में संशय नहीं आ सकता। |
ओम् शान्ति। यह घर का घर भी है और युनिवर्सिटी भी है। इसको ही गॉड फादरली वर्ल्ड युनिवर्सिटी कहा जाता है क्योंकि सारी दुनिया के मनुष्य मात्र की सद्गति होती है। रीयल वर्ल्ड युनिवर्सिटी यह है। घर का घर भी है। मात-पिता के सम्मुख बैठे हैं फिर युनिवर्सिटी भी है। स्प्रीचुअल फादर बैठा हुआ है। यह रूहानी नॉलेज है जो रूहानी बाप द्वारा मिलती है। स्प्रीचुअल नॉलेज सिवाए स्प्रीचुअल फादर के और कोई मनुष्य दे नहीं सकते। उनको ही ज्ञान का सागर कहा जाता है और ज्ञान से ही सद्गति होती है इसलिए ज्ञान सागर, सर्व का सद्गति दाता एक बाप ही है। बाप द्वारा सर्व युनिवर्स के मनुष्य तो क्या परन्तु हर चीज़ 5 तत्व भी सतोप्रधान बन जाते हैं। सबकी सद्गति होती है। यह बातें बड़ी समझने की हैं। अभी सबकी सद्गति होनी है। पुरानी दुनिया और दुनिया में रहने वाले सब चेन्ज हो जायेंगे। जो कुछ यहाँ देखते हो वह सब बदलकर नया होने का है। गाया भी जाता है – यहाँ है झूठी माया, झूठी काया… यह झूठ खण्ड बन जाता है। भारत सचखण्ड था, अभी झूठ खण्ड है। रचयिता और रचना के बारे में जो मनुष्य कहेंगे वह झूठ। अभी तुम बाप द्वारा जानते हो – भगवानुवाच। भगवान एक बाप है ना। वह है निराकार, असुल में तो सब आत्मायें निराकार हैं फिर यहाँ साकार रूप लेती हैं। वहाँ आकार नहीं है। आत्मायें मूलवतन वा ब्रह्म महतत्व में निवास करती हैं। वह है हम आत्माओं का घर, ब्रह्म महतत्व। यह आकाश तत्व है, जहाँ साकारी पार्ट चलता है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है, इसका अर्थ भी समझते नहीं, कहते हैं रिपीट होती है। गोल्डन एज, सिल्वर… फिर क्या? फिर गोल्डन एज जरूर आयेगी। संगमयुग एक ही होता है। सतयुग, त्रेता वा त्रेता और द्वापर का संगम नहीं कहा जाता, वह रांग हो जाता है। बाप कहते हैं – मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ। मुझे बुलाते ही तब हैं जब पतित बनते हैं। कहते हैं आप पावन बनाने आओ। पावन होते ही हैं सतयुग में। अभी है संगम, इनको कल्याणकारी संगमयुग कहा जाता है। आत्मा और परमात्मा के मिलन का संगम, इनको कुम्भ भी कहा जाता है। वह फिर दिखाते हैं नदियों का मेला। दो नदियां तो हैं, तीसरी फिर गुप्त नदी कहते हैं। यह भी झूठ। गुप्त नदी कोई हो सकती है क्या? साइंस वाले भी नहीं मानेंगे कि कोई गुप्त नदी हो सकती है। तीर मारा गंगा निकल आई, यह सब है झूठ। गाया हुआ है ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। यह अक्षर पकड़ लिया है परन्तु अर्थ नहीं समझते हैं। पहले-पहले है ज्ञान-दिन सुख, फिर है भक्ति-रात दु:ख। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। अब एक की तो हो न सके, बहुत होंगे ना। दिन होता है आधाकल्प का, फिर रात भी होती है आधाकल्प की। फिर होता है सारी पुरानी दुनिया से वैराग्य।
