AW.(03)16-02-1996/डायमंड जुबली वर्ष मेंडायमंड जुबली वर्ष में विशेष अटेंशन देकर”
“बापदादा के हाथ में बुद्धि रूपी हाथ हो तो परीक्षाओं रूपी सागर में हिलेंगे नहीं”
(दोपहर भोग के समय वतन का समाचार)
आज वतन में गई तो ब्रह्मा बाबा जैसे यहाँ मुलाकात करते थे वैसे वहाँ ब्रह्मा बाबा ने मुलाकात की। बाबा ने कहा बच्चों के भोजन के समय के अनुसार लेट आई हो। मैंने कहा – बाबा आपका तो एक डेढ बजे भोजन पान करने का समय था। बाबा ने कहा बाबा जब बच्चों के साथ भोजन खाता था तो बच्चों के टाइम भोजन खाता था। उस टाइम से लेट आई हो। फिर बाबा ने ब्रह्मा बाबा को कहा कि ले जाओ… क्या जाकर देखा कि जैसे यहाँ आफिस में कुर्सी पर बाबा आकर बैठता था, पत्र लिखता था तो वही कुर्सी, वही पैड, वही पेंसिल रखी थी। मैं तो हैरान हुई कि यह सभी चीजें वतन में कैसे आ गई। फिर बाबा ने हस्त लिखित पत्र मेरे को दिया। मैंने पढ़ा – जिसमें लिखा हुआ था:-
“स्वदर्शन चक्रधारी नूरे रत्नों याद-प्यार के बाद, आज अव्यक्त रूप से आप अव्यक्त स्थिति में स्थित हुए बच्चों से मिल रहे हैं।” दूसरे पेज में लिखा था – “बच्चे, जो बापदादा के साकार रूप से शिक्षायें मिली हैं उसका विस्तार करते रहना। अब न बिसरो न याद रहो। विदाई के बाद बाबा जैसे सही (हस्ताक्षर) डालते हैं वैसे डाली हुई थी। बाबा ने कहा हमने अपने समय पर पत्र भी लिखा फिर भोजन के लिए इंतजार कर रहे थे। फिर तो भोजन खिलाया। बाबा ने कहा – भल वतन में चीजें खाते हैं लेकिन यज्ञ के भोजन की रसना बहुत अच्छी है। फिर बाबा ने भोजन स्वीकार किया। जब हम आ रही थी – तो बाबा ने एक दृश्य दिखाया – एक सागर था जिसमें बहुत तेज लहरें चल रही थी। बाबा ने कहा आप इस सागर के बीच में जाओ। मैं घबराने लगी कि इतनी तेज लहरों में कैसे जाऊंगी। फिर बाबा की आज्ञा प्रमाण पांव डाला। जहाँ पाँव रखा वहाँ की लहर शान्त होती गई। फिर देखा कि बापदादा दोनों ने उसमें छोटी-छोटी नावें उस सागर के बीच में डाली लेकिन सागर की लहर आने से गायब हो गई। कोई तो लहर से इधर-उधर होती रही। कोई तो जैसी थी वैसे ही रही हम यह देखने में ही बिजी हो गई। फिर वह सीन खत्म हो गई। बापदादा ने कहा कि यह खेल बाप ने प्रैक्टिकल में रचा है। जिन बच्चों की जीवन रूपी नईया बाप के साथ में होगी वह हिलेगी नहीं। अभी तुम परीक्षाओं रूपी सागर के बीच में चल रहे हो। तो जिनका कनेक्शन अर्थात् जिनका हाथ बापदादा के हाथ में होगा उनकी यह जीवन रूपी नैया न हिलेगी न डूबेगी। तुम बच्चे इसको ड्रामा का खेल समझकर चलेंगे तो डगमग नहीं होंगे। और जिसका बुद्धि रूपी हाथ साथ ढीला होगा वह डोलते रहेंगे। इसलिए बच्चों को बुद्धि रूपी हाथ मजबूत रखने का खास ध्यान रखना है।
