Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 15-07-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – योगबल से ही आत्मा की कट निकलेगी, इसलिए योग में कभी भी ग़फलत नहीं करो” | |
| प्रश्नः- | बाप ने बच्चों को बेहद का वर्सा लेने की कौन सी युक्ति बताई जिसमें माया चारों तरफ विघ्न डालती है? |
| उत्तर:- | बाबा ने युक्ति बताई बच्चे तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां एक बाप के बच्चे आपस में भाई-बहिन हो, तुम कभी क्रिमिनल एसाल्ट नहीं कर सकते। भाई बहिन विकार में नहीं जा सकते, तुम्हें शिवबाबा की मत पर चलकर बेहद का वर्सा लेना है। परन्तु माया कम नहीं है, चारों तरफ इसमें ही विघ्न डालती रहती है। हम भाई बहिन हैं, एक बाप से वर्सा लेते हैं, यह भूल जाते हैं। |
| गीत:- | तुम्हें पाके हमने… |
ओम् शान्ति। गीत का एक अक्षर ही काफी है। बच्चे जानते हैं बेहद के बाप से बेहद का वर्सा मिलता है और कल्प-कल्प मिलता है। यह भी बच्चे जानते हैं कि बेहद का वर्सा बरोबर भारत को मिला था। अब वह नहीं है फिर से मिल रहा है। देखते हो – अभी तो स्वर्ग का वर्सा नहीं है, रावण द्वारा नर्क का श्राप मिल रहा है। श्राप से मनुष्य दु:खी होते हैं। वर अर्थात् वर्से से सुखी होते हैं। अब ब्राह्मण बच्चे जानते हैं वह है बेहद का निराकार बाप और प्रजापिता ब्रह्मा है बेहद का साकार बाप। बेहद के साकार बाप प्रजापिता ब्रह्मा बिगर कोई होता नहीं। भल गांधी को बापू जी कहते थे परन्तु कायदेसिर सारे मनुष्य सृष्टि का तो वह बापू जी हो न सके। सारी निराकारी वर्ल्ड का बापू जी है शिव। अभी तुम बच्चे जानते हो हम शिवबाबा के बने हैं। शिवबाबा ने आकर हमको अपना बनाया है – वर्सा देने लिए। मधुबन आते हैं किसके लिए? शिवबाबा से मिलने के लिए, परन्तु वह निराकार है। सिर्फ शिवबाबा कहने से समझेंगे नहीं इसलिए कहा जाता है बापदादा। शिवबाबा और ब्रह्मा दादा। दादे का नाम अलग है, बाप का नाम अलग है। वह निराकार सबका बाप भी है, सबका दादा भी है। सब बच्चों को बापदादा से वर्सा मिलता है जरूर। बेहद के बाप से सबको वर्सा मिलता है। वह बाप ही सबका दु:ख हर्ता सुख कर्ता है। सतयुग में कोई भी मनुष्य दु:खी हो न सके। नाम है स्वर्ग, वह है हेविन स्थापन करने वाला गॉड फादर। भारत सबसे पुराना है तो जरूर सबसे नया था तब तो अभी सबसे पुराना हुआ है। सतयुग, कलियुग भारत को ही कहा जाता है। बरोबर भारत स्वर्ग था। यह लक्ष्मी-नारायण राज्य करते थे। यह बुद्धि में है। अभी तुम लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जायेंगे तो झट बुद्धि में आयेगा कि इन्हों को यह वर्सा कैसे मिला! यह पूज्य कैसे बनें! कब राज्य किया? किस द्वारा राज्य पाया? यह सारा बुद्धि में आयेगा। आगे लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाते थे, माला फेरते थे। आक्युपेशन का कुछ भी पता नहीं था। अभी सिर्फ तुम्हारी बुद्धि में है सो भी नम्बरवार। तुम अभी लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाकर खड़े होंगे तो हर्षित होंगे। बुद्धि में है इन्होंने यह प्रालब्ध कैसे पाई थी। संगमयुग पर ही पाई क्योंकि संगम पर ही पुरानी दुनिया बदलने वाली है। संगम पर ही बाप ने आकर राजयोग सिखाया था। यह भी जानते हो बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में बरोबर यह ब्रह्मा था। ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना होती है। यह लक्ष्मी-नारायण ही अगले जन्म में बरोबर ब्रह्मा सरस्वती थे। ब्रह्मा के साथ ब्राह्मण ब्राह्मणियां भी होंगे। