AW.(15) 19-04-1969 /संस्कारों को बदलना है तो बिन्दु स्वरूप में स्थित रहने का अभ्यास करो
“संस्कारों को बदलना है तो बिन्दु स्वरूप में स्थित रहने का अभ्यास करो”
बापदादा जब आते हैं तो हर एक में क्या देखते हैं? आप जब एक दो को देखते हो तो क्या देखते हो? (भाई-भाई) भाई-भाई के स्वरूप में कैसे देखते हो। किसको देखते हो? (आत्मा को देखते हैं साकार में) बापदादा क्या देखते हैं? बापदादा एक सेकेण्ड में बहुत कुछ देखते हैं। एक तो आत्मा की स्टेज देखते हैं। दूसरा सर्विस का चार्ट देखते हैं। तीसरा चाल-चलन, योग का भी चार्ट देखते हैं। चौथी बात क्या देखते हैं? भविष्य पद, हरेक क्या बनने वाला है। वह बापदादा अभी से ही देखते हैं। आप भी यह 4 बातें देख सकते हो? आप जब एक दो को योग में बिठाते हो, आपकी आत्मा की स्टेज का साक्षात्कार होता है? होना चाहिए। आप भी त्रिकालदर्शी कहलाते हो।
जिस समय याद के यात्रा की भट्ठी में सामने गद्दी पर बैठते हो, उस समय की क्या अवस्था होती है? चेक करना चाहिए कि आज सारे दिन में बिन्दी रूप की याद कितना समय थी? बिन्दी रूप और विचार सागर मंथन दोनों में से पॉवरफुल अवस्था कौन सी समझते हो? (बिन्दी रूप का) यह बिन्दी रूप की अवस्था ज्यादा समय रहे – उसके लिए मुख्य साधन कौन सा है? (भिन्न-भिन्न विचार निकले) यह सब बातें तो ठीक हैं, लेकिन इसमें भी मुख्य बात है – जैसे आप लोगों को समझाते हो हर बात अपने समय पर करनी चाहिए। तुम्हारे पास कोई आकर कहते हैं, हमको ज्ञान सुनने का समय नहीं। गृहस्थ व्यवहार के झंझट बहुत हैं। तो तुम उनको क्या उपाय बताते हो? यही समझाते हो कि गृहस्थ व्यवहार के समय वह कार्य करो और बाकी जो थोड़ा समय निकले उस समय यह ज्ञान लो। तुम उनको समय की पहचान देते हो और समय पर कर्तव्य करने की पहचान देते हो। ऐसे ही जो भी पुरुषार्थी हैं, उनको किस समय क्या करना चाहिए, समय और कर्तव्य की पहचान होनी चाहिए। जिस समय जो अवस्था होनी चाहिए वह रहनी चाहिए। जैसे योग में बैठते हो तो वह समय ऐसा है जब बीजरूप अवस्था में स्थित रह सकते हो। तो उस समय फिर विचार सागर मंथन करने की आवश्यकता नहीं है। विचार सागर मंथन तो चलते-फिरते, नहाते-खाते भी कर सकते हो। जैसे अव्यक्ति रूह-रूहान का समय मुकरर है ना – अमृतवेले का। वैसे ही जब बैठते हो तो पहले बिन्दु रूप में समय लगाना चाहिए, फिर रूह-रूहान में। जब देखो बिन्दु रूप की स्थिति जास्ती नहीं ठहर सकती है तो सेकेण्ड स्टेज रूह-रूहान की पकड़ो। होता क्या है, अव्यक्ति रूह-रूहान या विचार सागर मंथन सहज है। वह तो झट करने लग जाते हो लेकिन बिन्दी रूप में स्थित होना मुश्किल है इसलिए ध्यान कम देते हो। लेकिन होना बहुत जरूरी चाहिए। जैसे साकार रूप में भी दृष्टान्त देखा, बात करते समय, खाना खाते समय एक दो सेकेण्ड के लिए भी शरीर से गायब देखने आते थे। बात करते हुए अशरीरी, आत्मिक रूप देखते थे। यह बिन्दी स्वरूप की स्थिति में रहने का पुरुषार्थ था। आपका यह पुरुषार्थ कम है इसलिए संस्कार नहीं बदलते हैं। संस्कारों को बदलना कैसे हो? जब