बापदादा के हाथ में बुद्धि रूपी हाथ हो तो परीक्षाओं रूपी सागर में हिलेंगे नहीं
मुरली नोट्स — दोपहर भोग के समय वतन का समाचार
मुरली प्रसंग: दोपहर भोग के समय वतन का समाचार
मुख्य विषय: बुद्धि का कनेक्शन बापदादा से मजबूत रखना
मुख्य संदेश: परीक्षाओं के सागर में वही जीवन-नैया स्थिर रहती है जिसका बुद्धि रूपी हाथ बापदादा के हाथ में है।
1. वतन में ब्रह्मा बाबा से मुलाकात
वतन में पहुँचने पर ब्रह्मा बाबा से उसी प्रकार मुलाकात हुई जैसे साकार रूप में बाबा यहाँ बच्चों से मुलाकात करते थे।
बाबा ने कहा कि तुम बच्चों के भोजन के समय के अनुसार थोड़ी देर से आई हो। फिर बाबा ने अपने साकार समय की दिनचर्या और बच्चों के साथ भोजन करने की भावना का स्मरण कराया।
सीख
बाबा का बच्चों के प्रति प्रेम केवल शिक्षाओं तक सीमित नहीं था। बच्चों के समय, उनकी स्थिति और उनकी आवश्यकताओं के प्रति बाबा की गहरी आत्मीयता थी।
मुरली नोट:
बाबा बच्चों के साथ भोजन करते थे तो बच्चों के समय के अनुसार ही भोजन करते थे।
इससे हमें समानता, आत्मीयता और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की शिक्षा मिलती है।
2. वही ऑफिस, वही कुर्सी और वही पेंसिल
बाबा ने ब्रह्मा बाबा को साथ ले जाने के लिए कहा। वहाँ जाकर ऐसा दृश्य दिखाई दिया जैसे साकार रूप में बाबा ऑफिस में कुर्सी पर बैठकर पत्र लिखा करते थे।
वही कुर्सी, पैड और पेंसिल रखी हुई थी।
यह दृश्य देखकर आश्चर्य हुआ कि वतन में साकार समय की इतनी सूक्ष्म स्मृतियाँ किस प्रकार दिखाई दे रही थीं।
फिर बाबा ने हस्तलिखित पत्र दिया।
पत्र में बच्चों के लिए प्रेम और विशेष स्मृति का संदेश था।
मुरली का मुख्य संदेश
“स्वदर्शन चक्रधारी नूरे रत्नों याद-प्यार के बाद, आज अव्यक्त रूप से आप अव्यक्त स्थिति में स्थित हुए बच्चों से मिल रहे हैं।”
दूसरे पेज पर बाबा ने बच्चों को साकार रूप में मिली शिक्षाओं को आगे बढ़ाने की प्रेरणा दी।
आज के लिए अर्थ
हमारे पास बाबा की शिक्षाएँ केवल पढ़ने के लिए नहीं हैं।
शिक्षाओं का विस्तार = उन्हें जीवन में प्रैक्टिकल करना।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमने कितनी मुरलियाँ पढ़ीं, बल्कि यह है:
- क्या हमारी बुद्धि बाबा की शिक्षाओं में स्थित रहती है?
- क्या परिस्थिति आने पर हम शिक्षा को याद करते हैं?
- क्या हम साकार बाबा की शिक्षाओं को अपने व्यवहार में ला रहे हैं?