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण की राजधानी थी ना। जरूर प्रजापिता भी होगा। तुम जानते हो हम पुरुषार्थ कर रहे हैं, जिन्होंने कल्प पहले पुरुषार्थ किया है वह हम साक्षी हो देखते हैं। एक होता है राजाई घराना, दूसरा होता है प्रजा घराना। उसमें भी कोई बहुत साहूकार होते हैं कोई कम। राजाओं में भी कोई बहुत साहूकार, कोई कम साहूकार होते हैं। तुम लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में किसको भी समझा सकते हो कि इन्होंने यह राज्य कैसे पाया। अब फिर से वही अपना राज्य भाग्य ले रहे हैं, राजधानी स्थापन हो रही है। कितना सहज है। अम्बा कौन है – यह भी नहीं जानते। तुम कहेंगे यह तो जगत अम्बा है। कल्प पहले भी जगत-अम्बा जगतपिता थे। उन्हों के बच्चे हम थे। संगम पर बाबा राजयोग सिखा रहे हैं। जगत अम्बा के बच्चे भी ढेर हैं। परन्तु इतने सभी को तो बिठा नहीं सकते।
अभी तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। बाप ज्ञान का सागर है तो जरूर बच्चों को ज्ञान ही देंगे। उनको न मनुष्य, न देवता कहा जाता है। उनको परमात्मा ही कहा जाता है। तुम कोई के भी मन्दिर में जाओ तो उनकी बायोग्राफी बता सकते हो। राम के लिए भी तुम समझा सकते हो। चन्द्रवंशी घराना अभी स्थापन हो रहा है। ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों का भी धर्म स्थापन होता है। ब्रह्मा का नाम कितना बाला है। ब्रह्मा द्वारा बाप ब्राह्मणों को रचते हैं। तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां होने से जानते हो हम एक बाप के बच्चे आपस में भाई-बहिन हैं। फिर हम क्रिमिनल एसाल्ट कर नहीं सकते। भाई बहिन विकार में जा नहीं सकते। बाप ने यह युक्ति रची है – ड्रामा अनुसार तुम भी ब्रह्माकुमार हम भी ब्रह्माकुमारी। वास्तव में सारी दुनिया बी.के. है। परन्तु जानते नहीं हैं। हम शिवबाबा की मत से बेहद का वर्सा ले रहे हैं। माया भी कम नहीं है। चारों तरफ विघ्न डालती रहती है। हम भाई बहिन हैं, एक बाप से वर्सा लेते हैं, यह भूल जाते हैं। यह तो अच्छी रीति समझते हो, सतयुग में एक ही धर्म रहता है। बाकी सब धर्म खत्म हो जाने हैं। यह भी बच्चे जानते हैं, यह कोई नई बात नहीं है। हर 5 हजार वर्ष बाद यह चक्र फिरता है। तिथि तारीख भी लिखी हुई है। यह भी बुद्धि में रहना चाहिए – हम शिवबाबा से इस युक्ति से वर्सा लेते हैं। लक्ष्य तो मिला हुआ है ना। बाप को याद कर बाप से वर्सा लेना है। याद अर्थात् योगबल से ही कट निकलेगी। इसमें कोई गफलत न हो, इसलिए मुरलियां मिलती हैं। निश्चयबुद्धि पक्का है तो भल कहाँ भी चला जाए। समझो मुरली नहीं मिलती तो भी बुद्धि में तो है ना – हम बाबा का बन गया। बाबा ने समझाया है, तुम्हारी आत्मा तमोप्रधान बनी है, अब तुम बाप को याद करो तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बनेंगे। यह महामन्त्र एक बाप ही बतलाते हैं और कोई बतला न सके। बाप ही कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे याद के बल से ही तुमको तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। यह अक्षर हैं परन्तु किसकी बुद्धि में नहीं आता। अब तुम समझते हो बरोबर कल्प पहले भी बाबा ने यह अक्षर कहा था कि देह के सब धर्मों को छोड़ अपने को आत्मा समझो। यह सब देह के धर्म हैं ना। सबका बाप एक ही है। सब आत्मायें उस एक बाप को पुकारती हैं। पोप भी गॉड को याद करते हैं। कहते हैं ओ गॉड फादर रहम करो। इन मनुष्यों की क्रोधी बुद्धियों को पलटाओ तो