Avyakta Murli-(7) 26-01-1983

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

26-01-1983 “दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग दो”

आज बापदादा अपने सेवाधारी साथियों से मिलने आये हैं, जैसे बापदादा ऊंचे ते ऊंचे स्थान पर स्थित हो बेहद की सेवा अर्थ निमित्त हैं, ऐसे ही आप सभी भी ऊंचे ते ऊंचे साकार स्थान पर स्थित हो बेहद की सेवा प्रति निमित्त हो। जिस स्थान के तरफ अनेक आत्माओं की नज़र है। जैसे बाप के यथार्थ स्थान को न जानते हुए भी फिर भी सबकी नजर ऊंचे तरफ जाती है, ऐसे ही साकार में सर्व आत्माओं की नजर इस महान स्थान पर ही जा रही है और जायेगी। ‘कहाँ पर है’ अभी तक इसी खोज में हैं। समझते हैं कि कोई श्रेष्ठ ठिकाना मिले। लेकिन यही वह स्थान है, इसकी पहचान के लिए चारों ओर परिचय देने की सेवा सभी कर रहे हैं। यह बेहद का विशेष कार्य ही इसी सेवा को प्रसिद्ध करेगा कि मिलना है वा पाना है तो यहाँ से। यही अपना श्रेष्ठ ठिकाना है। विश्व के इसी श्रेष्ठ कोने से ही सदाकाल का जीयदान मिलना है। इस बेहद के कार्य द्वारा यह एडवरटाइज विशाल रूप में होनी है, जैसे धरती के अन्दर कोई छिपी हुई वा दबी हुई चीजें अचानक मिल जाती हैं तो खुशी-खुशी से सब तरफ प्रचार करते हैं। ऐसे ही यह आध्यात्मिक खजानों की प्राप्ति का स्थान जो अभी गुप्त है, इसको अनुभव के नेत्र द्वारा देख ऐसे ही समझेंगे जैसे गँवाया हुआ, खोया हुआ गुप्त खजाने का स्थान फिर से मिल गया है। धीरे-धीरे सबके मन से, मुख से यही बोल निकलेंगे कि ऐसे कोने में इतना श्रेष्ठ प्राप्ति का स्थान। इसको तो खूब प्रसिद्ध करो। तो विचित्र बाप, विचित्र लीला और विचित्र स्थान, यही देख-देख हर्षित होंगे। वण्डरफुल बात है, वण्डरफुल कार्य है यही सबके मुख से सुनते रहेंगे। ऐसे सदाकाल की अनुभूति कराने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की हैं।

हॉल तो तैयार कर रहे हैं, हॉल के साथ चाल भी ठीक है? हॉल के साथ चाल भी देखेंगे ना। तो हाल और चाल दोनों ही विशाल और बेहद है ना। जैसे मजदूरों से लेकर बड़े-बड़े इन्जीनियर्स, दोनों के सहयोग और संगठन से हॉल की सुन्दर रूप रेखा तैयार हुई है, अगर मजदूर न होते तो इन्जीनियर भी क्या करते। वे कागज पर प्लैन बना सकते हैं, लेकिन प्रैक्टिकल स्वरूप तो बिना मजदूरों के हो नहीं सकता। तो जैसे स्थूल सहयोग के आधार पर सर्व की अंगुली लगने से हॉल तैयार हो गया है। वैसे हाल के साथ वण्डरफुल चाल दिखाने के लिए ऐसा विशेष स्वरूप प्रत्यक्ष रूप में दिखाओ। सिर्फ बुद्धि में संकल्प किया, यह नहीं। लेकिन जैसे इन्जीनियर के बुद्धि की मदद और मजदूरों के कर्म की मदद से कार्य सम्पन्न हुआ। इसी रीति मन के श्रेष्ठ संकल्प साथ-साथ हर कर्म द्वारा भी विचित्र चाल का अनुभव हो। प्रत्यक्ष स्वरूप हर कर्म द्वारा ही दिखाई देता है। तो ऐसे चलने और करने का संकल्प, वाणी हाथ वा पाँव द्वारा संगठित रूप में विचित्र स्वरूप से दिखाने का दृढ़ संकल्प किया है? ऐसी चाल का नक्शा तैयार किया है? सिर्फ 3 हजार की सभा नहीं लेकिन 3 हजार में सदा त्रिमूर्ति दिखाई दे। यह सब ब्रह्मा के समान कर्मयोगी, विष्णु के समान प्रेम और शक्ति से पालना करने वाले, शंकर के समान तपस्वी वायुमण्डल बनाने वाले हैं, ऐसा अनुभव हर एक द्वारा हो। ऐसा स्वयं में सर्व शक्तियों का स्टॉक जमा किया है? यह भी भण्डारा भरपूर किया है? यह स्टॉक चेक किया है? वा सभी ऐसे बिजी हो गये हो जो चेक करने की फुर्सत ही नहीं?