विकर्मों का बोझा हल्का होगा। संस्कारों को बदलने के लिए धारणा की क्लासेज तो बहुत होती हैं। एक दो में वर्णन भी बहुत करते हो लेकिन फिर भी संस्कार कहाँ बदलते हैं? संस्कार बदलने का साधन ही यह है। तो वर्तमाय समय इस बात पर भी ध्यान विशेष देना चाहिए। कम से कम सारे दिन में ऐसा विशेष समय अवश्य निकालना चाहिए। अपनी-अपनी दिनचर्या प्रमाण खास इस अभ्यास के लिये अपना समय निकालो। भल अव्यक्त स्थिति में रहने का पुरुषार्थ तो करते हो लेकिन अव्यक्ति स्थिति स्थाई रूप में तब होगी जब अशरीरी बिन्दी रूप का अभ्यास होगा। नहीं तो बार-बार व्यक्त भाव में आते हो। दूसरों को सुनाते हो – यह शरीर एक चोला है। तो जैसे इस चोले अर्थात् वस्त्र को जब चाहें तब पहनें, जब चाहें तब उतार भी सकते हैं। ऐसे प्रैक्टिस होनी चाहिए। शरीर का भान भूल भी जाएं और भान में आवें भी। जब ऐसी अवस्था होगी तब अन्त में धर्मराज की सजायें नहीं खायेंगे। नहीं तो संस्कार जो प्रबल चलता आता है, उन संस्कारों के कारण सजायें खानी पड़ेगी। अभी यह अभ्यास बहुत कम है। आप जो अभ्यास करते हो वह तब तक नहीं हो सकता जब तक आप पहले इस बिन्दी स्वरूप की स्थिति को पक्का न करो। इसलिए खास महारथियों को जो अष्ट देवतायें बनते हैं, उन्हों को विशेष ध्यान रखना चाहिए। सिर्फ अष्ट ही धर्मराजपुरी से क्रॉस कर सजायें नहीं खायेंगे। सजायें न खाने का प्रयत्न यही है और जितना समय जो बिन्दु रूप में होगा उसके संस्कारों में चेन्ज देखने में आयेगी। तो संस्कार बदलने का मुख्य साधन यही है, इसके लिए समय और कर्तव्य का ध्यान। अपनी दिनचर्या को सेट करो। ऐसे ही समय जाता रहा तो सम्पूर्ण कब बनेंगे। जब कहते भी हो पुरुषार्थ का समय कम है, तो मुख्य पुरुषार्थ तो अभी रहा हुआ है। यह जो आप लोगों ने सब बातें सुनाई – बिन्दु रूप में स्थित होने की। वह भी बिन्दु रूप होने में मददगार हैं। परन्तु उनमें मुख्य बात जो सुनाई, ब्रेक पॉवरफुल होनी चाहिए। कईयों की ब्रेक बहुत वीक है। जैसे गाड़ी की ब्रेक वीक होती है तो एक्सीडेंट हो जाता है। इसलिए ब्रेक पॉवरफुल होनी चाहिए। ड्रामा की प्वाइंट भी हर कर्तव्य में परिपक्व होनी चाहिए। यह सबजेक्ट कुछ कम देखने आती है। आपकी यादगार में तीसरा नेत्र दिखाया है, वह आत्मा की स्थिति स्थूल में देखने में आयेगी।
आज तो विशेष इस बात की रिजल्ट पर सुनाना था, वह सुनाया। ज्यादा से ज्यादा दो अढ़ाई घण्टे से ज्यादा किसी की भी रिजल्ट नहीं देखते। वह भी बहुत थोड़ों की और कभी कभी रहती है। सदैव नहीं। अगर दो घण्टा भी सदैव रहें तो भी बहुत है। इस स्थिति में रहने से अन्तर्मुखता का गुण सहज ही आ जायेगा और न चाहते हुए भी उनको एकान्त अपनी तरफ खिंचेगी। काम करते समय भी ऐसे अनुभव करेंगे जैसे एकान्त खींच रही है। बात करते-करते भी ऐसी अवस्था का अनुभव कर सकते हो। लेकिन जब तक एकान्त में बैठने का अभ्यास नहीं होगा तो कर्म करते हुए यह अनुभव नहीं कर सकेंगे।
