MURLI 26-09-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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26-09-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखो तो अवस्था अच्छी रहेगी, चार्ट रखने से कल्याण होता रहेगा”
प्रश्नः- कौन सी स्मृति पुरानी दुनिया से सहज ही किनारा करा देती है?
उत्तर:- अगर यह स्मृति रहे कि हम कल्प-कल्प बाप से बेहद का वर्सा लेते हैं। अभी फिर से हमने शिवबाबा की गोद ली है – वर्सा लेने के लिए। बाबा ने हमें एडाप्ट किया है, हम सच्चे-सच्चे ब्राह्मण बने हैं। शिवबाबा हमें गीता सुना रहे हैं। यही स्मृति पुरानी दुनिया से किनारा करा देगी।

ओम् शान्ति। तुम बच्चे यहाँ बैठे हो शिवबाबा की याद में, तो तुम जानते हो वह हमको सुखधाम का मालिक फिर से बना रहे हैं। बच्चों की बुद्धि में अन्दर कितनी खुशी होनी चाहिए, यहाँ बैठे बच्चों को खजाना मिलता है ना। अनेक प्रकार के कॉलेजों में, युनिवर्सिटीज़ में किसी की भी बुद्धि में यह बातें नहीं रहती। तुम ही जानते हो कि बाबा हमको स्वर्ग का मालिक बना रहे हैं। यह खुशी रहनी चाहिए ना। इस समय और सभी ख्यालात निकालकर एक बाप को ही याद करना है। यहाँ जब बैठते हो तो बुद्धि में नशा रहना चाहिए कि हम अभी सुखधाम का मालिक बन रहे हैं। सुख और शान्ति का वर्सा हम कल्प-कल्प लेते हैं। मनुष्य तो कुछ नहीं जानते। कल्प पहले भी बहुत मनुष्य अज्ञान के अन्धेरे में कुम्भकरण की नींद में सोये खत्म हो गये थे। फिर भी ऐसे ही होगा। बच्चे समझते हैं हमको बाप ने एडाप्ट किया है वा हमने शिवबाबा की धर्म गोद ली है। जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हैं। अभी हम ब्राह्मण हैं। हम सच्चा-सच्चा गीता का पाठ सुन रहे हैं। हम बाबा से फिर से राजयोग और ज्ञान बल से वर्सा लेते हैं। ऐसे-ऐसे ख्यालात अन्दर में आने चाहिए ना। बाप भी आकर खुशी की बातें बतलाते हैं ना। बाप जानते हैं बच्चे काम-चिता पर बैठ काले भस्मीभूत हो गये हैं इसलिए अमरलोक से मृत्युलोक में आता हूँ। तुम फिर कहते हो हम मृत्युलोक से अमरलोक जाते हैं। बाप कहते हैं – हम मृत्युलोक में जाता हूँ, जहाँ सबकी मृत्यु हो गई है, उनको फिर से अमरलोक में ले जाता हूँ। शास्त्रों में तो क्या-क्या लिख दिया है। वह सर्वशक्तिमान् है, जो चाहे सो कर सकते हैं। परन्तु बच्चे जानते हैं, उनको बुलाया ही जाता है हे पतित-पावन बाबा आओ, हमको आकर पतित से पावन बनाओ। दु:ख हरकर सुख दो, इसमें जादू की कोई बात नहीं है। बाप आते ही हैं कांटों से फूल बनाने।

