AV-(13)25-02-1986 “सफलता का आधार – दृढ़ता”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
25-02-1986 “सफलता का आधार – दृढ़ता”
(विदेशी भाई-बहिनों के समर्पण समारोह पर)
आज बापदादा विशेष श्रेष्ठ दिन की विशेष स्नेह भरी मुबारक दे रहे हैं। आज कौन-सा समारोह मनाया? बाहर का दृश्य तो सुन्दर था ही। लेकिन सभी के उमंग-उत्साह और दृढ़ सकंल्प का, दिल का आवाज दिलाराम बाप के पास पहुंचा। तो आज के दिन को विशेष उमंग-उत्साह भरा दृढ़ संकल्प समारोह कहेंगे। जब से बाप के बने तब से सम्बन्ध है और रहेगा। लेकिन यह विशेष दिन विशेष रूप से मनाया इसको कहेंगे दृढ़ संकल्प किया। कुछ भी हो जाए चाहे माया के तूफान आयें, चाहे लोगों की भिन्न-भिन्न बातें आयें, चाहे प्रकृति का कोई भी हलचल का नज़ारा हो। चाहे लौकिक वा अलौकिक सम्बन्ध में किसी भी प्रकार के सरकमस्टांस हों, मन के सकंल्पों का बहुत जोर से तूफान भी हो तो भी एक बाप दूसरा न कोई। एक बल एक भरोसा ऐसा दृढ़ संकल्प किया वा सिर्फ स्टेज पर बैठे! डबल स्टेज पर बैठे थे या सिंगल स्टेज पर? एक थी यह स्थूल स्टेज, दूसरी थी दृढ़ संकल्प की स्टेज, दृढ़ता की स्टेज। तो डबल स्टेज पर बैठे थे ना? हार भी बहुत सुन्दर पहने। सिर्फ यह हार पहना वा सफलता का भी हार पहना? सफलता गले का हार है। यह दृढ़ता ही सफलता का आधार है। इस स्थूल हार के साथ सफलता का हार भी पड़ा हुआ था ना। बापदादा डबल दृश्य देखते हैं। सिर्फ साकार रूप का दृश्य नहीं देखते। लेकिन साकार दृश्य के साथ-साथ आत्मिक स्टेज, मन के दृढ़ संकल्प और सफलता की श्रेष्ठ माला यह दोनों देख रहे थे। डबल माला डबल स्टेज देख रहे थे। सभी ने दृढ़ संकल्प किया। बहुत अच्छा। कुछ भी हो जाए लेकिन सम्बन्ध को निभाना है। परमात्म प्रीति की रीति सदा निभाते हुए सफलता को पाना है। निश्चित है सफलता गले का हार है। एक बाप दूसरा न कोई – यह है दृढ़ संकल्प। जब एक है तो एकरस स्थिति स्वत: और सहज है। सर्व सम्बन्धों की अविनाशी तार जोड़ी है ना। अगर एक भी सम्बन्ध कम होगा तो हलचल होगी। इसलिए सर्व सम्बन्धों की डोर बांधी। कनेक्शन जोड़ा। संकल्प किया। सर्व सम्बन्ध हैं या सिर्फ मुख्य 3 सम्बन्ध हैं? सर्व सम्बन्ध हैं तो सर्व प्राप्तियां हैं। सर्व सम्बन्ध नहीं तो कोई न कोई प्राप्ति की कमी रह जाती है। सभी का समारोह हुआ ना। दृढ़ संकल्प करने से आगे पुरुषार्थ में भी विशेष रूप से लिफ्ट मिल जाती है। यह विधि भी विशेष उमंग-उत्साह बढ़ाती है। बापदादा भी सभी बच्चों को दृढ़ संकल्प करने के समारोह की बधाई देते हैं। और वरदान देते सदा अविनाशी भव। अमर भव।