साकार रूप के सामने जब आप जाते हो तो एकान्त, अन्तर्मुखता जैसे खिंचती हैं ना। कभी-कभी आप सुनाते भी थे कि ऐसे लगता है जैसे लाइट ही लाइट है। बात करते भी जैसे लाइट ही लाइट देखने आती है। यह बिन्दी रूप की स्थिति का प्रभाव है। आप लोगों से भी ऐसा अनुभव होना चाहिए। तब आपकी जीवन अलौकिक देखेंगे। बिन्दी रूप में फिर ज्ञान अन्दर मर्ज हो जाता है। जैसे सतयुगी देवताओं के लिए कहते हो ज्ञान इमर्ज रूप में नहीं होगा। अर्थात् विस्तार नहीं होगा। बीज में विस्तार समाया हुआ होता है ना। तो बिन्दु रूप अर्थात् बीज रूप। बीज में सब मर्ज रहता है। फिर धरनी में बीज डालने से इमर्ज होता है। इसी रीति बिन्दु रूप में सब ज्ञान मर्ज रहता है। इमर्ज तब होता जब नीचे आते हो। बिन्दु रूप में वह भरपूर अवस्था रहती है। (यह तो जैसे समाधि मिसल हुआ) नहीं। यहाँ समाधि की बात तो है ही नहीं। उन्हों को ज्ञान कुछ भी नहीं है। वह निल की अवस्था है। यह निल नहीं। यह है ज्ञान स्वरूप हो जाना। आप मंथन करते हो, कुछ प्वाइंट को स्पष्ट करने के लिए वह सेकेण्ड स्टेज है। जैसे कोई साकार की बातों में ही रमण करते हैं, भल उनको भी योग कहेंगे। बापदादा की ही याद रहती है लेकिन परसेन्टेज कम कहेंगे। उनको भी स्मृति कहेंगे परन्तु बिन्दु रूप की स्थिति ज्यादा पॉवरफुल है। यह है प्रेम स्वरूप, स्नेह रूप दोनों में अन्तर है। उसमें कुछ विशेष पॉवर होती है। समाधि की निल अवस्था अलग है। उनका कोई लक्ष्य नहीं। इसमें तो प्राप्ति है। खुशी का, शीतलता का और सर्वगुण सम्पन्न का भी अनुभव होता है। भरपूरता की अवस्था है। जैसे बीज भरा हुआ होता है, खाली नहीं होता है। इस रीति यह अवस्था है। थोड़ा अभ्यास करेंगे फिर इस अनुभव को स्पष्ट समझते जायेंगे। फिर भी आपस में इस पर विचार करना। जिन्हों को विशेष अनुभव हो बिन्दी रूप में स्थित होने का वह अपना अनुभव सुनाकर औरों को भी अनुभवी बनाने की कोशिश करना होगा तो फिर भी अपने ही अभ्यास करने से। अच्छा!
हरेक ने कितनी प्रजा बनाई है। जिसको जो काम करना होता है तो लक्ष्य रखने से वह प्लैन भी आ जाता है। एम रखो कि हमको ज्यादा से ज्यादा प्रजा थोड़े समय में बनानी है। लक्ष्मी नारायण की कितनी प्रजा होगी। तो उनके राज्य में नजदीक आने के लिए साथ रहने, साथ खेलने आदि के लिए फिर इतनी प्रजा बनानी है। कम प्रजा वाले छोटे राजा कहे जायेंगे। वह कभी-कभी दरबार में आयेंगे। नजदीक आना चाहिए ना। जैसे रोज का चार्ट देखना है, वैसे प्रजा बनाने का भी चार्ट रखना चाहिए। फिर जब मिलने आना तो ज्यादा से ज्यादा प्रजा बनाई हुई सामने देखें। ऐसा दिखायेंगे ना। प्रजा तो सबको बनानी है। अच्छा!
अतिइन्द्रिय सुख में रहते हो? अतिइन्द्रिय सुख का अर्थ क्या है? अव्यक्त स्थिति में रह ईश्वरीय सुख का अनुभव करना। पीछे आने वालों को और ही रेस करनी है। आगे जा सकते हो। माया भल कितना भी आये लेकिन हिलना नहीं हैं। हिम्मत रखते हैं तो मदद भी दैवी परिवार की मिलेगी लेकिन अपने पुरुषार्थ से हटना नहीं हैं। पुरुषार्थ दिन प्रतिदिन नया है या पुराना है? खुद भल पुराने होते जाएं लेकिन पुरुषार्थ नया होना चाहिए।
अध्याय 1 — बापदादा एक सेकण्ड में क्या देखते हैं?
