(02) The First Characteristic of an Angel – The Art of Flying | How to Rise Above Circumstances? |

PH.(02)फरिश्ते की पहली पहचान – उड़ती कला | परिस्थितियों से ऊपर कैसे उड़ें? |

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

अध्याय 2

फरिश्ते की पहली पहचान – उड़ती कला


Disclaimer

यह अध्याय ब्रह्माकुमारीज़ की शिक्षाओं, राजयोग के आध्यात्मिक सिद्धांतों तथा वक्ता द्वारा प्रस्तुत विचारों को सरल भाषा में समझाने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दिए गए उदाहरण केवल आध्यात्मिक चिंतन एवं आत्म-अनुभव को सरल बनाने के लिए हैं। जहाँ भी मुरली उद्धरण दिए गए हैं, कृपया उन्हें आधिकारिक ब्रह्माकुमारीज़ मुरली से सत्यापित करें। इस अध्याय का उद्देश्य किसी मत, धर्म अथवा व्यक्ति की आलोचना करना नहीं है।

 

रिश्ता कौन है?

पिछले अध्याय में हमने समझा कि फरिश्ता कोई पंखों वाला दिव्य शरीर नहीं, बल्कि एक ऐसी आत्मा है जो देह, परिस्थितियों और नकारात्मक संस्कारों से न्यारी और प्यारी होकर जीवन जीती है।

अब प्रश्न उठता है—

फरिश्ते की पहली पहचान क्या है?

उत्तर है—

उड़ती कला।

उड़ती कला का अर्थ शरीर से उड़ना नहीं है, बल्कि परिस्थितियों से ऊपर उठकर स्थिर, हल्का और प्रसन्न रहना है।


उड़ती कला क्या है?

जब कोई पक्षी उड़ता है, तो वह धरती के बंधनों से ऊपर चला जाता है।

उसी प्रकार जब आत्मा उड़ती कला में रहती है, तब वह परिस्थितियों के प्रभाव से ऊपर रहती है।

यह उड़ान आकाश की नहीं…

विचारों की उड़ान है।

मनुष्य बाहर से वहीं रहता है—

उसी परिवार में…

उसी कार्यालय में…

उसी संसार में…

लेकिन उसकी सोच बदल जाती है।

यही उड़ती कला है।


मुरली चिंतन

(यहाँ आधिकारिक मुरली उद्धरण जोड़ें)

Murli Date : ____________

“________________________________”


कौन-सी जंजीरें हमें नीचे बांधे रखती हैं?

आज मनुष्य लोहे की जंजीरों से नहीं बंधा।

वह बंधा है—

  • क्रोध से
  • चिंता से
  • अपेक्षाओं से
  • अहंकार से
  • लोभ से
  • मोह से
  • तुलना से
  • मान-अपमान से

इन सभी का मूल कारण है—

देह-अभिमान।

जब आत्मा स्वयं को शरीर समझने लगती है, तभी ये सभी बंधन उत्पन्न होते हैं।

यही बंधन फरिश्ते के पंख काट देते हैं।


उदाहरण

कल्पना कीजिए…

एक पक्षी के दोनों पंख स्वस्थ हैं।

वह आसानी से उड़ सकता है।

लेकिन यदि उसके पंखों पर भारी पत्थर बांध दिए जाएँ…

क्या वह उड़ पाएगा?

नहीं।

इसी प्रकार आत्मा के ऊपर यदि क्रोध, चिंता और अहंकार का भार हो, तो वह उड़ती कला का अनुभव नहीं कर सकती।


हल्का बनो, ऊँचा उड़ो

राजयोग हमें सिखाता है—

हल्का मन ही ऊँची उड़ान भर सकता है।

जिस व्यक्ति के पास शिकायतें कम होती हैं, क्षमा अधिक होती है, अपेक्षाएँ कम होती हैं और स्वीकार्यता अधिक होती है—

वह स्वतः हल्का अनुभव करता है।

हल्कापन ही उड़ती कला का आधार है।


उड़ती कला के चार आधार

बाप-दादा फरिश्ता जीवन के लिए चार आधार बताते हैं—

1. स्वयं की पहचान

मैं शरीर नहीं…

मैं एक शुद्ध, शांत, ज्योतिर्मय आत्मा हूँ।

यही उड़ान का पहला कदम है।


2. परमात्मा की पहचान और याद

जब आत्मा स्वयं को पहचान लेती है, तब उसे अपने परमपिता की याद सहज होने लगती है।

याद शक्ति देती है।

शक्ति उड़ान देती है।


3. हल्का मन

पुरानी बातें…

पुराने दुख…

पुरानी शिकायतें…

यदि इन्हें मन में रखते रहेंगे, तो मन भारी होता जाएगा।

हल्का मन ही उड़ता है।


4. शांत जीवन

शांति केवल बोलने में नहीं…

सोचने में भी होनी चाहिए।

भीतर जितनी शांति होगी,

उतनी ही ऊँची उड़ान होगी।


ज्ञान और योग — फरिश्ते के दो पंख

पक्षी एक पंख से नहीं उड़ सकता।

उसी प्रकार आत्मा केवल ज्ञान या केवल योग से भी पूर्ण उड़ान नहीं भर सकती।

ज्ञान दिशा देता है।

योग शक्ति देता है।

ज्ञान बताता है—

“क्या सही है?”

