AW.(21)16-06-1969 / हिंदी · “बड़े-से-बड़ा त्याग – अवगुणों का त्याग” “बड़े-से-बड़ा त्याग – अवगुणों का त्याग”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“बड़े-से-बड़ा त्याग – अवगुणों का त्याग”
सभी किस स्वरूप में बैठे हो? स्नेह रूप में बैठे हो या शक्तिरूप में बैठे हो? इस समय कौन सा रूप है? स्नेह में शक्ति रहती है। दोनों इकट्ठी रह सकती हैं? क्यों नहीं कहते हो दोनों रूप हैं। बापदादा के साथ स्नेह क्यों है? बापदादा से स्नेह इसलिए है कि जो शिवबाबा का मुख्य टाइटिल है उसमें आप समान होना है। मुख्य टाइटिल कौन सा है? (सर्वशक्तिमान) तो सिर्फ स्नेह जो होता है तो वह कभी टूट भी सकता है लेकिन स्नेह और शक्ति दोनों का जहाँ मिलाप होता है, वहाँ आत्मा और परमात्मा का मिलाप भी अविनाशी अमर रहता है। तो अपने इस मिलन को अविनाशी बनाने के लिये क्या साधन करना पड़ेगा? स्नेह और शक्ति दोनों का मिलाप अपने अन्दर करना पड़ेगा; तब कहेंगे आत्मा और परमात्मा का मिलाप। मेले में तो बैठे हो लेकिन कई मेले में बैठे हुए भी दोनों के मिलाप को भूल जाते हैं। अच्छा।
आज तो खास कुमारियों के प्रति ही आये हैं। आज कुमारियों का कौन सा दिन है? (मिलन दिन) रिजल्ट भी आप सभी की निकली हैं? अपने रिजल्ट को खुद जान सकती हो? त्रिकालदर्शी बनी हो? इस ग्रुप से नम्बरवन कुमारी कौन निकली है? (चन्द्रिका) नम्बरवन का मुख्य कर्तव्य है – अपने जैसा नम्बरवन बनाना। कुमारियों को तो अभी एक और पेपर देना है। वह पेपर प्रैक्टिकल का है, न कि लिखने का। अभी तो एक मास की ट्रेनिंग की रिजल्ट में नम्बरवन है। लेकिन फाइनल रिजल्ट में भी नम्बरवन आ सकती है। लेकिन उसके लिये कौन सी मुख्य बात बुद्धि में रखनी है? त्याग और सेवा तो है, एक और मुख्य बात है। सभी से बड़ा बलिदान कौन सा है और सभी से बड़ा त्याग कौन सा है? दूसरों के अवगुणों को त्याग करना – यह है बड़ा त्याग। सभी से बड़ी सेवा कौन सी है? जो श्रेष्ठ सेवाधारी होंगे – वह मुख्य कौन सी सेवा करेंगे? जो तीव्र पुरुषार्थी होंगे वह तीव्र पुरुषार्थ का सबूत क्या दिखायेंगे? कोई भी सामने आये तो एक सेकेण्ड में उनको मरजीवा बनाना। कहते हैं ना एक धक से मरजीवा बनना। जिसको झाटकू कहते हैं। अधूरा नहीं छोड़ना। श्रेष्ठ सेवा यह है जो उनको झट झाटकू बना देना। अभी तो आप तीर मारते हो, बाहर फिर जिन्दा हो जाते हैं। लेकिन ऐसा समय आना है जो एक सेकेण्ड में नज़र से निहाल कर देंगे तब सर्विस की सफलता और प्रभाव निकलेगा। अभी मरजीवा भल बनाते हो – झाटकू नहीं बनाते हो। दो बातों की कमी है। वह बातें आ जायें तो अपना रंग दूसरों को भी चढ़ा सकती हो। आप झाटकू बनी हो? (पुरुषार्थी हैं) कहाँ-कहाँ भूल होती रहे तो उनको पुरुषार्थी कहेंगे? प्रतिज्ञा यह करनी है – आज से हम झाटकू बन गये है फिर जिन्दा नहीं होंगे, पुरानी दुनिया में। हिम्मतवान को फिर मदद भी मिलती है। हिम्मत के कारण बापदादा का स्नेह रहता है। तो दो बातों की कमी बता रहे थे एक मुख्य कमी है एकान्तवासी कम हो। और दूसरी कमी है एकता में कम रहते हो। एकता और एकान्त में बहुत