3. यज्ञ के भोजन की विशेषता
बाबा ने कहा कि वतन में चीजें खाते हैं, लेकिन यज्ञ के भोजन की रसना बहुत अच्छी है।
इसके पीछे केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि यज्ञ, सेवा, पवित्रता और प्रेम की भावना को समझना है।
उदाहरण
एक ही भोजन दो व्यक्तियों को दिया जाए—एक व्यक्ति उसे केवल खाने की वस्तु समझकर ग्रहण करे और दूसरा उसे ईश्वरीय याद एवं प्रेम से स्वीकार करे।
बाहरी भोजन समान हो सकता है, लेकिन भावना उसकी अनुभूति को बदल देती है।
4. परीक्षाओं का सागर — एक अद्भुत दृश्य
जब वहाँ से वापस आने का समय हुआ, बाबा ने एक दृश्य दिखाया।
एक विशाल सागर था और उसमें बहुत तेज लहरें उठ रही थीं।
बाबा ने कहा:
“आप इस सागर के बीच में जाओ।”
इतनी तेज लहरों को देखकर भय उत्पन्न हुआ—ऐसी परिस्थितियों में बीच सागर में कैसे जाया जाए?
लेकिन बाबा की आज्ञा प्रमाण पाँव आगे बढ़ाया गया।
और अद्भुत दृश्य हुआ—
जहाँ पाँव रखा, वहाँ की लहरें शांत होती गईं।
5. जीवन रूपी नईया और परीक्षाओं का सागर
इसके बाद बापदादा ने उस सागर के बीच छोटी-छोटी नावें डालीं।
लहरें आईं तो:
- कुछ नावें गायब हो गईं।
- कुछ इधर-उधर डोलती रहीं।
- कुछ नावें जैसी थीं वैसी ही स्थिर रहीं।
यह दृश्य हमें हमारी जीवन रूपी नैया का चित्र दिखाता है।
बाबा की मुख्य शिक्षा
जिसकी जीवन रूपी नैया बाप के साथ है, वह हिलेगी नहीं।
आज हम भी परीक्षाओं रूपी सागर के बीच में चल रहे हैं। परिस्थितियाँ कभी शांत तो कभी बहुत तेज लहरों जैसी दिखाई दे सकती हैं।
लेकिन समस्या केवल लहरों की नहीं है।
मुख्य बात है—हमारा कनेक्शन किसके साथ है?
6. बुद्धि रूपी हाथ बापदादा के हाथ में
यह इस पूरे प्रसंग का सबसे शक्तिशाली संदेश है।
बापदादा के हाथ में बुद्धि रूपी हाथ।
इसका अर्थ है—
जब बुद्धि का संबंध बाबा से मजबूत होता है, तब परिस्थिति हमें अपनी दिशा से हटा नहीं सकती।
उदाहरण 1 — आलोचना
कोई हमारी आलोचना करता है।
कमजोर बुद्धि तुरंत प्रतिक्रिया देती है:
“मैं भी उसे जवाब दूँगा।”
लेकिन बाबा से जुड़ी बुद्धि सोचती है:
“मुझे अपनी स्थिति क्यों खराब करनी है? मुझे आत्मिक स्थिति में रहना है।”
लहर आई, लेकिन नैया नहीं डोली।
उदाहरण 2 — असफलता
किसी कार्य में सफलता नहीं मिली।
एक बुद्धि कहती है:
“मैं असफल हो गया।”
बाबा से जुड़ी बुद्धि कहती है:
“यह भी ड्रामा का एक दृश्य है। मुझे सीख लेकर आगे बढ़ना है।”
लहर आई, लेकिन नाव स्थिर रही।
उदाहरण 3 — अचानक परिस्थिति
जीवन में अचानक कोई कठिन परिस्थिति आती है।
यदि बुद्धि अकेले निर्णय करने लगे तो घबराहट बढ़ सकती है।
लेकिन यदि बुद्धि का हाथ बापदादा के हाथ में है तो अंदर से आवाज आती है:
“मैं अकेला नहीं हूँ। मेरा मार्गदर्शक मेरे साथ है।”
7. ड्रामा का खेल समझकर चलना
बापदादा ने विशेष रूप से समझाया कि इस पूरे खेल को ड्रामा का खेल समझकर चलना है।
ड्रामा समझने का अर्थ यह नहीं कि हम कर्म या पुरुषार्थ छोड़ दें।
इसका अर्थ है:
परिस्थिति को देखकर डगमगाना नहीं।
जो हो रहा है उसे समझते हुए अपने श्रेष्ठ कर्म और पुरुषार्थ पर ध्यान देना।
याद रखने योग्य सूत्र
परिस्थिति बड़ी हो सकती है, लेकिन बाबा से हमारा कनेक्शन उससे बड़ा होना चाहिए।
8. बुद्धि रूपी हाथ ढीला क्यों पड़ता है?
