AW.(18)11-06-1970/विश्वपति बनने की सामग्री
“विश्वपति बनने की सामग्री”
आज सतगुरूवार के दिवस किसलिए विशेष बुलाया है? आज कुमारियों का कौन सा दिवस है? (समाप्ति समारोह) समाप्ति समारोह नहीं है, लेकिन आज का सतगुरूवार का दिन विश्वपति बनने की शुभ अविनाशी दशा बैठने का दिवस है। समझा। तो आज बापदादा विश्वपति बनाने की क्या सामग्री लाये होंगे? जब कोई समारोह होता है तो उसमें सामग्री भी होती है। तो आज विश्वपति बनाने के समारोह में विशेष क्या सामग्री लाये हैं? ताज, तख्त और तिलक। फिर इन तीनों को धारण करने की हिम्मत है? ताज को धारण करने लिए तख्त पर विराज़मान होने के लिए और तिलक को धारण करने के लिए क्या करना पड़ेगा? अगर यह धारण करने की हिम्मत है तो उसके लिए क्या करना पड़ेगा? एक तो त्याग, दूसरा तपस्या और सेवा। तिलक को धारण करने के लिये तपस्या और ताज को धारण करने लिये त्याग और तख्त पर विराज़मान होने के लिए जितनी सेवा करेंगे उतना अब भी तख्त नशीन और भविष्य में भी तख्त नशीन बनेंगे। इन तीनों बातों से ही तीनों चीजें धारण कर सकेंगे। अगर एक भी धारणा कम है तो फिर विश्वपति नहीं बन सकेंगे। समझा। तो इन तीनों गुणों की अपने में सम्पूर्ण धारणा की है? तीनों में से एक भी छूटे नहीं तब शूरवीर का जो नाम दिया है वह कार्य कर सकेंगी? तीनों की प्रतिज्ञा की है? त्याग किसका करेंगे? सभी से बड़े से बड़ा त्याग क्या है? अब सर्विस पर उपस्थित हो रही हो तो उसके लिए मुख्य यही धारण रखना है कि मैं पन का त्याग। मैंने किया, मैं यह जानती हूँ, मैं यह कर सकती हूँ, यह-मैं पन का जो अभिमान है उसका त्याग करना है। मैं के बजाय बापदादा की सुनाई हुई ज्ञान की बातों को वर्णन करो। मैं यह जानती हूँ, नहीं। बापदादा द्वारा यह जाना है। ज्ञान में चलने के बाद जो स्व अभिमान आ जाता है, उसका भी त्याग। जब इतनी त्याग की वृत्ति और दृष्टि होगी तब सदैव स्मृति में बाप और दादा रहेगा और मुख पर भी यही बोल रहेंगे। समझा। तब विश्वपति बन सकेंगी। विश्व की सर्विस कर सकेंगी।
अपनी धारणा को अविनाशी बनाने के लिए वा सदा कायम रखने के लिए दो बातें याद रखनी हैं। कौन सी? विशेष कन्याओं के लिए हैं। एक तो सभी बातों में सिम्पुल रहना और अपने को सैम्पल समझना। जैसे आप सैम्पल बन दिखायेंगी वैसे ही अनेक आत्मायें भी यह सौदा करने के लिए पात्र बनेंगी। इसलिए यह दो बातें सदैव याद रखो। अपने को ऐसा श्रेष्ठ सैम्पुल बनाया है? जो अच्छा सैम्पुल निकलता है उनको फिर छाप भी लगाई जाती है। आप कौन सी छाप लगाकर जायेंगी, जो कभी मिटे नहीं? शिव-शक्तियां और