योग शक्ति देता है—

“सही को जीवन में कैसे उतारें?”

जब ज्ञान और योग मिलते हैं,

तब आत्मा में उमंग और उत्साह स्वतः उत्पन्न होते हैं।

यही फरिश्ते के वास्तविक पंख हैं।


मुरली चिंतन

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क्या वास्तव में हर आत्मा उड़ सकती है?

यदि कोई पूछे—

“क्या आप उड़ सकते हैं?”

तो अधिकांश लोग कहेंगे—

“नहीं।”

क्योंकि वे शरीर की बात सोचते हैं।

लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से—

हर आत्मा उड़ सकती है।

क्योंकि आत्मा का वास्तविक स्वभाव स्वतंत्रता है।

उसे नीचे बांधता है—

देह-अभिमान।

उसे ऊपर उठाता है—

आत्म-अभिमान।


दौड़ना और उड़ना

आज का मनुष्य बहुत तेज दौड़ रहा है।

अधिक पैसा…

अधिक पद…

अधिक प्रसिद्धि…

अधिक उपलब्धियाँ…

लेकिन क्या वह भीतर से शांत है?

यदि नहीं,

तो वह केवल दौड़ रहा है।

उड़ नहीं रहा।

दौड़ने वाला धरती से जुड़ा रहता है।

उड़ने वाला धरती के ऊपर उठ जाता है।

यही दोनों में अंतर है।


एक साधारण उदाहरण

दो कर्मचारी एक ही कार्यालय में काम करते हैं।

दोनों पर समान कार्यभार है।

पहला व्यक्ति पूरे दिन शिकायत करता है।

दूसरा व्यक्ति मुस्कुराकर काम करता है।

परिस्थितियाँ दोनों की समान हैं।

लेकिन मानसिक ऊँचाई अलग है।

दूसरा व्यक्ति उड़ती कला के अधिक निकट है।


कमल का फूल

कमल कीचड़ में खिलता है।

लेकिन कीचड़ उसे गंदा नहीं कर पाती।

इसी प्रकार फरिश्ता संसार में रहता है।

वह संसार से भागता नहीं।

वह जिम्मेदारियाँ छोड़ता नहीं।

वह परिवार छोड़कर जंगल नहीं जाता।

वह संसार के बीच रहकर भी भीतर से स्वतंत्र रहता है।

यही फरिश्ता जीवन है।


मुरली चिंतन

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अभ्यास

आज पूरे दिन केवल एक अभ्यास करें।

जब भी कोई कठिन परिस्थिति आए…

स्वयं से पूछें—

“मैं अभी उड़ रहा हूँ… या गिर रहा हूँ?”

यदि लगे कि मन नीचे जा रहा है…

तुरंत स्मृति लाएँ—

मैं आत्मा हूँ।
मेरा बाबा मेरा साथी है।

कुछ क्षण रुकिए।

मन स्वतः ऊपर उठने लगेगा।


अध्याय का सार

फरिश्ता बनना किसी चमत्कार का नाम नहीं है।

यह मन की ऊँचाई का नाम है।

उड़ती कला का अर्थ है—

परिस्थितियों से ऊपर रहना,

देह-अभिमान से मुक्त होना,

ज्ञान और योग के पंखों से जीवन जीना,

और हर परिस्थिति में हल्का, शांत तथा प्रसन्न बने रहना।

जब आत्मा इस अवस्था में स्थिर हो जाती है,

तभी वह वास्तव में फरिश्ता कहलाती है।


चिंतन प्रश्न

  1. क्या मैं परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता हूँ?
  2. मेरी सबसे बड़ी मानसिक जंजीर कौन-सी है?
  3. क्या मैं स्वयं को आत्मा के रूप में अनुभव करता हूँ?
  4. क्या मेरे जीवन में ज्ञान और योग दोनों संतुलित हैं?
  5. आज मैं उड़ती कला का कौन-सा अभ्यास करूँगा?
  6. फरिश्ते की पहली पहचान – उड़ती कला : प्रश्नोत्तर

    प्रश्न 1. फरिश्ते की पहली पहचान क्या है?

    उत्तर:
    फरिश्ते की पहली और सबसे महत्वपूर्ण पहचान उड़ती कला है। इसका अर्थ है हर परिस्थिति से ऊपर उठकर हल्के, शांत और प्रसन्न रहना। यह शारीरिक उड़ान नहीं, बल्कि विचारों और चेतना की ऊँचाई है।


    प्रश्न 2. उड़ती कला का वास्तविक अर्थ क्या है?

