(20)Why did God himself become a teacher?

S.Y.(20)परमात्मा स्वयं क्यों शिक्षक बने?

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

परमात्मा स्वयं क्यों शिक्षक बने?

(संगम युग ही नई दुनिया की नींव है)


भूमिका

संगम युग वह अलौकिक समय है
जब पुरानी दुनिया समाप्ति की ओर है
और नई दुनिया की नींव रखी जा रही है।

आज हम 20वाँ पाठ कर रहे हैं —
एक सीधा लेकिन अत्यंत गहरा प्रश्न लेकर:

जब दुनिया में इतने शिक्षक, गुरु, प्रोफेसर, संत-महात्मा हैं,
तो फिर परमात्मा को स्वयं टीचर क्यों बनना पड़ा?

बाबा क्यों कहते हैं—

“यह पढ़ाई सिवाय बाप के और कोई पढ़ा नहीं सकता।”

आज हम इसे तीन गहरे पहलुओं से समझेंगे।


1️⃣ पढ़ाई का वास्तविक अर्थ क्या है?

सामान्य रूप से हम पढ़ाई को समझते हैं—

  • जानकारी देना

  • शब्द सिखाना

  • किताबों का ज्ञान देना

लेकिन ईश्वरीय पढ़ाई इससे बिल्कुल अलग है।

 ईश्वरीय पढ़ाई का उद्देश्य

आत्मा का परिवर्तन

मुरली – 5 मई 2004

“यह पढ़ाई आत्मा की उन्नति के लिए है।”


 उदाहरण

अगर कोई कहे—

“मैंने तैराकी की किताब पूरी पढ़ ली है।”

तो क्या वह तैर सकता है?
 नहीं।

तैरने के लिए—

  • पानी में उतरना पड़ता है

  • अभ्यास करना पड़ता है

यह पढ़ाई अनुभव की पढ़ाई है,
सिर्फ जानकारी की नहीं।


2️⃣ दुनिया की पढ़ाइयाँ कौन पढ़ाता है?

दुनिया की हर पढ़ाई—

  • देहधारी आत्मा,

  • देहधारी आत्मा को पढ़ाती है।

बीच में माध्यम होता है — देह

  • देह के लिए पढ़ाया जाता है

  • देह के लिए पढ़ा जाता है


 उदाहरण

डॉक्टर शरीर की बीमारी समझाता है।

क्या वह आत्मा की बीमारी ठीक कर सकता है?
 नहीं।

शरीर ठीक हो सकता है,
लेकिन आत्मा वैसी ही रहती है।

क्यों?

क्योंकि इलाज देह तक सीमित है।


3️⃣ आत्मा की वास्तविक बीमारी क्या है?

आत्मा की बीमारी कोई शारीरिक रोग नहीं।

आत्मा की बीमारी है—

देह-भान

देह-भान से—

  • विकार आते हैं

  • विकारों से स्मृति लुप्त होती है

  • संस्कार तमोप्रधान बनते हैं

मुरली – 15 अगस्त 2001

“पतन का कारण अज्ञान नहीं,
पतन का कारण देह-भान है।”


 अब प्रश्न उठता है—

देह-भान से मुक्त कौन है?

  • कोई मनुष्य?

  • कोई संत?

  • कोई गुरु?

केवल परमात्मा।


4️⃣ परमात्मा ही क्यों पढ़ा सकते हैं?

कारण 1️⃣ — परमात्मा स्वयं पतित नहीं है

  • जन्म-मरण से परे

  • देह से न्यारा

  • सदा पावन

मुरली – 24 जनवरी 2003

“उद्धार वही कर सकता है
जो स्वयं पतित न हो।”

उदाहरण

साफ पानी गंदे पानी को साफ कर सकता है,
गंदा पानी साफ नहीं कर सकता।


कारण 2️⃣ — परमात्मा आत्मा की रचना को जानते हैं

  • आत्मा क्या है

  • उसकी शक्तियाँ क्या हैं

  • उसका मूल स्वरूप क्या है

मुरली – 3 मार्च 2006

“बाप ही आत्मा को जैसा है वैसा जानता है।”


5️⃣ यह पढ़ाई पहले क्यों नहीं थी?

सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग—
कहीं भी यह पढ़ाई नहीं थी।

क्यों?

क्योंकि यह पढ़ाई—

  • पतन के बाद

  • उद्धार के समय

  • सिर्फ संगम युग में आती है।

मुरली – 24 जनवरी 2003

“यह पढ़ाई एक्यूरेट टाइम पर आती है—
न एक सेकंड पहले,
न एक सेकंड बाद।”

 उदाहरण

बीज बोने का समय निकल जाए
तो फसल नहीं होती।


6️⃣ इस पढ़ाई का नाम क्या है?

बाबा इस पढ़ाई का नाम बताते हैं—

राजयोग

मुरली – 9 सितंबर 2005

“राजयोग सिवाय बाप के
कोई सिखा नहीं सकता।”


7️⃣ राजयोग का सही अर्थ क्या है?

राजयोग—

  • कोई आसन नहीं

  • कोई शारीरिक ध्यान नहीं

राजयोग का अर्थ—

आत्मा समझ परमात्मा की याद

राज का अर्थ—

  • स्वयं पर राज्य

  • मन, बुद्धि, संस्कार का मालिक बनना

मुरली – 18 जनवरी 1969

“पहले स्वयं का राजा बनो।”


8️⃣ राजयोग आत्मा के साथ क्या करता है?

राजयोग से आत्मा—

  • देह से न्यारी बनती है

  • विकारों से मुक्त होती है

  • अपने मूल स्वरूप में लौटती है

“मैं ज्योति बिंदु आत्मा हूँ।”

अव्यक्त मुरली – 12 जनवरी 1996

“अब आत्मा जैसी बनेगी,
वही स्वरूप सदा रहेगा।”


 समापन

यह पढ़ाई केवल परमात्मा ही पढ़ा सकते हैं क्योंकि—

  • वही सदा पावन हैं

  • वही आत्मा के सच्चे ज्ञाता हैं

  • वही उद्धारकर्ता हैं

इस पढ़ाई का नाम राजयोग है—
जो आत्मा को स्व-राज्य अधिकारी बनाता है।


 आत्म-परीक्षण

  • क्या मैं इस पढ़ाई को केवल सुन रहा हूँ?

  • या सच में अभ्यास में ला रहा हूँ?

  • क्या मेरा मन और बुद्धि
    वास्तव में बाप की याद में स्थित है?

  • प्रश्न 1️⃣ : संगम युग क्या है?

    उत्तर:
    संगम युग वह अलौकिक समय है
    जब पुरानी दुनिया समाप्ति की ओर होती है
    और नई दुनिया की नींव रखी जा रही होती है।
    यही वह समय है जब परमात्मा स्वयं अवतरित होकर
    आत्माओं को नई सृष्टि के लिए तैयार करते हैं।


    प्रश्न 2️⃣ : आज के पाठ का मुख्य प्रश्न क्या है?

    उत्तर:
    आज हम 20वाँ पाठ कर रहे हैं और मुख्य प्रश्न है—

    जब दुनिया में इतने शिक्षक, गुरु, प्रोफेसर,
    संत और महात्मा हैं,
    तो फिर परमात्मा को स्वयं टीचर क्यों बनना पड़ा?


    प्रश्न 3️⃣ : बाबा क्यों कहते हैं कि “यह पढ़ाई सिवाय बाप के और कोई पढ़ा नहीं सकता”?

    उत्तर:
    क्योंकि यह पढ़ाई साधारण ज्ञान नहीं,
    बल्कि आत्मा के सम्पूर्ण परिवर्तन की पढ़ाई है।
    इसे हम तीन गहरे पहलुओं से समझेंगे।


    🔹 1️⃣ पढ़ाई का वास्तविक अर्थ

    प्रश्न 4️⃣ : सामान्य पढ़ाई और ईश्वरीय पढ़ाई में क्या अंतर है?

