(17)07-03-1986 “A truly memorable experience of studying all four subjects – Maha Shivaratri”

AV-(17)07-03-1986 “पढ़ाई की चारों सब्जेक्ट का यथार्थ यादगार – ‘महा-शिवरात्रि’

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07-03-1986 “पढ़ाई की चारों सब्जेक्ट का यथार्थ यादगार – ‘महा-शिवरात्रि’”

आज ज्ञान दाता, भाग्य विधाता, सर्वशक्तियों के वरदाता, सर्व खजानों से भरपूर करने वाले भोलानाथ बाप अपने अति स्नेही सदा सहयोगी, समीप बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। यह मिलन ही सदाकाल का उत्सव मनाने का यादगार बन जाता है। जो भी भिन्न-भिन्न नामों से समय प्रति समय उत्सव मनाते हैं – वह सभी इस समय बाप और बच्चों के मधुर मिलन, उत्साह भरा मिलन, भविष्य के लिए उत्सव के रूप में बन जाता है। इस समय आप सर्वश्रेष्ठ बच्चों का हर दिन, हर घड़ी सदा खुशी में रहने की घड़ियां वा समय है। तो इस छोटे से संगमयुग के अलौकिक जीवन, अलौकिक प्राप्तियाँ, अलौकिक अनुभवों को द्वापर से भक्तों ने भिन्न-भिन्न नाम से यादगार बना दिये हैं। एक जन्म की आपकी यह जीवन, भक्ति के 63 जन्मों के लिए याद का साधन बन जाती है। इतनी महान आत्मायें हो! इस समय की सबसे वण्डरफुल बात यही देख रहे हो – जो प्रैक्टिकल भी मना रहे हो और निमित्त उस यादगार को भी मना रहे हो। चैतन्य भी हो और चित्र भी साथ-साथ हैं।

5 हजार वर्ष पहले हर एक ने क्या-क्या प्राप्त किया, क्या बने, कैसे बने, यह 5 हजार वर्ष का पूरा अपना यादगार चित्र और जन्म-पत्री सभी स्पष्ट रूप में जान गये हो। सुन रहे हो और देख-देख हर्षित हो रहे हो कि यह हमारा ही गायन पूजन हमारे जीवन की कथायें वर्णन कर रहे हैं। ओरीज्नल आपका चित्र तो बना नहीं सकते हैं। इसलिए भावनापूर्वक जो भी टच हुआ वह चित्र बना दिया है। तो प्रैक्टिकल शिव-जयन्ति तो रोज़ मनाते ही हो क्योंकि संगमयुग है ही अवतरण का युग, श्रेष्ठ कर्तव्य, श्रेष्ठ चरित्र करने का युग। लेकिन बेहद युग के बीच में यह यादगार दिन भी मना रहे हो। आप सबका मनाना है – मिलन मनाना और उन्हों का मनाना है आह्वान करना। उन्हों का है पुकारना और आपका है पा लेना। वह कहेंगे “आओ” और आप कहेंगे “आ गये”, मिल गये। यादगार और प्रैक्टिकल में कितना रात-दिन का अन्तर है। वास्तव में यह दिन भोलानाथ बाप का दिन है, भोलानाथ अर्थात् बिना हिसाब के अनगिनत देने वाला। वैसे जितना और उतने का हिसाब होता है, जो करेगा वह पायेगा। उतना ही पायेगा। यह हिसाब है। लेकिन भोलानाथ क्यों कहते? क्योंकि इस समय देने में जितने और उतने का हिसाब नहीं रखता। एक का पदमगुणा हिसाब है। तो अनगिनत हो गया ना। कहाँ एक कहाँ पदम। पदम भी लास्ट शब्द है इसलिए पदम कहते हैं। अनगिनत देने वाले भोले भण्डारी का दिन यादगार रूप में मनाते हैं। आपको तो इतना मिला है जो अब तो भरपूर हो ही लेकिन 21 जन्म, 21 पीढ़ी सदा भरपूर रहेंगे।