आज एशिया का ग्रुप बैठा है। एशिया की विशेषता क्या है? विदेश सेवा का पहला ग्रुप जापान में गया, यह विशेषता हुई ना। साकार बाप की प्रेरणा प्रमाण विशेष विदेश सेवा का निमन्त्रण और सेवा का आरम्भ जापान से हुआ। तो एशिया का नम्बर स्थापना में आगे हुआ ना। पहला विदेश का निमन्त्रण था। और धर्म वाले निमन्त्रण दे बुलावें इसका आरम्भ एशिया से हुआ। तो एशिया कितना लकी है! और दूसरी विशेषता – एशिया भारत के सबसे समीप है। जो समीप होता है उनको सिकीलधे कहते हैं। सिकीलधे बच्चे छिपे हुए हैं, हर स्थान पर कितने अच्छे-अच्छे रत्न निकले हैं। क्वान्टिटी भले कम है लेकिन क्वालिटी है। मेहनत का फल अच्छा है। इस तरह धीरे-धीरे अब संख्या बढ़ रही है। सब स्नेही हैं। सब लवली हैं। हर एक, एक दो से ज्यादा स्नेही हैं। यही ब्राह्मण परिवार की विशेषता है। हर एक यह अनुभव करता है कि मेरा सबसे ज्यादा स्नेह है और बाप का भी मेरे से ज्यादा स्नेह है। मेरे को ही बापदादा आगे बढ़ाता है। इसलिए भक्ति मार्ग वालों ने भी बहुत अच्छा एक चित्र अर्थ से बनाया है। हर एक गोपी के साथ वल्लभ है। सिर्फ एक राधे के साथ वा सिर्फ 8 पटरानियों के साथ नहीं। हर एक गोपी के साथ गोपीवल्लभ है। जैसे दिलवाला मन्दिर में जाते हो तो नोट करते हो ना कि यह मेरा चित्र है अथवा मेरी कोठी है। तो इस रास मण्डल में भी आप सबका चित्र है? इसको कहते ही हैं महारास। इस महारास का बहुत बड़ा गायन है। बापदादा का हर एक से एक दो से ज्यादा प्यार है। बापदादा हरेक बच्चे के श्रेष्ठ भाग्य को देख हर्षित होते है। कोई भी है लेकिन कोटों में कोई है। पदमापदम भाग्यवान है। दुनिया के हिसाब से देखो तो इतने कोटों में से कोई हो ना। जापान तो कितना बड़ा है लेकिन बाप के बच्चे कितने हैं! तो कोटों में कोई हुए ना। बापदादा हर एक की विशेषता, भाग्य देखते हैं। कोटों में कोई सिकीलधे हैं। बाप के लिए सभी विशेष आत्मायें हैं। बाप किसको साधारण, किसको विशेष नहीं देखते। सब विशेष हैं। इस तरफ और ज्यादा वृद्धि होनी है क्योंकि इस पूरे साइड में डबल सेवा विशेष है। एक तो अनेक वैरायटी धर्म के हैं। और इस तरफ सिन्ध की निकली हुई आत्मायें भी बहुत हैं। उन्हों की सेवा भी अच्छी कर सकते हो। उन्हों को समीप लाया तो उन्हों के सहयोग से और धर्मों तक भी सहज पहुँच सकेंगे। डबल सेवा से डबल वृद्धि कर सकते हो। उन्हों में किसी न किसी रीति से उल्टे रूप में चाहे सुल्टे रूप में बीज पड़ा हुआ है। परिचय होने के कारण सहज सम्बन्ध में आ सकते हैं। बहुत सेवा कर सकते हो क्योंकि सर्व आत्माओं का परिवार है। ब्राह्मण सभी धर्मों में बिखर गये हैं। ऐसा कोई धर्म नहीं जिसमें ब्राह्मण न पहुँचे हों। अब सब धर्मों से निकल-निकलकर आ रहे हैं। और जो ब्राह्मण परिवार के हैं उन्हों से अपना-पन लगता है ना। जैसे कोई हिसाब-किताब से गये और फिर से अपने परिवार में पहुँच गये। कहाँ-कहाँ से पहुंच अपना सेवा का भाग्य लेने के निमित्त बन गये। यह कोई कम भाग्य नहीं। बहुत श्रेष्ठ भाग्य है। बड़े ते बड़े पुण्य आत्मायें बन जाते। महादानियों, महान सेवाधारियों की लिस्ट में आ जाते। तो निमित्त बनना भी एक विशेष गिफ्ट है। और डबल विदेशियों को यह गिफ्ट मिलती है। थोड़ा ही अनुभव किया और निमित्त बन जाते सेन्टर स्थापन करने के। तो यह भी लास्ट सो फास्ट जाने की विशेष गिफ्ट है। सेवा करने से मैजारिटी को यह स्मृति में रहता है कि जो हम निमित्त करेंगे अथवा चलेंगे, हमको देख और करेंगे। तो यह डबल अटेन्शन हो जाता है। डबल अटेन्शन होने के कारण डबल लिफ्ट हो जाती है। समझा, डबल विदेशियों को डबल लिफ्ट है। अभी सब तरफ धरनी अच्छी हो गई है। हल चलने के बाद धरनी ठीक हो जाती है ना। और फिर फल भी अच्छे और सहज निकलते हैं। अच्छा, एशिया के बड़े माइक का आवाज भारत में जल्दी पहुँचेगा। इसलिए ऐसे माइक तैयार करो। अच्छा।