सेवा की अविनाशी सफलता के लिए स्वयं के किस विशेष परिवर्तन की आहुति डालेंगे? ऐसा अपने आप से प्लैन बनाया है? सबसे बड़े ते बड़ी देन है दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग देना। बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगड़े हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना – यह है बड़े ते बड़ी विशेष देन। इसने यह कहा, यह किया, यह देखते, सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा परिवर्तन कर देना, जैसे कोई खाली स्थान होता है तो आलराउन्ड सेवाधारी समय प्रमाण जगह भर देते हैं। ऐसे अगर किसी भी द्वारा कोई शक्ति की कमी अनुभव भी हो तो अपने सहयोग से जगह भर दो, जिससे दूसरे की कमी का भी अन्य कोई को अनुभव न हो। इसको कहा जाता है – दाता के बच्चे बन समय प्रमाण उसे सहयोग की देन देना। यह नहीं सोचना है, इसने यह किया, ऐसा किया, लेकिन क्या होना चाहिए वह करते रहो। कोई की कमी न देखना, लेकिन आगे बढ़ते रहना। अच्छे ते अच्छा क्या हो सकता है, वह भी सिर्फ सोचना नहीं है लेकिन करना है। इसको ही विचित्र चाल का प्रत्यक्ष स्वरूप कहा जायेगा। सदा अच्छे ते अच्छा हो रहा है और सदा अच्छे ते अच्छा करते रहना है – इसी समर्थ संकल्प को साथ रखना। सिर्फ वर्णन नहीं करना लेकिन निवारण करते नव निर्माण के कर्तव्य की सफलता को प्रत्यक्ष रूप में देखते और दिखाते रहना। ऐसी तैयारी भी हो रही है ना क्योंकि सभी की जिम्मेवारी होते हुए भी विशेष मधुबन निवासियों की जिम्मेवारी है। डबल जिम्मेवारी ली है ना। जैसे हॉल का उद्घाटन कराया तो चाल का भी उद्घाटन हो गया है? वह भी रिर्हसल हुई वा नहीं। दोनों का मेल हो जायेगा तब ही सफलता का नगाड़ा चारों ओर तक पहुँचेगा। जितना ऊंचा स्थान होता है उतनी लाइट चारों ओर ज्यादा फैलती है। यह तो सबसे ऊंचा स्थान है तो यहाँ से निकला हुआ आवाज चारों ओर तक पहुंचे उसके लिए लाइट माइट हाउस बनना है। अच्छा।

सदा स्वयं को हर गुण, हर शक्ति सम्पन्न साक्षात् बाप स्वरूप बन सर्व को साक्षात्कार कराने वाले, सदा विचित्र स्थिति में स्थित हो साकार चित्र द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करने वाले, ऊंचे ते ऊंची स्थिति द्वारा ऊंचे ते ऊंचे स्थान को, ऊंचे ते ऊंचे प्राप्तियों के भण्डार को प्रत्यक्ष करने वाले, सर्व के मन से मिल गया, पा लिया का गीत निकलने की सदा शुभ भावना, शुभ कामना रखने वाले – ऐसे सर्व श्रेष्ठ बेहद सेवाधारियों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

