MURLI 16-06-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

 

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16-06-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम अभी सच्चे-सच्चे राजयोगी हो, तुम्हें राजऋषि भी कहा जाता है, राजऋषि माना ही पवित्र”
प्रश्नः- तुम बच्चे, मनुष्यों को माया रूपी रावण की दल-दल से कब निकाल सकेंगे?
उत्तर:- जब तुम खुद उस दल-दल से निकले हुए होंगे। दल-दल से निकलने वालों की निशानी है – इच्छा मात्रम् अविद्या। एक बाप के सिवाए और कुछ भी याद न आये। अच्छा कपड़ा पहनें, अच्छी चीज़ खायें.. यह लालच न हो, तुम पूरा ही वनवाह में हो। इस शरीर को भी भूले हुए, मेरा कुछ भी नहीं, मैं आत्मा हूँ – ऐसे आत्म-अभिमानी बच्चे ही रावण की दल-दल से मनुष्यों को निकाल सकते हैं।
गीत:- तू प्यार का सागर है….

ओम् शान्ति। कोई समय गीत जब बजाया जाता था तो बच्चों से गीत का अर्थ भी पूछते थे। अब बताओ तुम कब से राह भूल हो? (कोई ने कहा द्वापर से, कोई ने कहा सतयुग से) जो कहते हैं द्वापर से भूले हैं, वे रांग हैं। सतयुग से राह भूले हैं। राह बताने वाला तो अभी तुमको मिला है। सतयुग में राह बताने वाले को नहीं जानते हैं। वहाँ कोई बाप को जानते ही नहीं। गोया भूले हुए हैं। भूलना भी ड्रामा में नूँध है। फिर अभी राह बताने आये हैं। कहते हैं ना प्रभू राह बताओ। हम सतयुग से लेकर बाप को भूले हैं। बाबा प्रश्न पूछते हैं – बुद्धि चलाने लिए। यह ज्ञान ही निराला है ना, ज्ञान का सागर बाप ही है। बाप सम्मुख समझाते हैं। ज्ञान का सागर, सुख का सागर मैं ही हूँ। तुम भी जानते हो – बरोबर पतित-पावन भी एक ही बाप है। यह तो भक्ति वाले भी मानते हैं। पावन दुनिया है ही शान्तिधाम और सुखधाम। अब सुखधाम और दु:खधाम आधा-आधा है। यह तो बच्चे अच्छी रीति जानते हैं। बाप प्यार का सागर है, तभी तो सब उनको फादर कह पुकारते हैं परन्तु वह कौन है, कैसे आते हैं, यह भूल जाते हैं। 5 हजार वर्ष की बात है, बरोबर इन देवी-देवताओं का राज्य था। सतयुग में है सद्गति फिर दुर्गति कैसे होती है, कौन बताये? बाप ही आकर समझाते हैं, द्वापर से तुम्हारी दुर्गति हुई है तब तो बुलाते हैं। तुम समझते हो यह कोई नई बात नहीं है। बाप कल्प-कल्प आते हैं। अभी निराकार बाप आत्माओं को समझाते हैं। कोई भी अपनी आत्मा को नहीं जानते। ऐसे कभी कोई नहीं बतायेंगे कि हमारी आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है। कभी नहीं कहेंगे कि मैं अनेक बार यह बना हूँ, पार्ट बजाया है। ड्रामा को वह जानते ही नहीं। करके लाखों हजार वर्ष कहें फिर भी ड्रामा तो है ना। ड्रामा रिपीट होता है। यह तो कहेंगे ना। यह ज्ञान बाप ही बच्चों को सम्मुख देते हैं। मुख से बात कर रहे हैं। तुम जानते हो हमको शिव-बाबा ने ब्रह्मा द्वारा अपना बनाए ब्राह्मण बनाया है। शिवबाबा का यह बच्चा भी है। वन्नी (स्त्री) भी है। देखो, कितने बच्चों की सम्भाल की जाती है। अकेला मेल होने के कारण सरस्वती को मददगार बनाया है कि बच्चों को सम्भालो। यह बातें शास्त्रों में नहीं हैं। यह है प्रैक्टिकल। बाप ही राजयोग सिखाते हैं, जिनको राजयोग सिखाया, वह राजायें बनें। 84 जन्मों में आये। बाइबिल, कुरान, वेद-शास्त्र आदि पढ़ते तो बहुत हैं परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। अभी तुम कोई तत्व योगी नहीं हो। तुम्हारा तो बाप से योग है अर्थात् बाप की याद है। तुम अभी राजयोगी, राजऋषि हो अर्थात् योगीराज हो। योगी पवित्र को कहा जाता है। स्वर्ग की राजाई लेने लिए तुम योगी बने हो। बाप पहले-पहले कहते हैं पवित्र बनो। योगी नाम ही उनका है। तुम सब राजयोगी हो। यह तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मणों की बात है। तुमको राजयोग सिखा रहे हैं, स्टूडेन्ट हो गये ना। स्टूडेन्टस को कब टीचर भूलेगा क्या? जानते हो शिवबाबा हमको पढ़ा रहे हैं। परन्तु माया फिर भी भुला देती है। तुम अपने पढ़ाने वाले टीचर को भूल जाते हो। भगवान पढ़ाते हैं – यह समझें तब तो नशा चढ़े। स्कूल में आई.सी.एस. पढ़ते हैं तो कितना नशा रहता है। तुम बच्चे तो 21 जन्म के लिए यह राजयोग की पढ़ाई पढ़ते हो। पढ़ना तो फिर भी होता है। राजविद्या भी पढ़नी पड़े, भाषा आदि सीखनी पड़े।

