AV-12/14–12-1994-“समय, संकल्प, बोल द्वारा कमाई जमा करने का आधार – तीन बिन्दी लगाना”
“समय, संकल्प, बोल द्वारा कमाई जमा करने का आधार – तीन बिन्दी लगाना”
आज बापदादा किस सभा में आये हैं? ये सारी सभा किन आत्माओं की है? बापदादा देख रहे हैं कि हर एक हाइएस्ट, रिचेस्ट हैं। दुनिया वाले तो कहते हैं रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड लेकिन आप सभी हैं रिचेस्ट इन कल्पा। इस समय का जमा किया हुआ ख़ज़ाना सारा कल्प साथ में चलता है। सारे कल्प में ऐसा कोई भी नहीं मिलेगा जो ये सोचे कि इस जन्म में तो रिचेस्ट हूँ लेकिन भविष्य में भी अनेक जन्म साहूकार से साहूकार रहेंगे। और आप सभी निश्चय और नशे से कहते हो कि हमारा ये ख़ज़ाना अनेक जन्म साथ रहेगा। गैरन्टी है ना? तो ऐसा रिचेस्ट सारे कल्प में देखा? तो आज बापदादा अपने शाहन के भी शाह, राजाओं के भी राजा बच्चों को देख रहे हैं। एक-एक दिन में कितनी कमाई जमा करते हो? हिसाब निकालो, जमा का खाता कितना तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है? और बढ़ाने का साधन कितना सहज है! इसमें मेहनत है क्या? आपकी कमाई वा जमा खाता बढ़ने का सबसे सहज साधन है – बिन्दी लगाते जाओ और बढ़ाते जाओ। आप भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और ड्रामा में भी बीती को बिन्दी लगाना। तो कमाई का आधार है बिन्दी लगाना। और कोई मात्रा है ही नहीं। क्या, क्यों, कैसे – ये क्वेश्चन मार्क की मात्रा, आश्चर्य की मात्रा, किसी की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि मास्टर नॉलेजफुल बन गये। तो ‘कैसे’ शब्द ‘ऐसे’ में बदल गया। बदल गया या अभी भी ‘कैसे-कैसे’ कहते हो? ‘पता नहीं’ ये शब्द संकल्प में भी बदल गया? त्रिकालदर्शी ये स्वप्न में भी नहीं सोच सकते तो मुख से तो बोलने का सवाल ही नहीं है। संगम पर सारा खेल ही तीन बिन्दियों का है। सबसे सहज बिन्दी होती या क्वेश्चन मार्क सहज है? बिन्दी सहज है ना? बिन्दी लगाने में कितना टाइम लगता? सेकेण्ड से भी कम। बिन्दी लगाना आता है कि कलम खिसक जाती है? कई बार बिन्दी के बजाय कलम भी लम्बी लकीर खींच लेती है। बिन्दी लगाने से एक सेकेण्ड में आपके कितने ख़ज़ाने बच जाते हैं। ख़ज़ानों की लिस्ट तो जानते हो ना? अगर बिन्दी के बजाय और कोई मात्रा लगाते हो वा लग जाती है, तो सोचो ज्ञान का ख़ज़ाना गया, शक्तियों का ख़ज़ाना गया, गुणों का ख़ज़ाना गया, संकल्प का ख़ज़ाना गया, एनर्जी गई, श्वांस सफल के बजाय असफलता में गया, समय गया! कितना गया? लम्बी लिस्ट हो गई ना? तो ये कभी भी नहीं सोचो कि एक-दो सेकेण्ड ही तो गया। लेकिन एक सेकेण्ड में गँवाया कितना? एक सेकेण्ड भी कितना भारी हो गया? हर समय अपने जमा का खाता बढ़ाते चलो। कमाया क्या और गँवाया क्या? इन सभी ख़ज़ानों में से कितने ख़ज़ाने गँवाये? बापदादा भी बच्चों के जमा के खाते चेक करते रहते हैं। जब खाता देखते हैं तो मुस्कराते रहते हैं। क्या देखते होंगे जो मुस्कराते हैं? अमृतवेले मिलन भी मनाते, रूहरिहान भी करते, वायदे भी बहुत अच्छे करते कि ये करेंगे, ये करेंगे, बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते हैं लेकिन चलते-चलते सारे दिन में कोई न कोई ख़ज़ाना गँवा भी देते हैं। फिर आधार क्या बनाते हैं? बापदादा को भी अपनी अच्छी-अच्छी बातें सुनाने लगते हैं। अगर व्यर्थ संकल्प चला तो क्या ये जमा हुआ या गँवाया? तो फिर बातें क्या करते हैं? सिर्फ संकल्प में चला ना वो तो ठीक हो जायेगा, बाप को भी दिलासे दिलाते हैं कि ठीक हो जायेगा, पुरुषार्थी हैं ना, सम्पूर्ण तो नहीं हुए हैं, हो जायेगा…। तो बापदादा कहते हैं कि ये गा-गा के गीत सारे दिन में बहुत सुनते हैं लेकिन ये भी कब तक? क्या अंत में सम्पूर्ण होना है? कि बहुत काल के अभ्यास से बहुत काल का वर्सा पाना है? वर्सा अविनाशी चाहते हो? सम्पूर्ण वर्सा चाहते हो कि अधूरा चलेगा? और पुरुषार्थ में अधूरा पुरुषार्थ चलेगा? तो पुरुषार्थ के समय तो करेंगे, देखेंगे, बनेंगे, कर ही लेंगे, हो ही जायेगा… ये सोचते हो और प्राप्ति के समय गे-गे करेंगे? उसमें तो सम्पूर्ण प्राप्ति चाहिये, सम्पूर्ण वर्सा चाहिये। सभी लक्ष्मी-नारायण बनने में हाथ उठाते हो। मालूम भी है कि लक्ष्मी-नारायण की भी आठ गद्दियाँ चलेंगी लेकिन हाथ तो लक्ष्मी-नारायण में उठाते हो ना? तो लक्ष्मी-नारायण का अर्थ है नम्बरवन पास विद् ऑनर होना। बापदादा बच्चों की हिम्मत को देखकर खुश भी होते हैं। राम-सीता में कोई नहीं हाथ उठाता। हिम्मत अच्छी है और हिम्मत वाले को मदद भी मिलती है। सिर्फ पुरुषार्थ के समय भी जैसे बाप के आगे संकल्प करते हो वैसे ही ये बोल और कर्म में लाओ।