मधुबन निवासियों के साथ:- वरदान भूमि पर रहने वालों को सदा सन्तुष्ट रहने का वरदान मिला हुआ है ना। जो जितना अपने को सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अनुभव करेंगे वह सदा सन्तुष्ट होंगे। अगर जरा भी कमी की महसूसता हुई तो जहाँ कमी है वहाँ असन्तुष्टता है। तो सर्व प्राप्ति है ना। संकल्प की सिद्धि तो फिर भी हो रही है ना। थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि अपना राज्य तो है नहीं। जितनी औरों के आगे प्रॉब्लम आती है उतना यहाँ नहीं। यहाँ प्रॉब्लम तो खेल हो गई है फिर भी समय पर बहुत सहयोग मिलता रहा है क्योंकि हिम्मत रखी है। जहाँ हिम्मत है वहाँ सहयोग प्राप्त हो ही जाता है। अपने मन मे कोई हलचल नहीं होनी चाहिए। मन सदैव हल्का रहने से सर्व के पास भी आपके लिए हल्कापन रहेगा। थोड़ा बहुत हिसाब-किताब तो होता ही है लेकिन उस हिसाब-किताब को भी ऐसे ही पार करो जैसे कोई बड़ी बात नहीं। छोटी बात को बड़ा नहीं करो। छोटा करना वा बड़ा करना यह अपनी बुद्धि के ऊपर है। अभी बेहद की सेवा का समय है तो बुद्धि भी बेहद की रखो। वातावरण शक्तिशाली बनाना है, यह हरेक आत्मा स्वयं को जिम्मेवार समझे। जबकि एक दो के स्वभाव संस्कार को जान गये हो, तो नॉलेजफुल कभी किसी भी स्वभाव-संस्कार से टक्कर नहीं खा सकते। जैसे किसको पता है कि यहाँ खड्डा है वा पहाड़ है तो जानने वाला कब टकरायेगा नहीं। किनारा कर लेगा। तो स्वयं को सदा सेफ रखना है। जब एक टक्कर नहीं खायेगा तो दूसरा स्वयं ही बच जायेगा। किनारा करो अर्थात् अपने को सेफ रखो और वायुमण्डल को सेफ रखो। काम से किनारा नहीं करना है। अपनी सेफ्टी की शक्ति से दूसरे को भी सेफ करना यह है किनारा करना। ऐसी शक्ति तो आ गई है ना।

साकार रूप में फॉलो करने के हिसाब से सबको मधुबन ही दिखाई देता है क्योंकि ऊंचा स्थान है। मधुबन वाले तो सदा झूले में झूलते रहते। यहाँ तो सब झूले हैं। स्थूल प्राप्ति भी बहुत है तो सूक्ष्म प्राप्ति भी बहुत है, सदा झूले में होंगे तो कब भूलें नहीं होंगी। प्राप्ति के झूले से उतरते हैं तो भूलें अपनी भी दूसरे की भी दिखाई देंगी। झूले में बैठने से धरनी को छोड़ना पड़ता है। तो मधुबन वाले तो सर्व प्राप्ति के झूले में सदा झूलते रहते। सिर्फ प्राप्ति के आधार पर जीवन न हो। प्राप्ति आपके आगे भल आवे लेकिन आप प्राप्ति को स्वीकार नहीं कर लो। अगर इच्छा रखी तो सर्व प्राप्ति होते भी कमी महसूस होगी। सदा अपने को खाली समझेंगे। तो ऐसा भाग्य है जो बिना मेहनत के प्राप्ति स्वयं आती है। तो इस भाग्य को सदा स्मृति में रखो। जितना स्वयं निष्काम बनेंगे उतना प्राप्ति आपके आगे स्वत: ही आयेगी। अच्छा।