यह आपस में लड़ें नहीं। याद तो बाप को ही करेंगे ना। और कोई को याद नहीं करते। शिवबाबा को ही पुकारते हैं कि आकर पतितों को पावन बनाओ। पावन बनेंगे फिर तो इस छी-छी रावण की दुनिया में रह नहीं सकेंगे फिर जरूर नई दुनिया चाहिए। कलियुग से बदलकर सतयुग तो होगा ही ना। परन्तु इतना भी नहीं समझते हैं। एक डॉक्टर आया था – कहता था कलियुग तो कलियुग ही चलेगा। अरे सदैव कलियुग ही कैसे चलेगा। कलियुग कोई अच्छा है क्या! समझते थोड़ेही हैं सिर्फ भावना है औरों को ले आते हैं। उनको तीर नहीं लगता और कोई आने वाले को तीर लग जाए तो भी कुछ न कुछ दलाली मिल जायेगी। स्वर्ग में तो आ जायेंगे। बाप से थोड़ा भी आकर सुनते हैं तो भी स्वर्ग में जरूर चले जायेंगे। फिर भी हेविनली गॉड फादर के सामने आकर बैठे हैं। बाप समझाते हैं – मैं सबका बाप हूँ ना। कोई मानते नहीं कि शिवबाबा कैसे आयेगा। अरे आत्मा आ सकती है तो मैं क्यों नहीं आऊंगा। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरे में जा सकती तो मैं नहीं आ सकता हूँ। नहीं तो मैं कैसे आऊं! पुकारते भी हैं हे पतित-पावन बाबा आकर पतित से पावन बनाओ। बाप कहते हैं मैं आता ही भारत में हूँ। कल्प-कल्प के संगम पर एक ही बार आता हूँ। तुम जब 84 जन्म पूरे करते हो तो मैं आता हूँ। तुम बच्चों को निश्चय है बाबा आया है फिर से वर्सा देने। बाप कहते हैं मेरा धन्धा ही है – पुरानी दुनिया को बदल नई दुनिया स्थापन करना इसलिए गाया हुआ है नई दुनिया की स्थापना, पुरानी दुनिया का विनाश फिर तुम पालना करेंगे। रोशनी मिली है ना। काली का मन्दिर देखेंगे तो समझेंगे यह झूठा चित्र है। काली बरोबर जगदम्बा है। परन्तु ऐसे भयानक रूप नहीं है। बंगाल में काली के आगे बलि चढ़ाते हैं, परन्तु जानते कुछ नहीं। जगत अम्बा के मन्दिर में लाखों आते हैं। सदैव जैसे मेला ही है। छोटी सी मूर्ति रखी है ना। नाम रख दिया है जगत अम्बा। अब जगत अम्बा तो एक होनी चाहिए। सिन्ध में काली का मन्दिर कैसा बनाया था। एक बार किले में बम फटा तो एक फकीर ने कहा कि काली माता गुस्से हुई हैं, बस उसने जाकर वहाँ काली का मन्दिर बना दिया। अब काली है कौन! कुछ भी नहीं जानते। तुमको अब नॉलेज मिली है, ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसको तुम न जानो। समझते हो बाबा से वर्सा ले रहे हैं तो पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए ना।
पहले नम्बर का दु:ख तब शुरू होता है जब कुमार कुमारी शादी करते हैं। तुम्हें तो शादी करने का कभी ख्याल भी नहीं आना चाहिए। अब बाप कहते हैं यह रावण राज्य खत्म होना है। यह है विकारी गृहस्थ व्यवहार। देवी-देवताओं के लिए गाते रहते हैं। यह किसको पता नहीं कि इन देवताओं को निर्विकारी बनाने वाला कौन है! सतयुग है सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। शास्त्रों में फिर दिखा दिया है कि वहाँ भी विकार थे। परन्तु वह तो है ही वाइसलेस वर्ल्ड, विकारी दुनिया और निर्विकारी दुनिया में कितना फर्क है। यह बातें और किसकी बुद्धि में नहीं हैं। तुम जानते हो इन लक्ष्मी-नारायण का जब राज्य था तो कितने थोड़े मनुष्य थे। एक ही धर्म था फिर वृद्धि को पाया है। चक्र भी पूरा लगाना पड़े, तब कहेंगे पूरी पृथ्वी पर चक्र लगाया। समुद्र का तो चक्र लगा न सकें। सतयुग में थोड़े हैं तो कितनी थोड़ी जमीन लेते हैं। अब मनुष्य सृष्टि की हद पूरी होनी है। ऊपर में थोड़ी आत्मायें जो हैं – वह भी आती रहती हैं। मनुष्य बढ़ते ही रहते हैं। जब वहाँ से भी आत्मायें आना पूरी हो जायेंगी, तुम