बापदादा ने देखा समय के ख़ज़ाने का महत्व जितना रखना चाहिये उतना कई बच्चे नहीं रखते हैं। एक दिन का भी चार्ट चेक करें तो मैजारिटी का समय वेस्ट के खाते में जाता दिखाई देता है। द्वापर काल से व्यर्थ सुनने, देखने और फिर सोचने की आदत न चाहते भी आकर्षित कर लेती है और इसी कारण समय का ख़ज़ाना वेस्ट के खाते में चला जाता है। पहले भी सुनाया कि सेकेण्ड का भी कितना महत्व है! दूसरी बात, मैजारिटी व्यर्थ बोल में भी समय वेस्ट करते हैं। एक घण्टे के अन्दर भी चेक करो कि जो भी बोल बोला, हर बोल में आत्मिक भाव और शुभ भावना है? बोल से भाव और भावना दोनों अनुभव होती है। अगर हर बोल में शुभ भावना, श्रेष्ठ भावना नहीं है तो अवश्य माया की भावनायें हैं। वो तो अनेक हैं, ईर्ष्या, हषद, घृणा, ये भावनायें चाहे किसी भी परसेन्ट में समाई हुई होती है। कई बार बोल के टेप रिकॉर्ड बापदादा सुनते हैं। हर एक की ऑटोमेटिक टेप भरती जाती है और जिस घड़ी जिसकी भी सुनना चाहे वो सुन सकते हैं। हर बोल का सार नहीं होता। कई बार कहते भी हो मेरी भावना, मेरा भाव खराब नहीं था, ऐसे ही निकल गया वा बोल दिया लेकिन जिस बोल में आत्मिक भाव और शुभ भावना नहीं, वो किस खाते में जमा होगा? वेस्ट में हुआ ना? तो कमाई का खाता ज्यादा होगा या गँवाने का खाता ज्यादा होगा? ये तो गँवाया ना? तो बोल में भी गँवाने का खाता ज्यादा होता है। तो बोल को भी चेक करो। ऐसे ही बोल दिया ये भाषा बदली करो। समर्थ बोल का अर्थ ही है जिस बोल में किसी आत्मा को प्राप्ति का भाव वा सार हो। अगर सार नहीं है तो जमा का खाता तो नहीं होगा ना? जितना एक दिन में जमा कर सकते हो, तो बापदादा ने देखा जितने के हिसाब से उतना नहीं है। तो क्या करना पड़ेगा? लक्ष्मी-नारायण तो बनना ही है ना? कि नहीं बने तो भी हर्जा नहीं! पहले जन्म से लेकर श्रेष्ठ प्रालब्ध पानी है कि दूसरे-तीसरे जन्म से शुरू करेंगे? पहले जन्म में नहीं आओ, दूसरे-तीसरे में आओ, पसन्द है? नहीं पसन्द है ना? तो इतना जमा का खाता है? अगर खाता कम जमा होगा तो प्रालब्ध क्या खायेंगे? उतना ही खायेंगे जितना जमा किया है। तो आज बापदादा ने सभी के जमा के खाते देखे। दूसरों को समय का महत्व बहुत अच्छा सुनाते हो, संगमयुग की महिमा कितनी अच्छी करते हो! तो स्वयं भी सदा समय के महत्व को सामने रखो। समय के पहले अपने श्रेष्ठ भाग्य के आधार से प्राप्तियों का खाता फुल जमा करो।
संगमयुग के समय की विशेषता है कि तीनों रूप की प्राप्ति है। एक वर्से के रूप में, दूसरा पढ़ाई को सोर्स ऑफ इनकम कहते हैं तो पढ़ाई की प्राप्ति के आधार से और तीसरा है वरदान के रूप में। वर्सा भी है, इनकम भी है और वरदान भी है। प्राप्ति बहुत भारी है, बहुत बड़ी है! सिर्फ सम्भालने वाले बनो। वर्सा भी बेहद है, इनकम भी बेहद है और वरदान भी बेहद के हैं। कभी सोचा था कि रोज़ भगवान का वरदान मिलेगा? इतने वरदान किसी को भी, कभी भी नहीं मिल सकते। लेकिन आप तो कहते हो हमारा तो अधिकार है। वर्से पर भी, पढ़ाई पर भी और वरदान पर भी। छोटी बात नहीं है, बहुत बड़ी है! तीनों ही सम्बन्ध से तीनों के ऊपर अपना अधिकार प्राप्त कर लिया ना? सभी फ़खुर से कहते हैं ना बाप मेरा है। ये कहते हो क्या कि मेरा नहीं, तेरा है? हमारे लिये बाप पढ़ाने आता है ये समझते हो ना? तो पढ़ाई पर अधिकार है ना? और वरदाता के पास वरदान है ही किसके लिये? हरेक सोचता है कि मेरे लिये ही वरदाता बाप है। तो तीनों पर अधिकार है। कहने में तो बहुत साधारण है। इसीलिये तो दुनिया वाले हंसते हैं कि, हैं क्या और कहते क्या हैं? तो अधिकार को सदा स्मृति में रख कदम उठाओ। इमर्ज रूप में रखो, मर्ज रूप में नहीं। हैं तो ब्रह्माकुमार, हैं ही बाबा के… ऐसे नहीं। इमर्ज रुप में, मन में, बुद्धि में, कर्म में इमर्ज रखो। मन में ये संकल्प इमर्ज हो कि मैं ये हूँ, बुद्धि में स्मृति स्वरूप हो और कर्म में अधिकारी के निश्चय और नशे से हर कर्म हो। ऐसे नहीं, अमृतवेले तो इमर्ज रहता है फिर सारे दिन में मर्ज हो जाता है। नहीं, सदा इमर्ज रूप