इतने जन्मों की गैरन्टी और कोई नहीं कर सकता। कितना भी कोई बड़ा दाता हो लेकिन अनेक जन्म का भरपूर भण्डारा होने की गैरन्टी कोई भी नहीं कर सकता। तो भोलानाथ हुआ ना। नॉलेजफुल होते भी भोला बनते हैं… इसलिए भोलानाथ कहा जाता है। वैसे तो हिसाब करने में, एक-एक संकल्प का भी हिसाब जान सकते हैं। लेकिन जानते हुए भी देने में भोलानाथ ही बनता है। तो आप सभी भोलानाथ बाप के भोलानाथ बच्चे हो ना! एक तरफ भोलानाथ कहते दूसरे तरफ भरपूर भण्डारी कहते हैं। यादगार भी देखो कितना अच्छा मनाते हैं। मनाने वालों को पता नहीं लेकिन आप जानते हो। जो मुख्य इस संगमयुग की पढ़ाई है, जिसकी विशेष 4 सब्जेक्ट हैं वह चार ही सब्जेक्ट यादगार दिवस पर मनाते आते हैं। कैसे? पहले भी सुनाया था कि विशेष इस उत्सव के दिन बिन्दु का और बूंद का महत्व होता है। तो बिन्दु इस समय के याद अर्थात् योग के सब्जेक्ट की निशानी है। याद में बिन्दु स्थिति में ही स्थित होते हो ना! तो बिन्दु याद की निशानी और बूँद – ज्ञान की भिन्न-भिन्न बूँदे। इस ज्ञान के सब्जेक्ट की निशानी बूँद के रूप में दिखाई है। धारणा की निशानी इसी दिन विशेष व्रत रखते हैं। तो व्रत धारण करना। धारणा में भी आप दृढ़ संकल्प करते हो। तो व्रत रखते हो कि ऐसा सहनशील वा अन्तर्मुख अवश्य बनके ही दिखायेंगे। तो यह व्रत धारण करते हो ना! यह व्रत धारणा की निशानी है और सेवा की निशानी है जागरण। सेवा करते ही हो किसको जगाने के लिए। अज्ञान नींद से जगाना, जागरण कराना, जागृति दिलाना – यही आपकी सेवा है। तो यह जागरण सेवा की निशानी है। तो चार ही सब्जेक्ट आ गई ना। लेकिन सिर्फ रूपरेखा उन्होंने स्थूल रूप में बदल दी है। फिर भी भक्त भावना वाले होते हैं और सदा ही सच्चे भक्तों की यह निशानी होगी कि जो संकल्प करेंगे उसमें दृढ़ रहेंगे। इसलिए भक्तों से भी बाप का स्नेह है। फिर भी आपके यादगार को द्वापर से परम्परा तो चला रहे हैं और विशेष इस दिन जैसे आप लोग यहाँ संगमयुग पर बार-बार समर्पण समारोह मनाते हो, अलग-अलग भी मनाते हो, ऐसे ही आपके इस फंक्शन का भी यादगार वह स्वयं को समर्पण नहीं करते लेकिन बकरे को करते हैं। बलि चढ़ा देते हैं। वैसे तो बापदादा भी हंसी में कहते हैं कि यह मैं मैं-पन का समर्पण हो तब समर्पण अर्थात् सम्पूर्ण बनो। बाप समान बनो। जैसे ब्रह्मा बाप ने पहला-पहला कदम क्या उठाया? मैं और मेरा-पन का समर्पण समारोह माना किसी भी बात में मैं के बजाए सदा नेचुरल भाषा में साधारण भाषा में भी बाप शब्द ही सुना। मैं शब्द नहीं।