कर्मातीत अवस्था को पायेंगे फिर आत्माओं को शरीर छोड़कर जाना है। उनका आना तुम्हारा जाना होगा। थोड़े-थोड़े आते रहते हैं। समझ की बात है ना। हम पहले-पहले जाकर वहाँ रहेंगे। हमारे होते कोई रहना नहीं चाहिए। यह विस्तार की बातें हैं। बच्चों को फिर भी बाप कहते हैं – अच्छा अपने प्यारे बाबुल को याद करो। तुमको फायदा है बाप को याद करने में। यह हिस्ट्री-जॉग्राफी तो मनुष्य बहुत पढ़ते हैं। बहुत दूर-दूर जाते हैं। मून में भी जाते हैं। यह है साइन्स का घमन्ड। अति में जाते हैं। मून में कुछ खड़ा थोड़ेही है। तुम तो सूर्य चांद से भी पार हो जाते हो। यह नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में अभी है। समझते हो ड्रामा प्लैन अनुसार बाबा यह सब बतलाते हैं। बाप ही कहते हैं मैं तुमको पतित से पावन बनाता हूँ। यह मेरा पार्ट है। भक्ति मार्ग में भी यह हमारा पार्ट है। है तो ड्रामा ना। जैसे तुम पार्टधारी हो, मैं भी पार्टधारी हूँ। मेरा काम है तुमको पतित से पावन बनाना। जो कुछ करते हैं तो उनकी महिमा होती है ना। इन लक्ष्मी-नारायण की कितनी महिमा है। परन्तु उन्हों को ऐसा लायक किसने बनाया। यह सुखधाम के मालिक थे। अभी तो अनेक प्रकार के कितने दु:ख हैं। आज कोई मरा, झगड़ा हुआ, भल किसके पास लाख करोड़ पदम हैं, परन्तु अगर कोई बीमारी आदि आ जाती है तो क्या करेंगे! बिरला के पास कितने पैसे हैं! एक जन्म में पैसा देखने में आता है, परन्तु ऐसा कोई नहीं है जिसको कोई दु:ख नहीं हो। किसी न किसी प्रकार का दु:ख सभी को होता है। अभी तो यह पैसे आदि सब मिट्टी में मिल जाने हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कर्मातीत अवस्था को प्राप्त कर वापस घर जाना है परन्तु जायेंगे तब जब आत्माओं का आना बन्द होगा, इस विस्तार को बुद्धि में रख एक बाबुल को प्यार से याद करना है।
2) ज्ञान की रोशनी मिली है इसलिए निश्चयबुद्धि बन बाप से पूरा वर्सा लेना है। कहाँ भी रहते याद के बल से आत्मा को तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाने का पुरुषार्थ करना है।
| वरदान:- | स्वमान में स्थित रह विश्व द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाले, देह-अभिमान मुक्त भव पढ़ाई का मूल लक्ष्य है – देह-अभिमान से न्यारे हो देही-अभिमानी बनना। इस देह-अभिमान से न्यारे अथवा मुक्त होने की विधि ही है – सदा स्वमान में स्थित रहना। संगमयुग के और भविष्य के जो अनेक प्रकार के स्वमान हैं उनमें किसी एक भी स्वमान में स्थित रहने से देह-अभिमान मिटता जायेगा। जो स्वमान में स्थित रहता है उन्हें स्वत: मान प्राप्त होता है। सदा स्वमान में रहने वाले ही विश्व महाराजन बनते हैं और विश्व उन्हें सम्मान देती है। |
| स्लोगन:- | जैसा समय वैसा अपने को मोल्ड कर लेना – यही है रीयल गोल्ड बनना। |
ये अव्यक्त इशारे – ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
अभी निर्भय ज्वालामुखी बन प्रकृति और आत्माओं के अन्दर जो तमोगुण है उसे भस्म करो। तपस्या अर्थात् ज्वाला स्वरूप याद, इस याद द्वारा ही माया वा प्रकृति का विकराल रूप शीतल हो जायेगा। आपका तीसरा नेत्र, ज्वालामुखी नेत्र माया को शक्तिहीन कर देगा।
योगबल से आत्मा सतोप्रधान कैसे बने? | आज की मुरली प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: योगबल (परमात्मा शिवबाबा की याद) से ही आत्मा के विकर्मों का हिसाब समाप्त होता है। इसलिए योग में कभी भी ग़फलत नहीं करनी चाहिए।
प्रश्न 2: बेहद का वर्सा लेने की कौन-सी युक्ति बाबा ने बताई?