सेवाधारियों से:- सेवाधारी का अर्थ ही है प्रत्यक्षफल खाने वाले। सेवा की और खुशी की अनुभूति की तो यह प्रत्यक्षफल खाया ना। सेवाधारी बनना यह तो बड़े ते बड़े भाग्य की निशानी है। जन्म-जन्म के लिए अपने को राज्य अधिकारी बनने का सहज साधन है। इसलिए सेवा करना अर्थात् भाग्य का सितारा चमकना। तो ऐसे समझते हुए सेवा कर रहे हो ना! सेवा लगती है या प्राप्ति लगती है? नाम सेवा है लेकिन यह सेवा करना नहीं है, मिलना है। कितना मिलता है? करते कुछ भी नहीं हो और मिलता सब कुछ है। करने में सब सुख के साधन मिलते हैं। कोई मुश्किल नहीं करना पड़ता है, कितना भी हार्ड वर्क हो लेकिन सैलवेशन भी साथ-साथ मिलती है तो वह हार्ड वर्क नहीं लगता, खेल लगता है। इसलिए सेवाधारी बनना अर्थात् प्राप्तियों के मालिक बनना। सारे दिन में कितनी प्राप्ति करते हो? एक एक दिन की, एक एक घण्टे की प्राप्ति का अगर हिसाब लगाओ तो कितना अनगिनत है, इसलिए सेवाधारी बनना भाग्य की निशानी है। सेवा का चान्स मिला अर्थात् प्राप्तियों के भण्डार भरपूर हो गये। स्थूल प्राप्ति भी है और सूक्ष्म भी। कहीं भी कोई सेवा करो तो स्थूल साधन इतने नहीं मिलते जितने मधुबन में मिलते हैं। यहाँ सेवा के साथ-साथ पहले तो अपने आत्मा की, शरीर की पालना, डबल होती है। तो सेवा करते खुशी होती है या थकावट होती है? सेवा करते सदैव यह चेक करो कि डबल सेवा कर रहा हूँ! मनसा द्वारा वायुमण्डल श्रेष्ठ बनाने की और कर्म द्वारा स्थूल सेवा। तो एक सेवा नहीं करनी है। लेकिन एक ही समय पर डबल सेवाधारी बन करके अपना डबल कमाई का चांस लेना है।

सभी सन्तुष्ट हो? सभी अपने-अपने कार्य में अच्छी तरह से निर्विघ्न हो? कोई भी कार्य में कोई खिट-खिट तो नहीं है? कभी आपस में खिट-खिट तो नहीं करते हो? कभी तेरा मेरा, मैंने किया तुमने किया – यह भावना तो नहीं आती है? क्योंकि अगर किया और यह संकल्प में भी आया कि मैंने किया, तो जो भी किया वह सारा खत्म हो गया। मेरा-पन आना माना सारे किये हुए कार्य पर पानी डाल देना। ऐसे तो नहीं करते हो? सेवाधारी अर्थात् करावनहार बाप निमित्त बनाए करा रहे हैं। करावनहार को नही भूलें। जहाँ मैं पन आया वहाँ माया भी आई। निमित्त हूँ, निर्मान हूँ तो माया आ नहीं सकती। संकल्प या स्वप्न में भी माया आती है तो सिद्ध होता है कि कहाँ मैं-पन का दरवाजा खुला है। मैं-पन का दरवाजा बन्द रहे तो कभी भी माया आ नहीं सकती।

“दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग दो | Brahma Kumaris प्रेरणादायक प्रवचन”


1. प्रस्तावना – सेवाधारी आत्माओं का मिलन

आज बापदादा अपने सेवाधारी बच्चों से मिलने पधारे हैं।
जैसे बापदादा ऊँचे ते ऊँचे स्थान पर स्थित होकर बेहद की सेवा के निमित्त हैं, वैसे ही आप सभी भी ऊँचे साकार स्थान पर स्थित होकर विश्व-कल्याण की सेवा में निमित्त हो।
यह स्थान विश्व के लिए श्रेष्ठ ठिकाना है, जहाँ से सदाकाल का जीवन-दान मिलेगा।


2. मधुबन – गुप्त खजाने का स्थान

दुनिया आज भी खोज में है कि श्रेष्ठ स्थान कहाँ है।
यह स्थान वही गुप्त खजाना है, जो खोया हुआ मानवता को अब पुनः मिल रहा है।
जब कोई छुपा खजाना मिल जाता है तो प्रचार अपने-आप फैलता है; वैसे ही यह आध्यात्मिक खजाने का स्थान भी प्रसिद्ध होगा।