में रहे। तो जमा का खाता बढ़ाओ। तीव्र गति से बढ़ाना, ढीला-ढाला नहीं करना। क्योंकि समय आप मास्टर रचयिता के लिये रुका हुआ है। अभी भी प्रकृति को ऑर्डर करें तो क्या नहीं कर सकती है? अगर पांचों ही तत्व हलचल मचाना शुरू कर दें तो क्या नहीं हो सकता और कितने में हो सकता? तो समय, प्रकृति और माया विदाई के लिये इन्तज़ार कर रही है। आप सम्पूर्णता की बधाइयाँ मनाओ तो वो विदाई लेकर ही जायेगी। माया भी देखती है अभी ये तैयार नहीं हैं तो चांस लेती रहती है। प्रकृति को ऑर्डर करें? पुरुष तैयार हैं? प्रकृति तो तैयार हो जायेगी। ऑर्डर करें? कि ज्ञान सरोवर तैयार हो पीछे ऑर्डर करें? ऐसे एवररेडी हो, कि रेडी हो? शक्तियाँ एवररेडी हैं? सम्पूर्ण हो गये? थोड़े को तो एवररेडी नहीं कहेंगे ना? ये सोचो, चेक करो कि अगर इस घड़ी भी महाविनाश हो जाये तो अपनी तस्वीर देखो नॉलेज के आइने में, कि मैं क्या बनूँगा? आइना तो सबके पास है ना? क्लीयर है ना? तो अपने तकदीर की तस्वीर देखो। बाप को क्या टाइम लगेगा? जब ब्रह्मा के लिये गायन है कि संकल्प से सृष्टि रच ली तो क्या संकल्प से विनाश नहीं हो सकता? बाप जानते हैं राजधानी चलनी है तो उसमें एक ब्रह्मा क्या करेगा? साथी चाहिये ना? तो ब्रह्मा बाप भी आप साथियों के लिये रुके हुए हैं। तो बाप बच्चों से प्रश्न करते हैं, बच्चे तो बाप से प्रश्न बहुत कर चुके हैं। अभी बाप बच्चों से प्रश्न करते हैं कि डेट फिक्स करो। सभी काम की डेट फिक्स करते हो ना? तो इसकी भी डेट फिक्स करो, इसका भी मुहूर्त होना है ना। ज्ञान सरोवर की भी डेट फिक्स है, हॉस्पिटल की भी डेट फिक्स है। इसकी डेट क्या है? ये किसको फिक्स करनी है? बाप को नहीं करनी है। ये बाप ने आप बच्चों के हाथ में दिया है। कोई काम तो आप भी करेंगे, कि सब बाप करेंगे? डेट फिक्स का प्रोग्राम बनाना। अच्छा!
(नये बच्चों को देखते हुए) देखो, आप नये-नये बच्चे जो आये हैं, आप से सबका कितना प्यार है? पहला चांस आप सबको ही देते हैं। सब खुशराजी हैं? कितने पैर पृथ्वी मिली है? दो पैर या तीन पैर? (दो पैर) दो पैर में भी राज़ी तो हो, तकलीफ तो नहीं है ना? खाना-पीना तो अच्छा मिल रहा है ना? मेले में ऐसी पालना और कोई की हो ही नहीं सकती। मेले देखे हैं ना? ऐसा ब्रह्मा भोजन, ऐसा परमात्म परिवार कहाँ मिलता है? सर्दी लगती है? मौसम की भी मिठाई होती है। तो ये सर्दी भी मौसम की मिठाई है, मिठाई तो खानी चाहिये ना? सबको शालों की सौगात तो मिलती है ना? कोई मेले में ऐसी सौगात मिलती है या खाली होकर आते हो? अच्छा नयों की दिल पूरी हुई, मधुबन देख लिया? पहले स्वप्न में था, अभी साकार में हो गया। कितना भी स्थान बढ़ायेंगे लेकिन कम होना ही है। क्यों? सोचो, अभी 9 लाख जमा हुए हैं? पहले जन्म की संख्या ही तैयार नहीं हुई है। वो तो होनी है ना? कितने मकान बनायेंगे? कितने ज्ञान सरोवर बनायेंगे? सभी कहते हैं संख्या बढ़ाओ। जितना संख्या बढ़ायेंगे, उतनी संख्या दूसरे वर्ष और हो जायेगी तो क्या करेंगे? जितना मिले उतने में राज़ी रहो। मेला भी करना है ना? (तलहटी में ब्राह्मणों का विशाल संगठन होना है) ये तो मेले में आने नहीं हैं, ये तो आ गये। दूसरों के लिये इतना बड़ा मेला पसन्द है? दस हज़ार सोयेंगे! भीड़ नहीं हो जायेगी? ये तो समझते हैं हमको तो चांस मिलना नहीं है। इन्तज़ार की घड़ियाँ भी प्यारी होती हैं। एक साल के बाद जाना है ये इन्तज़ार होता है ना? तो इन्तज़ार में पुरुषार्थ कितना अच्छा चलता है! और जब होकर चले जायेंगे तो देख लिया, फिर क्या होगा? फिर अलबेलापन आयेगा? नहीं आयेगा? और आगे बढ़ेंगे? ये भी ड्रामा में जो विधि बनी है वो बहुत ही फायदे वाली है। एक साल में पक्के तो हो जाते हो ना? नहीं तो कच्चे-कच्चे आ जाते फिर युद्ध करनी पड़ती।
हर साल में आपके यहाँ (मधुबन में) इन्टरनेशनल मेले कितने लगते हैं? अभी भी ये मेला क्या है? इन्टरनेशनल है ना? देश-विदेश सब तरफ के हैं ना? दुनिया वाले तो सोचते हैं इन्टरनेशनल प्रोग्राम पांच साल में एक किया तो बहुत कर लिया। और मधुबन में कितने होते हैं, पता पड़ता है? इन्टरनेशनल मेला हो गया। और सब खुश! मज़ा आता है ना? लेकिन आना टर्न पर। अभी तो देखो दस हज़ार में भी टेन्ट तो मिलेगा ना? आखिर में ये सब साधन समाप्त हो जायेंगे। सारे आबू के पहाड़ों को सोने के स्थान बना लो तो कितने रह सकते हैं? अच्छा!