तुम बच्चे समझते हो सतयुग से हम यह राह भूलनी शुरू करते हैं। फिर एक-एक ढाका (पौढ़ी-स्टैप), एक-एक जन्म में नीचे उतरते हैं। अभी तुमको सारा याद है। कैसे हम चढ़ते हैं, कैसे हम उतरते हैं। यह सीढ़ी अच्छी रीति याद करो। 84 जन्म पूरे हुए, अब हमको जाना है। तो खुशी होती है, यह बेहद का नाटक है। आत्मा कितनी छोटी है। पार्ट बजाते-बजाते आत्मा थक जाती है तब कहते हैं बाबा राह बताओ तो हम विश्राम पायें, सुख-शान्ति पायें। तुम सुखधाम में हो तो तुम्हारे लिए वहाँ सुख-शान्ति भी है। वहाँ कोई हंगामा नहीं। आत्मा को शान्ति है। शान्ति के दो स्थान हैं – शान्तिधाम और सुखधाम। दु:खधाम में अशान्ति है। यह पढ़ाई है, तुम जानते हो हमको बाबा सुखधाम वाया शान्तिधाम में ले जा रहे हैं। तुमको कहने की दरकार नहीं। तुम जानते हो हम यहाँ पार्ट बजाने आये हैं फिर जाना है। यह खुशी है। शान्ति की खुशी नहीं है। पार्ट बजाने में हमको मजा आता है, खुशी होती है। जानते हैं बाप को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। कोई कहते हैं हमको मन की शान्ति मिले। यह अक्षर भी रांग है। नहीं, हम बाप को याद करते हैं कि विकर्म विनाश हों। शान्त तो मन रह न सके। कर्म बिगर रह नहीं सकते। बाकी महसूसता आती है, हम बाप से पवित्रता, सुख-शान्ति का वर्सा ले रहे हैं, तो खुशी होनी चाहिए। यह तो है ही दु:खधाम। इसमें सुख हो नहीं सकता। मनुष्य शान्तिधाम सुखधाम को भूल गये हैं। तो जिनको बहुत पैसे हैं, समझते हैं हम सुख में हैं, संन्यासी घरबार छोड़ जंगल में जाते हैं। कोई हंगामा तो है नहीं। तो शान्त तो हो जाते हैं परन्तु वह हुआ अल्पकाल के लिए। आत्मा का जो शान्ति स्वधर्म है, उसमें तुम शान्ति में रहते हो। यहाँ तो प्रवृत्ति में आना ही है। पार्ट बजाना ही है। यहाँ आते ही हैं कर्म करने। कर्म में तो आत्मा को जरूर आना ही है। तुम बच्चे समझते हो – यह समझानी बेहद का बाप दे रहे हैं। निराकार भगवानुवाच – अब तुम जानते हो हम आत्मा हैं, हमारा बाप परम आत्मा है। परम आत्मा माना परमात्मा। उनको यह आत्मा बुलाती है। वह बाप ही सर्व का सद्गति दाता है। अब बाप कहते हैं – बच्चे देही-अभिमानी बनो। यही मेहनत है। आधाकल्प से जो खाद पड़ती है, वह इस याद से ही निकलेगी। तुमको सच्चा सोना बनना है। जैसे सच्चे सोने में खाद मिलाए फिर जेवर बनाते हैं। तुम असुल में सच्चा सोना थे फिर तुम्हारे में खाद पड़ती है। अब तुम्हारी बुद्धि में है, हमने पार्ट बजाया है। अब हम जाते हैं पियर घर। जैसे विलायत से जब पियर घर लौटते हो तो खुशी होती है, तुम्हें भी खुशी है, तुम जानते हो बाबा हमारे लिए स्वर्ग लाया है। बेहद के बाप की सौगात है – बेहद की बादशाही अर्थात् सद्गति। संन्यासी लोग मुक्ति की सौगात पसन्द करते हैं। कोई मरता है तो भी कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। संन्यासी कहेंगे ज्योति ज्योत समाया, जिसमें सब मिल जायेंगे। वह तो रहने का स्थान है, जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। बाकी कोई ज्योति वा आग थोड़ेही है, जिसमें सब मिल जाएं। ब्रह्म महतत्व