3. हाल और चाल का मेल

  • हॉल के उद्घाटन के साथ-साथ, चाल (जीवन-व्यवहार) का उद्घाटन भी हो।

  • जैसे इंजीनियर और मजदूर मिलकर हॉल तैयार करते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ कर्म मिलकर वण्डरफुल चाल तैयार करते हैं।

  • सिर्फ बुद्धि में संकल्प न हो, बल्कि हर कर्म में श्रेष्ठता का प्रत्यक्ष स्वरूप हो।


4. त्रिमूर्ति स्वरूप में सेवाधारी

  • ब्रह्मा: कर्मयोगी जीवन का प्रत्यक्ष उदाहरण।

  • विष्णु: प्रेम और शक्ति से पालन करने वाले।

  • शंकर: तपस्या के द्वारा पवित्र वायुमंडल बनाने वाले।
    हर सेवाधारी में यह तीनों शक्तियाँ प्रत्यक्ष अनुभव हों।


5. सबसे बड़ी देन – सर्व को सहयोग

दाता के बच्चे बनने का अर्थ है:

  • बिगड़े हुए कार्य, संस्कार या मूड को शुभ भावना से ठीक करना।

  • किसी की कमी दिखे तो समय पर अपने सहयोग से स्थान भर देना।

  • कमी को देखना नहीं, बल्कि श्रेष्ठता को बढ़ाना।


6. नॉलेजफुल बन किनारा करना

जब किसी के स्वभाव-संस्कार को जान लिया, तो टकराना नहीं है।
किनारा करना मतलब स्वयं को सेफ रखना और वायुमंडल को भी सुरक्षित रखना।
काम से किनारा नहीं, बल्कि टकराव से किनारा।


7. प्राप्ति के झूले में रहना

मधुबनवासी सदा प्राप्ति के झूले में रहते हैं — स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्राप्तियाँ भरपूर हैं।
निष्काम सेवा करने से प्राप्ति अपने आप सामने आती है।
इच्छा रखने से कमी का अनुभव होगा, इसलिए प्राप्तियों को सहज स्वीकार करना है।


8. सेवाधारी का अर्थ – प्रत्यक्षफल का स्वामी

सेवा करना, भाग्य के सितारे को चमकाना है।
यह काम नहीं, बल्कि प्राप्ति है — स्थूल साधन और सूक्ष्म सुख दोनों साथ मिलते हैं।
एक साथ मनसा और कर्मणा की डबल सेवा से डबल कमाई का चांस लो।


9. मैं-पन से मुक्ति

  • सेवा में “मैंने किया” का भाव नहीं लाना।

  • “मैं-पन” दरवाज़ा खोलते ही माया प्रवेश कर लेती है।

  • निमित्तभाव और निर्मानभाव में रहकर ही माया से सुरक्षित रह सकते हैं।


10. निष्कर्ष – सहयोग और श्रेष्ठता का प्रकाशस्तंभ

यह ऊँचा स्थान, ऊँची स्थिति और ऊँची प्राप्ति का प्रतीक है।
यहाँ से प्रकाश और शक्ति चारों ओर फैले, ताकि हर आत्मा के मन से गीत निकले — “हमने पा लिया।”
दाता के बच्चे बनकर सर्व को सहयोग देना ही सबसे बड़ी सेवा है।

Q1. बापदादा ने सेवाधारी बच्चों से मिलने का मुख्य उद्देश्य क्या बताया?
A1. बापदादा ने सेवाधारी बच्चों को यह स्मृति दिलाई कि जैसे वे ऊँचे स्थान पर स्थित होकर बेहद की सेवा के निमित्त हैं, वैसे ही हर सेवाधारी आत्मा भी ऊँचे साकार स्थान पर स्थित होकर विश्व-कल्याण की सेवा में निमित्त बने। यह स्थान विश्व के लिए श्रेष्ठ ठिकाना है, जहाँ से सदाकाल का जीवन-दान मिलेगा।