तुम जानते हो हम ही सुखधाम के देवता थे, सतोप्रधान थे। हर एक को सतोप्रधान से तमोप्रधान में आना ही है। बच्चों को यहाँ बैठने समय तो और ही मज़ा आना चाहिए। याद आना चाहिए। बाप को ही सारी दुनिया याद करती है। हे लिबरेटर, गाइड, हे पतित-पावन आओ। बुलाते तब हैं जबकि रावणराज्य में हैं। सतयुग में थोड़ेही बुलाते, यह बातें बड़ी सहज समझने की हैं। यह किसने सुनाई हैं? बाप की भी महिमा करेंगे, टीचर, सतगुरू की भी महिमा करेंगे – तीनों एक ही हैं। यह तुम्हारी बुद्धि में है। यह बाप, टीचर, सतगुरू भी है। शिवबाबा का धन्धा ही है पतितों को पावन बनाना। पतित जरूर दु:खी होंगे। सतोप्रधान सुखी, तमोप्रधान दु:खी होते हैं। इन देवताओं का कितना सतोगुणी स्वभाव है। यहाँ मनुष्यों का कलियुगी तमोगुणी स्वभाव है। बाकी हाँ, मनुष्य नम्बरवार अच्छे व बुरे होते हैं। सतयुग में ऐसे कभी नहीं कहेंगे कि यह खराब है। यह ऐसा है। वहाँ बुरे लक्षण कोई होते नहीं। वह है ही दैवी सम्प्रदाय। हाँ, साहूकार और गरीब हो सकते हैं। बाकी अच्छे वा बुरे गुणों की भेंट वहाँ होती नहीं, सभी सुखी रहते हैं। दु:ख की बात नहीं, नाम ही है सुखधाम। तो बच्चों को बाप से पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ करना चाहिए। अपना चित्र और लक्ष्मी-नारायण का चित्र भी रख सकते हो। कहेंगे कोई तो इन्हों को सिखलाने वाला होगा। यह तो भगवानुवाच है ना। भगवान को अपना शरीर नहीं है। वह आकर लोन लेते हैं। गाया भी हुआ है भागीरथ, तो जरूर रथ पर विराजमान है। बैल पर थोड़ेही आयेगा। शिव और शंकर इकट्ठा कर दिया है, तब बैल दे दिया है। तो बाप कहते हैं – तुमको कितना खुश होना चाहिए, हम बाप के बने हैं। बाप भी कहते हैं – तुम हमारे हो। बाप को पद पाने की खुशी नहीं है। टीचर तो टीचर है, उनको पढ़ाना है। बाप कहते हैं – बच्चे, मैं सुख का सागर हूँ। अभी तुमको अतीन्द्रिय सुख भासता है, जब हमने तुमको एडाप्ट किया है। एडाप्शन तो किसम-किसम की होती है। पुरुष भी कन्या को एडाप्ट करते हैं। वह समझती हैं यह हमारा पति है, अभी तुम समझते हो – शिवबाबा ने हमें एडाप्ट किया है। दुनिया में इन बातों को नहीं समझते। उन्हों की वह एडाप्शन है – एक दो पर काम-कटारी चलाने की। समझो कोई राजा बच्चे को गोद में लेता है, एडाप्ट करता है सुख के लिए, परन्तु वह है अल्पकाल का सुख। संन्यासी भी एडाप्ट करते हैं ना। वह कहेंगे यह हमारा गुरू है, वह कहेगा यह हमारा फॉलोअर्स है। कितनी एडाप्शन है। बाप बच्चे को एडाप्ट करते हैं। उनको सुख तो देते हैं फिर शादी कराने से जैसे दु:ख का वर्सा दे देते हैं। गुरू की एडाप्शन कितनी फर्स्टक्लास है। यह फिर है ईश्वर की एडाप्शन, आत्माओं को अपना बनाने की। अभी तुम बच्चों ने सबकी एडाप्शन को देख लिया है। संन्यासियों के होते हुए फिर भी गाते रहते हैं – हे पतित-पावन आओ, आकर हमको एडाप्ट कर पावन बनाओ। सब ब्रदर्स हैं। परन्तु जबकि आकर अपना बनाये ना। कहते हैं बाबा हम दु:खी हो पड़े हैं। रावण राज्य का भी अर्थ नहीं समझते हैं। एफ़ीजी बनाकर जलाते रहते हैं। जैसे कोई दु:ख देते हैं तो समझते हैं इन पर केस चलाना चाहिए। परन्तु यह कब से दुश्मन बना है? आखरीन यह दुश्मन मरेगा या नहीं? इस दुश्मन का तुमको ही मालूम है, उन पर जीत पाने के लिए तुमको एडाप्ट किया जाता है। यह भी तुम बच्चे जानते हो, विनाश होना है, एटामिक बॉम्बस भी बने हुए हैं। इस ज्ञान यज्ञ से ही विनाश ज्वाला निकली है। अभी तुम जानते हो रावण पर विजय पाकर फिर नई सृष्टि पर राज्य करेंगे। बाकी तो सब गुड़ियों का खेल है। रावण की गुड्डी तो बहुत खर्चा कराती है। मनुष्य बहुत पैसे फालतू गँवाते हैं। कितना रात-दिन का फ़र्क है। वह भटकते दु:खी होते, धक्के खाते रहते हैं। और हम अभी श्रीमत पर श्रेष्ठाचारी, सतयुगी स्वराज्य पा रहे हैं। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ सतयुग स्थापन करने वाला शिवबाबा हमको श्रेष्ठ देवता विश्व का मालिक बनाते हैं। श्री श्री शिवबाबा हमको श्री बनाते हैं। श्री श्री सिर्फ एक को ही कहा जाता है। देवताओं को श्री कहा जाता है क्योंकि वह पुनर्जन्म में आते हैं ना। वास्तव में श्री विकारी राजाओं को भी नहीं कह सकते हैं।