है, जिसमें आत्मायें रहती हैं। बाप भी वहाँ रहते हैं। वह भी है बिन्दी। बिन्दी का किसको साक्षात्कार हो तो समझ नहीं सकेंगे। बच्चे बहुत कहते हैं – बाबा याद करने में दिक्कत होती है। बिन्दी रूप को कैसे याद करें। आधाकल्प तो बड़े लिंग रूप को याद किया। वह भी बाप समझाते हैं। बिन्दी की तो पूजा हो न सके। इनका मन्दिर कैसे बनायेंगे? बिन्दी तो देखने में भी न आये, इसलिए शिवलिंग बड़ा बनाते हैं। बाकी आत्माओं के सालिग्राम तो बहुत छोटे-छोटे बनाते हैं। अण्डे मिसल बनाते हैं। कहेंगे पहले यह क्यों नहीं बताया – परमात्मा बिन्दी मिसल है। बाप कहते हैं – उस समय यह बताने का पार्ट ही नहीं था। अरे तुम आई.सी.एस. शुरू से क्यों नहीं पढ़ते हो? पढ़ाई के भी कायदे हैं ना। कोई ऐसी बात पूछे तो तुम कह सकते हो – अच्छा बाबा से पूछते हैं वा हमारे से बड़ी टीचर है उनसे लिखकर पूछते हैं। बाबा को बताना होगा तो बतायेंगे वा तो कहेंगे आगे चल समझ लेंगे। एक ही टाइम तो नहीं सुनायेंगे। यह सब हैं नई बातें। तुम्हारे वेद-शास्त्रों में जो है – बाप बैठ सार बताते हैं। यह भी भक्ति मार्ग की नूँध है, फिर भी तुमको पढ़ने ही होंगे। यह भक्ति का पार्ट बजाना ही होगा। पतित बनने का भी पार्ट बजाना है। कहते हैं भक्ति के दुबन में फँस गये हैं। बाहर से तो खूबसूरती बहुत है। जैसे रूण्य के पानी का मिसाल देते हैं। भक्ति भी सुहैनी (आकर्षक) बहुत है। बाप कहते हैं यह रूण्य का पानी है। (मृगतृष्णा समान) इस दुबन में फँस जाते हैं। फिर निकलना ही मुश्किल हो जाता है, एकदम फँस पड़ते हैं। जाते हैं औरों को निकालने फिर खुद ही फँस पड़ते हैं। ऐसे बहुत फँस पड़े। आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती औरों को निकालवन्ती, चलते-चलते फिर खुद फँस पड़ते हैं। कितने अच्छे-अच्छे फर्स्टक्लास थे। फिर उनको निकलना बड़ा मुश्किल हो जाता है। बाप को भूल जाते हैं, तो दुबन से निकालने में कितनी मेहनत लगती है। कितना भी समझाओ बुद्धि में नहीं बैठता। अब तुम समझ सकते हो कि हम माया रूपी रावण की दल-दल से कितना निकले हैं। जितना-जितना निकलते जाते हैं, उतना-उतना खुशी होती है। जो खुद निकला होगा उनके पास शक्ति होगी दूसरे को निकालने की। बाण चलाने वाले कोई तीखे होते हैं, कोई कमजोर होते हैं। भील और अर्जुन का भी मिसाल है ना। अर्जुन साथ रहने वाला था, अर्जुन एक को नहीं, जो बाप के बनकर बाप के साथ रहते हैं, उनको कहा जाता है अर्जुन। साथ में रहने वाले और बाहर में रहने वाले की रेस कराई जाती है। भील अर्थात् बाहर रहने वाला तीखा चला गया। दृष्टान्त एक का दिया जाता है। बात तो बहुतों की है। तीर भी यह ज्ञान का है। हर एक अपने को समझ सकते हैं, हम कितना बाप को याद करते हैं, और कोई की याद तो नहीं आती है! अच्छी चीज़ पहनने वा खाने की लालच तो नहीं रहती! यहाँ अच्छा पहनेंगे तो वहाँ कम हो जायेगा। हमको यहाँ तो वनवाह में रहना है। बाप कहते हैं तुम अपने इस शरीर को भी भूल जाओ। यह तो पुराना तमोप्रधान शरीर है। तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। इच्छा मात्रम् अविद्या।