बाबा करा रहा है, मैं कर रहा हूँ, नहीं। बाबा चला रहा है, मै कहता हूँ, नहीं। बाबा कहता है। हद के कोई भी व्यक्ति या वैभव से लगाव यह मेरापन है। तो मेरेपन को और मैं-पन को समर्पण करना इसको ही कहते हैं बलि चढ़ना। बलि चढ़ना अर्थात् महाबली बनना। तो यह समर्पण होने की निशानी है। तो बापदादा भक्तों को एक बात की ऑफरीन देते हैं – किसी भी रूप से भारत में वा हर देश में उत्साह की लहर फैलाने के लिए उत्सव बनाये तो अच्छे हैं ना। चाहे दो दिन के लिए हो या एक दिन के लिए हो लेकिन उत्साह की लहर तो फैल जाती है ना, इसलिए उत्सव कहते हैं। फिर भी अल्पकाल के लिए विशेष रूप से बाप के तरफ मैजॉरिटी का अटेन्शन तो जाता है ना। तो इस विशेष दिन पर क्या विशेष करेंगे? जैसे भक्ति में कोई सदाकाल के लिए व्रत लेता है और कोई में हिम्मत नहीं होती है तो एक मास के लिए, एक दिन के लिए या थोड़े समय के लिए लेते हैं। फिर वह व्रत छोड़ देते हैं। आप तो ऐसे नहीं करते हो ना! मधुबन में तो धरनी पर पाँव नहीं है और फिर जब विदेश में जायेंगे तो धरनी पर आयेंगे या ऊपर ही रहेंगे! सदा ऊपर से नीचे आकर कर्म करेंगे या नीचे रहकर कर्म करेंगे? ऊपर रहना अर्थात् ऊपर की स्थिति में रहना। ऊपर कोई छत पर नहीं लटकना है। ऊंची स्थिति में स्थित हो कोई भी साधारण कर्म करना अर्थात् नीचे आना, लेकिन साधारण कर्म करते भी स्थिति ऊपर अर्थात् ऊंची हो। जैसे बाप भी साधारण तन लेता है ना। कर्म तो साधारण ही करेंगे ना, जैसे आप लोग बोलेंगे वैसे ही बोलेंगे। वैसे ही चलेंगे। तो कर्म साधारण है, तन ही साधारण है, लेकिन साधारण कर्म करते भी स्थिति ऊंची रहती। ऐसे आप की भी स्थिति सदा ऊंची हो।

जैसे आज के दिन को अवतरण का दिन कहते हो ना तो रोज़ अमृतवेले ऐसे ही सोचो कि निंद्रा से नहीं शान्तिधाम से कर्म करने के लिए अवतरित हुए हैं। और रात को कर्म करके शान्तिधाम में चले जाओ। तो अवतार अवतरित होते ही हैं श्रेष्ठ कर्म करने के लिए। उनको जन्म नहीं कहते हैं, अवतरण कहते हैं। ऊपर की स्थिति से नीचे आते हैं – यह है अवतरण। तो ऐसी स्थिति में रहकर कर्म करने से साधारण कर्म भी अलौकिक कर्म में बदल जाते हैं। जैसे दूसरे लोग भी भोजन खाते और आप कहते हो ब्रह्मा भोजन खाते हैं। फर्क हो गया ना। चलते हो लेकिन आप फरिश्ते की चाल चलते, डबल लाइट स्थिति में चलते। तो अलौकिक चाल अलौकिक कर्म हो गया। तो सिर्फ आज का दिन अवतरण का दिन नहीं लेकिन संगमयुग ही अवतरण दिवस है।