थोड़ा फर्क है। एकान्त स्थूल भी होती है, सूक्ष्म भी होती है। इसमें दोनों की आवश्यकता है। एकान्त के आनन्द के अनुभवी बन जायें तो फिर बाहरमुखता अच्छी नहीं लगेंगी। अभी बाहरमुखता में सभी का इन्ट्रेस्ट जास्ती जाता है। इन दो बातों की मैजारिटी में कमी है। अव्यक्त स्थिति को बढ़ाने के लिए इसकी बहुत आवश्यकता है। इससे ज्यादा एकान्त में रुचि रखनी है। कुमारियों को अब जाना है – प्रैक्टिकल कोर्स देने। अब कुमारियों को तीन सौगात देनी हैं। सौगात है स्नेह की निशानी। तो तीनों सम्बन्ध से तीन सौगात देते हैं। जो कभी भूलना नहीं है। बापदादा की सौगात सदा अपने साथ रखना। सौगात छिपाकर रखनी होती है ना। तो बाप के रूप में एक शिक्षा की सौगात याद रखना। क्या शिक्षा देते हैं कि सदैव बापदादा और जो निमित्त बनी हुई बहनें हैं और जो भी दैवी परिवार है उन सबसे आज्ञाकारी वफादार बनकर के चलना है, यह है बाप के रूप में शिक्षा की सौगात। और फिर टीचर के रूप में कौन सी शिक्षा की सौगात देते है? शिक्षा को ग्रहण किया जाता है ना। जहाँ भी जाओ तो टीचर के रूप में एक तो ज्ञान ग्रहण, दूसरा गुणग्राहक यह शिक्षा हमेशा याद रखना और गुरू के रूप से यही शिक्षा है सदैव एक मत होना है, एकरस और एक की ही याद में रहना। विष्णु को जो अलंकार दिखाये हैं वह अभी शक्तिरूप में धारण करने है। यह अलंकार सदैव अपने सामने रखो। यह है बाप टीचर और गुरू तीनों सम्बन्ध से शिक्षा की सौगात – खास कुमारियों प्रति। अब देखेंगे कौन-कौन इस सौगात को साथ रखते हैं।
वह लोग भी रिफाइन बॉम्बस बना रहे हैं ना। तुमको भी अब रिफाइन बॉम्बस गिराने हैं। चींटी मार्ग की सर्विस बहुत की। बम गिराने से झट सफाई हो जाती है। तो विशेष आवाज़ फैलाने की सर्विस करनी है, उसको बम गिराना कहते हैं। जितना जो रिफाइन होंगे उतना रिफाइन बम फेकेंगे औरों पर। अभी आलराउण्डर बनना है। जितना-जितना बनेंगी उतना-उतना नज़दीक आयेंगी सतयुगी परिवार के। आलराउण्ड चक्र लगाकर अपना शो दिखाना, तब है ट्रेनिंग की रिजल्ट। प्रैक्टिकल कोर्स के बाद फिर रिजल्ट देखेंगे। अभी फिर एक मास के बाद मधुबन में आओ तो अकेले नहीं आना है। अभी ट्रेनिंग पूरी नहीं है। प्रैक्टिकल अभी है। अकेला कोई को लौटना नहीं है। कोई न कोई का पण्डा बनकर आना है, यात्री ले आना है। बापदादा की इन कुमारियों में बहुत उम्मीद है। उम्मीदवार रत्नों को बापदादा नयनों में समाते हैं।
बड़े-से-बड़ा त्याग – अवगुणों का त्याग | स्नेह + शक्ति से आत्मा-परमात्मा का अविनाशी मिलाप | कुमारियों के लिए विशेष मुरली
Disclaimer
Disclaimer: यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन और आत्मिक चिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए विचार संबंधित मुरली के भावार्थ/आध्यात्मिक संदेश पर आधारित हैं। कृपया इसे व्यक्तिगत आत्मचिंतन एवं पुरुषार्थ के संदर्भ में लें।
मुरली नोट्स — मुख्य विषय
मुख्य संदेश:
सबसे बड़ा त्याग केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि दूसरों के अवगुणों को त्याग देना है। सच्चे तीव्र पुरुषार्थ की पहचान है—अपने अंदर स्नेह और शक्ति दोनों का संतुलन लाना तथा दूसरों को भी श्रेष्ठ जीवन की ओर प्रेरित करना।