बाप कहते हैं – तुम यहाँ जेवर आदि भी नहीं पहनों, ऐसे क्यों कहते हैं? इसके भी अनेक कारण हैं। कोई का जेवर गुम हो जायेगा तो कहेंगे वहाँ बी.के. को देकर आई है और फिर चोर-चकार भी रास्ते चलते छीन लेते हैं। आजकल माईयाँ भी लूटने वाली बहुत निकली हैं। फीमेल भी डाका मारती हैं। दुनिया का हाल देखो क्या है? तुम समझते हो, यह दुनिया बिल्कुल वेश्यालय है। हम यहाँ शिवालय में बैठे हैं – शिवबाबा के साथ। वह सत है, चैतन्य है, आनंद स्वरूप है। आत्मा की ही महिमा है। आत्मा ही कहती हैं मैं प्रेजीडेंट बना हूँ, मैं फलाना हूँ। और तुम्हारी आत्मा कहती है हम ब्राह्मण हैं। बाबा से वर्सा ले रहे हैं। आत्म-अभिमान में रहना है, इसमें ही मेहनत है। यह मेरा फलाना है, यह मेरा है… यह याद रहता है, हम आत्मा भाई-भाई हैं, यह भूल जाते हैं। यहाँ मेरा-मेरा छोड़ना पड़ता है। मैं आत्मा हूँ, इनकी आत्मा भी जानती है। बाप समझा रहे हैं, मैं भी सुनता रहता हूँ। पहले मैं सुनता हूँ, भल मैं भी सुना सकता हूँ परन्तु बच्चों के कल्याण अर्थ कहता हूँ – तुम सदा समझो कि शिवबाबा समझाते हैं। विचार सागर मंथन करना बच्चों का काम है। जैसे तुम करते हो, वैसे मैं भी करता हूँ। नहीं तो पहले नम्बर में कैसे जायेंगे लेकिन अपने को गुप्त रखते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मेरा-मेरा सब छोड़ अपने को आत्मा समझना है। आत्म-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। यहाँ बिल्कुल वनवाह में रहना है। कोई भी पहनने, खाने की इच्छा से इच्छा मात्रम् अविद्या बनना है।