बाबा ने संकेत दिया कि जिसका बुद्धि रूपी हाथ साथ में ढीला होगा, वह डोलता रहेगा।
बुद्धि का हाथ ढीला होने के कुछ संकेत हैं:
- बार-बार नकारात्मक चिंतन करना।
- छोटी बात को बहुत बड़ा बना देना।
- दूसरों के व्यवहार से अपनी स्थिति बदल देना।
- परिस्थिति आते ही घबरा जाना।
- बाबा की शिक्षाओं को याद करने के बजाय समस्या को ही बार-बार देखना।
- आत्मिक स्थिति के बजाय देह-अभिमान में चले जाना।
अभ्यास
जब भी मन डोले, स्वयं से पूछें:
“इस समय मेरी बुद्धि का हाथ किसके हाथ में है?”
यदि उत्तर है—“परिस्थिति के हाथ में”, तो तुरंत बुद्धि को बाबा से जोड़ने का अभ्यास करें।
9. आज का विशेष पुरुषार्थ
आज का पुरुषार्थ केवल यह नहीं कि “मुश्किल परिस्थिति समाप्त हो जाए।”
बल्कि यह है:
“मुश्किल परिस्थिति में मेरी स्थिति मजबूत रहे।”
क्योंकि समुद्र को शांत करना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी नैया को मजबूत रखना हमारे पुरुषार्थ में है।
अमृतवेले का संकल्प
सुबह कुछ क्षण स्वयं से कहें:
“मैं आत्मा हूँ। बापदादा मेरा साथी और मार्गदर्शक है। मेरी बुद्धि का हाथ बापदादा के हाथ में है। परिस्थितियों की लहरें मुझे हिला नहीं सकतीं। मैं ड्रामा को साक्षी होकर देखते हुए श्रेष्ठ पुरुषार्थ करता हूँ।”
मुरली के मुख्य नोट्स — Quick Revision
- बापदादा के साथ बुद्धि का कनेक्शन मजबूत रखना है।
- परीक्षाओं का सागर आएगा, लेकिन हमें डगमगाना नहीं है।
- जीवन रूपी नैया को बाबा के साथ रखना है।
- परिस्थितियों को ड्रामा का खेल समझकर साक्षी भाव रखना है।
- साकार बाबा की शिक्षाओं को जीवन में प्रैक्टिकल करना है।
- बुद्धि रूपी हाथ ढीला नहीं होने देना है।
- लहरों को देखने के बजाय अपनी नैया की स्थिति पर ध्यान देना है।
- कनेक्शन मजबूत = स्थिति मजबूत।
“बापदादा के हाथ में बुद्धि रूपी हाथ हो तो परीक्षाओं के सागर में हिलेंगे नहीं | दोपहर भोग का वतन समाचार”
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Date Note
आपके दिए हुए पाठ में मुरली की मूल तारीख दिखाई नहीं गई है, इसलिए मैं बिना सत्यापन के कोई तारीख जोड़ना उचित नहीं समझूँगा। इसे प्रकाशित करने से पहले संबंधित दोपहर भोग/अव्यक्त वतन समाचार की मूल प्रति से तारीख मिलाना बेहतर होगा।
प्रश्न 1: बापदादा ने सागर का दृश्य क्यों दिखाया?