बड़ी दादियों से:- आप लोगों की महिमा भी क्या करें! जैसे बाप के लिए कहते हैं ना – सागर को स्याही बनायें, धरनी को कागज बनायें… ऐसे ही आप सभी दादियों की महिमा है। अगर महिमा शुरू करें तो सारी रात-दिन एक सप्ताह का कोर्स हो जायेगा। अच्छे हैं, सबकी रास अच्छी है। सभी की राशि मिलती है और सभी रास करते भी अच्छी हैं। हाथ में हाथ मिलाना अर्थात् विचार मिलाना यही रास है। तो बापदादा दादियों की यही रास देखते रहते हैं। अष्ट रत्नों की यही रास है।
आप दादियाँ परिवार का विशेष श्रृंगार हो। अगर श्रृंगार न हो तो शोभा नहीं होती है। तो सभी उसी स्नेह से देखते हैं।
बृजइन्द्रा दादी से:- बचपन से लौकिक में, अलौकक में श्रृंगार करती रही तो श्रृंगार करते-करते श्रृंगार बन गई। ऐसे हैं ना! बापदादा महावीर महारथी बच्चों को सदा ही याद तो क्या करते लेकिन समाये हुए रहते हैं। जो समाया हुआ होता है उनको याद करने की भी जरूरत नहीं। बापदादा सदा ही हर विशेष रत्न को विश्व के आगे प्रत्यक्ष करते हैं। तो विश्व के आगे प्रत्यक्ष होने वाली विशेष रत्न हो। एक्स्ट्रा सभी के खुशी की मदद है। आपकी खुशी को देखकर सबको खुशी की खुराक मिल जाती है। इसलिए आप सबकी आयु बढ़ रही है क्योंकि सभी के स्नेह की आशीर्वाद मिलती रहती है। अभी तो बहुत कार्य करना है, इसलिए श्रृंगार हो परिवार का। सभी कितने प्यार से देखते हैं। जैसे कोई का छत्र उतर जाए तो माथा कैसे लगेगा। छत्र पहनने वाला अगर छत्र न पहने तो क्या लगेगा। तो आप सभी भी परिवार के छत्र हो।
निर्मलशान्ता दादी से:- अपना यादगार सदा ही मधुबन में देखती रहती हो। यादगार होते हैं याद करने के लिए। लेकिन आपकी याद यादगार बना देती है। चलते-फिरते सभी परिवार को निमित्त बने हुए आधार मूर्त याद आते रहते हैं। तो आधार मूर्त हो। स्थापना के कार्य के आधार मूर्त मजबूत होने के कारण यह वृद्धि की, उन्नति की बिल्डिंग कितनी मजबूत हो रही है। कारण? आधार मजबूत है।
अध्याय : सफलता का आधार – दृढ़ता
(विदेशी भाई-बहिनों के समर्पण समारोह पर)
अव्यक्त मुरली – 25 फरवरी 1986
1. विशेष दिन – विशेष संकल्प का समारोह
बापदादा कहते हैं —
आज का दिन साधारण नहीं, दृढ़ संकल्प का समारोह है।
बाहर का दृश्य सुन्दर था,
लेकिन उससे भी अधिक सुन्दर था —
बच्चों का उमंग, उत्साह और अडिग संकल्प।
मुरली भावार्थ
जब दिल की आवाज दिलाराम बाप तक पहुँचती है,
तो वह दिन इतिहास बन जाता है।
2. डबल स्टेज का रहस्य – बाहरी और भीतरी
बापदादा पूछते हैं —
आप सिर्फ एक स्टेज पर बैठे थे या डबल स्टेज पर?