अभी तुम्हारी कितनी विशालबुद्धि होनी चाहिए। तुम जानते हो कि हम इस पढ़ाई से डबल सिरताज बनते हैं। हम ही डबल सिरताज थे, अभी तो सिंगल ताज भी नहीं है। पतित हैं ना। यहाँ लाइट का ताज किसको लगा नहीं सकते। इन चित्रों में जहाँ तुम तपस्या में बैठे हो वहाँ लाइट का ताज नहीं देना चाहिए। तुमको डबल सिरताज भविष्य में बनना है। तुम बच्चे जानते हो हम बाबा से डबल सिरताज महाराजा-महारानी बनने के लिए आये हैं। यह खुशी होनी चाहिए। शिवबाबा को याद करना चाहिए तो पतित से पावन बन स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे, इसमें कोई तकलीफ की बात नहीं है। यहाँ तुम स्टूडेन्ट बैठे हो। वहाँ बाहर मित्र-सम्बन्धियों आदि के पास जाने से स्टूडेन्ट लाइफ भूल जाती है। फिर मित्र सम्बन्धी याद आ जाते हैं। माया का फोर्स है ना। हॉस्टल में रहने से पढ़ते अच्छा है। बाहर आने-जाने से संगदोष में खराब होते हैं। यहाँ से बाहर जाते हैं तो फिर स्टूडेन्ट लाइफ का नशा गुम हो जाता है। पढ़ाने वाली ब्राह्मणियों को भी वहाँ बाहर में इतना नशा नहीं रहेगा, जितना यहाँ रहेगा। यह हेड ऑफिस मधुबन है। स्टूडेन्ट टीचर के सामने रहते हैं। उल्टे धन्धे कोई नहीं है। रात-दिन का फ़र्क है। कोई तो सारे दिन में शिवबाबा को याद भी नहीं करते हैं। शिवबाबा के मददगार नहीं बनते हैं। शिवबाबा के बच्चे बने हो तो सर्विस करो। अगर सर्विस नहीं करते तो गोया वह कपूत बच्चे हैं। बाबा तो समझते हैं ना। इनका फ़र्ज है कहना – मुझे याद करो। फॉलो करो तो बहुत-बहुत कल्याण है। विकारी सम्बन्ध तो भ्रष्टाचारी हैं। उनको छोड़ते जाओ, उनसे संग नहीं रखो। बाप तो समझाते हैं परन्तु किसकी तकदीर में भी हो ना। बाबा कहे – चार्ट रखना है, इनसे भी बहुत कल्याण होगा। कोई घण्टा भी मुश्किल याद में रहता होगा। 8 घण्टा तो अन्त में पहुँचना है। कर्म-योगी तो हो ना। कोई-कोई को उमंग कभी-कभी आता है तो चार्ट रखते हैं। यह अच्छा है। जितना बाप को याद करेंगे फायदा ही है। गाया हुआ है – अन्तकाल जो हरि को सुमिरे… वल-वल का अर्थ क्या है? जो अच्छी रीति याद नहीं करते हैं, तो जन्म-जन्मान्तर का बोझा जो है, वह वल-वल (बार-बार) जन्म देकर साक्षात्कार कराए फिर सजा देते हैं। जैसे काशी कलवट खाते हैं तो झट पापों का साक्षात्कार होता है। महसूस करते हैं हम पापों की सजा खाते हैं। बहुत मोचरा खाने वाले हैं। बाबा की सर्विस में जो विघ्न डालते हैं, वह सजाओं के लायक हैं। बाप की सर्विस में बाधा डालते हैं, जिसका राइट हैण्ड धर्मराज है। बाप कहते हैं – अपने साथ प्रतिज्ञा करो क्योंकि बाप की याद से ही तुम पावन बनेंगे। नहीं तो नहीं। बाप प्रतिज्ञा कराते हैं, करो न करो, तुम्हारी मर्जी। जो करेगा सो पायेगा। बहुत हैं जो प्रतिज्ञा करते हैं, फिर भी बुरे काम करते रहते हैं। भक्ति मार्ग में गाते रहते हैं – मेरा तो एक दूसरा न कोई। परन्तु वह बात अभी बुद्धि में आती है कि आत्मा क्यों ऐसे गाती आई है। सारा दिन गाते रहते हैं मेरा तो एक गिरधर गोपाल… यह तो संगम पर बाप आये तब अपने घर ले जाए, कृष्णपुरी में जाने के लिए तुम पढ़ते हो ना। प्रिन्सेज़ कॉलेज होते हैं, जहाँ प्रिन्स-प्रिन्सेज पढ़ते हैं। वह तो है हद की बात। कभी बीमार पड़ते, कभी मर भी जाते। यह तो है प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने की गॉड फादरली युनिवर्सिटी। राजयोग है ना। तुम नर से नारायण बनते हो। तुम बाप से वर्सा ले सतयुग का प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हो।

