Short Questions & Answers Are given below (लघु प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
अधिकारी बनने के लिए अधीनता छोडो
आज विशेष किसके लिए आये हैं, जानती हो? भविष्य में विशेषता दिखलाने वाली विशेष आत्माओं के प्रति। अपने को विशेष आत्मायें अर्थात् विशेषता दिखलाने वाली समझती हो? ऐसा विशेष कौनसा कार्य करके दिखायेंगी जो अब तक कोई ग्रुप ने न करके दिखाया हो? इसका कोई प्लैन सोचा है? ‘पास विद् ऑनर’ बनने का लक्ष्य और बाप का शो दिखलाने का लक्ष्य तो सभी का ही है लेकिन आप लोग विशेष क्या नवीनता दिखायेंगी? नवीनता वा विशेषता यही दिखाना वा दिखाने का निश्चय करना – कि कोई भी विघ्न में वा कोई भी कार्य में मेहनत न लेकर और ही अन्य आत्माओं को भी निर्विघ्न और हर कार्य में मददगार बनाते सहज ही सफलता- मूर्त बनेंगे और बनायेंगे। अर्थात् सदा सहजयोग, सदा बाप के स्नेही, बाप के कार्य में सहयोगी, सदा सर्व शक्तियों को धारण करते हुए श्रृंगार-मूर्त, शस्त्रधारी शक्ति बन अपने चित्र से, चलन से बाप के चरित्र और कर्त्तव्य को प्रत्यक्ष करना है। ऐसी प्रतिज्ञा अपने से की है? छोटी-छोटी बातों में मेहनत तो नहीं लेंगे? किसी भी माया के आकर्षित रूप में धोखा तो नहीं खायेंगे? जो स्वयं धोखा खा लेते हैं वह औरों को धोखे से छुड़ा नहीं पाते। सदैव यही स्मृति रखो कि हम दुःख-हर्ता सुख-कर्ता के बच्चे हैं। किसके भी दुःख को हल्का करने वाले स्वयं कब भी, एक सेकेण्ड वे लिए भी, संकल्प वा स्वप्न में भी दुःख की लहर में नहीं आ सकते हैं। अगर संकल्प में भी दुःख की लहर आती है तो सुख के सागर बाप की सन्तान कैसे कहला सकते हैं? क्या बाप की महिमा में यह कब वर्णन करते हो कि सुख का सागर हो लेकिन कब-कब दु:ख की लहर भी आ जाती है? तो बाप समान बनना है ना। दु:ख की लहर आती है अर्थात् कहां न कहां माया ने धोखा दिया। तो ऐसी प्रतिज्ञा करनी है। शक्ति रूप नहीं हो क्या? शक्ति कैसे मिलेगी? अगर सदा बुद्धि का सम्बन्ध एक ही बाप से लगा हुआ है तो सम्बन्ध से सर्व शक्तियों का वर्सा अधिकार के रूप में अवश्य प्राप्त होता है, लेकिन अधिकारी समझकर हर कर्म करते रहें तो कहने वा संकल्प में मांगने की इच्छा नहीं रहेगी। अधिकार प्राप्त न होने कारण, कहां न कहां किसी प्रकार की अधीनता है। अधीनता होने के कारण अधिकार प्राप्त नहीं होता है। चाहे अपने देह के भान की अधीनता हो, चाहे पुराने संस्कारों के अधीन हो, चाहे कोई भी गुणों की धारणा की कमी के कारण निर्बलता वा कमजोरी के अधीन हो, इसलिए अधिकार का अनुभव नहीं कर पाते। तो सदैव यह समझो कि हम अधीन नहीं, अधिकारी हैं। पुराने संस्कारों पर, माया के ऊपर विजय पाने के अधिकारी हैं। अपने देह के भान वा देह के सम्बन्ध वा सम्पर्क जो भी हैं उनके ऊपर विजय पाने के अधिकारी हैं। अगर यह अधिकारीपन सदैव स्मृति में रहे तो स्वत: ही सर्व शक्तियों