    उत्तर:
    उड़ती कला का अर्थ है परिस्थितियों, समस्याओं, आलोचना, क्रोध और नकारात्मक विचारों से प्रभावित हुए बिना आत्मिक स्थिति में स्थिर रहना। यह मन की ऊँची अवस्था है।


    प्रश्न 3. मनुष्य किन अदृश्य जंजीरों से बंधा हुआ है?

    उत्तर:
    मनुष्य मुख्य रूप से क्रोध, चिंता, अपेक्षाएँ, अहंकार, लोभ, मोह, ईर्ष्या, तुलना और देह-अभिमान जैसी मानसिक जंजीरों से बंधा होता है।


    प्रश्न 4. इन सभी जंजीरों का मूल कारण क्या है?

    उत्तर:
    इन सभी का मूल कारण देह-अभिमान है। जब आत्मा स्वयं को शरीर मान लेती है, तब अनेक प्रकार के विकार और बंधन उत्पन्न हो जाते हैं।


    प्रश्न 5. फरिश्ते के पंख किससे कट जाते हैं?

    उत्तर:
    जब आत्मा देह-अभिमान, क्रोध, अहंकार, चिंता और आसक्ति में आ जाती है, तब उसके आध्यात्मिक पंख कट जाते हैं और वह उड़ती कला का अनुभव नहीं कर पाती।


    प्रश्न 6. उड़ती कला का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?

    उत्तर:
    स्वयं को आत्मा समझकर, परमात्मा की याद में रहकर, मन को हल्का बनाकर और हर परिस्थिति में शांत रहने का अभ्यास करके उड़ती कला विकसित की जा सकती है।


    प्रश्न 7. उड़ती कला के चार आधार कौन-से हैं?

    उत्तर:

    1. स्वयं की पहचान (मैं आत्मा हूँ)
    2. परमात्मा की पहचान और याद
    3. हल्का मन
    4. शांत जीवन

    प्रश्न 8. फरिश्ते के दो पंख कौन-से हैं?

    उत्तर:
    ज्ञान और योग फरिश्ते के दो आध्यात्मिक पंख हैं। ज्ञान सही दिशा देता है और योग उस दिशा में चलने की शक्ति देता है।


    प्रश्न 9. ज्ञान और योग से कौन-सी प्राप्ति होती है?

    उत्तर:
    ज्ञान और योग से आत्मा में उमंग, उत्साह, आत्मविश्वास, आंतरिक शक्ति और प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।


    प्रश्न 10. क्या हर आत्मा उड़ सकती है?

    उत्तर:
    हाँ। प्रत्येक आत्मा आध्यात्मिक रूप से उड़ सकती है। यह उड़ान शरीर की नहीं, बल्कि विचारों और चेतना की उड़ान है।


    प्रश्न 11. दौड़ने और उड़ने में क्या अंतर है?

    उत्तर:
    दौड़ना बाहरी उपलब्धियों के पीछे भागना है, जबकि उड़ना परिस्थितियों से ऊपर उठकर आत्मिक स्थिति में स्थिर रहना है।


    प्रश्न 12. कमल का फूल फरिश्ता जीवन का प्रतीक क्यों माना जाता है?

    उत्तर:
    कमल कीचड़ में रहकर भी उससे अछूता रहता है। उसी प्रकार फरिश्ता संसार में रहते हुए भी संसार की नकारात्मकता से प्रभावित नहीं होता।


    प्रश्न 13. हल्का मन क्यों आवश्यक है?

    उत्तर:
    भारी मन कभी ऊँची उड़ान नहीं भर सकता। शिकायत, क्रोध और पुरानी बातें मन को भारी बनाती हैं, जबकि क्षमा और स्वीकार्यता मन को हल्का करती हैं।


    प्रश्न 14. फरिश्ता संसार से भागता क्यों नहीं?

    उत्तर:
    फरिश्ता संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी आत्मिक स्थिति में स्थिर रहता है। वह जिम्मेदारियों का पालन करता है, लेकिन मानसिक रूप से उनसे बंधता नहीं।


    प्रश्न 15. दैनिक जीवन में उड़ती कला का अभ्यास कैसे करें?

    उत्तर:
    जब भी कोई कठिन परिस्थिति आए, स्वयं से पूछें—
    “मैं अभी उड़ रहा हूँ या गिर रहा हूँ?”
    यदि मन नीचे जा रहा हो, तो तुरंत आत्म-स्मृति और परमात्म-स्मृति का अभ्यास करें।


    मुख्य संदेश

    फरिश्ता वही है जो परिस्थितियों से नहीं, अपनी आत्मिक स्थिति से जीवन जीता है। ज्ञान और योग के पंखों से उड़ते हुए वह हर परिस्थिति में हल्का, शांत, प्रसन्न और स्थिर रहता है।

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