2) पार्ट बजाते हुए कर्म करते अपने शान्ति स्वधर्म में स्थित रहना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है। इस दु:खधाम को भूल जाना है।

वरदान:- रूहाब और रहम के गुण द्वारा विश्व नव निर्माण करने वाले विश्व कल्याणकारी भव
विश्व कल्याणकारी बनने के लिए मुख्य दो धारणायें आवश्यक हैं एक ईश्वरीय रूहाब और दूसरा-रहम। अगर रूहाब और रहम दोनों साथ-साथ और समान हैं तो रूहानियत की स्टेज बन जाती है। तो जब भी कोई कर्तव्य करते हो वा मुख से शब्द वर्णन करते हो तो चेक करो कि रहम और रूहाब दोनों समान रूप में हैं? शक्तियों के चित्रों में इन दोनों गुणों की समानता दिखाते हैं, इसी के आधार पर विश्व नव-निर्माण के निमित्त बन सकते हो।
स्लोगन:- बाप के प्यार के पीछे व्यर्थ संकल्प न्योछावर कर दो – यही सच्ची कुर्बानी है।

 

ये अव्यक्त इशारे – सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

जितना जो स्वयं सरल होंगे उतना याद भी सरल रहेगी। जितना जो हर बात में स्पष्ट अर्थात् साफ होगा उतना सरल होगा। जो जैसा स्वयं होता है वैसे ही उनकी रचना में भी वही संस्कार होते हैं। तो हर गुण के प्रैक्टिकल स्वरूप एक्जैम्पल बनो।

अध्याय : सच्चे राजयोगी और राजऋषि बनने का रहस्य

(साकार मुरली के महावाक्यों पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन)

प्रश्न 1 : बाप हमें सच्चा राजयोगी और राजऋषि क्यों कहते हैं?

उत्तर :
क्योंकि हम केवल योगी नहीं, बल्कि भविष्य के स्वर्ग की राजाई प्राप्त करने वाले योगी हैं। राजयोगी अर्थात् वह आत्मा जो परमात्मा से योग लगाकर स्वयं को पवित्र बनाती है और भविष्य में देवी-देवता राज्य की अधिकारी बनती है। राजऋषि का अर्थ भी है—राजाई के अधिकारी होते हुए पवित्रता में स्थित रहने वाली आत्मा।


प्रश्न 2 : मनुष्यों को माया रूपी रावण की दल-दल से कौन निकाल सकता है?

उत्तर :
जो स्वयं माया की दल-दल से बाहर निकल चुका है, वही दूसरों को निकाल सकता है। जो स्वयं कामना, मोह, देह-अभिमान और व्यर्थ इच्छाओं में फँसा है, वह दूसरों का कल्याण नहीं कर सकता।


प्रश्न 3 : माया की दल-दल से निकले हुए बच्चों की पहचान क्या है?

उत्तर :
उनकी पहचान है—

  • इच्छा मात्रम् अविद्या,
  • एक बाप के सिवाय किसी की याद न आना,
  • अच्छे वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और सुख-सुविधाओं का लालच न होना,
  • देह और देह के सम्बन्धों से न्यारा रहना,
  • स्वयं को आत्मा समझना।

ऐसी आत्म-अभिमानी आत्माएँ ही सच्ची राजयोगी हैं।


प्रश्न 4 : हम कब से राह भूले हुए हैं?