का, प्राप्ति का अनुभव होता रहेगा। अधिकारीपन भूल जाता है? जो अधीन होता है वह सदैव मांगता रहता है, अधिकारी जो होता है वह सदैव सर्व प्राप्ति-स्वरूप रहता है। बाप के पास सर्व शक्तियों का खज़ाना किसके लिए है? तो जो जिन्हों की चीज़ है वह प्राप्त न करें? यही नशा सदैव रहे कि सर्व शक्तियां तो हमारा जन्म-सिद्ध-अधिकार है। तो अधिकारी बनकर के चलो। ऐसा सदैव बुद्धि में श्रेष्ठ संकल्प रहना चाहिए। अगर संकल्प श्रेष्ठ है तो वचन और कर्म में भी नहीं आ सकते। इसलिए संकल्प को श्रेष्ठ बनाओ और सदैव सर्वशक्तिवान बाप के साथ बुद्धि का संग हो। ऐसे सदैव संग के रंग में रंगे हुए हो? अनुभव करते हो वा अभी जाने के बाद अनुभव करेंगे? सदैव यही समझो कि सोचना है वा बोलना है वा करना है तो कमाल का, कामन नहीं। अगर कामन अर्थात् साधारण संकल्प किये तो प्राप्ति भी साधारण होगी। जैसे संकल्प वैसी सृष्टि बनेगी ना। अगर संकल्प ही श्रेष्ठ न होंगे तो अपनी नई सृष्टि जो रचने वाले हैं उसमें पद भी साधारण ही मिलेगा। इसलिए सदैव यह चेक करो – हमारा संकल्प जो उठा वह साधारण है वा श्रेष्ठ? साधारण संकल्प वा चलन तो सर्व आत्मायें करती रहती हैं। अगर सर्वशक्तिवान की सन्तान होने के बाद भी साधारण संकल्प वा कर्म हुए तो श्रेष्ठता वा विशेषता क्या हुई? मैं विशेष आत्मा हूँ, इस कारण हमारा सभी कुछ विशेष होना चाहिए। अपने परिवर्तन से आत्माओं को अपनी तरफ वा अपने बाप के तरफ आकर्षित कर सको; अपने देह के तरफ नहीं, अपनी अर्थात् आत्मा की रूहानियत तरफ। तुम्हारा परिवर्तन सृष्टि को परिवर्तन में लायेगा। सृष्टि का परिवर्तन भी श्रेष्ठ आत्माओं के परिवर्तन के लिए रूका हुआ है। परिवर्तन तो लाना है। ना कि यह साधारण जीवन ही अच्छी लगती है? यह स्मृति, वृति और दृष्टि अलौकिक हो जाती है तो इस लोक का कोई भी व्यक्ति वा कोई भी वस्तु आकर्षित नहीं कर सकती। अगर आकर्षित करती है तो समझना चाहिए कि स्मृति में वा वृत्ति में वा दृष्टि में अलौकिकता की कमी है। इस कमी को सेकेण्ड में परिवर्तन में लाना है। यह ग्रुप यही विशेषता दिखावे कि सेकेण्ड में अपने संस्कार वा संकल्प को परिवर्तन में लाकर दिखावे। ऐसी हिम्मत है? सोचने में भी जितना समय लगता है, करने में इतना समय न लगे। ऐसी हिम्मत है? यह ग्रुप है साहसी ग्रुप। तो जो साहस रखने वाले हैं उन्हों के साथ बाप सदा सहयोगी है, इसलिए कभी भी साहस को छोड़ना नहीं। हिम्मत और उल्लास सदा रहे। हिम्मत से सदा हर्षित रहेंगे। उल्लास से क्या होगा? उल्लास किसको खत्म करता है? आलस्य को। आलस्य भी विशेष विकार है। जो पुरुषार्थी पुरूषार्थ के मार्ग पर चल पड़ हैं उन्हों के सामने वर्तमान समय माया का वार इस आलस्य के रूप में भिन्न-भिन्न तरीके से आता है। तो इस आलस्य को खत्म करने के लिए सदा उल्लास में रहो। कमाई करने का जब किसको उल्लास होता है तो फिर आलस्य खत्म हो जाता