आज के दिन आप लोग बापदादा को मुबारक देते हो लेकिन बापदादा कहते हैं “पहले आप”। अगर बच्चे नहीं होते तो बाप कौन कहता। बच्चे ही बाप को बाप कहते हैं। इसलिए पहले बच्चों को मुबारक। आप सब बर्थ डे का गीत गाते हो ना – हैपी बर्थ डे टू यू… बापदादा भी कहते हैं हैपी बर्थ डे टू यू। बर्थ डे की मुबारक तो बच्चों ने बाप को दी। बाप ने बच्चों को दी। और मुबारक से ही पल रहे हो। आप सबकी पालना ही क्या है? बाप की, परिवार की बधाइयों से ही पल रहे हो। बधाइयों से ही नाचते, गाते, पलते, उड़ते जा रहे हो। यह पालना भी वण्डरफुल है। एक दो को हर घड़ी क्या देते हो? बधाईयाँ हैं और यही पालना की विधि है। कोई कैसा भी है, वह तो बापदादा भी जानते हैं, आप भी जानते हो कि नम्बरवार तो होंगे ही। अगर नम्बरवार नहीं बनते फिर तो सतयुग में कम से कम डेढ़ लाख तख्त बनाने पड़े। इसलिए नम्बरवार तो होने ही हैं। तो नम्बरवार होना है लेकिन कभी कोई को अगर आप समझते हैं कि यह रांग है, यह अच्छा काम नहीं कर रहा है, तो रांग को राइट करने की विधि या यथार्थ कर्म नहीं करने वाले को यथार्थ कर्म सिखाने की विधि – कभी भी उसको सीधा नहीं कहो कि तुम तो रांग हो। यह कहने से वह कभी नहीं बदलेगा। जैसे आग बुझाने के लिए आग नहीं जलाई जाती है, उसको ठण्डा पानी डाला जाता है। इसलिए कभी भी उसको पहले ही कहा कि तुम रांग हो, तुम रांग हो तो वह और ही दिलशिकस्त हो जायेगा। पहले उसको अच्छा-अच्छा कह करके थमाओ तो सही, पहले पानी तो डालो फिर उसको सुनाओ कि आग क्यों लगी। पहले यह नहीं कहो कि तुम ऐसे हो, तुमने यह किया, यह किया। पहले ठण्डा पानी डालो। पीछे वह भी महसूस करेगा कि हाँ आग लगने का कारण क्या है और आग बुझाने का साधन क्या है। अगर बुरे को बुरा कह देते तो आग में तेल डालते हो। इसीलिए बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कह करके पीछे उसको कोई भी बात दो तो उसमें सुनने की, धारण करने की हिम्मत आ जाती है। इसलिए सुना रहे थे कि बहुत अच्छा, बहुत अच्छा यही बधाइयां हैं। जैसे बापदादा भी कभी किसको डायरेक्ट रांग नहीं कहेगा, मुरली में सुना देगा – राइट क्या है, रांग क्या है। लेकिन अगर कोई सीधा आकर पूछेगा भी कि मैं रांग हूँ! तो कहेगा नहीं तुम तो बहुत राइट हो क्योंकि उसमें उस समय हिम्मत नहीं होती है। जैसे पेशेन्ट जा भी रहा होता है, आखरी सांस होता है तो भी डॉक्टर से अगर पूछेगा कि मैं जा रहा हूँ तो कभी नहीं कहेगा हाँ जा रहे हो क्योंकि उस टाइम हिम्मत नहीं होती। किसकी दिल कमजोर हो और आप अगर उसको ऐसी बात कह दो, वह तो हार्टफेल हो ही जायेगा अर्थात् पुरूषार्थ में परिवर्तन करने की शक्ति नहीं आयेगी। तो संगमयुग है ही बधाईयों से वृद्धि को पाने का युग। यह बधाईयाँ ही श्रेष्ठ पालना हैं। इसीलिए आपके इस बधाईयों की पालना का यादगार जब भी कोई देवी देवता का दिन मनाते हैं तो उसको बड़ा दिन कह देते हैं। दीपमाला होगी, शिवरात्रि होगी तो कहेंगे आज बड़ा दिन है। जो भी उत्सव होंगे उसको बड़ा दिन कहेंगे क्योंकि आपकी बड़ी दिल है तो उन्होंने बड़ा दिन कह दिया है। तो एक दो को बधाइयाँ देना यह बड़ी दिल है। समझा – ऐसे नहीं कि रांग को रांग समझायेंगे नहीं, लेकिन थोड़ा धैर्य रखो, इशारा तो देना पड़ेगा लेकिन टाइम तो देखो ना। वह मर रहा है और उसको कहो मर जाओ, मर जाओ…। तो टाइम देखो, उसकी हिम्मत देखो। बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहने से हिम्मत आ जाती है। लेकिन दिल से कहो – ऐसे नहीं बाहर से कहो तो वह समझे कि मेरे को ऐसे ही कह रहे हैं। यह भावना की बात है। दिल का भाव रहम का हो तो उसके दिल को रहम का भाव लगेगा। इसीलिए सदा बधाईयाँ देते रहो। बधाईयाँ लेते रहो। यह बधाई वरदान है। जैसे आज के दिन को गायन करते हैं – शिव के भण्डारे भरपूर… तो आपका गायन है, सिर्फ बाप का नहीं। सदा भण्डारा भरपूर हो। दाता के बच्चे दाता बन जाओ। सुनाया था ना – भक्त है ‘लेवता’ और आप हो देने वाले ‘देवता’ तो दाता माना देने वाले। किसी को भी कुछ थोड़ा भी देकर फिर आप उनसे कुछ ले लो तो उसको फील नहीं होगा। फिर कुछ भी उसको मना सकते हो। लेकिन पहले उसको दो। हिम्मत दो, उमंग दिलाओ, खुशी दिलाओ फिर उससे कुछ भी बात मनाने चाहो तो मना सकते हो, रोज उत्सव मनाते रहो। रोज बाप से मिलन मनाना यही उत्सव मनाना है। तो रोज उत्सव है। अच्छा।