उत्तर :
हमने सतयुग से ही बाप को भूलना शुरू किया। यद्यपि सतयुग में सुख और पवित्रता है, लेकिन वहाँ परमपिता परमात्मा का परिचय नहीं रहता। यही भूलना धीरे-धीरे हमें द्वापर और कलियुग की दुर्गति तक ले आता है।


प्रश्न 5 : सद्गति और दुर्गति का रहस्य क्या है?

उत्तर :
सतयुग और त्रेतायुग सद्गति का समय है, जहाँ सुख, शांति और पवित्रता है। द्वापर और कलियुग दुर्गति का समय है, जहाँ आत्मा विकारों और दुःखों में आ जाती है। बाप आकर पुनः हमें सद्गति का मार्ग बताते हैं।


प्रश्न 6 : सच्चा योग किसे कहा जाता है?

उत्तर :
सच्चा योग किसी तत्व या प्रकृति से जुड़ना नहीं है। सच्चा योग है—आत्मा का अपने परमपिता परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ना।

योग का अर्थ है—

“मैं आत्मा हूँ और मेरा बाप परमात्मा है।”

यही याद विकर्मों को भस्म करती है।


प्रश्न 7 : भगवान स्वयं हमें क्या पढ़ाते हैं?

उत्तर :
भगवान हमें राजयोग की शिक्षा देते हैं। यह ऐसी शिक्षा है जो हमें केवल इस जन्म के लिए नहीं, बल्कि इक्कीस जन्मों के लिए स्वर्ग की राजाई का अधिकारी बनाती है।


प्रश्न 8 : आत्मा को शांति कब प्राप्त होती है?

उत्तर :
आत्मा का मूल स्वधर्म शांति है। आत्मा को वास्तविक शांति दो स्थानों पर प्राप्त होती है—

  1. शान्तिधाम
  2. सुखधाम

दुःखधाम में पूर्ण शांति सम्भव नहीं है क्योंकि यहाँ कर्म और परिस्थितियों का सामना करना ही पड़ता है।


प्रश्न 9 : मन की शांति माँगना क्यों पूर्ण ज्ञान नहीं है?

उत्तर :
क्योंकि मन कभी निष्क्रिय नहीं रह सकता। आत्मा को कर्म करना ही है। इसलिए केवल मन की शांति माँगने के बजाय परमात्मा की याद द्वारा विकर्मों को समाप्त करना और पवित्रता, सुख और शक्ति का वर्सा प्राप्त करना ही सच्ची समझ है।


प्रश्न 10 : देही-अभिमानी बनने की सबसे बड़ी मेहनत क्या है?

उत्तर :
आधा कल्प से आत्मा पर देह-अभिमान की खाद चढ़ती रही है। अब स्वयं को आत्मा समझना और प्रत्येक सम्बन्ध में आत्मिक दृष्टि रखना ही सबसे बड़ी साधना है।


प्रश्न 11 : आत्मा और परमात्मा दोनों को बिन्दी रूप क्यों कहा जाता है?

उत्तर :
क्योंकि आत्मा और परमात्मा दोनों ही अति सूक्ष्म ज्योति-बिन्दु स्वरूप हैं। वे स्थूल शरीर नहीं हैं। परमात्मा का स्मरण कराने के लिए शिवलिंग का प्रतीक बनाया गया, लेकिन उनका वास्तविक स्वरूप ज्योति-बिन्दु ही है।


प्रश्न 12 : भक्ति को मृगतृष्णा समान क्यों कहा गया है?

उत्तर :
भक्ति बाहर से बहुत आकर्षक दिखाई देती है, लेकिन आत्मा को स्थायी शांति और मुक्ति नहीं देती। जैसे रेगिस्तान में दूर से पानी दिखाई देता है, पर वास्तव में होता नहीं, वैसे ही भक्ति के आकर्षण में आत्मा फँसी रहती है और परम सत्य को प्राप्त नहीं कर पाती।


प्रश्न 13 : अच्छे-अच्छे बच्चे भी माया में क्यों फँस जाते हैं?