दिल्ली ग्रुप:- पहले तो दिल्ली वालों को डेट फिक्स करनी पड़ेगी। क्योंकि देहली को परिस्तान बनाना है ना? राज गद्दी तो दिल्ली में होनी है ना? तो पहले दिल्ली वालों को तैयारी करनी पड़ेगी तब तो राज्य करेंगे ना? तो दिल्ली वाले क्या तैयारी करेंगे? दिल्ली वालों को एक्स्ट्रा सेवा करनी पड़ेगी। क्योंकि एक तो आत्माओं को योग्य और योगी बनाना है, दूसरा धरनी को भी तैयार करना है। तो विशेष अपने वाणी के साथ-साथ वृत्ति को और तीव्र गति देनी पड़ेगी। क्योंकि वृत्ति से वायुमण्डल बनेगा और वायुमण्डल का प्रभाव प्रकृति पर पड़ेगा, तब तैयार होंगे। तो दिल्ली वालों को डबल सेवा का सदा अटेन्शन रखना है। वाणी और वृत्ति दोनों साथ-साथ सेवा में लगे रहें। सभी पॉवरफुल वृत्ति वाले हो ना? ढीला पुरुषार्थ नहीं करना। क्योंकि अगर आप देरी करेंगे तो राज्य भी देरी से स्थापन होगा। इसलिये दिल्ली वालों को सदा ही डबल सेवा द्वारा तीव्र गति से तैयारी करनी है, राजधानी बनानी है। बनायेंगे तो नज़दीक भी रहेंगे ना? तो डबल सेवा द्वारा ऐसा पॉवरफुल वायुमण्डल बनाओ जो प्रकृति भी दासी बन जाये, हलचल करने के बजाय दासी बनकर सेवा करे। तो देहली निवासी विश्व परिवर्तक तो हो ही लेकिन विश्व में भी राजधानी परिवर्तन के विशेष निमित्त हो। नशा है ना? तो डबल सेवा करनी है, तब ही डबल ताज मिलेगा, ऐसे नहीं मिलेगा। सेवाधारी सो ताजधारी। अच्छा।
बम्बई, महाराष्ट्र:- बम्बई वाले क्या करेंगे? देहली वाले राजधानी तैयार करेंगे, आप प्रजा और राजा-रानी तैयार करेंगे? बाम्बे वालों को विशेष ब्रह्मा बाप का वरदान है। (रमेश भाई से) कौन-सा वरदान है? (नरदेसावर) नरदेसावर का अर्थ है सदा सम्पूर्ण, सदा भरपूर। कभी कोई कमी नहीं होगी। नरदेसावर अर्थात् सदा कमाने वाले, कमाने में होशियार। ऐसे नरदेसावर, सदा भरपूर हो? या कभी खाली हो जाते हो? इतना भरपूर जो औरों को भी भरपूर करने वाले। बाम्बे वाले राजधानी के राजा-रानी और प्रजा तैयार करेंगे। बाम्बे वालों का तो बहुत बड़ा काम हो गया! देहली वालों को भी राज्य अधिकारी तो बनाने पड़ेंगे। क्योंकि अभी भी देखो लास्ट जन्म में भी राज्य अधिकारी तो देहली में ही हैं। तो देहली और बाम्बे दोनों को मिलकर राजधानी जल्दी-जल्दी तैयार करनी है। पसन्द है? डेट भी फिक्स करेंगे ना? डेट नहीं भूल जाना। देहली और बाम्बे वाले जब कहेंगे राजधानी तैयार हो गई तब तो काम होगा ना? राज्य अधिकारी हो नहीं और राज्य तैयार हो जाये, कैसे होगा? बाम्बे में सेवा के रत्न भी अच्छे-अच्छे हैं। अच्छे हैं या अच्छे ते अच्छे हैं? बाप कहते हैं अच्छे ते अच्छे हैं। देखो, एक-एक रत्न, पुराने-पुराने रत्न गिनती करो तो कितने अच्छे हैं। दिल्ली में भी हैं, बाम्बे में भी हैं। क्योंकि आदि से सेवा के निमित्त बने हो। ऐसे तो गुजरात भी कम नहीं हैं। गुजरात लास्ट सो फास्ट है और ये आदि हैं। गुजरात ने वृद्धि बहुत जल्दी की है।
नागपुर, पूना:- नागपुर वा पूना वाले राजधानी में विशेष क्या करेंगे? राजधानी को सजायेंगे? महाराष्ट्र सजाने की ड्यूटी ज्यादा लेता है ना? कितना भी तैयार हो जाये कोई लेकिन सज़ावट नहीं तो कुछ नहीं। तो महाराष्ट्र वाले राजधानी को सजायेंगे। सजाने के लिये साधन तैयार करने पड़ते हैं ना? तो महाराष्ट्र वाले सदा अपने सहयोग से सहयोगी आत्माओं को निमित्त बनायेंगे। क्योंकि जितना आगे चलते जायेंगे, सहयोगी आत्मायें सदा ही सहयोग के हाथ बढ़ाते हुए परिवर्तन में आगे बढ़ेंगे। ब्राह्मणों के ज़ोन में तो महाराष्ट्र बहुत बड़ा है ना? तो जैसे अभी भी सेवा में, हर कार्य में सहयोगी बनते हो और आगे भी अनेक सहयोगी आत्माओं द्वारा राजधानी को सजाने में सहयोगी बनेंगे। तो महाराष्ट्र वाले सहयोग देने में और सहयोगी बनाने में अच्छे निमित्त हैं और आगे भी रहेंगे। ऐसे हैं ना? योग शिविर में भी सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के आते हैं ना और ब्राह्मण परिवार में संख्या किसकी ज्यादा आती है? (महाराष्ट्र की) अच्छा है, वृद्धि है और सहयोग की विधि से सफलता को पाते रहना ही है। समझा? अच्छा!