- स्नेह + शक्ति: स्नेह में शक्ति समाई हुई है। जब स्नेह और शक्ति दोनों साथ रहते हैं, तब आत्मा और परमात्मा का मिलाप अविनाशी बनता है।
- सर्वशक्तिमान बनने का लक्ष्य: शिवबाबा के मुख्य टाइटिल “सर्वशक्तिमान” के समान बनने का पुरुषार्थ करना है।
- सबसे बड़ा त्याग: दूसरों के अवगुणों को देखना और उन्हें अपने संस्कारों में स्थान न देना।
- श्रेष्ठ सेवा: ऐसी सेवा करना जिससे आत्मा को एक सेकण्ड में श्रेष्ठ जीवन की ओर मोड़ने की प्रेरणा मिले।
- एकान्तवासी बनना: केवल बाहरी एकान्त नहीं, बल्कि मन-बुद्धि की अन्तर्मुखी अवस्था में रहना।
- एकता: दैवी परिवार में मतभेदों से ऊपर उठकर एकमत और एकरस रहने का अभ्यास।
- कुमारियों के लिए तीन सौगातें:
- बाप के रूप में: आज्ञाकारी और वफादार बनकर चलना।
- टीचर के रूप में: ज्ञान ग्रहण करना और गुणग्राही बनना।
- गुरु के रूप में: एक मत, एकरस और एक की याद में रहना।
- प्रैक्टिकल परीक्षा: केवल ज्ञान सुनना पर्याप्त नहीं; प्राप्त ज्ञान को जीवन में धारण करना ही वास्तविक रिजल्ट है।
- आलराउण्डर बनना: सेवा, स्व-परिवर्तन, एकता, एकान्त और शक्तिरूप—इन सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ना।
- मुख्य संकल्प: “आज से मैं पुरानी दुनिया और पुराने संस्कारों में वापस नहीं जाऊँगा/जाऊँगी।”
आज का आत्म-चिंतन
क्या मैं दूसरों की कमियाँ देखता हूँ या उनके गुण ग्रहण करता हूँ?
क्या मेरा स्नेह शक्ति से जुड़ा हुआ है?
क्या मैं एकान्त के आनंद का अनुभव करता हूँ?
क्या मेरी एकता परिस्थिति पर निर्भर है या आत्मिक स्थिति पर?
क्या मेरी सेवा दूसरों को वास्तविक परिवर्तन की ओर ले जा रही है?
याद रखने योग्य सार
“बड़े-से-बड़ा त्याग है—दूसरों के अवगुणों का त्याग।”
सच्चा पुरुषार्थ तब दिखाई देता है जब स्नेह शक्ति बने, एकान्त अन्तर्मुखता बने, एकता संस्कार बने और सेवा आत्म-परिवर्तन का माध्यम बने।
प्रश्न 1: इस समय हमें किस स्वरूप में बैठना है?
उत्तर: हमें स्नेह स्वरूप और शक्तिरूप—दोनों स्वरूपों में रहना है। स्नेह में शक्ति समाई हुई है।
प्रश्न 2: आत्मा और परमात्मा का अविनाशी मिलाप कैसे हो सकता है?
उत्तर: अपने अंदर स्नेह और शक्ति दोनों का मिलाप करने से आत्मा और परमात्मा का मिलाप अविनाशी बनता है।
प्रश्न 3: शिवबाबा का मुख्य टाइटिल कौन-सा है?
उत्तर: शिवबाबा का मुख्य टाइटिल “सर्वशक्तिमान” है। हमें भी अपने पुरुषार्थ द्वारा सर्वशक्तिमान बनने का लक्ष्य रखना है।
प्रश्न 4: सबसे बड़ा त्याग कौन-सा है?
उत्तर: सबसे बड़ा त्याग है—दूसरों के अवगुणों का त्याग करना। किसी के अवगुण को देखकर उसे अपने मन में धारण न करना ही श्रेष्ठ त्याग है।
प्रश्न 5: श्रेष्ठ सेवाधारी की मुख्य सेवा क्या है?
उत्तर: श्रेष्ठ सेवाधारी वह है जो दूसरों को शीघ्र श्रेष्ठ स्थिति में लाने का प्रयास करे और उन्हें पुराने संस्कारों से मुक्त होकर मरजीवा जीवन अपनाने की प्रेरणा दे।
प्रश्न 6: तीव्र पुरुषार्थ का सबूत क्या है?
