Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 31-07-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – शिवबाबा को यह भी लालसा नहीं कि बच्चे बड़े होंगे तो हमारी सेवा करेंगे, वह कभी बूढ़ा होता नहीं, बाप ही है निष्काम सेवाधारी” | |
| प्रश्नः- | भोलानाथ शिवबाबा हम सब बच्चों का बहुत बड़ा ग्राहक है – कैसे? |
| उत्तर:- | बाबा कहते मैं इतना भोला ग्राहक हूँ, जो तुम्हारी सब पुरानी चीज़ें खरीद कर लेता और उसके रिटर्न में सब नई-नई चीज़ें देता हूँ। तुम कहते हो बाबा यह तन-मन-धन सब आपका है तो उसकी एवज़ में तुम्हें ब्यूटीफुल तन मिल जाता, अपार धन मिल जाता। |
| गीत:- | भोलेनाथ से निराला… |
ओम् शान्ति। यह भक्ति मार्ग में गीत गाते हैं। जो भी गीत हैं सब भक्ति मार्ग के हैं, उनका भी अर्थ बाप समझाते हैं। बच्चे भी समझ जाते हैं कि भोलानाथ किसको कहा जाता है। देवताओं को भोलानाथ नहीं कहेंगे। गाया हुआ है सुदामा ने दो मुट्ठी अन्न की दी तो महल मिल गये। तो भी कितने समय के लिए? 21 जन्म के लिए। अब बच्चे समझते हैं कि बाप आकर के भारतवासियों को बरोबर हीरे-जवाहरों के महल देते हैं। किसकी एवज़ में देते हैं? बच्चे कहते हैं बाबा यह तन-मन-धन सब आपका है। आपका ही दिया हुआ है। किसको बच्चा पैदा हुआ तो कहते हैं भगवान ने दिया। धन के लिए भी कहते हैं भगवान ने दिया। कहने वाले कौन हैं? आत्मा। भगवान अर्थात् बाप ने दिया। बाप कहते हैं – सब कुछ तुमको अब देना होगा। उसकी एवज़ में हम तुमको बहुत ब्यूटीफुल तन ट्रांसफर कर देंगे, अपार धन देंगे। लेकिन किसको देंगे? जरूर बच्चों को ही देंगे। लौकिक बाप से अल्पकाल के लिए धन मिला है। बेहद का बाप हमको बेहद का वर्सा देंगे। बाप समझाते हैं ज्ञान और भक्ति में रात-दिन का फ़र्क है। भक्ति में अल्पकाल के लिए मिलता है। धन है तो सुख है। धन के बिगर मनुष्य कितने दु:खी होते हैं। बच्चे जानते हैं बाबा हमको अथाह धन देते हैं इसलिए खुशी होती है। सुखधाम में तो सुख की कोई कमी नहीं। हर एक को अपनी-अपनी राजधानी है। उसको कहा जाता है पवित्र गृहस्थ आश्रम। तो बाप कितना भोला है, क्या लेते हैं और क्या देते हैं! कितना अच्छा ग्राहक है बाप! यूँ भी बच्चों का तो बाप ग्राहक ही है। बच्चा पैदा हुआ और सारी मिलकियत उनकी है। वह होते हैं हद के ग्राहक, यह है बेहद का भोलानाथ। बेहद के बच्चों का ग्राहक। बाप कहते हैं – मैं परमधाम से आया हूँ। पुराना सब कुछ तुमसे लेकर नई दुनिया में तुमको सब कुछ देता हूँ इसलिए दाता कहा जाता है। दाता भी इन जैसा और कोई नहीं। निष्काम सेवा करते हैं। बाप कहते हैं – मैं निष्कामी हूँ। मेरे को कोई भी लालसा नहीं। ऐसे तो नहीं कहता हूँ कि बच्चों का काम है – बूढ़े बाप की सम्भाल करना क्योंकि हमने तुम्हारी सम्भाल की है। नहीं, यह कायदा होता है – बाप बूढ़ा हो तो बच्चे उनकी सम्भाल करें। यह बाप तो कभी बूढ़ा होता नहीं, सदैव जवान है। आत्मा कभी बूढ़ी नहीं होती। यह तो जानते हो लौकिक बाप बच्चों में उम्मीद रखते हैं कि हम बूढ़ा होगा तो बच्चे हमारी सेवा करेंगे। भल सब कुछ बच्चों को देते हैं फिर भी सेवा तो होती है। यह शिवबाबा कहते हैं मैं हूँ ही अभोक्ता। मैं कभी खाता ही नहीं हूँ। मैं आता ही हूँ सिर्फ बच्चों को नॉलेज देने। सुप्रीम रूह, रूहों को बैठ समझाते हैं। रूह ही सुनती है, हर एक बात रूह करती है। संस्कार भी रूह ले जाती है जिसके आधार पर शरीर मिलता है। यहाँ मनुष्यों की अनेक मतें हैं। कोई कहते हैं रूह परमात्मा ही ठहरा। उनको कुछ भी लेप-छेप नहीं लगता है। आत्मा निर्लेप कह देते हैं। अगर आत्मा निर्लेप होती तो क्यों कहते पाप आत्मा, पुण्य आत्मा। अगर आत्मा निर्लेप है तो कहा जाए – पाप शरीर पुण्य शरीर।
अभी तुम जानते हो कि सभी आत्माओं का रूहानी बाप हम रूहों को पढ़ा रहे हैं, इस शरीर द्वारा। आत्मा को बुलाते भी हैं ना। कहते हैं हमारे बाप की आत्मा आई, टेस्ट ली। आत्मा ही टेस्ट लेती है। बाप तो ऐसा नहीं कहेंगे। वो तो अभोक्ता है। ब्राह्मणों को खिलाते हैं, आत्मा आती है। कहाँ तो विराजमान होती होगी। ब्राह्मणों आदि को खिलाना भारत में कॉमन बात है। आत्मा को बुलाते हैं, उनसे पूछते हैं फिर कई बातें उनकी सच्ची भी निकलती हैं। यह पित्र आदि खिलाना – यह भी ड्रामा में नूँध है। इसमें कोई वन्डर नहीं खाना चाहिए। बाप नटशेल में ड्रामा के राज़ को बताते हैं। डिटेल तो इतनी ड्रामा की समझानी दे नहीं सकते। एक-एक की समझानी में ही वर्ष लग जायें। तुम बच्चों को बड़ी सहज शिक्षा मिलती है। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ, आकर हमको पावन बनाओ। उनका नाम ही है पतित-पावन। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को पतित-पावन नहीं कह सकते हैं। बाप को ही पतित-पावन, लिबरेटर कहते हैं। दु:ख हर्ता, सुख कर्ता भी उनको ही कहा जाता है। वह है निराकार। शिव के मन्दिर में जाकर देखो वहाँ लिंग रखा है। जरूर चैतन्य था तब तो पूजा करते हैं। यह देवता भी कभी चैतन्य थे तब तो उन्हों की महिमा है। नेहरू चैतन्य में था तब तो उनका फोटो निकाल महिमा करते हैं। कोई अच्छा काम करके जाते हैं तो उनका जड़ चित्र बनाए महिमा करते हैं। पवित्र की ही पूजा करते हैं। कोई भी मनुष्य की पूजा नहीं कर सकते। विकार से पैदा होते हैं ना तो उनकी पूजा नहीं हो सकती। पूजा देवताओं की होती है, जो सदैव पवित्र होते हैं। तुम जानते हो बाप आया था फिर अब संगम पर आया है – स्वर्ग की स्थापना करने। फिर द्वापर से रावण राज्य शुरू होगा। रावण राज्य शुरू होने से झट शिव का मन्दिर बनाते हैं। अभी तो चैतन्य में नॉलेज सुना रहे हैं। वह सत है, चैतन्य है। उनकी ही महिमा गाते हैं – निराकार को शरीर तो चाहिए ना। तो बाप ही आकर विश्व को हेविन बनाते हैं, उस हेविन में राज्य करने के लिए तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। स्वर्गवासी तुम बन रहे हो। निराकार परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर है। परन्तु सुनाये कैसे? कहते हैं मैं इस शरीर में आया हूँ, मेरा ड्रामा में यह पार्ट है। मैं प्रकृति का आधार लेता हूँ। यह जो पहले नम्बर का है इनके ही बहुत जन्मों के अन्त में मैं आकर प्रवेश करता हूँ और इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। पहले यह सब भट्ठी में थे तो बहुतों को नाम दिये थे। परन्तु बहुतों ने