भोपाल:- भोपाल वाले राजधानी में क्या तैयारी करेंगे? भोपाल वाले नगाड़ा बजायेंगे। वैसे भी जब तक नगाड़ा नहीं बजेगा तो तैयारी कैसे होगी? तो भोपाल वाले बहुत ज़ोरशोर से चारों ओर नगाड़ा बजायेंगे। क्या नगाड़ा बजायेंगे? बाप आ गया, वर्सा ले लो ये नगाड़ा बजायेंगे। नक्शे के हिसाब से भी मध्य प्रदेश है ना। वैसे भी जब कोई आवाज़ फैलाना होता है तो बीच में खड़े होकर फैलायेंगे ना? तो खूब नगाड़ा बजाओ। बजा भी रहे हैं और बजायेंगे भी। सबको खुशनसीब बनने की खुश़खबरी सुनायेंगे। खुश़खबरी सुनाने में होशियार हो ना? सबको खुशखबरी सुनाना, यही सबसे बड़ा श्रेष्ठ कर्तव्य है। क्योंकि चारों ओर दु:ख, अशान्ति की ख़बरें सुनते रहते हैं। तो ऐसी आत्मायें खुश़खबरी सुनकर कितनी खुश होंगी! सबके दिल से निकलेगा कि वाह! परमात्म बच्चे वाह! तो ऐसा श्रेष्ठ कार्य करना ही है। हुआ ही पड़ा है, सिर्फ निमित्त करना है। राजधानी भी तैयार हुई पड़ी है, प्रजा भी तैयार है, आप सिर्फ ठप्पा लगाते जाओ, बस। अच्छा।
कर्नाटक:- कर्नाटक वाले क्या करेंगे? कर्नाटक के धरनी की क्या विशेषता है? भावना वाले ज्यादा हैं, तो भावना प्रधान आत्मायें क्या करेंगी? आत्माओं में श्रेष्ठ भावना पैदा करने के निमित्त बनेंगी। जैसे धरनी की विशेषता है, वैसे चारों ओर सारे विश्व को तैयार करने के लिये सभी में श्रेष्ठ भावना, शुभ भावना उत्पन्न करेंगे। श्रेष्ठ भावना क्या है? हम बाप के और बाप हमारा। इस श्रेष्ठ भावना से सभी भावना का फल सहज प्राप्त करेंगे। भावना का फल बहुत जल्दी मिलता है। तो ऐसी सहज सेवा करो जो भावना उत्पन्न करो और भावना का फल सहज प्राप्त करो। तो ये सेवा करना आता है कि नहीं? अभी से फ़रिश्ते बन गये हैं क्योंकि भाषा नहीं समझते हैं लेकिन इशारों से समझ जाते हैं। तो समझा, कर्नाटक वालों को क्या करना है? सहज फल खिलाओ, मेहनत नहीं कराओ। कर्नाटक की धरनी में वृद्धि बहुत सहज होती है। तो जैसे आप लोगों की धरनी है वैसे औरों की धरनी को भी तैयार करो और फल की प्राप्ति करो।
आन्ध्र प्रदेश:- आन्ध्र प्रदेश क्या करेंगे? ऐसा कोई नया प्लैन बनाओ, जैसे साइन्स वाले नई-नई इन्वेन्शन निकालते रहते हैं ना, तो थोड़े समय में प्राप्ति ज्यादा हो तो आन्ध्र प्रदेश ऐसे ही इन्वेन्शन करो जो थोड़े समय में आत्मायें अनुभूति की प्राप्तियाँ ज्यादा अनुभव करें, उसका साधन क्या है जो समय कम लगे और प्राप्ति ज्यादा हो? इसका साधन है आन्ध्र प्रदेश की हर ब्राह्मण आत्मा को लाइट हाउस, माइट हाउस बनना पड़े। लाइट हाउस कितना जल्दी लाइट फैलाता है और चारों ओर फैला देता है। तो आन्ध्र प्रदेश लाइट हाउस, माइट हाउस बन ऐसा प्रकाश फैलाओ जो सबको दिखाई दे कि मैं आत्मा हूँ और बाप आ चुका है। रोशनी में दिखाई देता है ना कि मैं कौन हूँ? तो ऐसे लाइट और माइट हाउस बनकर लाइट और माइट फैलाओ।
डबल विदेशी:- डबल विदेशियों ने बाप का एक टाइटल तो प्रैक्टिकल कर लिया है। कौन सा? सर्वव्यापी का। कोई ऐसा प्रोग्राम नहीं होता जिसमें डबल विदेशी न हो। तो सर्व कार्य में व्यापी हो गये और बापदादा को भी खुशी होती है। क्योंकि डबल विदेशियों से इन्टरनेशनल हो जाता है। बाप का टाइटल भी विश्व कल्याणकारी है ना। भारत कल्याणकारी तो नहीं है ना। तो जब डबल विदेशी आते हैं तो बाप का भी विश्व कल्याणकारी टाइटल सिद्ध कर देते हैं। रौनक हो जाती है। डबल विदेशियों की विशेषता है हर कार्य में रौनक करने वाले। वहाँ गोल्डन दुनिया में भी क्या करेंगे? चारों ओर रौनक मचा देंगे। विदेश में वैसे भी लाइट की सजावट की रौनक बहुत होती है ना। तो ब्राह्मण परिवार की रूहानी रौनक डबल विदेशी हैं। डबल विदेशी कहाँ-कहाँ से आये हैं? (लण्डन, नैरोबी, न्युजीलैण्ड, जर्मनी, जापान, मैक्सिको) मैक्सिको नाच रहा है, मैक्सिको वालों की बहादुरी भी बहुत अच्छी है, स्थान भी दूर है और इकॉनॉमी सिस्टम भी विचित्र ही है। फिर भी भावना और स्नेह पहुँचा देता है। इसलिये मैक्सिको वालों को मुबारक। अच्छा, देखो लण्डन वाले भी बहुत आगे बढ़ा रहे हैं, समाचार सुना चाबी मिल गई है। (लण्डन शहर में म्यूज़ियम के लिए मकान मिला है) इससे क्या सिद्ध हुआ कि ब्राह्मणों का दृढ़ संकल्प जो चाहे वो कर सकता है। बुद्धिवान बन किसी की भी बुद्धि को बदल सकते हैं। कायदे भी बदल करके फायदे में दिखाई देते हैं। विदेश के कायदे कितने सख्त हैं लेकिन कायदे के ऊपर फायदा विजय प्राप्त कर लेता है। (बाबा करनकरावनहार बन करा लेता है) लेकिन ब्राह्मण बच्चे भी भुजायें हैं। भुजाओं के बिना तो कोई काम नहीं होता।
जीतू भाई (ज्ञान सरोवर के कान्ट्रैक्टर) परिवार सहित बापदादा के सामने सभा में बैठे हैं:- बाप की भुजा हो ना? (राइट हैण्ड हैं) मुबारक हो। राइट हैण्ड की मुबारक हो। परमात्म भुजा बनना कितना बड़ा भाग्य है! सेवा के सहयोगी बनना अर्थात् भुजा बनना। सभी का बाप से अच्छा प्यार है। बाप को भी प्यार है। बाप से ज्यादा प्यार है या प्रवृत्ति से ज्यादा प्यार है? (दोनों से) जवाब देने में होशियार हैं। अच्छा है कितने शेयर्स आप लोगों ने इकट्ठा किया है? अपना एकाउण्ट देखा है? सारे परिवार को कितने शेयर्स मिले हैं? अगर घर बैठे शेयर मिल जायें, बिना मेहनत के तो इसको भाग्य कहेंगे ना? अच्छा है, बाप से भी मिल लिया, मना भी लिया। परिवार ही अच्छा है।
(डा.अशोक मेहता से) ये क्या मनाने आये हैं? बर्थ डे मनाने आये हैं। जन्मते ही भाग्य की लकीर श्रेष्ठ लेकर आये हो। गीत है ना तकदीर जगाकर आये हैं। तो जन्मते मेहनत करनी पड़ी है कि सहज प्राप्ति से आगे बढ़ते जाते हैं? सहज प्राप्ति है ना! तो तकदीर लेकरके ही आये हैं। और कलम तो हाथ में है ही। सेवा का बल, परिवार का सहयोग और बाप का प्यार तीनों प्राप्त हैं। तो तीनों सहज कर रहे हैं और करते रहेंगे। परिवार के भी समीप आने में देरी नहीं लगी ना? बाप के समीप जल्दी आये तो परिवार के समीप भी बहुत तीव्र गति से आ रहे हो। देखो, कितने प्यारे हो सबके! जिसका बाप से और सेवा से प्यार है ना तो बाप का और परिवार का प्यार स्वत: ही मिलता है। ऐसे हैं ना? सब पहचाने हुए लगते हैं ना। कहाँ भी जाओ तो आपको जल्दी पहचान लेंगे ना? अच्छा, सभी ने दिल खुश मिठाई खाई?