बाप तुम बच्चों को कितनी मज़े की बातें बैठ सुनाते हैं। याद रहना चाहिए ना। कोई तो यहाँ से बाहर निकले तो फँस जाते हैं। बाप को याद भी नम्बरवार करते हैं। जो जास्ती याद करते होंगे वह औरों को भी याद कराते होंगे। बुद्धि में यही रहना चाहिए कि कैसे बहुतों का कल्याण करें। बाहर वाले प्रजा में दास-दासी, यहाँ वाले फिर राजाओं में दास-दासी बनेंगे। आगे चल सब साक्षात्कार होता जायेगा। तुम भी फील करेंगे बरोबर हमने पूरा पुरुषार्थ नहीं किया है, बहुत चमत्कार देखेंगे। जो अच्छी रीति पढ़ेंगे वही नवाब बनेंगे। बाप कितना कहते रहते हैं – सेन्टर्स को प्रदर्शनी देता हूँ तो बच्चों को सिखाकर होशियार बनायें। तब बाबा समझेंगे बी.के. सर्विस करना जानती हैं। सर्विस करेंगे तो ऊंच पद पायेंगे, इसलिए बाबा प्रदर्शनी बनाने पर जोर दे रहे हैं। यह चित्र बनाना तो बहुत कॉमन चीज़ है। हिम्मत कर प्रदर्शनी के चित्र बनाने में मदद करनी चाहिए तो समझाने में बच्चों को सहज होगा। बाबा समझते हैं – टीचर्स, मैनेजर्स ठण्डे हैं। कोई-कोई ब्राह्मणियां मैनेजर बनती हैं तो देह-अभिमान आ जाता है। अपने को मिया मिट्ठू समझती हैं। हम बहुत अच्छी चलती हैं। दूसरों से पूछो तो 10 बातें सुनायेंगे। माया बड़ा चक्कर में डालती है। बच्चों को तो सर्विस और सर्विस में रहना चाहिए। बाप रहमदिल, दु:ख हर्ता सुख कर्ता है तो बच्चों को भी बनना है, सिर्फ बाप का परिचय देना है। बाप कहते हैं – मामेकम् याद करो तो नर्कवासी से स्वर्गवासी बन जायेंगे। कितना सहज है। बाप कहते हैं – मुझे याद करो तो पतित से पावन बन तुम शान्तिधाम, सुखधाम में आ जायेंगे। निश्चय हो तो फिर एकदम लिखवा लेना चाहिए। लिखते भी हैं बरोबर ब्रह्माकुमार कुमारियां शिवबाबा से वर्सा लेते हैं, तो समझेंगे ऐसे बाप का तो जरूर बनना चाहिए। शरण पड़ना चाहिए। तुम बाप की शरण पड़े हो ना अर्थात् गोद में आये हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप समान रहमदिल, दु:ख हर्ता सुख कर्ता बनना है।