उत्तर: बाबा ने समझाया कि हम सभी ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियाँ एक परमपिता शिवबाबा की संतान हैं। आपस में भाई-बहन होने के कारण पवित्र रहकर बाबा की श्रीमत पर चलना ही बेहद का वर्सा प्राप्त करने की युक्ति है।
प्रश्न 3: इस युक्ति में माया किस प्रकार विघ्न डालती है?
उत्तर: माया बार-बार देह-अभिमान और विकारों में फँसाकर यह स्मृति भुला देती है कि हम एक परमपिता की संतान और आपस में भाई-बहन हैं।
प्रश्न 4: आत्मा को तमोप्रधान से सतोप्रधान कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर: स्वयं को आत्मा समझकर निरंतर शिवबाबा की याद करने से आत्मा सतोप्रधान बनती है और विकर्मों का बोझ समाप्त होता है।
प्रश्न 5: संगमयुग का सबसे बड़ा महत्व क्या है?
उत्तर: संगमयुग वह श्रेष्ठ समय है जब परमात्मा स्वयं आकर राजयोग सिखाते हैं और नई दुनिया की स्थापना करते हैं।
प्रश्न 6: ब्रह्मा द्वारा कौन-सी स्थापना होती है?
उत्तर: ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना होती है और राजयोग के अभ्यास से देवताई राज्य की नींव रखी जाती है।
प्रश्न 7: ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलने का क्या अर्थ है?
उत्तर: ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलने का अर्थ है कि आत्मा सत्य को पहचानती है, सृष्टि चक्र को समझती है और परमात्मा की पहचान प्राप्त करती है।
प्रश्न 8: बाप बच्चों को कौन-सा महामंत्र देते हैं?
उत्तर: देह के सभी धर्मों को छोड़ स्वयं को आत्मा समझो और एक परमपिता शिवबाबा को याद करो।
प्रश्न 9: आज की धारणा क्या है?
उत्तर: निश्चयबुद्धि बनकर निरंतर योग का अभ्यास करना और बाबा की याद से आत्मा को सतोप्रधान बनाने का पुरुषार्थ करना।
प्रश्न 10: आज का वरदान क्या है?
उत्तर: स्वमान में स्थित रहकर देह-अभिमान से मुक्त बनना तथा विश्व से सम्मान प्राप्त करने वाला बनना।
प्रश्न 11: आज का स्लोगन क्या है?
उत्तर: “जैसा समय, वैसा अपने को मोल्ड कर लेना—यही है रीयल गोल्ड बनना।”
प्रश्न 12: इस मुरली से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: पवित्रता, आत्म-अभिमान, नियमित योग, बाबा की याद और श्रीमत पर चलकर श्रेष्ठ जीवन एवं भविष्य का सुखद राज्य प्राप्त करना।
Disclaimer
इस वीडियो में प्रस्तुत मुरली एवं आध्यात्मिक विचार केवल अध्ययन, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागृति के उद्देश्य से साझा किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। इस सामग्री के मूल आध्यात्मिक अधिकार संबंधित स्रोत एवं संस्था के पास सुरक्षित हैं। यदि किसी प्रकार की आपत्ति या कॉपीराइट संबंधी विषय हो, तो कृपया संपर्क करें। उचित अनुरोध प्राप्त होने पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
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