अव्यक्त मुरली-(31)26-04-1984 “रुहानी विचित्र मेले में सर्व खज़ानों की प्राप्ति”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
26-04-1984 “रुहानी विचित्र मेले में सर्व खज़ानों की प्राप्ति”
आज बापदादा बच्चों के मिलन की लगन को देख रहे हैं। सभी दूर-दूर से किसलिए आये हैं? मिलन मनाने के लिए अर्थात् मेले में आये हैं। यह रुहानी मेला विचित्र मेला है। इस मेले का मिलना भी विचित्र है और विचित्र आत्मायें विचित्र बाप से मिलती हैं। यह सागर और नदियों को मेला है। ईश्वरीय परिवार के मिलने का मेला है। यह मेला एक बार के मेले से अनेक बार की सर्व प्राप्ति करने का मेला है। इस मेले में खुले भण्डार, खुले खजाने हैं। जिसको जो खजाना चाहिए, जितना चाहिए उतना बिगर खर्चे के, अधिकार से ले सकते हैं। लॉटरी भी है। जितनी भाग्य की श्रेष्ठ लॉटरी लेने चाहे उतनी ले सकते हैं। अभी लॉटरी लो और पीछे नम्बर निकलेगा, ऐसा नहीं है। अभी जो लेना हो, जितनी भी लकीर भाग्य की दृढ़ संकल्प द्वारा खींचने चाहो उतनी खींच सकते हो। सेकेण्ड में लॉटरी ले सकते हो। इस मेले में जन्म-जन्म के लिए राज्य पद का अधिकार ले सकते हो अर्थात् इस मेले में राजयोगी सो जन्म-जन्म के विश्व के राजे बन सकते हो। जितनी बड़ी प्राप्ति की सीट चाहिए वह सीट बुक कर सकते हो। इस मेले में विशेष सभी को एक गोल्डन चांस भी मिलता है। वह गोल्डन चांस है – “दिल से मेरा बाबा कहो और बाप के दिलतख्तनशीन बनो।” इस मेले में एक विशेष गिफ्ट भी मिलती है – वह गिफ्ट है “छोटा-सा सुखी और सम्पन्न संसार।” जिस संसार में जो चाहो सब सदा ही प्राप्त है। वह छोटा-सा संसार, बाप में ही संसार है। इस संसार में रहने वाला सदा ही प्राप्तियों के, खुशियों के अलौकिक झूलों में झूलता है। इस संसार में रहने वाले सदा इस देह की मिट्टी के मैले-पन के ऊपर फरिश्ता बन उड़ती कला में उड़ते रहते हैं। सदा रत्नों से खेलते पत्थर बुद्धि और पत्थरों से पार रहते हैं। सदा परमात्म साथ का अनुभव करते हैं। तुम्हीं से खाऊं, तुम्ही से सुनूँ, तुम्हीं से बोलूँ, तुम्हीं से सर्व सम्बन्ध की प्रीत की रीति निभाऊं, तुम्हारी ही श्रीमत पर, आज्ञा पर हर कदम उठाऊं। यही उमंग-उत्साह के, खुशी के गीत गाते रहते हैं। ऐसा संसार इस मिलन मेले में मिलता है। बाप मिला, संसार मिला – ऐसा यह श्रेष्ठ मेला है। तो ऐसे मेले में आये हो ना! ऐसा न हो कि मेला देखते-देखते एक ही प्राप्ति में इतने मस्त हो जाओ जो सर्व प्राप्तियाँ रह जायें। इस रुहानी मेले में सर्व प्राप्ति करके जाना है। बहुत मिला, इसमें ही खुश होकर चले जाओ, ऐसे नहीं करना। पूरा चक्र करके जाना। अभी भी चेक करो कि मेले की सर्व प्राप्तियाँ प्राप्त कीं? जब खुला खजाना है तो सम्पन्न होकर ही जाना। फिर वहाँ जाकर ऐसे नहीं कहना कि यह भी करना था। जितना चाहिए था उतना नहीं किया। ऐसे तो नहीं कहेंगे ना? तो समझा, इस मेले का महत्व? मेला मनाना अर्थात् महान बनना। सिर्फ आना और जाना नहीं है। लेकिन सम्पन्न प्राप्ति स्वरुप बनना है। ऐसा मेला मनाया है? निमित्त सेवाधारी क्या समझते हैं? वृद्धि, विधि को भी चेन्ज करती हैं। वृद्धि होना भी जरुरी है और हर विधि में सम्पन्न और सन्तुष्ट रहना भी जरुरी है। अभी तो फिर भी बाप और बच्चे के सम्बन्ध से मिलते हो। समीप आते हो। फिर तो दर्शन मात्र रह जायेंगे। अच्छा।