है। अब भी कोई कार्य प्रति भी अपना उल्लास नहीं होता तो फिर आलस्य ज़रूर होगा। इसलिए कभी भी उल्लास को कम नहीं करना है जो आलस्य के वश होकर और श्रेष्ठ कर्म करने से वंचित हो जाओ। आलस्य भी कई प्रकार का होता है। अपने पुरूषार्थ में आगे बढ़ने में आलस्य बहुत विघ्न रूप बन जाता है। यह जो कहने में आता है – अच्छा, सोचेंगे, यह कार्य करेंगे – कर ही लेंगे, यह आलस्य की निशानी है। करेंगे, कर ही लेंगे, हो ही जायेगा, लेकिन नहीं, करने लग पड़ना है। जो नॉलेज वा धारणायें मिली हैं वह बुद्धि में धारण तो की हैं ना। लेकिन प्रैक्टिकल में आने में जो विघ्न रूप बनता वह है स्वयं का आलस्य। अच्छा, कल से लेकर करेंगे, फलाना करे तो हम भी करेंगे, आज सोचते हैं कल से करेंगे, यह कार्य पूरा करके फिर यह करेंगे – ऐसे-ऐसे संकल्प ही आलस्य का रूप हैं। जो करना है वह अभी करना है। जितना करना है वह अभी करना है। बाकी करेंगे, सोचेंगे – इन अक्षरों में पिछाड़ी में ‘ग-ग’ आता है ना, तो यह शब्द है बचपन की निशानी। छोटा बच्चा ग-ग करता रहता है ना, यह अलबेलेपन की निशानी है। इसलिए कब भी आलस्य का रूप अपने पास आने न देना और सदा अपने को उल्लास में रखना। क्योंकि निमित्त बनते हो ना। निमित्त बने हुए सदैव पुरूषार्थ के उल्लास में रहते हैं तो उन्हें देख और भी उल्लास में रहते हैं। चलते-चलते पुरूषार्थ में थकावट आना वा चलते-चलते पुरूषार्थ साधारण रफ्तार में हो जावे, यह किसकी निशानी है? विघ्न न हो लेकिन लगन भी श्रेष्ठ न हो तो उसको भी आलस्य कहेंगे। कई ऐसे अनुभव करते हैं – विघ्न भी नहीं हैं, ठीक भी चल रहे हैं लेकिन लगन भी नहीं है अर्थात् उल्लास वा विशेष कोई उमंग नहीं है। तो यह भी निशानी आलस्य की है। आलस्य भी अनेक प्रकार का है। इस आलस्य को कभी भी आने न देना। आलस्य धीरे-धीरे पहले साधारण पुरुषार्थी बनायेगा वा समीपता से दूर करेगा; फिर दूर करते-करते धोखा भी दे देगा, कमजोर बना देगा, निर्बल बना देगा। निर्बल वा कमजोर बनने से कमियों की प्रवेशता शुरू हो जाती है। इसलिए सदैव यह चेक करना – मेरी बुद्धि की लगन बाप वा बाप के कर्त्तव्य से थोड़ी भी दूर तो नहीं है, बिल्कुल समीप वा साथ-साथ है? आजकल के जमाने में कोई किसका खून करता है वा कोई भ्रष्टाचार का कार्य करता है तो पहले उनको दूर भगाकर ले जायेगा। उनको अकेला, कमजोर बनाकर फिर उस पर वार करेगा। तो माया भी चतुर है। पहले सर्वशक्तिवान बाप से बुद्धि को दूर करती है, फिर जब कमजोर बन जाते हैं तब वार करती है। कोई भी साथ नहीं रहता है। क्या भी हो जाये – अपनी बुद्धि को कभी बाप के साथ से दूर न करना। जब किसका वार होता है तो उनसे कैसे अपने को बचाने लिए चिल्लाते हैं, घमसान करते हैं जिससे कोई दूर न ले जा सके। यहां फिर जब देखो कि माया हमारी बुद्धि की लगन को बाप से दूर करने की कोशिश करती है, तो अपने अन्दर बाप के गुण गाने हैं, महिमा