टीचर्स:- देखो, टीचर्स नहीं होती तो आप लोग कैसे आते? टीचर्स का महत्व है ना! फिर भी निमित्त टीचर्स तो हैं। आप सभी को पाठ पक्का कराने वाले निमित्त हैं ना? उमंग-उत्साह बढ़ाने वाले निमित्त टीचर्स हैं। टीचर्स का विशेष कार्य ही है उमंग-उत्साह के पंख लगाए, स्वयं भी उड़ने वाले और दूसरों को भी उड़ाने वाले। योग्य टीचर्स की विशेषता ही यह है कि आने वाले हर स्टूडेण्ट सदा ही सहज पुरुषार्थ द्वारा आगे से आगे उड़ते रहेंगे। वैसे टीचर्स का भाग्य ब्राह्मण परिवार में एक्स्ट्रा भी है। क्योंकि निमित्त बनना ये एक एक्स्ट्रा लिफ्ट है। सेवा के अधिकारी बनना ये एक्स्ट्रा अधिकार अन्दर बहुत मदद करता है। तो टीचर्स को बापदादा सदा निमित्त और समान सेवाधारी समझते हैं। जो बाप का कार्य वो निमित्त टीचर्स का कार्य। तो बापदादा सदा टीचर्स को समान स्वरूप से देखते हैं। इतना स्नेह और इतना रिगार्ड बाप सदा देते हैं और उसी नज़र से देखते हैं कि ये समान सेवाधारी हैं। टीचर्स के बिना तो काम नहीं चलेगा ना! आप लोगों को ठप्पा तो टीचर्स का लगाना पड़ता है ना? अगर टीचर्स आपके फॉर्म पर ठप्पा नहीं लगायेंगी तो कैसे आयेंगे? अच्छा!
चारों ओर के हाइएस्ट और रिचेस्ट श्रेष्ठ आत्माओं को, हर ख़ज़ानों के मालिक सम्पन्न आत्माओं को, सदा स्वयं को एवररेडी बनाने वाले तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं को, सदा समय, संकल्प, बोल द्वारा श्रेष्ठ कमाई का खाता जमा करने वाले अति समीप आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादी जी से :-
सब सहज चल रहा है ना? मेला चल रहा है या खेल चल रहा है? सन्तुष्टता का खेल चल रहा है। सन्तुष्ट करने वाले सन्तुष्ट करते हैं और सन्तुष्ट होने वाले सन्तुष्ट होते हैं। ये सन्तुष्टता का खेल सभी को प्यारा लगता है। और सब ठीक है? (तलहटी में दो टर्न का सोचा है) पहले लिस्ट देखो, पीछे दो बारी भी होगा तो कोई बात नहीं। बाप बच्चों की सब आशायें पूर्ण करता है। बाप को आने में तो कोई तकलीफ नहीं है ना। चाहे मधुबन, पाण्डव भवन में आये, चाहे तलहटी में आये, उनको आने में कोई तकलीफ नहीं है। तकलीफ तो बच्चों को है, लेकिन वो तकलीफ नहीं लगती। जब बच्चे हिम्मत रखते हैं कि हमारे लिये तकलीफ नहीं है, मनोरंजन है, तो बाप को तो तन में ही आना है ना, बस। संगम पर करना ही क्या है? मेला और खेला। सेवा है खेल। मेला मचाओ, सेवा का खेल करो, और क्या करना है? खाओ-पियो, ब्रह्मा भोजन खाओ।
तीन बिन्दी का रहस्य
समय, संकल्प और बोल द्वारा श्रेष्ठ कमाई जमा करने की दिव्य कला
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तीन बिन्दी का रहस्य | कैसे बचाएँ समय, संकल्प और बोल की शक्ति? | BapDada Murli Deep Secrets
📜 Disclaimer
यह अध्याय ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा प्रकाशित साकार मुरली एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं के अध्ययन पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, सम्प्रदाय, देवी-देवता, शास्त्र अथवा किसी व्यक्ति की आस्था का विरोध या अपमान करना नहीं है। प्रस्तुत विचार आध्यात्मिक अध्ययन, आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवनशैली को प्रोत्साहित करने के लिए हैं। पाठकों से निवेदन है कि वे इन विचारों पर स्वयं चिंतन करें तथा अपनी बुद्धि और अनुभव के आधार पर निर्णय लें।
भूमिका
मनुष्य अपने जीवन में धन कमाने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। वह बैंक बैलेंस बढ़ाने, व्यवसाय बढ़ाने और भविष्य सुरक्षित करने में लगा रहता है। लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है कि ऐसा कौन-सा खजाना है जो केवल इस जन्म तक सीमित नहीं रहता बल्कि अनेक जन्मों तक हमारे साथ चलता है?