फिर छोड़ दिया इसलिए नाम रखने से क्या फायदा? तुम वह नाम देखो तो वन्डर खाओ। एक ही साथ सब इकट्ठे कितने रमणीक नाम आये। सन्देशी नाम ले आती थी। वह लिस्ट भी जरूर रखनी चाहिए। संन्यासी भी जब संन्यास करते हैं तो उनका भी नाम बदल जाता है। घरबार छोड़ देते हैं। तुम छोड़ते नहीं हो। तुम ब्रह्मा के आकर बनते हो। शिव के तो हो ही। तुम कहते ही हो बापदादा। संन्यासियों का ऐसे नहीं होता है। भल नाम बदलते हैं परन्तु बापदादा नहीं मिलता। उनको सिर्फ गुरू मिलता है। हठयोगी हद के संन्यासी और राजयोगी बेहद के संन्यासी में रात दिन का फ़र्क है। गाया भी जाता है ज्ञान, भक्ति और वैराग्य। उनको भी वैराग्य है। परन्तु उनका है घरबार से वैराग्य। तुमको सारी दुनिया से वैराग्य है। उनको पता ही नहीं कि सृष्टि बदलती है। तुम्हारा है बेहद का वैराग्य। यह सृष्टि खलास होनी है। तुम्हारे लिए नई दुनिया बन रही है। वहाँ जाना है परन्तु पावन होने बिगर तो वहाँ जा नहीं सकते। दिल में जंचता है बरोबर नई दुनिया में देवी-देवताओं का राज्य था, जो बाप अब स्थापन करते हैं। तुम जानते हो शिवबाबा को याद करने से हम पुण्य आत्मा बन जायेंगे। है बड़ा सहज, परन्तु याद भूल जाती है। भक्ति मार्ग की रसम रिवाज बिल्कुल ही अलग है। वापिस अपने घर तो कोई जा नहीं सकता। पुनर्जन्म सबको जरूर लेना है। घर जाने का समय एक ही है। फलाना मोक्ष को प्राप्त हुआ, यह तो गपोड़ा है। बाप कहते हैं – कोई भी आत्मा बीच से वापिस नहीं जा सकती। नहीं तो सारा खेल बिगड़ जाये। हर एक को सतो रजो तमो में जरूर आना है। मोक्ष के लिए तो बहुत आते हैं, समझाया जाता है मोक्ष होता नहीं। यह तो अनादि बना बनाया ड्रामा है। वह कभी बदली नहीं हो सकता। मक्खी यहाँ से पास हुई फिर 5 हजार वर्ष बाद ऐसे ही पास होगी। यह तो जानते हैं बाबा कितना भोला है। पतित-पावन बाप अपने परमधाम से आते हैं – पार्ट बजाने। वही समझाते हैं यह ड्रामा कैसे बना हुआ है, इसमें मुख्य कौन-कौन हैं। जैसे कहते हैं ना कि सबसे साहूकार कौन हैं – इस दुनिया में? उसमें नम्बरवार नाम निकालते हैं। तुम जानते हो, सबसे साहूकार कौन है? वह कहेंगे अमेरिका। परन्तु तुम जानते हो स्वर्ग में सबसे साहूकार यह लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। तुम पुरुषार्थ करते हो भविष्य के लिए, सबसे बड़ा साहूकार बनने के लिए। यह रेस है। इन लक्ष्मी-नारायण जैसा साहूकार कोई होगा? अल्लाह अवलदीन की भी स्टोरी बनाते हैं। ठका करने से कुबेर का खजाना निकल गया। बहुत किसम-किसम के नाटक बनाते हैं।
अभी तुम्हारी बुद्धि में है – यह शरीर छोड़ स्वर्ग में जायेंगे। हमको कारून का खजाना मिलेगा। बाप कहते हैं – मुझे याद करने से माया एकदम भाग जायेगी। बाप को याद नहीं करते तो माया फिर तंग करती है। कहते हैं बाबा हमको माया के तूफान बहुत आते हैं। अच्छा बाप को बहुत प्यार से याद करो तो तूफान उड़ जायेंगे। बाकी नाटक आदि बैठ बनाये हैं। बात है कुछ भी नहीं। बाप कितना सहज बताते हैं – सिर्फ बाप को याद करो तो तुम्हारे में जो अलाए है वह निकल जायेगी और कोई तकलीफ नहीं देते हैं। आत्मा जो पवित्र सच्चा सोना थी, वह अब झूठी बन गई है