बाप कहते हैं – देह सहित जो कुछ भी तुम इन आंखों से देखते हो उनको ज्ञान से भूलना है। धन्धा आदि सब करना हैं। बच्चों को सम्भालना है। परन्तु बुद्धि का योग एक से लगाना है। आधाकल्प तुम रावण की मत पर चलते हो। अब बाप का बने हो तो जो कुछ करो सो बाप की राय से करो। तुम्हारा लेन-देन इतना समय पतितों से चला आया है, उसका नतीजा क्या हुआ है। दिन-प्रतिदिन पतित ही बनते आये हो क्योंकि भक्ति-मार्ग है ही उतरती कला का मार्ग। सतोप्रधान, सतो रजो तमो में आना होता है। उतरना ही है जरूर। इससे कोई छुड़ा न सके। लक्ष्मी-नारायण के भी 84 जन्म बताये हैं ना। अंग्रेजी के अक्षर बड़े अच्छे हैं। गोल्डन एज, सिल्वर एज … ऐसे खाद पड़ती जाती है। इस समय आकर आइरन एजेड बने हैं। गोल्डन एज में नई दुनिया थी, नया भारत था। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। कल की बात है। शास्त्रों में लिख दिया है लाखों वर्ष। अब बाप कहते हैं तुम्हारे शास्त्र राइट हैं या मैं राइट हूँ? बाप को कहा जाता है – वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी। जो वेद-शास्त्र बहुत पढ़ते हैं उनको अथॉरिटी कहा जाता है। बाप कहते हैं – यह सब भक्ति मार्ग की अथॉरिटी हैं। ज्ञान के लिए तो मेरा गायन करते हैं – आप ज्ञान के सागर हो, हम नहीं हैं। मनुष्य सब भक्ति के सागर में डूबे हुए हैं। सतयुग में कोई विकार में जाते नहीं। कलियुग में तो मनुष्य आदि-मध्य-अन्त दु:खी होते रहते हैं। बाप ने कल्प पहले भी ऐसे समझाया था, अब फिर समझा रहे हैं। बच्चे समझते हैं कल्प पहले भी बेहद के बाप से वर्सा लिया था अब फिर पढ़कर पा रहे हैं। समय बहुत थोड़ा है। यह तो विनाश हो जायेंगे इसलिए बेहद के बाप से पूरा वर्सा लेना चाहिए। वह बाप, टीचर, गुरू भी है। सुप्रीम फादर, सुप्रीम टीचर भी है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे रिपीट होती है, सारी नॉलेज देते हैं। यह और कोई समझा न सके। अभी बच्चे समझते हैं 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक, यह वही गीता का भगवान है, श्रीकृष्ण नहीं है। मनुष्य को भगवान नहीं कहा जाता। भगवान तो है ही पुनर्जन्म रहित। इनको दिव्य जन्म कहते हैं। नहीं तो मैं निराकार बोलूँ कैसे। मुझे तो जरूर आकर पावन बनाना है तो युक्ति बतानी पड़े। तुम जानते हो हम आत्मा अमर हैं। रावण राज्य में तुम सब देह-अभिमानी बन पड़े हो। सतयुग में देही-अभिमानी होते हैं। बाकी परमात्मा रचता और उनकी रचना को वहाँ भी कोई नहीं जानते। अगर वहाँ भी मालूम हो कि हमको फिर ऐसे गिरना है तो राजाई की खुशी ही न रहे इसलिए बाप कहते हैं – यह नॉलेज वहाँ प्राय:लोप हो जाती है, जबकि तुम्हारी सद्गति हो जाती है फिर ज्ञान की दरकार ही नहीं। ज्ञान की दरकार ही दुर्गति में होती है। इस समय सब दुर्गति में हैं, सब