चारों ओर के बच्चों को, संगमयुग के हर दिन के अवतरण दिवस की अविनाशी मुबारक हो। सदा बाप समान दाता और वरदाता बन हर आत्मा को भरपूर करने वाले, मास्टर भोलानाथ बच्चों को, सदा याद में रह हर कर्म को यादगार बनाने वाले बच्चों को, सदा स्व उन्नति और सेवा की उन्नति में उमंग-उत्साह से आगे बढ़ने वाले श्रेष्ठ बच्चों को, विशेष आज के यादगार दिवस शिवजयन्ती सो ब्राह्मण जयन्ति हीरे तुल्य जयन्ति, सदा सर्व को सुखी बनाने की, सम्पन्न बनाने की जयन्ति की मुबारक और यादप्यार और नमस्ते।

1 : संगमयुग – मिलन ही सबसे बड़ा उत्सव

Murli Date: 07-03-1986 (मधुबन)

विषय: “पढ़ाई की चारों सब्जेक्ट का यथार्थ यादगार – महा-शिवरात्रि”

बापदादा आज ज्ञान दाता, भाग्य विधाता, सर्वशक्तियों के वरदाता भोलानाथ के रूप में अपने समीप और स्नेही बच्चों से मिलने आए हैं।
यह मिलन कोई साधारण मिलन नहीं, बल्कि सदाकाल के उत्सव का बीज है।

उदाहरण:
भक्त द्वापर से उत्सव मनाते हैं,
लेकिन संगमयुग में बच्चे प्रैक्टिकल मिलन मना रहे हैं।


Chapter 2 : एक जन्म की पढ़ाई – 63 जन्मों की यादगार

बापदादा बताते हैं—
संगमयुग का एक जन्म,
भक्ति के 63 जन्मों का आधार बन जाता है।

🔹 भक्तों ने चित्र बनाए
🔹 पूजा-पाठ रचे
🔹 व्रत-उत्सव बनाए

लेकिन आप जानते हो—
यह सब आपकी ही जीवन-कथा का यादगार है।

चैतन्य भी आप हो और चित्र भी आप ही का है।


Chapter 3 : भोलानाथ क्यों कहा जाता है शिव बाबा को?

भोलानाथ = बिना हिसाब के देने वाला

 संसार में नियम है:

“जितना करोगे, उतना पाओगे”

 लेकिन शिव बाबा कहते हैं:

“एक कदम → पदमगुणा फल”

उदाहरण:
एक = आपका पुरुषार्थ
पदम = 21 जन्मों की भरपूर प्रालब्ध

 इसलिए शिव बाबा को भोले भण्डारी कहा जाता है।


Chapter 4 : महाशिवरात्रि – पढ़ाई की 4 सब्जेक्ट का यथार्थ यादगार

बापदादा स्पष्ट करते हैं कि
महाशिवरात्रि कोई केवल पर्व नहीं,
बल्कि संगमयुग की पढ़ाई का जीवित सिलेबस है।


1️⃣ योग (याद) – बिंदु की निशानी

  • शिव बाबा = बिंदु

  • आत्मा = बिंदु

  • याद में स्थिति = बिंदु स्थिति

 इसलिए शिवलिंग का स्वरूप बना।


2️⃣ ज्ञान – बूँद की निशानी

  • गंगा की बूँदें

  • अमृत की धाराएँ

 ज्ञान की एक-एक बूँद
आत्मा को जीवनदान देती है।


3️⃣ धारणा – व्रत की निशानी

व्रत = दृढ़ संकल्प

 आज मैं यह बनूँगा

आज यह करके ही दिखाऊँगा

यही वास्तविक धारणा है।


🔹 4️⃣ सेवा – जागरण की निशानी

जागरण =
 रात भर जागना नहीं
✅ आत्माओं को अज्ञान की नींद से जगाना


Chapter 5 : बलि का यथार्थ अर्थ – मैं और मेरा का समर्पण

भक्त बकरा चढ़ाते हैं
लेकिन बापदादा कहते हैं—

सच्ची बलि = मैं-पन और मेरा-पन का त्याग

🔹 “मैं कर रहा हूँ” 
🔹 “बाबा करा रहा है”