✔ एक — स्थूल स्टेज
✔ दूसरी — दृढ़ संकल्प की स्टेज
उदाहरण
जैसे कोई व्यक्ति मंच पर खड़ा है,
लेकिन मन में डर हो —
तो वह सिंगल स्टेज है।
पर जो मन से भी अडिग है —
वह डबल स्टेज पर है।
3. दृढ़ता ही सफलता का आधार
अव्यक्त मुरली – 25-02-1986
“यह दृढ़ता ही सफलता का आधार है।”
सिर्फ हार पहनना नहीं,
बल्कि सफलता का हार गले में पड़ना —
यही बापदादा देख रहे थे।
✔ साकार दृश्य
✔ आत्मिक स्थिति
✔ मन के संकल्प
बापदादा डबल माला देख रहे थे।
4. “एक बाप दूसरा न कोई” – अचल मंत्र
यही है दृढ़ संकल्प की पहचान —
एक बाप
एक भरोसा
एक बल
मुरली भावार्थ
जब “एक” पक्का होता है,
तो एकरस स्थिति स्वतः आ जाती है।
यदि किसी एक संबंध की भी कमी हो —
तो हलचल शुरू हो जाती है।
5. सर्व संबंध = सर्व प्राप्तियाँ
बापदादा प्रश्न करते हैं —
क्या सिर्फ 2-3 संबंध जोड़े हैं
या सर्व संबंधों की डोर बाँधी है?
✔ माता-पिता
✔ शिक्षक
✔ मित्र
✔ रक्षक
✔ साथी
मुरली भावार्थ
जहाँ सर्व संबंध,
वहाँ सर्व प्राप्तियाँ।
6. दृढ़ संकल्प से पुरुषार्थ में लिफ्ट
दृढ़ संकल्प केवल भावना नहीं,
यह पुरुषार्थ को गति देने की विधि है।
उदाहरण
जैसे लिफ्ट में खड़े हो जाओ,
सीढ़ियाँ अपने-आप नीचे रह जाती हैं।
वैसे ही
दृढ़ संकल्प = आध्यात्मिक लिफ्ट
7. एशिया ग्रुप की विशेषता
अव्यक्त मुरली – 25-02-1986
✔ पहला विदेशी सेवा निमंत्रण – जापान
✔ भारत के समीप – इसलिए “सिकीलधे”
✔ संख्या कम, पर गुणवत्ता श्रेष्ठ
गुण रहस्य
मेहनत का फल मीठा होता है।
8. हर आत्मा विशेष – कोटों में कोई
बापदादा कहते हैं —
कोई साधारण नहीं।
मुरली भावार्थ
कोटों में कोई
पदमापदम भाग्यवान
भक्ति मार्ग की तस्वीर भी यही कहती है —
हर गोपी के साथ गोपीवल्लभ।
9. डबल सेवा = डबल लिफ्ट
एशिया साइड की विशेषता —
✔ अनेक धर्म
✔ सिंध से निकली आत्माएँ
इससे
डबल सेवा
डबल वृद्धि
डबल अटेन्शन
डबल लिफ्ट
10. दादियों की महिमा – परिवार का श्रृंगार
मुरली भावार्थ
दादियाँ —
परिवार का श्रृंगार हैं।
जैसे छत्र के बिना राजा अधूरा लगता है,
वैसे दादियों के बिना
ब्राह्मण परिवार अधूरा।
11. आधार मूर्त – स्थापना की नींव
मुरली भावार्थ
जब आधार मजबूत होता है,
तो उन्नति की इमारत स्वतः मजबूत बनती है।
दादियाँ —
यादगार नहीं,
आधार मूर्त हैं।
निष्कर्ष
✔ सफलता संयोग से नहीं आती
✔ सफलता सुविधा से नहीं आती
✔ सफलता आती है — दृढ़ता से
अव्यक्त मुरली – 25-02-1986
“सदा अविनाशी भव, अमर भव।”
अंतिम संदेश
अगर आज भी —
✔ एक बाप दूसरा न कोई
✔ सर्व संबंधों की डोर
✔ अडिग दृढ़ संकल्प
तो समझो —
सफलता का हार तैयार है।
प्रश्न 1: इस मुरली में बापदादा आज के दिन को “विशेष दिन” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि यह दिन केवल बाहरी कार्यक्रम का नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प के समारोह का दिन था। बच्चों के उमंग, उत्साह और अडिग निश्चय ने इस दिन को ऐतिहासिक बना दिया।
प्रश्न 2: “दृढ़ संकल्प का समारोह” से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब आत्मा के भीतर यह निश्चय पक्का हो जाए कि
“मैं बाप की श्रीमत पर अडिग रहूँगा”,
तो वही स्थिति दृढ़ संकल्प का समारोह कहलाती है।
प्रश्न 3: मुरली में “डबल स्टेज” से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
डबल स्टेज का अर्थ है —
1️⃣ बाहरी (स्थूल) स्टेज – मंच पर बैठना
2️⃣ भीतरी स्टेज – मन में अडिग दृढ़ता होना
जो दोनों स्टेज पर स्थिर है, वही सच्चे अर्थ में सफल है।
प्रश्न 4: सिंगल स्टेज और डबल स्टेज में क्या अंतर है?