काम-चिता पर बैठ जल मरे हैं। बाप कहते हैं – मेरे बच्चे, आत्माएं जो शरीर द्वारा आकर पार्ट बजाती हैं, वह काम-चिता पर बैठ तमोप्रधान बन पड़ी हैं। बुलाते भी हैं कि हम पतित बन पड़े हैं। पतित बनते ही हैं काम-चिता से। क्रोध वा लोभ से पतित नहीं बनते हैं। साधू-सन्त आदि पावन हैं, देवतायें पावन हैं तो पतित मनुष्य जाकर माथा टेकते हैं। गाते भी हैं आप निर्विकारी, हम विकारी हैं। वाइसलेस वर्ल्ड, विशश वर्ल्ड गाया जाता है ना। भारत ही वाइसलेस वर्ल्ड था। अब विशश है। भारत के साथ सारा वर्ल्ड ही विशश है। वाइसलेस वर्ल्ड में आज से 5 हजार वर्ष पहले एक ही धर्म था, पवित्रता थी तो पीस, प्रासपर्टी तीनों ही थे। प्योरिटी है फर्स्ट। अभी प्योरिटी नहीं है तो पीस प्रासपर्टी भी नहीं है।
ज्ञान का सागर, सुख का सागर, प्यार का सागर एक ही बाप है। तुमको भी ऐसा प्यारा बनाते हैं। इन लक्ष्मी-नारायण की राजधानी में सब प्यारे हैं। मनुष्य मात्र जानवर आदि सब प्यारे हैं। शेर बकरी इकट्ठे जल पीते हैं। यह एक दृष्टान्त है। वहाँ ऐसी चीज़ गन्द करने वाली होती नहीं। यहाँ बीमारियां, मच्छर आदि बहुत हैं। वहाँ ऐसी चीज़ होती नहीं। साहूकार आदमियों के पास फर्नीचर भी फर्स्टक्लास होता है। गरीबों का फर्नीचर भी साधारण। भारत अभी गरीब है, कितना किचड़ा लगा हुआ है। सतयुग में कितनी सफाई रहती है। सोने के महल आदि कितने फर्स्टक्लास होंगे। वैकुण्ठ की गायें भी देखो कितनी फर्स्टक्लास होती हैं। श्रीकृष्ण को कितनी अच्छी गायें दिखाते हैं। कृष्णपुरी में गायें तो होंगी ना। वहाँ चीजें कितनी फर्स्टक्लास होती हैं। हेविन तो फिर क्या! इस पुरानी छी-छी दुनिया में तो बहुत किचड़ा है। यह सब इस ज्ञान यज्ञ में स्वाहा हो जायेगा। कैसे-कैसे बॉम्ब्स बनाते रहते हैं। बॉम्ब फेंके तो आग निकल आये। आजकल तो ऐसे जीवाणु भी डालते हैं, ऐसा विनाश करते हैं, जो बेहद में खत्म हो जायें। हॉस्पिटल आदि तो रहेंगे नहीं, जो दवाई आदि कर सकें। बाप कहते हैं – बच्चों को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए इसलिए गाया हुआ है नेचुरल कैलेमिटीज़, मूसलधार बरसात। बच्चों ने विनाश का साक्षात्कार भी किया है। बुद्धि भी कहती है विनाश तो जरूर होना है। कोई कहे विनाश का साक्षात्कार हो तब मानें, अच्छा नहीं मानों, तुम्हारी मर्जी। कोई कहे हम आत्मा का साक्षात्कार करें तब हम मानें। अच्छा आत्मा तो बिन्दी है। देख लिया तो क्या हुआ! क्या इससे सद्गति होगी? कहते हैं – परमात्मा अखण्ड ज्योति स्वरूप, हजारों सूर्य से तेजोमय है। परन्तु ऐसे है नहीं। गीता में लिखा है – अर्जुन ने कहा बस करो, हम सहन नहीं कर सकता हूँ। ऐसी बात नहीं है। बाप को बच्चे देखें और कहें हम सहन नहीं कर सकते, ऐसे कुछ भी है नहीं। जैसी आत्मा है वैसे परमपिता परमात्मा बाप है। सिर्फ वह ज्ञान का