बापदादा इस मुरली में बताते हैं कि संगमयुग का प्रत्येक सेकण्ड अमूल्य है। इस समय किया गया हर श्रेष्ठ संकल्प, हर शुभ बोल और हर पुण्य कर्म आत्मा के खाते में ऐसा आध्यात्मिक धन जमा करता है जो पूरे कल्प तक साथ रहता है।
मुरली महावाक्य
“आप भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और ड्रामा में भी बीती को बिन्दी लगाना। तो कमाई का आधार है बिन्दी लगाना।”
— साकार मुरली, अव्यक्त बापदादा, 18 जनवरी 1998
अध्याय 1
सबसे बड़े धनवान कौन हैं?
दुनिया कहती है कि सबसे अमीर वह है जिसके पास सबसे अधिक पैसा है। लेकिन बापदादा एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण देते हैं।
वे कहते हैं कि वास्तविक अमीरी बैंक बैलेंस नहीं बल्कि आत्मा का जमा हुआ आध्यात्मिक खजाना है।
जो आत्मा आज परमात्मा की याद, सेवा, श्रेष्ठ संकल्प और शुभ कर्मों द्वारा कमाई जमा करती है, वही आने वाले अनेक जन्मों तक सुख, सम्मान और सम्पन्नता प्राप्त करती है।
इसलिए संगमयुग का प्रत्येक क्षण करोड़ों रुपयों से भी अधिक मूल्यवान माना गया है।
उदाहरण
मान लीजिए दो मित्र हैं।
पहला मित्र हर महीने लाखों रुपये कमाता है लेकिन उसका पूरा पैसा खर्च हो जाता है।
दूसरा मित्र कम कमाता है लेकिन हर महीने बचत करता रहता है।
बीस वर्ष बाद कौन अधिक सम्पन्न होगा?
निश्चित रूप से जिसने बचत की।
इसी प्रकार आत्मा भी प्रतिदिन आध्यात्मिक बचत करती है। यही जमा भविष्य का भाग्य बनती है।
अध्याय 2
तीन बिन्दी का वास्तविक अर्थ
बापदादा सम्पूर्ण मुरली का सार केवल तीन बिन्दियों में बताते हैं।
पहली बिन्दी — मैं आत्मा
मैं शरीर नहीं हूँ।
मैं एक ज्योति बिन्दु आत्मा हूँ।
जब यह स्मृति रहती है तब अहंकार, क्रोध और दुख स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
दूसरी बिन्दी — परमात्मा भी बिन्दी
परमात्मा भी एक निराकार ज्योति बिन्दु हैं।
वे शरीरधारी नहीं हैं।
उनकी स्मृति से आत्मा शक्तिशाली बनती है।
तीसरी बिन्दी — बीती को बिन्दी
जो बीत गया, उसे समाप्त समझो।
पुरानी बातों, अपमान, गलती और दुख को बार-बार याद करना आत्मा की ऊर्जा नष्ट करता है।
बीती को बिन्दी लगाने वाला व्यक्ति वर्तमान में जीना सीख जाता है।
सामान्य जीवन का उदाहरण
कल्पना कीजिए कि आपके मोबाइल में हजारों बेकार फोटो और वीडियो भर गए हैं।
मोबाइल धीरे-धीरे धीमा हो जाता है।
जब आप अनावश्यक फाइलें हटा देते हैं तो मोबाइल फिर तेज चलने लगता है।
ठीक यही कार्य “बीती को बिन्दी” करना है।
पुरानी बातों को हटाकर आत्मा हल्की हो जाती है।
मुरली महावाक्य
“संगम पर सारा खेल ही तीन बिन्दियों का है।”
— साकार मुरली, अव्यक्त बापदादा, 18 जनवरी 1998
अध्याय 3
एक सेकण्ड कितना मूल्यवान है?
सामान्य व्यक्ति सोचता है—
“केवल एक सेकण्ड ही तो गया।”
लेकिन बापदादा बताते हैं कि एक सेकण्ड में बहुत कुछ खो सकता है।
यदि एक सेकण्ड के लिए क्रोध आया—
- शक्ति गई
- शान्ति गई
- समय गया
- शुभ संकल्प गया
- ऊर्जा गई
इस प्रकार एक सेकण्ड भी आत्मा के लिए बहुत महंगा पड़ सकता है।
उदाहरण
एक क्रिकेट मैच में केवल एक गेंद पूरी बाज़ी बदल देती है।
एक विद्यार्थी एक मिनट देर से परीक्षा हॉल पहुँचता है और पूरी परीक्षा छूट सकती है।
इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी एक सेकण्ड का व्यर्थ संकल्प पूरे दिन की स्थिति को बदल सकता है।
मुरली महावाक्य
“एक सेकेण्ड में आपके कितने ख़ज़ाने बच जाते हैं।”
— साकार मुरली, अव्यक्त बापदादा, 18 जनवरी 1998
अध्याय 4
समय सबसे बड़ा खजाना क्यों है?
दुनिया पैसा खोकर वापस कमा सकती है।
स्वास्थ्य भी काफी हद तक वापस पाया जा सकता है।
लेकिन बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता।
इसीलिए बापदादा समय को सबसे बड़ा खजाना कहते हैं।
यदि समय व्यर्थ विचारों में चला गया, तो वह आध्यात्मिक खाते से सीधी हानि है।
जीवन का उदाहरण
एक किसान यदि सही मौसम में बीज नहीं बोता, तो वर्षभर पछताता है।
संगमयुग भी ऐसा ही श्रेष्ठ समय है।
जो आज जमा करेगा, वही भविष्य में पाएगा।
मुरली महावाक्य
“समय के पहले अपने श्रेष्ठ भाग्य के आधार से प्राप्तियों का खाता फुल जमा करो।”
— साकार मुरली, अव्यक्त बापदादा, 18 जनवरी 1998
इस अध्याय से मुख्य शिक्षाएँ
✔ मैं आत्मा हूँ।
✔ परमात्मा निराकार ज्योति बिन्दु हैं।
✔ बीती हुई बातों को बिन्दी लगाना आध्यात्मिक बुद्धिमानी है।
✔ प्रत्येक सेकण्ड आत्मा का खजाना है।
✔ समय, संकल्प और बोल—तीनों का श्रेष्ठ उपयोग ही वास्तविक कमाई है।
Murli Notes
मुरली स्रोत:
अव्यक्त बापदादा साकार मुरली
दिनांक: 18 जनवरी 1998
मुख्य महावाक्य
- “आप भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और ड्रामा में भी बीती को बिन्दी लगाना।”
- “संगम पर सारा खेल ही तीन बिन्दियों का है।”
- “हर समय अपने जमा का खाता बढ़ाते चलो।”
- “समय के पहले अपने श्रेष्ठ भाग्य के आधार से प्राप्तियों का खाता फुल जमा करो।”
निष्कर्ष
बापदादा हमें एक अत्यन्त सरल लेकिन गहन आध्यात्मिक सूत्र देते हैं—तीन बिन्दी। यदि हम स्वयं को आत्मा समझें, परमात्मा को निराकार ज्योति बिन्दु के रूप में याद रखें और बीती हुई बातों को समाप्त कर वर्तमान में श्रेष्ठ कर्म करें, तो हमारा आध्यात्मिक खाता निरन्तर भरता रहेगा। यही वास्तविक धन है, जो केवल इस जन्म तक नहीं बल्कि पूरे कल्प तक आत्मा के साथ चलता है।
तीन बिन्दी का रहस्य – समय, संकल्प और बोल द्वारा श्रेष्ठ कमाई
1. प्रश्न: बापदादा के अनुसार संसार का सबसे धनी व्यक्ति कौन है?