करनी है। महान्! कर्त्तव्य करने लग जाओ, चिल्लाओ नहीं। भक्ति में भी गुणगान करते हैं ना। यह यादगार भी कब से बना? यह मन्सा का गुणगान करना वाचा में ला दिया है। यथार्थ रीति से गुणगान तो आप ही कर सकते हो ना। अब यथार्थ रूप में मन्सा संकल्प से, स्मृति-स्वरूप में गुणगान करते हो और भक्ति में स्थूलता में आते हैं तो मुख से गाने लग पड़ते हैं। सभी रीति- रस्म शुरू तो यहां से होती हैं ना। तो गुणगान करने लग जाओ। अपने को अधिकारी समझ सर्व शक्तियों को काम में लाओ। फिर कब भी माया आपकी बुद्धि की लगन को दूर नहीं कर सकेगी। न दूर होंगे, न कमजोर होंगे, न हार खायेंगे। फिर सदा विजयी होंगे। तो यह स्लोगन याद रखना कि हम अनेक बार के विजयी हैं, अब भी विजयी बनकर ही दिखायेंगे। जो अनेक बार के विजयी हैं वह अभी फिर हार खा सकते हैं क्या? कभी नहीं। हार खाना असम्भव अनुभव होना चाहिए। जैसे अज्ञानी आत्माओं को विजय पाना असम्भव अनुभव होता है ना। समझते हैं – विजयी बनना हो भी सकता है क्या? तो जैसे अज्ञानी के लिए विजयी बनना असम्भव है, इस प्रकार ज्ञानी आत्मा को हार खाना असम्भव अनुभव होना चाहिए।
अधिकारी बनने के लिए अधीनता छोड़ो
प्रश्न और उत्तर:
- प्रश्न: आज विशेष आत्माओं के लिए क्या संदेश है?
उत्तर: भविष्य में विशेषता दिखाने वाली आत्माओं को अपने अंदर नवीनता लानी है और बिना मेहनत के सफलता प्राप्त करनी है। - प्रश्न: अधिकारी बनने में सबसे बड़ी रुकावट क्या है?
उत्तर: किसी भी प्रकार की अधीनता—देह-अभिमान, पुराने संस्कारों या कमजोरियों की अधीनता। - प्रश्न: सर्व शक्तियाँ कैसे प्राप्त होंगी?
उत्तर: जब बुद्धि का संबंध सदा एक बाप से जुड़ा रहेगा, तब अधिकारी बनने का अनुभव स्वाभाविक रूप से होगा। - प्रश्न: अधिकारी और अधीन व्यक्ति में क्या अंतर है?
उत्तर: अधिकारी आत्मा सदा प्राप्ति स्वरूप रहती है, जबकि अधीन आत्मा सदा माँगती रहती है। - प्रश्न: सदा सुख स्वरूप कैसे रहें?
उत्तर: हमें स्मृति रखनी है कि हम दुख-हर्ता, सुख-कर्ता के बच्चे हैं और कभी भी दुख की लहर में नहीं आ सकते। - प्रश्न: माया हमें धोखा कब देती है?
उत्तर: जब संकल्पों में दुख की लहर आती है या जब हम स्वयं को कमजोर मान लेते हैं। - प्रश्न: सृष्टि परिवर्तन के लिए हमें क्या करना होगा?
उत्तर: अपने संस्कारों और संकल्पों को सेकंड में परिवर्तन करना होगा। - प्रश्न: आलस्य से बचने का उपाय क्या है?
उत्तर: उल्लास को सदा बनाए रखना, क्योंकि आलस्य आत्मा को कमजोर बनाता है। - प्रश्न: आत्मा को कमजोर बनाने वाला सबसे बड़ा कारण क्या है?
उत्तर: माया बुद्धि की लगन को बाप से दूर कर देती है, जिससे आत्मा कमजोर हो जाती है। - प्रश्न: विजयी बनने का मंत्र क्या है?
उत्तर: “हम अनेक बार के विजयी हैं, अब भी विजयी बनकर दिखाएँगे। हार खाना असंभव है!
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