    उत्तर:
    सामान्य पढ़ाई में—

    • जानकारी दी जाती है

    • शब्द सिखाए जाते हैं

    • किताबों का ज्ञान दिया जाता है

    लेकिन ईश्वरीय पढ़ाई का उद्देश्य है—

    आत्मा का परिवर्तन

    मुरली – 5 मई 2004
    “यह पढ़ाई आत्मा की उन्नति के लिए है।”


    प्रश्न 5️⃣ : ईश्वरीय पढ़ाई को अनुभव की पढ़ाई क्यों कहा जाता है?

    उत्तर:
    क्योंकि यह पढ़ाई केवल सुनने या जानने से पूरी नहीं होती,
    बल्कि अभ्यास और अनुभव से सिद्ध होती है।

    उदाहरण:
    अगर कोई कहे—
    “मैंने तैराकी की किताब पढ़ ली है।”

    तो क्या वह तैर सकता है?
     नहीं।

    तैरने के लिए पानी में उतरना
    और अभ्यास करना पड़ता है।
    इसी प्रकार यह पढ़ाई अनुभव की पढ़ाई है।


    🔹 2️⃣ दुनिया की पढ़ाइयाँ और उनकी सीमा

    प्रश्न 6️⃣ : दुनिया की पढ़ाइयाँ कौन पढ़ाता है?

    उत्तर:
    दुनिया की हर पढ़ाई—

    • देहधारी आत्मा

    • देहधारी आत्मा को पढ़ाती है

    बीच में माध्यम होता है— देह
    इसलिए पढ़ाई भी देह तक सीमित रहती है।


    प्रश्न 7️⃣ : देह की पढ़ाई आत्मा को क्यों नहीं बदल सकती?

    उत्तर:
    क्योंकि देह की पढ़ाई देह की समस्याओं तक सीमित होती है।

    उदाहरण:
    डॉक्टर शरीर की बीमारी ठीक कर सकता है,
    लेकिन आत्मा की बीमारी नहीं।

    शरीर ठीक हो सकता है,
    पर आत्मा वैसी ही रहती है।


    🔹 3️⃣ आत्मा की वास्तविक बीमारी

    प्रश्न 8️⃣ : आत्मा की असली बीमारी क्या है?

    उत्तर:
    आत्मा की बीमारी कोई शारीरिक रोग नहीं,
    बल्कि—

    देह-भान

    देह-भान से—

    • विकार आते हैं

    • स्मृति लुप्त होती है

    • संस्कार तमोप्रधान बनते हैं

    मुरली – 15 अगस्त 2001
    “पतन का कारण अज्ञान नहीं,
    पतन का कारण देह-भान है।”


    प्रश्न 9️⃣ : देह-भान से मुक्त कौन है?

    उत्तर:

    • कोई मनुष्य?

    • कोई संत?

    • कोई गुरु?

    केवल परमात्मा देह-भान से मुक्त हैं।


    🔹 4️⃣ परमात्मा ही क्यों पढ़ा सकते हैं?

    प्रश्न 🔟 : परमात्मा ही क्यों सच्चे शिक्षक हैं?

    उत्तर:
    इसके दो मुख्य कारण हैं।


    कारण 1️⃣ : परमात्मा स्वयं पतित नहीं हैं

    उत्तर:
    परमात्मा—

    • जन्म–मरण से परे हैं

    • देह से न्यारे हैं

    • सदा पावन हैं

    मुरली – 24 जनवरी 2003
    “उद्धार वही कर सकता है
    जो स्वयं पतित न हो।”

    उदाहरण:
    साफ पानी गंदे पानी को साफ कर सकता है,
    गंदा पानी साफ नहीं कर सकता।


    कारण 2️⃣ : परमात्मा आत्मा की रचना को जानते हैं

    उत्तर:
    परमात्मा जानते हैं—

    • आत्मा क्या है

    • उसकी शक्तियाँ क्या हैं

    • उसका मूल स्वरूप क्या है

    मुरली – 3 मार्च 2006
    “बाप ही आत्मा को जैसा है वैसा जानता है।”


    🔹 5️⃣ यह पढ़ाई पहले क्यों नहीं थी?