उत्तर: वह आत्मा जो संगमयुग में समय, संकल्प, बोल और कर्म द्वारा आध्यात्मिक खज़ाना जमा करती है। यही खज़ाना पूरे कल्प तक साथ रहता है।
2. प्रश्न: बापदादा ने “तीन बिन्दी” का क्या अर्थ बताया है?
उत्तर:
- मैं आत्मा हूँ (बिन्दी स्वरूप)।
- परमात्मा शिव भी ज्योति बिन्दु हैं।
- बीती हुई बातों को बिन्दी लगाकर भूल जाना।
3. प्रश्न: आध्यात्मिक कमाई का सबसे सरल साधन क्या है?
उत्तर: हर परिस्थिति में तीन बिन्दियों की स्मृति रखना और व्यर्थ विचारों को समाप्त करना।
4. प्रश्न: “बीती को बिन्दी लगाना” का क्या अर्थ है?
उत्तर: पुरानी गलतियों, दुखद घटनाओं, अपमान और नकारात्मक अनुभवों को बार-बार याद न करके वर्तमान में श्रेष्ठ कर्म करना।
5. प्रश्न: बापदादा “क्या, क्यों, कैसे” जैसे प्रश्नों से बचने की सलाह क्यों देते हैं?
उत्तर: क्योंकि ये व्यर्थ चिंतन और समय की हानि का कारण बनते हैं। ज्ञानवान आत्मा समाधान पर ध्यान देती है, समस्या पर नहीं।
6. प्रश्न: एक सेकण्ड का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
उत्तर: एक सेकण्ड में श्रेष्ठ संकल्प आत्मा का भाग्य बना सकता है, जबकि व्यर्थ संकल्प कई आध्यात्मिक खज़ानों की हानि कर सकता है।
7. प्रश्न: बापदादा किन खज़ानों की रक्षा करने की शिक्षा देते हैं?
उत्तर: समय, ज्ञान, शक्तियाँ, गुण, शुभ संकल्प, ऊर्जा, श्वास और पवित्र बोल।
8. प्रश्न: व्यर्थ संकल्प का सबसे बड़ा नुकसान क्या है?
उत्तर: इससे समय, मानसिक शक्ति, आत्मिक स्थिति और आध्यात्मिक कमाई का नुकसान होता है।
9. प्रश्न: बोल (वाणी) को श्रेष्ठ बनाने का आधार क्या है?
उत्तर: प्रत्येक बोल में आत्मिक भाव, शुभ भावना और किसी आत्मा के कल्याण का सार होना चाहिए।
10. प्रश्न: बापदादा समय के महत्व पर इतना ज़ोर क्यों देते हैं?
उत्तर: क्योंकि संगमयुग का प्रत्येक क्षण अमूल्य है और यही भविष्य के भाग्य का आधार बनता है।
11. प्रश्न: संगमयुग में आत्मा को कौन-सी तीन महान प्राप्तियाँ मिलती हैं?
उत्तर:
- परमात्मा का वर्सा
- ईश्वरीय पढ़ाई
- प्रतिदिन मिलने वाले वरदान
12. प्रश्न: “जमा का खाता” किसे कहा गया है?
उत्तर: श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ कर्म, सेवा, योग और पवित्र जीवन द्वारा आत्मा में संचित आध्यात्मिक पूँजी को।
13. प्रश्न: बापदादा किस प्रकार का पुरुषार्थ चाहते हैं?
उत्तर: तीव्र पुरुषार्थ, जिसमें “करेंगे” नहीं बल्कि “अभी करेंगे” की भावना हो।
14. प्रश्न: “एवररेडी” बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: हर समय आत्मिक स्थिति में स्थिर रहना और किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रहना।
15. प्रश्न: लक्ष्मी-नारायण बनने का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: नम्बरवन, सम्पूर्ण, गुणवान और श्रेष्ठ पुरुषार्थी आत्मा बनना।
16. प्रश्न: बापदादा के अनुसार श्रेष्ठ बोल किसे कहा जाता है?
उत्तर: ऐसा बोल जो किसी आत्मा को शक्ति, प्रेरणा, शांति या लाभ प्रदान करे।
17. प्रश्न: व्यर्थ बोल किस खाते में जमा होते हैं?
उत्तर: वे आध्यात्मिक कमाई नहीं बढ़ाते, बल्कि व्यर्थ के खाते में चले जाते हैं।
18. प्रश्न: समय बचाने का सबसे आसान उपाय क्या है?
उत्तर: तीन बिन्दियों की स्मृति में रहना और व्यर्थ विचार, व्यर्थ बोल तथा बीती बातों को समाप्त करना।
19. प्रश्न: बापदादा आत्माओं को कौन-सी सबसे बड़ी जिम्मेदारी देते हैं?
उत्तर: स्वयं को सम्पूर्ण बनाना, समय का श्रेष्ठ उपयोग करना और विश्व-परिवर्तन के निमित्त बनना।
20. प्रश्न: इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: हर सेकण्ड, हर संकल्प और हर बोल को श्रेष्ठ बनाकर आत्मा का आध्यात्मिक खाता भरते चलो। “मैं आत्मा, मेरा बाबा और बीती को बिन्दी”—यही श्रेष्ठ जीवन का सरल सूत्र है।
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