सभी रुहानी मिलन मेला मनाने वाले, सर्व प्राप्तियों का सम्पूर्ण अधिकार पाने वाले, सदा सुखमय सम्पन्न संसार अपनाने वाले, सदा प्राप्तियों के, खुशियों के गीत गाने वाले, ऐसे सदा श्रेष्ठ मत पर चलने वाले, आज्ञाकारी सुपात्र बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
टीचर्स से:- सदा याद और सेवा का बैलेन्स रखने वाली और सदा बाप की ब्लैसिंग लेने वाली। जहाँ बैलेन्स है वहाँ बाप द्वारा स्वत: ही आशीर्वाद तो क्या वरदान प्राप्त होते हैं। जहाँ बैलेन्स नहीं वहाँ वरदान भी नहीं। और जहाँ वरदान नहीं होगा वहाँ मेहनत करनी पड़ेगी। वरदान प्राप्त हो रहे हैं अर्थात् सर्व प्राप्तियाँ सहज हो रही हैं। ऐसे वरदानों को प्राप्त करने वाले सेवाधारी हो ना। सदा एक बाप, एकरस स्थिति और एकमत होकर के चलने वाले। ऐसा ग्रुप है ना। जहाँ एकमत है वहाँ सदा ही सफलता है। तो सदा हर कदम में बाप वरदाता द्वारा वरदान प्राप्त करने वाले। ऐसे सच्चे सेवाधारी। सदा अपने को डबल लाइट समझकर सेवा करते रहो। जितना हल्के उतना सेवा में हल्कापन। और जितना सेवा में हल्कापन आयेगा उतना सभी सहज उड़ेंगे, उड़ायेंगे। डबल लाइट बन सेवा करना, याद में रहकर सेवा करना यही सफलता का आधार है। उस सेवा का प्रत्यक्ष फल मिलता ही है।
पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-
संगमयुग सदा सर्व प्राप्ति करने का युग है। संगमयुग श्रेष्ठ बनने और बनाने का युग है। ऐसे युग में पार्ट बजाने वाली आत्मायें कितनी श्रेष्ठ हो गई! तो सदा यह स्मृति रहती है कि हम संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें हैं? सर्व प्राप्तियों का अनुभव होता है? जो बाप से प्राप्ति होती है उस प्राप्ति के अधार पर सदा स्वयं को सम्पन्न, भरपूर आत्मा समझते हो? इतना भरपूर हो जो स्वयं भी खाते रहो और दूसरों को भी बांटो। जैसे बाप के लिए कहा जाता है भण्डारे भरपूर हैं, ऐसे आप बच्चों का भी सदा भण्डारा भरपूर है। कभी खाली नहीं हो सकता। जितना किसी को देंगे उतना और ही बढ़ता जयेगा। जो संगमयुग की विशेषता है वो आपकी विशेषता है। हम संगमयुगी सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मायें हैं, इसी स्मृति में रहो। संगमयुग पुरुषोत्तम युग है, इस युग में पार्ट बजाने वाले भी पुरुषोत्तम हुए ना। दुनिया की सर्व आत्मायें आपके आगे साधारण हैं, आप अलौकिक और न्यारी आत्मायें हो! वह अज्ञानी हैं, आप ज्ञानी हो। वह शूद्र हैं, आप ब्राह्मण हो। वह दु:खधाम वाले हैं और आप संगमयुग वाले हो। संगमयुग भी सुखधाम है। कितने दु:खों से बच गये हो। अभी साक्षी होकर देखते हो कि दुनिया कितनी दु:खी है और उनकी भेंट में आप कितने सुखी हो। फ़र्क मालूम होता है ना! तो सदा हम पुरुषोत्तम युग की पुरुषोत्तम आत्मायें, सुख स्वरुप श्रेष्ठ आत्मायें हैं, इसी स्मृति में रहो। अगर सुख नहीं, श्रेष्ठता नहीं तो जीवन नहीं।