बापदादा जब बच्चों को देखते हैं तो केवल बाहरी रूप नहीं देखते, बल्कि आत्मा की अन्दरूनी स्थिति और भविष्य को भी देखते हैं।
बापदादा मुख्य रूप से चार बातें देखते हैं:
- आत्मा की वर्तमान स्टेज
- सर्विस का चार्ट
- चाल-चलन और योग का चार्ट
- भविष्य पद — आत्मा आगे क्या बनने वाली है
उदाहरण:
जैसे एक अनुभवी शिक्षक विद्यार्थी को देखकर उसकी तैयारी, व्यवहार और भविष्य की सम्भावना पहचान लेता है, वैसे ही बापदादा आत्मा की वर्तमान स्थिति और भविष्य पद को देखते हैं।
मुरली नोट
त्रिकालदर्शी बनने का अर्थ है—वर्तमान स्थिति के साथ भविष्य परिणाम को भी देखना।
अध्याय 2 — बिन्दु स्वरूप और विचार सागर मंथन
याद की यात्रा में बैठते समय स्वयं को चेक करना चाहिए—
“आज पूरे दिन में मैंने बिन्दु रूप की याद में कितना समय बिताया?”
विचार सागर मंथन भी आवश्यक है, लेकिन दोनों की अपनी-अपनी स्टेज है।
मुख्य बात:
बिन्दु स्वरूप = अधिक पॉवरफुल अवस्था
विचार सागर मंथन = ज्ञान के विस्तार और स्पष्टता के लिए
उदाहरण:
जैसे बीज छोटा होता है लेकिन उसके अंदर पूरा वृक्ष समाया रहता है, वैसे ही बिन्दु स्वरूप में ज्ञान का पूरा सार मर्ज रहता है।
अध्याय 3 — समय और कर्तव्य की पहचान
हर कार्य अपने समय पर करना चाहिए।
गृहस्थ व्यवहार में व्यक्ति को पहले अपने आवश्यक कार्य करने हैं और जो समय बचे उसमें ज्ञान और योग के लिए समय निकालना है।
इसी प्रकार योग में बैठने का भी एक विशेष उद्देश्य है।
योग के समय:
पहले बिन्दु स्वरूप → फिर रूह-रूहान → फिर आवश्यकता अनुसार विचार सागर मंथन।
विचार सागर मंथन तो चलते-फिरते, खाते-पीते और कर्म करते हुए भी किया जा सकता है।
मुरली नोट
जिस समय जो अवस्था होनी चाहिए, उस समय वही अवस्था धारण करना ही समय और कर्तव्य की पहचान है।
अध्याय 4 — बिन्दु स्वरूप में स्थित होना क्यों कठिन लगता है?
रूह-रूहान और विचार सागर मंथन करना सहज लगता है, लेकिन अशरीरी बिन्दु स्वरूप में स्थित होना कठिन लगता है।
इसीलिए इस अभ्यास पर पर्याप्त ध्यान नहीं जाता।
उदाहरण:
जैसे गाड़ी को चलाना आसान है, लेकिन अचानक उसे सही समय पर रोकना अच्छी ब्रेक की निशानी है।
वैसे ही विचारों को चलाना सरल है, लेकिन एक सेकण्ड में विचारों को ब्रेक लगाकर बिन्दु स्वरूप में स्थित होना विशेष पुरुषार्थ है।
अध्याय 5 — संस्कार बदलने का मुख्य साधन
धारणा की बातें सुनने और समझाने से संस्कार अपने-आप नहीं बदलते।
संस्कार परिवर्तन के लिए मुख्य साधन है—
बिन्दु स्वरूप का अभ्यास
जितना अधिक समय आत्मा अशरीरी बिन्दु रूप में स्थित होगी, उतना ही पुराने संस्कारों में परिवर्तन दिखाई देगा।
उदाहरण:
जैसे बार-बार किसी नए रास्ते पर चलने से वह रास्ता सहज हो जाता है, वैसे ही बार-बार बिन्दु स्वरूप का अभ्यास करने से अशरीरी स्थिति संस्कार में आने लगती है।