उत्तर :
जब आत्मा बाप की याद से हटकर देह, व्यक्तियों, वस्तुओं या सुविधाओं की ओर आकर्षित होने लगती है, तब माया धीरे-धीरे उसे अपनी दल-दल में खींच लेती है। इसलिए निरंतर याद और सावधानी आवश्यक है।


प्रश्न 14 : अर्जुन और भील का उदाहरण क्या सिखाता है?

उत्तर :
यह उदाहरण सिखाता है कि सफलता स्थान पर नहीं, पुरुषार्थ पर निर्भर है। जो आत्मा सच्चे दिल से बाप की याद और ज्ञान के अभ्यास में रहती है, वही तीव्र पुरुषार्थी बनती है, चाहे वह कहीं भी रहती हो।


प्रश्न 15 : इच्छा मात्रम् अविद्या का अर्थ क्या है?

उत्तर :
इच्छा मात्रम् अविद्या का अर्थ है—

  • खाने की इच्छा से मुक्त,
  • पहनने की इच्छा से मुक्त,
  • मान-सम्मान की इच्छा से मुक्त,
  • संग्रह की इच्छा से मुक्त,
  • देह और देह के आकर्षण से न्यारा।

अर्थात् आत्मा पूर्ण संतोष में स्थित हो जाए।


प्रश्न 16 : बाप हमें वनवास में रहने की शिक्षा क्यों देते हैं?

उत्तर :
क्योंकि यह पुरानी दुनिया दुःखधाम है। यहाँ आवश्यकता के अनुसार रहते हुए भी मन से न्यारा रहना है। अधिक सुख-सुविधाओं और संग्रह की इच्छा आत्मा को माया की ओर ले जाती है।


प्रश्न 17 : आत्म-अभिमानी बनने का सबसे सरल अभ्यास क्या है?

उत्तर :
बार-बार यह स्मृति रखना—

मैं आत्मा हूँ।
मैं इस शरीर की मालिक हूँ।
यह मेरा शरीर है, मैं शरीर नहीं हूँ।
मैं परमात्मा की संतान हूँ।

इस अभ्यास से देह-अभिमान कम होता है और आत्मिक शक्ति बढ़ती है।


प्रश्न 18 : विश्व कल्याणकारी बनने के लिए कौन-सी दो धारणाएँ आवश्यक हैं?

उत्तर :
विश्व कल्याणकारी बनने के लिए दो विशेष गुण आवश्यक हैं—

  1. ईश्वरीय रूहाब (आत्मिक स्वमान)
  2. रहम (सर्व के प्रति करुणा और शुभभावना)

जब ये दोनों गुण समान रूप से विकसित होते हैं, तब आत्मा विश्व नव-निर्माण की निमित्त बन जाती है।


प्रश्न 19 : सच्ची कुर्बानी किसे कहा गया है?

उत्तर :
बापदादा कहते हैं—

“बाप के प्यार के पीछे व्यर्थ संकल्प न्योछावर कर दो—यही सच्ची कुर्बानी है।”

अर्थात् अपने व्यर्थ विचारों, चिंताओं, शिकायतों और नकारात्मक संकल्पों को परमात्म प्रेम में समर्पित कर देना ही वास्तविक त्याग है।


प्रश्न 20 : सदा हर्षित रहने का सहज उपाय क्या है?

उत्तर :
अपनी प्रकृति को—

  • सरल,
  • सहनशील,
  • स्पष्ट,
  • निष्कपट,
  • सहज

बनाना है। जितना स्वभाव सरल होगा, उतनी याद सहज होगी और उतना ही जीवन में हर्ष और हलकापन अनुभव होगा।


निष्कर्ष

सच्चा राजयोगी वही है—

जो स्वयं को आत्मा समझता है,
एक बाप की याद में रहता है,
इच्छाओं से न्यारा रहता है,
देही-अभिमानी बनता है,
रूहाब और रहम दोनों को धारण करता है,
और स्वयं माया की दल-दल से निकलकर दूसरों को भी निकालने का निमित्त बनता है।

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