ब्रह्माकुमारियां। साकार में दो निमित्त बनी हुई बड़ी अथॉर्टी यह छाप लगा रही हैं। इसलिए यह याद रखना कि मिटेंगे लेकिन कब हटेंगे नहीं। संस्कारों में, चाहे सर्विस में, चाहे सम्बन्ध में सर्व बातों में अपने को मिटायेंगे लेकिन हटेंगे नहीं। हटना कमजोरों का काम है। शिवशक्तियां अपने को मिटाती हैं न कि हटती हैं। तो यह बातें याद रखनी हैं। फिर इस ग्रुप का प्रैक्टिकल पेपर कब होगा? अभी का रिजल्ट फाइनल का नहीं है। अभी तो पेपर देने के लिये जा रहे हो। फिर उसकी रिजल्ट देखेंगे। यह ग्रुप आगे कदम बढ़ा सकता है। बापदादा ऐसी उम्मीद रखते हैं। इसलिए अब ऐसा समझो कि जो भी कर्मबन्धन है उसको बहुत जल्दी काटकर फिर मधुबन में सम्पूर्ण समर्पण का समारोह मनाने आना है। इस लक्ष्य से जाना है। फिर इस ग्रुप से कितनों का सम्पूर्ण समर्पण का समारोह होता है। आज तो महाबली बनने की बातें सुनाई हैं। फिर महाबली चढ़ने लिए आयेंगे तो बाप-दादा खूब सज़ायेंगे। सजाकर फिर स्वाहा करना होता है। जितना बाप-दादा के स्नेही हो उतना फिर सहयोगी भी बनना है। सहयोगी तब बनेंगे जब अपने में सर्व शक्तियों को धारण करेंगे। फिर स्वाहा होना सहज होगा। जो भी कोई शक्ति की कमी हो तो वह आज के दिन ही अपने में भरकर जाना। कोई भी कमी साथ ले न जाना। अभी सिर्फ हिसाब-किताब चुक्तू करने जाते हो। सर्व शक्तियां अपने में भरकर जायेंगे तब तो चुक्तू कर सकेंगे ना। तो अब फाइनल पेपर के नम्बर्स तो जब प्रैक्टिकल कर दिखायेंगे तब निकलेंगे।
1. आज का दिन विशेष क्यों है?
बापदादा समझाते हैं कि यह केवल किसी समारोह की समाप्ति का दिन नहीं, बल्कि विश्वपति बनने की शुभ, अविनाशी दशा को धारण करने का दिन है।
जब कोई विशेष समारोह होता है तो उसके लिए विशेष सामग्री भी होती है। इसी प्रकार विश्वपति बनने के समारोह की मुख्य सामग्री है:
ताज — त्याग
तिलक — तपस्या
तख्त — सेवा
इन तीनों को जीवन में धारण करने के लिए हिम्मत और दृढ़ता चाहिए। तीनों में से किसी एक की कमी भी सम्पूर्णता में बाधा बन सकती है। उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति बहुत अच्छी सेवा करता है, लेकिन त्याग नहीं है, तो सेवा में सूक्ष्म अहंकार आ सकता है।
यदि त्याग है लेकिन तपस्या कमजोर है, तो परिस्थितियों में मन डगमगा सकता है।
यदि तपस्या और त्याग हैं लेकिन सेवा नहीं है, तो प्राप्त शक्तियों का विश्व-कल्याण में प्रयोग कम हो जाता है।
इसलिए तीनों का संतुलन आवश्यक है।
2. ताज, तख्त और तिलक की गहराई
ताज — त्याग की निशानी
ताज धारण करने के लिए सबसे बड़ा त्याग किसका करना है?