सागर है। तुम्हारे में भी ज्ञान है। बाप ही आकर पढ़ाते हैं और कोई बात ही नहीं, जो-जो जिस भावना से याद करते हैं, वह भावना पूरी कर देता हूँ। वह भी ड्रामा में नूँध है। बाकी भगवान किसको मिल नहीं सकता। मीरा साक्षात्कार में कितना खुश होती थी। दूसरे जन्म में भी भक्तिन बनी होगी। वैकुण्ठ में तो जा नहीं सकती। अभी तुम बच्चे वैकुण्ठ में जाने की तैयारी कर रहे हो। जानते हो हम वैकुण्ठ, कृष्णपुरी के मालिक बन रहे हैं। यहाँ तो सब नर्क के मालिक हैं। हिस्ट्री-जाग्रॉफी रिपीट होगी ना।
तुम बच्चे जानते हो हम अपना राज्य-भाग्य फिर से ले रहे हैं। यह है राजयोग बल। बाहुबल की लड़ाईयां तो अनेक बार, अनेक जन्म चली हैं। योगबल से तुम्हारी चढ़ती कला है। जानते हो बरोबर स्वर्ग की राजधानी स्थापन हो रही है। जिन्होंने कल्प पहले पुरषार्थ किया होगा वैसे ही करेंगे। तुमको हार्टफेल नहीं होना चाहिए। जो पक्के निश्चयबुद्धि हैं, उनको कभी संशय नहीं आ सकता। संशयबुद्धि भी होते जरूर हैं। बाबा ने कहा है आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती… अहो माया तुम इन पर जीत पा लेती हो। माया बहुत बलवान है। अच्छे-अच्छे फर्स्टक्लास सर्विस करने वाले, सेन्टर चलाने वाले को भी माया थप्पड़ मार देती है। लिखते हैं बाबा शादी कर मुँह काला कर दिया। काम-कटारी से हमने हार खा ली। अब तो बाबा आपके सामने आने लायक नहीं रहे हैं। फिर लिखते हैं बाबा सम्मुख आयें। बाबा लिखते हैं काला मुँह किया अब यहाँ नहीं आ सकते हो। यहाँ आकर क्या करेंगे। फिर भी वहाँ रहकर पुरषार्थ करो। एक बार गिरा सो गिरा। ऐसे नहीं राजाई पद पा सकेंगे। कहा जाता है ना – चढ़े तो चाखे वैकुण्ठ रस, गिरे तो एकदम चण्डाल… हड्ड गुड्ड टूट पड़ते हैं। 5 मंजिल से गिरते हैं फिर कोई-कोई सच लिखते हैं। कोई तो सुनाते ही नहीं हैं। इन्द्रप्रस्थ की परियों का भी मिसाल है ना। यह है सारे ज्ञान की बात। इस सभा में कोई पतित को बैठना, हुक्म नहीं है। परन्तु कोई हालत में बिठाना होता है। पतित ही तो आयेंगे ना। अभी तो देखो कितनी द्रोपदियाँ पुकारती हैं, कहती हैं बाबा हमको नंगन करने से बचाओ। बांधेलियों का भी पार्ट चलता है। कामेशु, क्रोधेशु होते हैं ना। बड़ी खिटपिट होती है। बाबा के पास समाचार आते हैं। बेहद का बाप कहते हैं बच्चे इन पर जीत पहनो। अब पवित्र रहो, मुझे याद करो तो गैरन्टी है विश्व के मालिक बनोगे। अखबारों में भी खुद डालते हैं कि कोई प्रेरक है जो हमसे यह बाम्ब्स आदि बनवाते हैं, इससे अपने ही कुल का नाश होगा। परन्तु क्या करें ड्रामा में नूँध है, दिन-प्रतिदिन बनाते जाते हैं। टाइम बहुत तो नहीं है ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सतयुगी प्यार की राजधानी में चलने के लिए बहुत-बहुत प्यारा बनना है। राजाई पद के लिए पावन जरूर बनना है। पवित्रता फर्स्ट है इसलिए काम महाशत्रु पर विजय पानी है।
2) इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैरागी बनने के लिए इन आंखों से देह सहित जो कुछ दिखाई देता है, उसे देखते भी नहीं देखना है। हर कदम पर बाप से राय लेकर चलना है।
| वरदान:- | सारे वृक्ष की नॉलेज को स्मृति में रख तपस्या करने वाले सच्चे तपस्वी व सेवाधारी भव भक्ति मार्ग में दिखाते हैं कि तपस्वी वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करते हैं। इसका भी रहस्य है। आप बच्चों का निवास इस सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष की जड़ में है। वृक्ष के नीचे बैठने से सारे वृक्ष की नॉलेज बुद्धि में स्वत: रहती है। तो सारे वृक्ष की नॉलेज स्मृति में रख साक्षी होकर इस वृक्ष को देखो। तो यह नशा, खुशी दिलायेगा और इससे बैटरी चार्ज हो जायेगी। फिर सेवा करते भी तपस्या साथ-साथ रहेगी। |
| स्लोगन:- | तन की बीमारी कोई बड़ी बात नहीं लेकिन मन कभी बीमार न हो। |
ये अव्यक्त इशारे – अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
दाता के बच्चे सदा सर्व सम्पत्तिवान होते हैं। कभी भक्तपन वा भिखारीपन के संस्कार इमर्ज न हो। ऐसा संकल्प भी न आये कि बाबा मुझे कुछ मदद करे, आशीर्वाद दे। बाबा मुझे सहयोग चाहिए, शक्ति चाहिए। यह चाहिए शब्द दाता, विधाता, वरदाता बच्चों के आगे शोभता नहीं। दाता के बच्चे सर्व शक्तियों से सम्पन्न होते हैं। यही सम्पन्न स्थिति सम्पूर्ण स्थिति को समीप लाती है।
“एक ही गॉड फादरली वर्ल्ड यूनिवर्सिटी से सबकी सद्गति”
नीचे मुरली के मुख्य बिंदुओं के आधार पर प्रश्न–उत्तर तैयार किए गए हैं।
1. प्रश्न: बाप में निश्चय होते ही कौन-सी राय फौरन अमल में लानी चाहिए?
उत्तर: जब निश्चय हो गया कि बाप आया है, तो बाप की पहली राय है—इन आँखों से जो कुछ देखते हो, उससे बुद्धियोग हटाकर एक बाप की मत पर चलो। हर कार्य बाप की राय के अनुसार करना चाहिए।
2. प्रश्न: बेहद के बाप के बनने के बाद पतितों के साथ लेन-देन के बारे में क्या समझाया गया है?
उत्तर: जब तुम बेहद के बाप के बच्चे बने हो तो पतितों के साथ अनावश्यक लेन-देन नहीं रखना चाहिए। बाप की श्रीमत पर चलते हुए अपने जीवन को पावन बनाना है।
3. प्रश्न: इस स्थान को गॉड फादरली वर्ल्ड यूनिवर्सिटी क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि यहाँ रूहानी बाप द्वारा रूहानी ज्ञान दिया जाता है और इस ज्ञान से मनुष्य मात्र की सद्गति होती है। इसलिए इसे गॉड फादरली वर्ल्ड यूनिवर्सिटी कहा गया है।
4. प्रश्न: ज्ञान सागर और सर्व की सद्गति दाता किसे कहा जाता है?
उत्तर: परमपिता परमात्मा को ज्ञान का सागर और सर्व की सद्गति दाता कहा जाता है। रूहानी ज्ञान उन्हीं से प्राप्त होता है।
5. प्रश्न: वर्तमान पुरानी दुनिया के बारे में क्या समझाया गया है?