मुरली नोट
“संस्कारों को बदलने का साधन ही यह है।”
अध्याय 6 — शरीर एक चोला है
बच्चों को समझाया जाता है कि यह शरीर एक चोला अर्थात् वस्त्र है।
जैसे वस्त्र को आवश्यकता के अनुसार पहना और उतारा जाता है, वैसे ही आत्मा को शरीर के भान से ऊपर उठने का अभ्यास करना है।
अभ्यास:
शरीर का भान भूलना → अशरीरी बनना → आवश्यकता पर शरीर के भान में आना।
यह अभ्यास अन्तिम समय की तैयारी भी है।
अध्याय 7 — ब्रेक पॉवरफुल बनाओ
बिन्दु स्वरूप की स्थिति के लिए ब्रेक पॉवरफुल होना बहुत आवश्यक है।
उदाहरण:
यदि गाड़ी की ब्रेक कमजोर हो तो दुर्घटना हो सकती है। इसी प्रकार बुद्धि की ब्रेक कमजोर होने पर संकल्पों की गति को समय पर रोकना मुश्किल होता है।
अभ्यास:जब चाहें—
स्टॉप
बिन्दु
अशरीरी
शान्त
यह अभ्यास धीरे-धीरे ब्रेक पॉवर को मजबूत करता है।
मुरली नोट
“ब्रेक पॉवरफुल होनी चाहिए।”
अध्याय 8 — बिन्दु रूप और समाधि में अन्तर
बिन्दु स्वरूप को समाधि या शून्य अवस्था नहीं समझना है।
समाधि की निल अवस्था:
कुछ प्राप्ति का लक्ष्य नहीं।
बिन्दु स्वरूप:
ज्ञान से भरपूर, शीतलता, खुशी और सर्वगुण सम्पन्नता का अनुभव कराने वाली अवस्था।
उदाहरण:
बीज बाहर से छोटा दिखाई देता है, लेकिन उसके अंदर पूरा वृक्ष छिपा होता है।
इसी प्रकार बिन्दु स्वरूप में ज्ञान का विस्तार मर्ज रहता है और आवश्यकता के अनुसार वह इमर्ज होता है।
अध्याय 9 — बिन्दु स्वरूप का प्रभाव
जब बिन्दु स्वरूप की स्थिति मजबूत होती है तो—
- अन्तर्मुखता सहज आती है।
- एकान्त अपनी ओर आकर्षित करता है।
- व्यक्त भाव कम होता है।
- ज्ञान भीतर मर्ज अनुभव होता है।
- आत्मिक शक्ति बढ़ती है।
- जीवन अलौकिक दिखाई देने लगता है।
उदाहरण:
जैसे शक्तिशाली चुंबक बिना आवाज किए लोहे को अपनी ओर खींचता है, वैसे ही गहरी अन्तर्मुखी स्थिति वातावरण पर प्रभाव डालती है।
अध्याय 10 — एकान्त और अन्तर्मुखता
केवल एकान्त में बैठना ही पर्याप्त नहीं है।
पहले एकान्त का अभ्यास करना होगा, तभी कर्म करते हुए भी अन्तर्मुखता का अनुभव हो सकेगा।
लक्ष्य:
एकान्त में भी बिन्दु स्वरूप और कर्म करते हुए भी बिन्दु स्वरूप।
यही अभ्यास व्यक्त और अव्यक्त के बीच सहज आने-जाने की शक्ति देता है।
अध्याय 11 — प्रजा बनाने का लक्ष्य
बापदादा केवल अपनी योग स्थिति का चार्ट रखने की बात नहीं करते, बल्कि प्रजा बनाने का चार्ट रखने की भी प्रेरणा देते हैं।
जैसे रोज अपना पुरुषार्थ चेक करते हैं, वैसे ही यह भी देखें—
“मैंने कितनी आत्माओं को बाप का परिचय दिया?”
उदाहरण:
एक राजा की महानता केवल उसके महल से नहीं, बल्कि उसकी प्रजा और उसके राज्य के विस्तार से भी देखी जाती है।
इसलिए सेवा में स्पष्ट लक्ष्य रखें और समय के अनुसार प्रजा बनाने का पुरुषार्थ करें।
अध्याय 12 — अतिइन्द्रिय सुख क्या है?