मुरली विशेष रूप से “मैं-पन” के त्याग की ओर ध्यान दिलाती है।
“मैंने किया।”
“मैं यह जानती हूँ।”
“मैं यह कर सकती हूँ।”
इन संकल्पों के पीछे छिपे हुए सूक्ष्म अभिमान को पहचानना है।
इसके स्थान पर भावना हो:
“बापदादा द्वारा यह जाना है।”
ज्ञान प्राप्त होने के बाद ज्ञान का भी अभिमान आ जाए, तो वह भी सूक्ष्म “मैं-पन” बन सकता है। इसलिए सच्चा त्याग केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि अहंकार और स्व-अभिमान का त्याग है।
आज का अभ्यास
जब कोई आपकी सेवा की प्रशंसा करे, तो मन में देखें:
“मैंने किया” या
“बाप ने निमित्त बनाया और सेवा कराई।”
यही दृष्टि “मैं-पन” को कम करने में मदद करती है।
3. 🪷 तिलक — तपस्या
तिलक केवल माथे पर लगाने की वस्तु नहीं, बल्कि श्रेष्ठ स्मृति और तपस्या की निशानी है।
तपस्या अर्थात् परिस्थितियों के बीच भी अपनी श्रेष्ठ स्थिति को कायम रखना।
तपस्या का अर्थ
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मन को व्यर्थ संकल्पों से बचाना।
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परिस्थितियों में स्थिर रहना।
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देह-अभिमान से ऊपर उठना।
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बाप की स्मृति को प्राथमिकता देना।
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संकल्प, वाणी और कर्म में पवित्रता रखना।
उदाहरण
किसी ने आपकी बात नहीं मानी।
सामान्य प्रतिक्रिया हो सकती है:
“मेरी बात क्यों नहीं मानी?”
तपस्या की स्थिति पूछेगी:
“इस परिस्थिति में मुझे अपनी आत्मिक स्थिति कैसे कायम रखनी है?”
यही अभ्यास तिलक को स्थायी बनाता है।
4. तख्त — सेवा
मुरली में सेवा को तख्त से जोड़ा गया है। जितनी सेवा करेंगे, उतना ही वर्तमान में भी और भविष्य में भी तख्तनशीन बनने का अधिकार प्राप्त करेंगे।
लेकिन सेवा का अर्थ केवल बाहरी कार्य करना नहीं है।
सच्ची सेवा में शामिल हैं:
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मन से शुभ संकल्प देना।
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वाणी से ज्ञान देना।
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कर्म से श्रेष्ठ उदाहरण बनना।
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अपने श्रेष्ठ जीवन द्वारा दूसरों को प्रेरणा देना।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति रोज़ ज्ञान की बातें सुनाता है लेकिन अपने व्यवहार में क्रोध, अभिमान और असन्तुष्टता दिखाता है, तो उसकी वाणी की सेवा कमजोर पड़ जाती है।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति कम बोलकर भी अपने जीवन से शान्ति, प्रेम और शक्ति का अनुभव कराता है, वह सैम्पल बनकर सेवा करता है।
5. सबसे बड़ा त्याग — “मैं-पन” का त्याग
यह इस मुरली का अत्यन्त महत्वपूर्ण बिंदु है।
ज्ञान में आगे बढ़ने के बाद एक नया खतरा उत्पन्न हो सकता है—ज्ञान का अभिमान।
पहले व्यक्ति कहता था:
“मुझे कुछ नहीं आता।”
ज्ञान मिलने के बाद कह सकता है:
“मुझे सब पता है।”
यहीं से सूक्ष्म “मैं-पन” प्रारम्भ हो सकता है।
इसलिए श्रेष्ठ स्थिति यह है:
“मैं जानती हूँ” के बजाय — “बापदादा ने मुझे यह ज्ञान दिया है।”
“मैंने सेवा की” के बजाय — “मुझे सेवा के लिए निमित्त बनाया गया।”
“मैंने परिवर्तन किया” के बजाय — “परिवर्तन की शक्ति परमात्मा से मिली।”
यही वास्तविक त्याग है।
6. सदा “सैम्पल” बनो
मुरली में कन्याओं के लिए दो विशेष बातें याद रखने को कही गई हैं:
1. सिम्पुल रहना
2. सैम्पल बनना
अर्थात् जीवन को इतना सरल और श्रेष्ठ बनाना कि दूसरे आपको देखकर प्रेरित हों।
सैम्पल का अर्थ:
जो स्वयं करके दिखाए और जिसके जीवन को देखकर दूसरा भी वही अपनाने के लिए प्रेरित हो।
उदाहरण
यदि आप किसी को कहते हैं:
“क्रोध मत करो।”
लेकिन स्वयं छोटी बात पर क्रोधित हो जाते हैं, तो आपकी शिक्षा का प्रभाव कम होगा।
लेकिन यदि परिस्थिति कठिन होने पर भी आप शान्त रहते हैं, तो बिना बोले आपकी प्रैक्टिकल सेवा हो जाती है।
बापदादा की शिक्षाओं में “सैम्पल” बनने की भावना अन्य अव्यक्त मुरलियों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
7. कौन-सी छाप लगाकर जाना है?