Q2. मधुबन को ‘गुप्त खजाने का स्थान’ क्यों कहा गया है?
A2. क्योंकि मधुबन वह स्थान है, जहाँ खोया हुआ आध्यात्मिक खजाना मानवता को पुनः मिल रहा है। जैसे छुपा हुआ खजाना मिलते ही खुशी और प्रचार फैलता है, वैसे ही यहाँ के अनुभव और शक्तियाँ पूरे विश्व में प्रसिद्ध होंगी।


Q3. ‘हाल और चाल का मेल’ का क्या अर्थ है?
A3. हॉल के उद्घाटन के साथ-साथ जीवन-व्यवहार (चाल) का उद्घाटन भी होना चाहिए। जैसे इंजीनियर और मजदूर मिलकर हॉल तैयार करते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ कर्म मिलकर वण्डरफुल चाल तैयार करते हैं।


Q4. त्रिमूर्ति स्वरूप में सेवाधारी बनने का क्या भाव है?
A4.

  • ब्रह्मा: कर्मयोगी जीवन जीना।

  • विष्णु: प्रेम और शक्ति से पालन करना।

  • शंकर: तपस्या से पवित्र वायुमंडल बनाना।
    हर सेवाधारी में ये तीनों शक्तियाँ प्रत्यक्ष अनुभव होनी चाहिए।


Q5. दाता के बच्चे बनने का सबसे बड़ा लक्षण क्या है?
A5. बिगड़े हुए कार्य, संस्कार या मूड को शुभ भावना से ठीक करना और किसी की कमी दिखे तो समय पर अपने सहयोग से स्थान भर देना। कमी को देखना नहीं, बल्कि श्रेष्ठता को बढ़ाना।


Q6. ‘नॉलेजफुल बन किनारा करना’ का क्या अर्थ है?
A6. किसी के स्वभाव-संस्कार को जानने के बाद टकराना नहीं है। किनारा करने का मतलब स्वयं को और वातावरण को सेफ रखना है। यह काम से किनारा नहीं, बल्कि टकराव से किनारा है।


Q7. मधुबनवासियों को ‘प्राप्ति के झूले में’ रहने वाला क्यों कहा जाता है?
A7. क्योंकि यहाँ स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार की प्राप्तियाँ भरपूर मिलती हैं। निष्काम सेवा से प्राप्ति अपने आप सामने आती है। इच्छा रखने से कमी महसूस होती है, इसलिए सहज स्वीकार करना ही सुख का आधार है।


Q8. सेवाधारी बनने का वास्तविक अर्थ क्या है?
A8. सेवा करना भाग्य के सितारे को चमकाना है। यह काम नहीं, बल्कि प्राप्ति है। सेवाधारी मनसा और कर्मणा की डबल सेवा से डबल कमाई का अवसर प्राप्त करते हैं।


Q9. सेवा में ‘मैं-पन’ से क्यों बचना चाहिए?
A9. ‘मैंने किया’ का भाव आते ही माया प्रवेश कर लेती है और सेवा का फल समाप्त हो जाता है। निमित्तभाव और निर्मानभाव में रहकर ही माया से सुरक्षित रह सकते हैं।


Q10. इस प्रवचन का मुख्य संदेश क्या है?
A10. दाता के बच्चे बनकर सर्व को सहयोग देना ही सबसे बड़ी सेवा है। ऊँची स्थिति और श्रेष्ठता का प्रकाश चारों ओर फैलाना, ताकि हर आत्मा के मन से गीत निकले — “हमने पा लिया।”

Disclaimer:

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ संस्था की 26 जनवरी 1983 की अव्यक्त मुरली के अध्ययन एवं आध्यात्मिक मनन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक ज्ञान, आत्म-जागृति और सकारात्मक विचारों का प्रचार-प्रसार करना है। इस वीडियो में साझा की गई सामग्री, विचार और शिक्षाएं मूल रूप से ब्रह्माकुमारीज़ के आध्यात्मिक साहित्य और मुरली से प्रेरित हैं। हम किसी प्रकार का व्यावसायिक लाभ नहीं ले रहे हैं। सभी आध्यात्मिक अधिकार उनके मूल स्रोत के पास सुरक्षित हैं।

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