उत्तर: तीव्र पुरुषार्थ का सबूत है—अपने परिवर्तन के साथ दूसरों को भी परिवर्तन की प्रेरणा देना और सेवा में सफलता प्राप्त करना।
प्रश्न 7: कुमारियों के लिए कौन-सी प्रतिज्ञा बताई गई?
उत्तर: प्रतिज्ञा करनी है कि आज से हम मरजीवा बन गए हैं और फिर पुरानी दुनिया तथा पुराने संस्कारों में वापस नहीं जाएंगे।
प्रश्न 8: कुमारियों में किन दो बातों की कमी बताई गई?
उत्तर: मुख्य रूप से दो बातों की कमी बताई गई—एकान्तवासी बनने में कमी और एकता में कमी।
प्रश्न 9: एकान्त कितने प्रकार का होता है?
उत्तर: एकान्त स्थूल भी होता है और सूक्ष्म भी। बाहरी शान्ति के साथ मन और बुद्धि की अन्तर्मुखी अवस्था भी आवश्यक है।
प्रश्न 10: एकान्त के आनंद का अनुभव होने पर क्या परिवर्तन आता है?
उत्तर: जब एकान्त के आनंद का अनुभव होने लगता है, तब बाहरमुखता अच्छी नहीं लगती और मन को अन्तर्मुखी रहने में रुचि होने लगती है।
प्रश्न 11: कुमारियों को बाप के रूप में कौन-सी सौगात दी गई?
उत्तर: बाप के रूप में शिक्षा की सौगात है—बापदादा, निमित्त बनी बहनों और पूरे दैवी परिवार के प्रति आज्ञाकारी और वफादार बनकर चलना।
प्रश्न 12: टीचर के रूप में कौन-सी सौगात दी गई?
उत्तर: टीचर के रूप में दो बातें याद रखनी हैं—ज्ञान ग्रहण करना और गुणग्राही बनना।
प्रश्न 13: गुरु के रूप में कौन-सी शिक्षा दी गई?
उत्तर: गुरु के रूप में शिक्षा है—एक मत, एकरस और एक की याद में रहना।
प्रश्न 14: विष्णु के अलंकारों का क्या महत्व बताया गया?
उत्तर: विष्णु के अलंकारों को केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि शक्तिरूप में धारण करने के लिए बताया गया है। उन्हें अपने सामने रखकर अपने जीवन में धारण करना है।
प्रश्न 15: “रिफाइन बम” से क्या संकेत दिया गया है?
उत्तर: इसका संकेत है कि अब सेवा को और प्रभावशाली तथा शक्तिशाली बनाना है। केवल धीरे-धीरे सेवा करने के बजाय ऐसा प्रभाव पैदा हो कि श्रेष्ठ ज्ञान और संदेश तेजी से अनेक आत्माओं तक पहुँचे।
प्रश्न 16: आलराउण्डर बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: आलराउण्डर बनने का अर्थ है—ज्ञान, योग, धारणा, सेवा, एकता, एकान्त और शक्तिरूप—सभी क्षेत्रों में संतुलित रूप से आगे बढ़ना।
प्रश्न 17: ट्रेनिंग की वास्तविक रिजल्ट क्या होगी?
उत्तर: वास्तविक रिजल्ट तब दिखाई देगी जब ज्ञान केवल सुनने तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन में धारण होकर सेवा और व्यवहार में दिखाई दे।
प्रश्न 18: बापदादा को कुमारियों से क्या उम्मीद है?
उत्तर: बापदादा को कुमारियों से बहुत उम्मीद है। उनसे आशा है कि वे स्वयं श्रेष्ठ बनेंगी और दूसरों को भी श्रेष्ठ बनाने की सेवा करेंगी।
प्रश्न 19: “उम्मीदवार रत्न” से क्या भाव है?
उत्तर: उम्मीदवार रत्न वे आत्माएँ हैं जिनमें श्रेष्ठ बनने की लगन, हिम्मत और पुरुषार्थ है। ऐसे रत्न बापदादा को बहुत प्रिय हैं।
प्रश्न 20: इस मुरली का सबसे मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस मुरली का मुख्य संदेश है—स्नेह को शक्ति से जोड़ो, दूसरों के अवगुणों का त्याग करो, एकान्त और एकता को अपनाओ तथा अपने जीवन से श्रेष्ठ सेवा का प्रमाण दो।