उत्तर:
-
सिंगल स्टेज: बाहर सब ठीक, भीतर डर या संदेह
-
डबल स्टेज: बाहर भी स्थिर, भीतर भी अचल
डबल स्टेज वाली आत्मा ही बापदादा को प्रिय लगती है।
प्रश्न 5: अव्यक्त मुरली 25-02-1986 में सफलता का आधार क्या बताया गया है?
उत्तर:
मुरली स्पष्ट कहती है —
“दृढ़ता ही सफलता का आधार है।”
सफलता बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि भीतर की अडिग स्थिति से मिलती है।
प्रश्न 6: बापदादा “सफलता का हार” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि यह हार केवल सम्मान का नहीं,
बल्कि आत्मिक विजय और स्थिति की सफलता का प्रतीक है,
जो दृढ़ संकल्प से प्राप्त होती है।
प्रश्न 7: “एक बाप दूसरा न कोई” को अचल मंत्र क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि जब बुद्धि एक बाप पर टिक जाती है —
तो भरोसा, बल और एकरसता स्वतः आ जाती है।
दूसरा सहारा आते ही हलचल शुरू हो जाती है।
प्रश्न 8: सर्व संबंध जोड़ने का क्या महत्व है?
उत्तर:
जब बाप से
माता-पिता, शिक्षक, मित्र, रक्षक और साथी —
सभी संबंध जोड़ लिए जाते हैं,
तो सर्व प्राप्तियाँ स्वतः मिल जाती हैं।
प्रश्न 9: दृढ़ संकल्प को “आध्यात्मिक लिफ्ट” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
जैसे लिफ्ट सीढ़ियों का श्रम बचा देती है,
वैसे ही दृढ़ संकल्प
पुरुषार्थ को तेज़ और सहज बना देता है।
प्रश्न 10: एशिया ग्रुप की विशेषता मुरली में क्यों बताई गई है?
उत्तर:
क्योंकि
-
संख्या कम थी
-
पर गुणवत्ता श्रेष्ठ थी
-
मेहनत अधिक थी
इसलिए बापदादा ने उन्हें विशेष अटेन्शन दिया।
प्रश्न 11: “हर आत्मा विशेष है” — इसका गूढ़ अर्थ क्या है?
उत्तर:
कोई भी आत्मा साधारण नहीं।
हर आत्मा कोटों में कोई है,
और पदमापदम भाग्यवान बनने का अधिकारी है।
प्रश्न 12: “डबल सेवा = डबल लिफ्ट” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जहाँ अनेक धर्म और विविध आत्माएँ होती हैं,
वहाँ सेवा भी अधिक होती है
और पुरुषार्थ की लिफ्ट भी दोगुनी मिलती है।
प्रश्न 13: मुरली में दादियों को “परिवार का श्रृंगार” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि दादियाँ
अनुभव, त्याग और तपस्या की प्रत्यक्ष मूर्त हैं।
उनके बिना ब्राह्मण परिवार अधूरा लगता है।
प्रश्न 14: “आधार मूर्त” से क्या समझाया गया है?
उत्तर:
आधार मूर्त वे आत्माएँ हैं
जिनकी दृढ़ता पर
ईश्वरीय स्थापना की इमारत खड़ी है।
प्रश्न 15: इस मुरली का मुख्य निष्कर्ष क्या है?
उत्तर:
-
सफलता संयोग से नहीं
-
सुविधा से नहीं
-
बल्कि दृढ़ता से आती है
अव्यक्त मुरली – 25-02-1986
“सदा अविनाशी भव, अमर भव।”
अंतिम प्रश्न (चिंतन हेतु):
क्या मेरा आज का पुरुषार्थ “अडिग दृढ़ता” पर आधारित है?
अगर हाँ —
तो समझो,
सफलता का हार तैयार है।
डिस्क्लेमर
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की
अव्यक्त मुरली, आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक चिंतन पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, शास्त्र, व्यक्ति या मान्यता का खंडन करना नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल आत्मिक जागृति, दृढ़ संकल्प, और जीवन में सच्ची सफलता के आधार
को स्पष्ट करने हेतु है।
दर्शक इसे आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण करें।
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