🔹 “मेरा” = देह, वैभव, संबंध
🔹 इनका समर्पण = महाबली बनना


📖 Chapter 6 : अवतरण का अर्थ – ऊँची स्थिति में रहकर कर्म

अवतार =
 जन्म लेना
 ऊँची स्थिति से कर्म क्षेत्र में आना

🔹 सुबह:

“शान्तिधाम से कर्म करने अवतरित हुआ हूँ”

🔹 रात:“कर्म करके शान्तिधाम लौट रहा हूँ”

 साधारण कर्म भी अलौकिक कर्म बन जाते हैं।


Chapter 7 : बधाइयाँ – संगमयुग की श्रेष्ठ पालना

बापदादा सिखाते हैं—

पहले बहुत अच्छा कहो, फिर सुधार दो

 आग को आग से नहीं
 आग को पानी से बुझाया जाता है

 बधाई = ठण्डा पानी

 डाँट = तेल

इसलिए संगमयुग को कहा गया—
“बधाइयों से पलने का युग”


Chapter 8 : दाता बनो – रोज़ उत्सव मनाओ

🔹 भक्त = लेने वाला
🔹 आप = देने वाले देवता

पहले दो—
✔️ हिम्मत
✔️ उमंग
✔️ खुशी

फिर कुछ भी कहो—
आत्मा मान लेगी।


Final Blessing (Murli Essence)

सदा अवतरण दिवस की स्मृति में रहो,
हर कर्म को यादगार बनाओ,
स्व-उन्नति और सेवा में आगे बढ़ो,
और मास्टर भोलानाथ बन हर आत्मा को भरपूर करो।

प्रश्न 1: बापदादा आज किस रूप में बच्चों से मिलने आए हैं?

उत्तर:
बापदादा आज ज्ञान दाता, भाग्य विधाता और सर्वशक्तियों के वरदाता भोलानाथ के रूप में अपने समीप और स्नेही बच्चों से मिलने आए हैं।


प्रश्न 2: संगमयुग का मिलन साधारण मिलन क्यों नहीं है?

उत्तर:
क्योंकि यह मिलन केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि सदाकाल के उत्सव का बीज है। यही मिलन आगे चलकर 63 जन्मों की यादगार बनता है।


प्रश्न 3: भक्त और संगमयुग के बच्चों के उत्सव में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • भक्त द्वापर से उत्सव मनाते हैं

  • लेकिन संगमयुग में बच्चे प्रैक्टिकल मिलन मना रहे हैं, अर्थात् साक्षात् बाप से मिलन।


Chapter 2 : एक जन्म की पढ़ाई – 63 जन्मों की यादगार

प्रश्न 4: संगमयुग का एक जन्म विशेष क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि संगमयुग का एक जन्म, भक्ति के 63 जन्मों का आधार बन जाता है।


प्रश्न 5: भक्ति में बने चित्र, पूजा और व्रत क्या दर्शाते हैं?

उत्तर:
ये सभी आपकी ही जीवन-कथा की यादगार हैं, जो आपने संगमयुग में चैतन्य रूप में निभाई।


प्रश्न 6: “चैतन्य भी आप हो और चित्र भी आप ही का है” — इसका क्या अर्थ है?

उत्तर:
इसका अर्थ है कि जो कुछ भक्त आज चित्रों में पूजते हैं, वह आपका ही संगमयुग का जीवित स्वरूप है।


Chapter 3 : भोलानाथ क्यों कहा जाता है शिव बाबा को?

प्रश्न 7: भोलानाथ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
भोलानाथ का अर्थ है — बिना हिसाब के देने वाला


प्रश्न 8: संसार और शिव बाबा के देने के नियम में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • संसार कहता है: “जितना करोगे, उतना पाओगे”

  • शिव बाबा कहते हैं: “एक कदम → पदमगुणा फल”


प्रश्न 9: “एक कदम, पदमगुणा फल” कैसे समझें?