उत्तर: पुरानी दुनिया और उसमें रहने वाले मनुष्यों में परिवर्तन होना है। वर्तमान दुनिया को झूठ खण्ड और पुरानी दुनिया कहा गया है, जबकि भारत को पहले सचखण्ड और पावन दुनिया बताया गया है।
6. प्रश्न: आत्माओं का मूल घर कहाँ है?
उत्तर: आत्माओं का मूल घर शान्तिधाम अर्थात् ब्रह्म महतत्व है। आत्माएँ वहाँ से साकारी दुनिया में अपना पार्ट बजाने आती हैं।
7. प्रश्न: कल्प-कल्प बाप कब आते हैं?
उत्तर: बाप कल्प के संगमयुग में आते हैं। जब संसार पतित बन जाता है और मनुष्य पावन बनाने के लिए परमात्मा को पुकारते हैं, तब बाप आकर राजयोग की शिक्षा देते हैं।
8. प्रश्न: संगमयुग को कल्याणकारी संगमयुग क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि यह आत्मा और परमात्मा के मिलन का समय है। इसी समय परमात्मा आकर ज्ञान और राजयोग द्वारा आत्माओं को पावन बनने तथा सद्गति प्राप्त करने की शिक्षा देते हैं।
9. प्रश्न: ज्ञान और भक्ति में क्या अन्तर बताया गया है?
उत्तर: ज्ञान को दिन और भक्ति को रात कहा गया है। ज्ञान से सुख और सद्गति की प्राप्ति होती है, जबकि भक्ति मार्ग में मनुष्य धीरे-धीरे उतरती कला में आते हैं।
10. प्रश्न: बाप बच्चों को आँखों से दिखाई देने वाली चीज़ों के बारे में क्या शिक्षा देते हैं?
उत्तर: देह सहित जो कुछ आँखों से दिखाई देता है, उससे बुद्धि का मोह हटाना है। संसार के कार्य और जिम्मेदारियाँ निभाते हुए बुद्धियोग एक बाप से लगाना है।
11. प्रश्न: बाप की मत पर चलने का क्या अर्थ है?
उत्तर: हर कार्य करने से पहले बाप की श्रीमत को ध्यान में रखना और उसी के अनुसार जीवन चलाना। आधाकल्प रावण की मत पर चलने के बाद अब बाप की मत पर चलना है।
12. प्रश्न: बाप के अनुसार पतित बनने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: काम-विकार को पतित बनने का मुख्य कारण बताया गया है। काम-चिता पर बैठने से आत्मा तमोप्रधान बनती जाती है।
13. प्रश्न: भारत की प्राचीन विशेषता क्या बताई गई है?
उत्तर: भारत को पहले वाइसलेस वर्ल्ड अर्थात् निर्विकारी दुनिया कहा गया है। वहाँ पवित्रता, शान्ति और समृद्धि थी।
14. प्रश्न: पवित्रता को सबसे पहले क्यों रखा गया है?
उत्तर: क्योंकि पवित्रता के आधार पर ही शान्ति और समृद्धि आती है। इसलिए सतयुगी जीवन प्राप्त करने के लिए पहले पवित्र बनना आवश्यक है।
15. प्रश्न: बाप को सुप्रीम फादर और सुप्रीम टीचर क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि परमात्मा ही आत्माओं के सर्वोच्च पिता हैं और वही आकर सच्चा ज्ञान तथा राजयोग पढ़ाते हैं। वे विश्व की हिस्ट्री-जॉग्राफी और सृष्टि के चक्र का ज्ञान देते हैं।
16. प्रश्न: सतयुग में ज्ञान की आवश्यकता क्यों नहीं रहती?