2) संगदोष से अपनी बहुत-बहुत सम्भाल करनी है। एक बाप को ही फॉलो करना है। बहुतों के कल्याण की सर्विस करनी है। कभी अहंकार में आकर मिया मिट्ठू नहीं बनना है

वरदान:- अन्तर्मुखी बन अपने समय और संकल्पों की बचत करने वाले विघ्न जीत भव
कोई भी नई पावरफुल इन्वेन्शन करते हैं तो अन्डरग्राउण्ड करते हैं। आप भी जितना अन्तर्मुखी अर्थात् अन्डरग्राउण्ड रहेंगे उतना वायुमण्डल से बचाव हो जायेगा, मनन शक्ति बढ़ेगी और माया के विघ्नों से भी सेफ हो जायेंगे। बाहरमुखता में आते भी अन्तर्मुख, हर्षितमुख, आकर्षणमूर्त रहो, कर्म करते भी यह प्रैक्टिस करो तो समय की बचत होगी और सफलता भी अधिक अनुभव करेंगे।
स्लोगन:- बीमारी से घबराओ नहीं, उसे दवाई रूपी फ्रूट खिलाकर विदाई दे दो।

 

ये अव्यक्त इशारे – अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

तुम बच्चों को किसी भी आत्मा से कुछ लेना नहीं है। सिर्फ एक बाप से ही लेना है और जो लिया है वह सबको देना है। जहाँ देना है, वहाँ लेने की इच्छा नहीं रखना। अगर आत्मा, आत्मा द्वारा कुछ-भी लेने की इच्छा रखती है तो उन्हें अल्पज्ञ आत्माओं से अल्पकाल की ही प्राप्ति होगी। एक सर्वज्ञ बाप से ही सदाकाल की प्राप्ति होगी। किसी भी प्रकार की लेने की इच्छा अपने स्वमान से गिरा देती है।

“सच्चा चार्ट रखो, बाप की याद से अवस्था अच्छी बनाओ”

1. प्रश्न: कौन-सी स्मृति पुरानी दुनिया से सहज ही किनारा करा देती है?

उत्तर: यह स्मृति कि हम कल्प-कल्प बाप से बेहद का वर्सा लेते हैं। अभी फिर से हमने शिवबाबा की गोद ली है और सच्चे ब्राह्मण बने हैं। शिवबाबा हमें गीता और राजयोग की शिक्षा दे रहे हैं। यही स्मृति पुरानी दुनिया से सहज किनारा करा देती है।

2. प्रश्न: बाप बच्चों को किस वर्से का अधिकारी बना रहे हैं?

उत्तर: बाप बच्चों को सुख और शान्ति के वर्से का तथा सतयुगी सुखधाम का मालिक बनने का अधिकारी बना रहे हैं।

3. प्रश्न: बच्चों को यहाँ बैठते समय बुद्धि में कौन-सा नशा रहना चाहिए?