मुरली में बहुत सुंदर रूपक है—छाप।
ऐसी छाप लगनी चाहिए जो कभी मिटे नहीं:
“शिव-शक्तियां”
“ब्रह्माकुमारियां”
अर्थात् अपने संस्कारों, सम्बन्धों और सेवा में ऐसी श्रेष्ठता छोड़कर जाना कि आपकी पहचान आपके श्रेष्ठ कर्मों से हो।
इसके लिए एक गहरी बात कही गई है:
मिटना है, लेकिन हटना नहीं है।
संस्कारों में मिटना।
अहंकार में मिटना।
कमजोरियों में मिटना।
लेकिन सेवा से हटना नहीं, लक्ष्य से हटना नहीं, बाप की स्मृति से हटना नहीं।
सरल सूत्र
कमजोरी को मिटाओ — जिम्मेदारी को नहीं।
अहंकार को मिटाओ — स्वमान को नहीं।
देह-अभिमान को मिटाओ — सेवा को नहीं।
8. “हटेंगे नहीं” — शूरवीर की निशानी
कमजोर व्यक्ति परिस्थिति देखकर हट सकता है।
लेकिन शिव-शक्ति का अर्थ है:
परिस्थिति आए → स्थिति नहीं बदले।
विरोध आए → सेवा नहीं छूटे।
प्रशंसा मिले → अभिमान नहीं आए।
अपमान मिले → आत्म-सम्मान नहीं जाए।
यही शूरवीरता है।
9. अभी फाइनल रिजल्ट नहीं है
बापदादा संकेत देते हैं कि अभी केवल पढ़ाई सुन लेना या प्रतिज्ञा कर लेना ही अंतिम रिजल्ट नहीं है।
प्रैक्टिकल पेपर अभी बाकी है।
इसलिए वास्तविक परीक्षा कहाँ होगी?
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सम्बन्धों में
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सेवा में
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संस्कारों में
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परिस्थितियों में
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कर्मबन्धनों में
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मन की स्थिति में
उदाहरण
मुरली सुनते समय कहना आसान है:
“मैं शांत आत्मा हूँ।”
लेकिन जब कोई विरोध करे और तब भी शान्त रहना—यह प्रैक्टिकल पेपर है।
सेवा में सब साथ दें और तब सहयोग करना आसान है।
लेकिन सहयोग न मिलने पर भी शुभ भावना रखना—यह प्रैक्टिकल पेपर है।
10. कर्मबन्धन जल्दी समाप्त करने का लक्ष्य
मुरली का आह्वान है कि कर्मबन्धनों को शीघ्र समाप्त कर सम्पूर्ण समर्पण की स्थिति की ओर बढ़ना है।
इसलिए लक्ष्य केवल यह नहीं कि:
“मैं अच्छा अभ्यास कर रही हूँ।”
बल्कि लक्ष्य है:
“मुझे सम्पूर्ण बनना है।”
जो भी कमी दिखाई दे, उसे साथ लेकर आगे नहीं जाना है।
आत्म-चेक
आज स्वयं से पूछें:
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मेरे अंदर कौन-सा अभिमान अभी बाकी है?