अतिइन्द्रिय सुख का अर्थ है—अव्यक्त स्थिति में रहकर ईश्वरीय सुख का अनुभव करना।
माया कितनी भी आए, लेकिन स्थिति को हिलने नहीं देना है।
मुख्य सूत्र:
हिम्मत रखो → पुरुषार्थ में अडिग रहो → दैवी परिवार की मदद प्राप्त करो।
अध्याय 13 — पुरुषार्थ पुराना नहीं, रोज नया
एक बहुत सुंदर शिक्षा है—
“खुद भल पुराने होते जाएं लेकिन पुरुषार्थ नया होना चाहिए।”
अर्थात् समय बीतने के साथ पुरुषार्थ में ढील नहीं आनी चाहिए।
हर दिन स्वयं से पूछें:
- आज मेरी याद कल से बेहतर थी?
- आज मेरी ब्रेक पॉवर कितनी रही?
- आज कितनी देर बिन्दु स्वरूप में रहा?
- आज कितनी आत्माओं की सेवा की?
- आज मेरे पुराने संस्कारों में क्या परिवर्तन आया?
मुख्य मुरली सूत्र
बिन्दु स्वरूप का अभ्यास = संस्कार परिवर्तन का मुख्य साधन।
पहले बिन्दु रूप, फिर रूह-रूहान।
विचार सागर मंथन कर्म करते हुए भी किया जा सकता है।
ब्रेक पॉवरफुल बनाओ।
शरीर को चोला समझकर अशरीरी बनने का अभ्यास करो।
बिन्दु रूप निल अवस्था नहीं, बल्कि ज्ञान से भरपूर बीजरूप अवस्था है।
जितना बिन्दु रूप में रहेंगे, उतना संस्कारों में परिवर्तन दिखाई देगा।
पुरुषार्थ रोज नया होना चाहिए।
मुरली नोट
विषय: संस्कार परिवर्तन और बिन्दु स्वरूप का अभ्यास
स्रोत: अव्यक्त महावाक्य / बापदादा
मुख्य विषय: बिन्दु स्वरूप, अशरीरी स्थिति, ब्रेक पॉवर, संस्कार परिवर्तन, अन्तर्मुखता, अतिइन्द्रिय सुख और सेवा।
मुख्य संदेश: संस्कारों को बदलने के लिए केवल धारणा की बातें करना पर्याप्त नहीं; नियमित रूप से अशरीरी बिन्दु स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास आवश्यक है।
प्रश्न 1. बापदादा बच्चों को देखते समय मुख्य रूप से कौन-सी चार बातें देखते हैं?
उत्तर: बापदादा आत्मा की स्टेज, सर्विस का चार्ट, चाल-चलन व योग का चार्ट और भविष्य पद—आत्मा आगे क्या बनने वाली है—इन चार बातों को देखते हैं।
प्रश्न 2. याद की यात्रा में बैठकर स्वयं को क्या चेक करना चाहिए?
उत्तर: यह चेक करना चाहिए कि पूरे दिन में बिन्दु रूप की याद में कितना समय रहा और अपनी योग स्थिति कितनी शक्तिशाली रही।
प्रश्न 3. बिन्दु रूप और विचार सागर मंथन में अधिक पॉवरफुल अवस्था कौन-सी है?
उत्तर: बिन्दु रूप की अवस्था अधिक पॉवरफुल मानी गई है, क्योंकि इसमें आत्मा बीजरूप और भरपूर स्थिति का अनुभव करती है।
प्रश्न 4. योग में बैठते समय सबसे पहले किस अवस्था का अभ्यास करना चाहिए?
उत्तर: सबसे पहले बिन्दु स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास करना चाहिए, उसके बाद रूह-रूहान और आवश्यकता अनुसार विचार सागर मंथन करना चाहिए।
प्रश्न 5. विचार सागर मंथन कब किया जा सकता है?
उत्तर: विचार सागर मंथन चलते-फिरते, खाते-पीते और कर्म करते हुए भी किया जा सकता है। इसके लिए विशेष रूप से एक ही समय पर बैठना आवश्यक नहीं है।
प्रश्न 6. बिन्दु स्वरूप में स्थित होना कठिन क्यों लगता है?
उत्तर: क्योंकि रूह-रूहान और विचार सागर मंथन सहज लगते हैं, जबकि विचारों को रोककर अशरीरी बिन्दु स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास कम किया गया है।
प्रश्न 7. संस्कारों को बदलने का मुख्य साधन क्या बताया गया है?