उत्तर:

  • एक कदम = आपका पुरुषार्थ

  • पदमगुणा फल = 21 जन्मों की भरपूर प्रालब्ध
    इसीलिए शिव बाबा को भोले भण्डारी कहा जाता है।


Chapter 4 : महाशिवरात्रि – पढ़ाई की 4 सब्जेक्ट का यथार्थ यादगार

प्रश्न 10: महाशिवरात्रि को केवल पर्व क्यों नहीं कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि महाशिवरात्रि संगमयुग की पढ़ाई का जीवित सिलेबस है, जिसमें चारों सब्जेक्ट समाए हुए हैं।


प्रश्न 11: योग (याद) की निशानी क्या है?

उत्तर:

  • शिव बाबा = बिंदु

  • आत्मा = बिंदु

  • याद की स्थिति = बिंदु स्थिति
    इसीलिए शिवलिंग का स्वरूप बनाया गया।


प्रश्न 12: ज्ञान को बूँद की निशानी क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि ज्ञान की एक-एक बूँद, अमृत के समान आत्मा को जीवनदान देती है।


प्रश्न 13: वास्तविक व्रत या धारणा किसे कहा जाता है?

उत्तर:
व्रत का अर्थ है दृढ़ संकल्प, जैसे—

  • आज मैं यह बनूँगा

  • आज यह करके ही दिखाऊँगा

यही सच्ची धारणा है।


प्रश्न 14: जागरण का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
जागरण का अर्थ—
 रात भर जागना नहीं
 आत्माओं को अज्ञान की नींद से जगाना


Chapter 5 : बलि का यथार्थ अर्थ

प्रश्न 15: सच्ची बलि किसे कहा जाता है?

उत्तर:
सच्ची बलि है — मैं-पन और मेरा-पन का त्याग


प्रश्न 16: “मैं” और “मेरा” में क्या-क्या शामिल है?

उत्तर:

  • “मैं” = अहंकार

  • “मेरा” = देह, वैभव, संबंध
    इनका समर्पण ही महाबली बनना है।


Chapter 6 : अवतरण का अर्थ

प्रश्न 17: अवतार और अवतरण में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • अवतार  = जन्म लेना

  • अवतरण = ऊँची स्थिति से कर्म क्षेत्र में आना


प्रश्न 18: अवतरण की स्मृति से कर्म कैसे बदलते हैं?

उत्तर:
जब आत्मा यह स्मृति रखती है कि
“मैं शान्तिधाम से कर्म करने आया हूँ”,
तो साधारण कर्म भी अलौकिक कर्म बन जाते हैं।


Chapter 7 : बधाइयाँ – संगमयुग की श्रेष्ठ पालना

प्रश्न 19: बापदादा सुधार देने की क्या विधि सिखाते हैं?

उत्तर:
पहले बहुत अच्छा कहो, फिर सुधार दो


प्रश्न 20: बधाई और डाँट की तुलना किससे की गई है?

उत्तर:

  • बधाई = ठण्डा पानी

  • डाँट = तेल
    आग को पानी से बुझाया जाता है, आग से नहीं।


Chapter 8 : दाता बनो – रोज़ उत्सव मनाओ

प्रश्न 21: भक्त और आप में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर:

  • भक्त = लेने वाला

  • आप = देने वाले देवता


प्रश्न 22: दाता बनने के लिए पहले क्या देना चाहिए?

उत्तर:
पहले देना चाहिए—
✔️ हिम्मत
✔️ उमंग
✔️ खुशी
फिर कही हुई बात आत्मा सहज स्वीकार कर लेती है।


Final Question

प्रश्न 23: इस अव्यक्त मुरली का सार क्या है?

उत्तर:
सदा अवतरण दिवस की स्मृति में रहकर,
हर कर्म को यादगार बनाते हुए,
स्व-उन्नति और सेवा में आगे बढ़ना
और मास्टर भोलानाथ बन हर आत्मा को भरपूर करना।

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली (07-03-1986) पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन हेतु है।
इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है।
प्रस्तुत विचार ब्रह्माकुमारी आध्यात्मिक ज्ञान की व्याख्या हैं।
यह ज्ञान आत्म-परिवर्तन, आत्म-उन्नति एवं सेवा भावना के लिए है।

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