    प्रश्न 1️⃣1️⃣ : यह पढ़ाई सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग में क्यों नहीं थी?

    उत्तर:
    क्योंकि यह पढ़ाई—

    • पतन के बाद

    • उद्धार के समय

    • केवल संगम युग में आती है

    मुरली – 24 जनवरी 2003
    “यह पढ़ाई एक्यूरेट टाइम पर आती है—
    न एक सेकंड पहले,
    न एक सेकंड बाद।”

    उदाहरण:
    बीज बोने का समय निकल जाए
    तो फसल नहीं होती।


    🔹 6️⃣ इस पढ़ाई का नाम

    प्रश्न 1️⃣2️⃣ : इस पढ़ाई का नाम क्या है?

    उत्तर:
    इस पढ़ाई का नाम है—

    राजयोग

    मुरली – 9 सितंबर 2005
    “राजयोग सिवाय बाप के
    कोई सिखा नहीं सकता।”


    🔹 7️⃣ राजयोग का सही अर्थ

    प्रश्न 1️⃣3️⃣ : राजयोग का वास्तविक अर्थ क्या है?

    उत्तर:
    राजयोग—

    • कोई आसन नहीं

    • कोई शारीरिक ध्यान नहीं

    राजयोग का अर्थ है—

    ] आत्मा समझ परमात्मा की याद।

    राज का अर्थ—

    • स्वयं पर राज्य

    • मन, बुद्धि और संस्कार का मालिक बनना

    मुरली – 18 जनवरी 1969
    “पहले स्वयं का राजा बनो।”


    🔹 8️⃣ राजयोग का आत्मा पर प्रभाव

    प्रश्न 1️⃣4️⃣ : राजयोग आत्मा के साथ क्या करता है?

    उत्तर:
    राजयोग से आत्मा—

    • देह से न्यारी बनती है

    • विकारों से मुक्त होती है

    • अपने मूल स्वरूप में लौटती है

     “मैं ज्योति बिंदु आत्मा हूँ।”

    अव्यक्त मुरली – 12 जनवरी 1996
    “अब आत्मा जैसी बनेगी,
    वही स्वरूप सदा रहेगा।”


     समापन – प्रश्न–उत्तर

    प्रश्न 1️⃣5️⃣ : निष्कर्ष क्या है?

    उत्तर:
    यह पढ़ाई केवल परमात्मा ही पढ़ा सकते हैं क्योंकि—

    • वही सदा पावन हैं

    • वही आत्मा के सच्चे ज्ञाता हैं

    • वही उद्धारकर्ता हैं

    इस पढ़ाई का नाम राजयोग है,
    जो आत्मा को स्व-राज्य अधिकारी बनाता है।


     आत्म-परीक्षण (Self-Check)

    प्रश्न 1️⃣6️⃣ : मेरा आत्म-परीक्षण क्या होना चाहिए?

    उत्तर:

    • क्या मैं इस पढ़ाई को केवल सुन रहा हूँ
      या सच में अभ्यास में ला रहा हूँ?

    • क्या मेरा मन और बुद्धि
      वास्तव में बाप की याद में स्थित है?

डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्मा कुमारीज़ की
साकार एवं अव्यक्त मुरलियों पर आधारित
एक आत्मिक अध्ययन है।

इसका उद्देश्य किसी धर्म, व्यक्ति
या शिक्षा पद्धति की आलोचना नहीं,
बल्कि आत्मा की वास्तविक उन्नति हेतु
ईश्वरीय ज्ञान को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।

दर्शकों से निवेदन है कि
आधिकारिक मुरलियों का स्वयं अध्ययन

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