उत्तर: नियमित रूप से अशरीरी बिन्दु स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास संस्कारों को बदलने का मुख्य साधन बताया गया है।
प्रश्न 8. बिन्दु स्वरूप का संस्कारों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: जितना अधिक समय आत्मा बिन्दु रूप में स्थित होगी, उतना ही पुराने और प्रबल संस्कारों में परिवर्तन दिखाई देगा।
प्रश्न 9. शरीर को चोला समझने का क्या अर्थ है?
उत्तर: शरीर को एक वस्त्र या चोला समझकर आवश्यकता के अनुसार शरीर के भान में आना और आवश्यकता अनुसार अशरीरी स्थिति में स्थित होना—इस अभ्यास को मजबूत करना है।
प्रश्न 10. “ब्रेक पॉवरफुल” होने का क्या अर्थ है?
उत्तर: आवश्यकता पड़ते ही संकल्पों की गति को रोककर एक सेकण्ड में बिन्दु, अशरीरी और शान्त स्थिति में स्थित हो जाना ही शक्तिशाली ब्रेक का अभ्यास है।
प्रश्न 11. कमजोर ब्रेक का उदाहरण किससे दिया गया है?
उत्तर: गाड़ी की ब्रेक कमजोर होने पर एक्सीडेंट हो सकता है। इसी प्रकार बुद्धि की ब्रेक कमजोर होने पर संकल्पों को समय पर रोकना कठिन हो जाता है।
प्रश्न 12. बिन्दु स्वरूप और समाधि की निल अवस्था में क्या अन्तर है?
उत्तर: बिन्दु स्वरूप निल या खाली अवस्था नहीं है। यह ज्ञान से भरपूर, शीतलता, खुशी और सर्वगुण सम्पन्नता का अनुभव कराने वाली बीजरूप अवस्था है।
प्रश्न 13. बिन्दु स्वरूप को बीजरूप क्यों कहा गया है?
उत्तर: जैसे बीज के अंदर पूरा वृक्ष मर्ज रहता है, वैसे ही बिन्दु स्वरूप में ज्ञान का पूरा विस्तार मर्ज रहता है और आवश्यकता के अनुसार इमर्ज होता है।
प्रश्न 14. बिन्दु स्वरूप की स्थिति का क्या प्रभाव दिखाई देता है?
उत्तर: इससे अन्तर्मुखता सहज आती है, एकान्त प्रिय लगता है, व्यक्त भाव कम होता है और आत्मिक शान्ति, खुशी तथा भरपूरता का अनुभव होता है।
प्रश्न 15. बिन्दु स्वरूप की स्थिति कर्म करते हुए भी कैसे लाई जा सकती है?
उत्तर: पहले एकान्त में बिन्दु स्वरूप का नियमित अभ्यास करना होगा। अभ्यास मजबूत होने पर कर्म करते हुए, बातचीत के बीच और अन्य कार्यों में भी अशरीरी स्थिति का अनुभव किया जा सकता है।
प्रश्न 16. प्रजा बनाने का चार्ट क्यों रखना चाहिए?
उत्तर: जैसे रोज अपने पुरुषार्थ और योग का चार्ट देखते हैं, वैसे ही सेवा में कितनी आत्माओं को बाप का परिचय दिया और कितनी आत्माओं को ईश्वरीय परिवार से जोड़ा—इसका भी लक्ष्य रखना चाहिए।
प्रश्न 17. अतिइन्द्रिय सुख का क्या अर्थ है?
उत्तर: अव्यक्त स्थिति में रहकर ईश्वरीय सुख का अनुभव करना ही अतिइन्द्रिय सुख है।
प्रश्न 18. माया कितनी भी आये तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: हिम्मत रखते हुए अपने पुरुषार्थ से हटना नहीं चाहिए। दृढ़ता से पुरुषार्थ करने पर दैवी परिवार का सहयोग भी प्राप्त होता है।
प्रश्न 19. पुरुषार्थ कैसा होना चाहिए—पुराना या नया?
उत्तर: उम्र भले बढ़ती जाए और स्वयं पुराने होते जाएं, लेकिन पुरुषार्थ प्रतिदिन नया और उत्साहपूर्ण होना चाहिए।
प्रश्न 20. इस अव्यक्त महावाक्य की सबसे मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: संस्कारों को बदलने के लिए नियमित रूप से बिन्दु स्वरूप, अशरीरी अवस्था और शक्तिशाली ब्रेक का अभ्यास करना है। जितना बिन्दु रूप में स्थित होंगे, उतना आत्मिक शक्ति और संस्कार परिवर्तन का अनुभव होगा।
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