फिर सच्ची बनेगी – इस याद अग्नि से। आग में डालने बिगर सोना पवित्र हो न सके तो इसको भी योग अग्नि कहते हैं। है याद की बात। वो लोग तो अनेक प्रकार के हठयोग सिखलाते हैं। तुमको तो बाप कहते हैं – उठते बैठते याद करो। आसन आदि कहाँ तक तुम लगायेंगे। यह तो चलते फिरते काम करते याद में रहना है। भल बीमार हो तो यहाँ लेटकर भी बाप को याद कर सकते हो। शिवबाबा को याद करो और चक्र फिराओ, बस। उन्होंने फिर लिखा है गंगा का तट हो, अमृत मुख में हो। गंगा के किनारे तो गंगाजल ही मिलता है, इसलिए मनुष्य हरिद्वार में जाकर बैठते हैं। बाप तो कहते हैं तुम कहाँ भी बैठो, भल बीमार हो सिर्फ बाप को याद करो। स्वदर्शन चक्र फिराते रहो तब प्राण तन से निकलें। यह प्रैक्टिस करनी पड़े। उस भक्ति मार्ग की बातों में और इस ज्ञान मार्ग की बातों में कितना रात दिन का फर्क है। बाप की याद से तुम स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे। वह तो लड़ाई वालों को कहते हैं – जो युद्ध के मैदान में मरेगा वह स्वर्ग में जायेगा। वास्तव में युद्ध यही है। उन्होंने कौरवों, पाण्डवों का लश्कर दिखाया है। महाभारत लड़ाई हुई फिर क्या हुआ? रिजल्ट कुछ भी नहीं। बिल्कुल ही घोर अन्धियारा है, कुछ भी समझते नहीं इसलिए अज्ञान अन्धियारा कहा जाता है। बाप फिर रोशनी करने आया है। उनको ज्ञान का सागर, नॉलेजफुल कहा जाता है। अभी तुमको भी सारा ज्ञान मिला है। वह है मूलवतन, जहाँ तुम आत्मायें रहती हो उनको ब्रह्माण्ड भी कहा जाता है। यहाँ रूद्र यज्ञ रचते हैं तो बाप के साथ-साथ तुम आत्माओं की भी पूजा करते हैं क्योंकि तुम बहुतों का कल्याण करते हो। बाप के साथ तुम भारत की खास और दुनिया की आम रूहानी सेवा करते हो इसलिए बाप के साथ तुम बच्चों का भी पूजन होता है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) माया के तूफानों को भगाने के लिए बाप को बहुत-बहुत प्यार से याद करना है। आत्मा को योग अग्नि से सच्चा-सच्चा सोना बनाना है।
2) बेहद का वैरागी बन इस पुरानी दुनिया को भूल जाना है। दुनिया बदल रही है, नई दुनिया में जाना है इसलिए इससे संन्यास ले लेना है।
| वरदान:- | कदम-कदम पर सावधानी रखते हुए पदमों की कमाई जमा करने वाले पदमपति भव बाप बच्चों को बहुत ऊंची स्टेज पर रहने की सावधानी दे रहे हैं इसलिए अभी जरा भी गफलत करने का समय नहीं है, अब तो कदम-कदम पर सावधानी रखते हुए, कदम में पदमों की कमाई करते पदमपति बनो। जैसे नाम है पदमापदम भाग्यशाली, ऐसे कर्म भी हों। एक कदम भी पदम की कमाई के बिगर न जाए। तो बहुत सोच-समझकर श्रीमत प्रमाण हर कदम उठाओ। श्रीमत में मनमत मिक्स नहीं करो। |
| स्लोगन:- | मन को आर्डर प्रमाण चलाओ तो मन्मनाभव की स्थिति स्वत: रहेगी। |
ये अव्यक्त इशारे – ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
याद को शक्तिशाली बनाने के लिए विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो, विस्तार में सार भूल न जाये। खाओ-पियो, सेवा करो लेकिन न्यारेपन को नहीं भूलो। साधना अर्थात् शक्तिशाली याद। निरन्तर बाप के साथ दिल का सम्बन्ध। साधना इसको नहीं कहते कि सिर्फ योग में बैठ गये लेकिन जैसे शरीर से बैठते हो वैसे दिल, मन, बुद्धि एक बाप की तरफ बाप के साथ-साथ बैठ जाए। ऐसी एकाग्रता ही ज्वाला को प्रज्जवलित करेगी।