उत्तर: बुद्धि में यह खुशी और नशा रहना चाहिए कि हम शिवबाबा से राजयोग और ज्ञान का वर्सा लेकर सुखधाम के मालिक बन रहे हैं।

4. प्रश्न: बाप बच्चों को किस रूप में एडाप्ट करते हैं?

उत्तर: परमात्मा शिव आत्माओं को अपनी गोद में लेकर अपना बनाते हैं और उन्हें पावन बनाकर आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना के योग्य बनाते हैं।

5. प्रश्न: बाप मृत्युलोक में क्यों आते हैं?

उत्तर: बाप पतित आत्माओं को पावन बनाने और मृत्युलोक से अमरलोक अर्थात् सुखधाम की ओर ले जाने के लिए आते हैं।

6. प्रश्न: बाप का मुख्य कार्य क्या है?

उत्तर: बाप का मुख्य कार्य पतितों को पावन बनाना, दु:ख हरकर सुख देना और आत्माओं को राजयोग द्वारा श्रेष्ठ बनाना है।

7. प्रश्न: सतयुग में बाप को क्यों नहीं पुकारते?

उत्तर: क्योंकि सतयुग सुखधाम है। वहाँ आत्माएँ पावन और सुखी होती हैं। पतित-पावन को पुकारने की आवश्यकता संगमयुग और पतित अवस्था में होती है।

8. प्रश्न: बाप, टीचर और सतगुरू—तीनों रूपों में कौन है?

उत्तर: परमपिता परमात्मा शिव ही बाप, टीचर और सतगुरू हैं। वे पिता के रूप में वर्सा, टीचर के रूप में ज्ञान और सतगुरू के रूप में सद्गति का मार्ग देते हैं।

9. प्रश्न: सतोप्रधान से तमोप्रधान बनने के बारे में क्या समझाया गया है?

उत्तर: आत्माओं को सतोप्रधान से सतो, रजो और तमो अवस्था में आना होता है। इसी क्रम में सुख से दु:ख की ओर आते हैं। अब बाप फिर से पावन बनाकर चढ़ती कला में ले जा रहे हैं।

10. प्रश्न: सतयुग में अच्छे और बुरे की तुलना क्यों नहीं होती?

उत्तर: क्योंकि सतयुग दैवी सम्प्रदाय की पावन दुनिया है। वहाँ बुरे लक्षण और विकारी स्वभाव नहीं होते। सभी सुखी रहते हैं।

11. प्रश्न: बच्चों को पूरा वर्सा लेने के लिए क्या पुरुषार्थ करना चाहिए?

उत्तर: बाप को याद करना, पवित्र बनना, राजयोग की पढ़ाई करना और श्रीमत पर चलना चाहिए। साथ ही बाप की सर्विस करके दूसरों का भी कल्याण करना चाहिए।

12. प्रश्न: शिवबाबा की एडाप्शन और संसार की एडाप्शन में क्या अन्तर है?

उत्तर: संसार की एडाप्शन प्रायः अल्पकालिक सम्बन्ध और सुख से जुड़ी होती है, जबकि शिवबाबा की एडाप्शन आत्मा को अपना बनाकर पावन करने और सदाकाल के सुख-शान्ति के वर्से का अधिकारी बनाने के लिए है।

13. प्रश्न: रावण पर विजय पाने के लिए बच्चों को क्यों एडाप्ट किया गया है?

उत्तर: क्योंकि रावण राज्य के विकारों पर विजय प्राप्त करके नई पावन सृष्टि में राज्य करना है। बाप बच्चों को राजयोग का बल देकर विकारों पर विजय पाने योग्य बनाते हैं।

14. प्रश्न: श्रीमत पर चलने से बच्चों को क्या प्राप्ति होती है?