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मेरी कौन-सी शक्ति कमजोर है?
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कौन-सा संस्कार बार-बार सेवा में बाधा डालता है?
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क्या मैं परिस्थिति में अपनी स्थिति कायम रखती हूँ?
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क्या मेरी वाणी से ज्यादा मेरा जीवन सेवा करता है?
11. सर्व शक्तियां भरकर जाना
मुरली का अंतिम भाव बहुत शक्तिशाली है:
कोई भी कमी साथ लेकर नहीं जाना है।
यदि कोई शक्ति कम है तो उसी समय उसे अपने अंदर भरने का पुरुषार्थ करना है।
क्योंकि कर्मबन्धनों का हिसाब-किताब चुकता करने के लिए सर्व शक्तियों का धारण करना आवश्यक है।
आज की शक्ति-स्मृति
मैं आत्मा हूँ।
मैं बाप की संतान हूँ।
मैं निमित्त हूँ।
मैं शूरवीर हूँ।
मैं परिस्थितियों में अपनी श्रेष्ठ स्थिति नहीं छोड़ूँगी।
मैं “मैं-पन” को त्यागकर बाप की याद में सेवा करूँगी।
12. पूरे अध्याय का सार — “3T Formula”
याद रखने के लिए मुरली की तीन मुख्य सामग्री को इस प्रकार रखें:
| सामग्री | आन्तरिक अर्थ | अभ्यास |
|---|---|---|
| 👑 ताज | त्याग | “मैं-पन” का त्याग |
| 🪷 तिलक | तपस्या | श्रेष्ठ स्मृति और स्थिति |
| 🏛️ तख्त | सेवा | विश्व-कल्याण के लिए निमित्त बनना |
एक लाइन का सूत्र:
त्याग से ताज, तपस्या से तिलक और सेवा से तख्त।
और तीनों में से एक भी धारणा कम नहीं होनी चाहिए।
13. आज के लिए Practical Murli NotesMurli Notes — 11-06-1970
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विश्वपति बनने की सामग्री — ताज, तख्त और तिलक।
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ताज = त्याग।
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तिलक = तपस्या।
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तख्त = सेवा।
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सबसे बड़ा त्याग — “मैं-पन” का त्याग।
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ज्ञान के बाद आने वाले सूक्ष्म अभिमान से सावधान।
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“मैं जानती हूँ” के बजाय — “बापदादा द्वारा यह जाना है।”
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जीवन को सिम्पुल और सैम्पल बनाना है।
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ऐसी श्रेष्ठ छाप छोड़नी है जो मिटे नहीं।
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मिटना है, हटना नहीं है।
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वर्तमान का प्रैक्टिकल पेपर ही भविष्य का रिजल्ट तय करेगा।
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कर्मबन्धनों का हिसाब-किताब चुक्तू करना है।
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कोई भी कमजोरी साथ लेकर नहीं जानी है।
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सर्व शक्तियों को धारण करके शूरवीर बनना है।
मुरली की मूल तारीख 11 जून 1970 की पुष्टि उपलब्ध अव्यक्त-मुरली रिकॉर्ड और ब्रह्माकुमारीज़ के मुरली विषय-संग्रह दोनों से होती है।
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विश्वपति, अव्यक्त मुरली, बापदादा, 11 जून 1970, ताज तख्त तिलक, त्याग तपस्या सेवा, ब्रह्माकुमारी, शिव शक्ति, मुरली ज्ञान, BK Murli, BapDada, विश्वपति बनने की सामग्री, राजयोग, आध्यात्मिक ज्ञान, ओम शांति,Vishwapati, Avyakt Murli, BapDada, June 11, 1970, Taj Takht Tilak, Renunciation Tapasya Seva, Brahma Kumari, Shiv Shakti, Murli Gyan, BK Murli, BapDada, Materials to become Vishwapati, Rajyoga, Spiritual Knowledge, Om Shanti,