उत्तर: क्योंकि सतयुग में आत्माओं की सद्गति हो चुकी होती है और वे सुखधाम में रहती हैं। ज्ञान की आवश्यकता मुख्य रूप से उस समय होती है जब आत्माएँ दुर्गति में होती हैं।
17. प्रश्न: बच्चे वैकुण्ठ जाने की तैयारी किस प्रकार कर रहे हैं?
उत्तर: राजयोग का अभ्यास करके, पवित्र बनकर और बाप की याद में रहकर बच्चे वैकुण्ठ अर्थात् कृष्णपुरी के अधिकारी बनने की तैयारी कर रहे हैं।
18. प्रश्न: योगबल और बाहुबल में क्या अन्तर है?
उत्तर: बाहुबल की लड़ाइयाँ अनेक बार हुई हैं, लेकिन योगबल से आत्मा की चढ़ती कला होती है। बाप की याद द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करना योगबल है।
19. प्रश्न: निश्चयबुद्धि बच्चों की निशानी क्या है?
उत्तर: निश्चयबुद्धि बच्चों को बाप और पढ़ाई के प्रति संशय नहीं होता। वे बाप की श्रीमत पर चलते हुए पुरुषार्थ करते रहते हैं और अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होते।
20. प्रश्न: माया के प्रभाव से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: पवित्र रहना, बाप को याद करना और श्रीमत पर चलते रहना चाहिए। बाप की याद से विकारों पर विजय पाने का बल मिलता है।
21. प्रश्न: बाप बच्चों को विश्व का मालिक बनने की गारंटी किस आधार पर देते हैं?
उत्तर: पवित्र रहने और बाप को याद करने के आधार पर। राजयोग द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करके आत्माएँ विश्व की राजधानी के अधिकारी बनती हैं।
22. प्रश्न: सतयुगी प्यार की राजधानी में जाने के लिए मुख्य धारणा क्या है?
उत्तर: बहुत-बहुत प्यारा बनना और राजाई पद के लिए पावन बनना है। पवित्रता फर्स्ट है, इसलिए काम महाशत्रु पर विजय पानी है।
23. प्रश्न: बेहद का वैराग्य किस प्रकार धारण करना है?
उत्तर: संसार में रहते हुए भी देह और दिखाई देने वाली वस्तुओं से आसक्ति कम करनी है तथा हर कदम पर बाप से राय लेकर चलना है। बुद्धि का योग एक बाप से जोड़ना है।
24. प्रश्न: मुरली के वरदान में सच्चे तपस्वी और सेवाधारी बनने की विधि क्या बताई गई है?
उत्तर: सृष्टि रूपी कल्पवृक्ष की सम्पूर्ण नॉलेज को स्मृति में रखकर साक्षी होकर इस वृक्ष को देखना है। इससे नशा और खुशी रहती है, बैटरी चार्ज होती है और सेवा के साथ तपस्या भी चलती रहती है।
25. प्रश्न: आज का स्लोगन क्या है?
उत्तर: “तन की बीमारी कोई बड़ी बात नहीं लेकिन मन कभी बीमार न हो।”
26. प्रश्न: दाता के बच्चों की पहचान क्या है?
उत्तर: दाता के बच्चे सदा सर्व सम्पत्तिवान होते हैं। उनमें भक्तपन या भिखारीपन के संस्कार इमर्ज नहीं होने चाहिए। “मुझे यह चाहिए” जैसी भावना के बजाय स्वयं को सर्व शक्तियों से सम्पन्न समझना है।
27. प्रश्न: “दाता के बच्चों के आगे ‘यह चाहिए’ शब्द क्यों शोभता नहीं?”
उत्तर: क्योंकि दाता के बच्चे सर्व शक्तियों और सम्पत्तियों से सम्पन्न होते हैं। बार-बार मदद, शक्ति या आशीर्वाद माँगने की भावना सम्पन्न स्थिति के विपरीत है। सम्पन्न स्थिति ही सम्पूर्ण स्थिति को समीप लाती है।
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