उत्तर: श्रीमत पर चलने से आत्मा श्रेष्ठाचारी बनती है और सतयुगी स्वराज्य प्राप्त करने के योग्य बनती है।

15. प्रश्न: डबल सिरताज बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर: डबल सिरताज अर्थात् भविष्य में श्रेष्ठ देवी-देवता राजा और रानी के पद का अधिकारी बनना। बच्चे राजयोग की पढ़ाई द्वारा इस श्रेष्ठ पद के लिए पुरुषार्थ कर रहे हैं।

16. प्रश्न: बाहर के संग से स्टूडेन्ट लाइफ पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

उत्तर: मित्र-सम्बन्धियों के संग में जाने से पढ़ाई और बाप की याद का नशा कम हो सकता है। इसलिए संगदोष से अपनी सम्भाल करनी और स्टूडेन्ट लाइफ की स्मृति बनाए रखनी है।

17. प्रश्न: सच्चे स्टूडेन्ट की मुख्य पहचान क्या है?

उत्तर: बाप को याद करना, अच्छी रीति पढ़ना, श्रीमत पर चलना और बाप की सर्विस में सहयोगी बनना सच्चे स्टूडेन्ट की पहचान है।

18. प्रश्न: बाप बच्चों को चार्ट रखने की सलाह क्यों देते हैं?

उत्तर: चार्ट रखने से यह पता चलता है कि दिनभर में कितना समय बाप की याद में रहा। इससे आत्म-चेकिंग होती है, पुरुषार्थ बढ़ता है और अवस्था में सुधार आता है।

19. प्रश्न: बाप की सर्विस में सहयोगी बनने का क्या महत्व है?

उत्तर: बाप की सर्विस करने से दूसरों का कल्याण होता है और स्वयं भी श्रेष्ठ पद प्राप्त करने का पुरुषार्थ होता है। बच्चों को केवल ज्ञान लेना ही नहीं, बल्कि ज्ञान और बाप का परिचय दूसरों को भी देना है।

20. प्रश्न: सर्विस करते समय किस बात से बचना चाहिए?

उत्तर: देह-अभिमान और अहंकार से बचना चाहिए। स्वयं को बहुत श्रेष्ठ समझकर “मिया मिट्ठू” नहीं बनना है। विनम्रता और रहमदिल भाव से सेवा करनी है।

21. प्रश्न: बाप बच्चों को कैसा बनने की शिक्षा देते हैं?

उत्तर: बाप समान रहमदिल, दु:ख हर्ता और सुख कर्ता बनना है। दूसरों के कल्याण की भावना रखकर सेवा करनी है।

22. प्रश्न: “मामेकम् याद करो” का क्या फल बताया गया है?

उत्तर: एक बाप की याद से आत्मा पतित से पावन बनती है और शान्तिधाम तथा सुखधाम की अधिकारी बनती है।

23. प्रश्न: संगदोष से बचने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: एक बाप को फॉलो करना है, विकारी संग से सम्भाल करनी है और अपनी बुद्धि का योग बाप से जोड़कर रखना है।

24. प्रश्न: अन्तर्मुखी बनने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: अन्तर्मुखी रहने से समय और संकल्पों की बचत होती है, मनन शक्ति बढ़ती है, वायुमण्डल से बचाव होता है और माया के विघ्नों से सुरक्षित रहने में मदद मिलती है।

25. प्रश्न: आज का वरदान क्या है?

उत्तर: “अन्तर्मुखी बन अपने समय और संकल्पों की बचत करने वाले विघ्न जीत भव।”

26. प्रश्न: आज का स्लोगन क्या है?

उत्तर: “बीमारी से घबराओ नहीं, उसे दवाई रूपी फ्रूट खिलाकर विदाई दे दो।”

27. प्रश्न: अव्यक्त इशारों के अनुसार आत्मा को किससे लेना है?

उत्तर: किसी भी आत्मा से कुछ लेने की इच्छा नहीं रखनी है। केवल एक सर्वज्ञ बाप से लेना है और जो प्राप्त किया है उसे दूसरों को देना है।

28. प्रश्न: लेने की इच्छा स्वमान को कैसे प्रभावित करती है?

उत्तर: किसी आत्मा से कुछ पाने की इच्छा आत्मा को अल्पकाल की प्राप्ति की ओर ले जाती है और स्वमान को कम करती है। एक बाप से सदाकाल की प्राप्ति लेकर दाता स्वरूप में रहना है।

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