उत्तर: सागर परीक्षाओं और परिस्थितियों का प्रतीक था। तेज लहरें जीवन में आने वाली कठिनाइयों और उतार-चढ़ाव को दर्शाती हैं।
प्रश्न 2: सागर के बीच जाने पर लहरों के शांत होने का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि जब हम बापदादा की आज्ञा प्रमाण चलते हैं और बुद्धि का कनेक्शन बाबा से मजबूत रखते हैं, तो कठिन परिस्थितियों में भी हमारी स्थिति स्थिर रह सकती है।
प्रश्न 3: छोटी-छोटी नावें किसकी प्रतीक थीं?
उत्तर: नावें हमारी जीवन रूपी नैया की प्रतीक थीं। अलग-अलग नावों का हिलना, डोलना या स्थिर रहना हमारी आंतरिक स्थिति और बाबा से कनेक्शन को दर्शाता है।
प्रश्न 4: किन बच्चों की जीवन रूपी नैया नहीं हिलेगी?
उत्तर: जिन बच्चों की जीवन रूपी नैया बापदादा के साथ है और जिनकी बुद्धि का हाथ बापदादा के हाथ में मजबूत है, उनकी नैया न हिलेगी और न डूबेगी।
प्रश्न 5: “बुद्धि रूपी हाथ बापदादा के हाथ में” रखने का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है अपनी बुद्धि को बाबा की शिक्षाओं, याद और श्रीमत से जोड़कर रखना, ताकि परिस्थिति आने पर बुद्धि घबराने या भटकने के बजाय सही निर्णय ले सके।
प्रश्न 6: ड्रामा का खेल समझकर चलने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: ड्रामा को समझकर चलने से हम परिस्थितियों में डगमग नहीं होते। हम साक्षी होकर परिस्थिति को देखते हैं और अपना श्रेष्ठ पुरुषार्थ जारी रखते हैं।
प्रश्न 7: बुद्धि रूपी हाथ ढीला होने पर क्या होता है?
उत्तर: जब बाबा से बुद्धि का कनेक्शन कमजोर होता है, तो मनुष्य परिस्थितियों, व्यक्तियों और समस्याओं से प्रभावित होकर बार-बार डोलता रहता है।
प्रश्न 8: साकार बाबा की शिक्षाओं के बारे में क्या विशेष संदेश दिया गया?
उत्तर: साकार रूप से मिली शिक्षाओं का केवल स्मरण नहीं करना है, बल्कि उनका विस्तार करते हुए उन्हें अपने जीवन में प्रैक्टिकल करना है।
प्रश्न 9: यज्ञ के भोजन की विशेषता क्या बताई गई?
उत्तर: बाबा ने कहा कि वतन में चीजें खाते हैं, लेकिन यज्ञ के भोजन की रसना बहुत अच्छी है। इसमें यज्ञ के भोजन के प्रति विशेष प्रेम और भावना का संकेत मिलता है।
प्रश्न 10: इस पूरे वतन समाचार की मुख्य शिक्षा क्या है?
उत्तर: चाहे परीक्षाओं का सागर कितना भी तेज क्यों न हो, यदि हमारी बुद्धि का हाथ बापदादा के हाथ में मजबूत है, तो हमारी जीवन रूपी नैया डगमग नहीं होगी।
प्रश्न 11: जब जीवन में कोई बड़ी परेशानी आए तो हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर: घबराने या परिस्थिति को बार-बार सोचने के बजाय बाबा को याद करके अपनी बुद्धि को उनसे जोड़ना चाहिए और ड्रामा को साक्षी होकर देखते हुए श्रेष्ठ पुरुषार्थ करना चाहिए।
प्रश्न 12: इस संदेश को एक वाक्य में कैसे याद रखें?
उत्तर:
“लहरें चाहे कितनी भी तेज हों, बापदादा से बुद्धि का कनेक्शन मजबूत हो तो जीवन रूपी नैया स्थिर रहती है।”
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