प्रश्नोत्तर | मीठे बच्चे – शिवबाबा निष्काम सेवाधारी और सबसे बड़े भोले ग्राहक हैं
प्रश्न 1: इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: शिवबाबा सबसे निरहंकारी, निष्काम सेवाधारी और दाता हैं। वे बच्चों से कुछ नहीं लेते, बल्कि पुरानी दुनिया की वस्तुओं के बदले नई दुनिया का सुख, पवित्रता और स्वर्ग का राज्य देते हैं।
प्रश्न 2: शिवबाबा को “सबसे बड़ा भोला ग्राहक” क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि वे बच्चों का तन, मन और धन स्वीकार करके उसके बदले सुंदर शरीर, अपार धन, सुख और 21 जन्मों की स्वर्ग की बादशाही प्रदान करते हैं।
प्रश्न 3: शिवबाबा की निष्काम सेवा की विशेषता क्या है?
उत्तर: शिवबाबा को बच्चों से किसी प्रकार की सेवा या प्रतिफल की इच्छा नहीं होती। वे केवल बच्चों का कल्याण करने और उन्हें श्रेष्ठ बनाने के लिए आते हैं।
प्रश्न 4: शिवबाबा स्वयं को अभोक्ता क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि वे न तो भोजन करते हैं और न ही किसी भौतिक वस्तु का उपभोग करते हैं। वे केवल आत्माओं को ज्ञान देने और पावन बनाने के लिए आते हैं।
प्रश्न 5: परमात्मा से हमें क्या प्राप्त होता है?
उत्तर: परमात्मा से ज्ञान, पवित्रता, सुख, शांति, स्वर्ग का राज्य और 21 जन्मों का अविनाशी सुख प्राप्त होता है।
प्रश्न 6: ज्ञान और भक्ति में क्या अंतर बताया गया है?
उत्तर: भक्ति में मनुष्य अल्पकाल का फल प्राप्त करता है, जबकि ज्ञान द्वारा परमात्मा स्वयं आकर आत्माओं को पवित्र बनाकर स्थायी सुख और मुक्ति का मार्ग बताते हैं।
प्रश्न 7: माया के तूफानों से बचने का सहज उपाय क्या है?
उत्तर: परमपिता शिवबाबा को बहुत प्रेम से याद करना। उनकी याद से माया के तूफान स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
प्रश्न 8: योग-अग्नि का क्या महत्व है?
उत्तर: योग-अग्नि आत्मा को सच्चे सोने के समान पवित्र बनाती है और जन्म-जन्म के विकारों को समाप्त कर देती है।
प्रश्न 9: बेहद का वैराग्य किसे कहा जाता है?
उत्तर: पुरानी दुनिया से बुद्धियोग हटाकर नई दुनिया और परमात्मा की याद में स्थित होना ही बेहद का वैराग्य है।
प्रश्न 10: “मनमनाभव” की स्थिति कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर: जब मन, बुद्धि और हृदय निरंतर एक परमपिता शिवबाबा के साथ जुड़े रहते हैं तथा श्रीमत अनुसार जीवन चलता है, तब मनमनाभव की स्थिति सहज बन जाती है।
प्रश्न 11: पदमपति बनने के लिए बाप कौन-सी सावधानी देते हैं?
उत्तर: प्रत्येक कदम श्रीमत के अनुसार उठाना, मनमत को मिक्स न करना और हर कर्म को पदमों की कमाई बनाने की सावधानी रखना।
प्रश्न 12: इस मुरली से हमें कौन-सी मुख्य धारणाएँ अपनानी चाहिए?
उत्तर: बाप की प्रेमपूर्वक याद में रहना, योग-अग्नि द्वारा आत्मा को पवित्र बनाना, पुरानी दुनिया से वैराग्य रखना, श्रीमत पर चलना और निष्काम सेवा द्वारा विश्व कल्याण का निमित्त बनना।
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