2. सदा याद की खुशी में रहते हो ना? खुशी ही सबसे बड़े ते बड़ी दुआ और दवा है। सदा यह खुशी की दवा और दुआ लेते रहो, तो सदा खुश होने के कारण शरीर का हिसाब-किताब भी अपनी तरफ खींचेगा नहीं। न्यारे और प्यारे होकर शरीर का हिसाब-किताब चुक्तू करेंगे। कितना भी कड़ा कर्मभोग हो, वह भी सूली से कांटा हो जाता है। कोई बड़ी बात नहीं लगती। समझ मिल गई यह हिसाब-किताब है तो खुशी-खुशी से हिसाब-किताब चुक्तू करने वाले के लिए सब सहज हो जाता है। अज्ञानी हाय-हाय करेंगे और ज्ञानी सदा वाह मीठा बाबा! वाह ड्रामा! की स्मृति में रहेंगे। सदा खुशी के गीत गाओ। बस यही याद करो कि जीवन में पाना था वह पा लिया। जो प्राप्ति चाहिए वह सब हो गई। सर्व प्राप्ति के भरपूर भण्डार हैं। जहाँ सदा भण्डारा भरपूर है वहाँ दु:ख दर्द सब समाप्त हो जाते हैं। सदा अपने भाग्य को देख हर्षित होते रहो – वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य! यही सदा मन में गीत गाते रहो। कितना बड़ा आपका भाग्य है। दुनिया वालों को तो भाग्य में सन्तान मिलेगा, धन मिलेगा, सम्पत्ति मिलेगी लेकिन यहाँ क्या मिलता? स्वयं भाग्य विधाता ही भाग्य में मिल जाता है। भाग्य विधाता जब अपना हो गया तो बाकी क्या रह गया! यह अनुभव है ना! सिर्फ सुनी सुनाई पर तो नहीं चल पड़े। बड़ों ने कहा भाग्य मिलता है और आप चल पड़े, इसको कहते हैं सुनी सुनाई पर चलना। तो सुनने से समझते हो वा अनुभव से समझते हो? सभी अनुभवी हो? संगमयुग है ही अनुभव करने का युग, इस युग में सर्व प्राप्ति का अनुभव कर सकते हो। अभी जो अनुभव कर रहे हो यह सतयुग में नहीं होगा। यहाँ जो स्मृति है वह सतयुग में मर्ज हो जायेगी। यहाँ अनुभव करते हो कि बाप मिला है, वहाँ बाप की तो बात ही नहीं। संगमयुग ही अनुभव करने का युग है। तो इस युग में सभी अनुभवी हो गये। अनुभवी आत्मायें कभी भी माया से धोखा नहीं खा सकती। धोखा खाने से ही दु:ख होता है। अनुभव की अथॉरिटी वाले कभी धोखा नहीं खा सकते। सदा ही सफलता को प्राप्त करते रहेंगे। सदा खुश रहेंगे। तो वर्तमान सीजन का वरदान याद रखना – सर्व प्राप्ति स्वरुप सन्तुष्ट आत्मायें हैं। सन्तुष्ट बनाने वाले हैं।
अध्याय :
26-04-1984 | “रूहानी विचित्र मेले में सर्व खज़ानों की प्राप्ति”
1. रूहानी मेला क्या है? — साधारण नहीं, विचित्र मेला
मुरली भावार्थ:
बापदादा बच्चों की मिलन की लगन को देख रहे हैं। सभी दूर-दूर से किसी देखने के लिए नहीं,
बल्कि मिलन मनाने के लिए आए हैं।
यह कोई लौकिक मेला नहीं
यह रूहानी मेला है
जहाँ विचित्र आत्माएँ, विचित्र बाप से मिलती हैं
उदाहरण:
लौकिक मेले में खर्च होता है,
लेकिन इस रूहानी मेले में —
बिना खर्चे, अधिकार से सर्व प्राप्तियाँ मिलती हैं।
2. सागर और नदियों का मिलन — ईश्वरीय परिवार का मेला
मुरली नोट:
यह मेला सागर (परमात्मा) और नदियों (आत्माओं) के मिलन का मेला है।
यह ईश्वरीय परिवार के मिलने का मेला है।
यहाँ सिर्फ मिलन नहीं
बल्कि जन्म-जन्म के लिए प्राप्ति है
3. खुले खज़ाने और भाग्य की लॉटरी
मुरली की विशेष घोषणा:
इस मेले में—
✔ खुले भण्डार
✔ खुले खज़ाने
✔ भाग्य की लॉटरी
और सबसे बड़ी बात—
जो चाहिए, जितना चाहिए, अभी चाहिए
उदाहरण:
लौकिक लॉटरी में पहले टिकट, बाद में नम्बर
यहाँ —
पहले दृढ़ संकल्प, उसी सेकेंड लॉटरी
4. जन्म-जन्म के राज्य पद की सीट बुकिंग
मुरली भाव:
इस मेले में राजयोगी आत्माएँ
जन्म-जन्म के विश्व के राजा बन सकती हैं।
जितनी बड़ी सीट चाहिए
उतनी बड़ी सीट अभी बुक
Murli Note:
यह केवल सुनने की बात नहीं,
यह पुरुषार्थ की बुकिंग है।
5. गोल्डन चांस — “दिल से मेरा बाबा कहो”
सबसे बड़ा वरदान:
इस मेले का सबसे कीमती अवसर—
“दिल से मेरा बाबा कहो और बाप के दिलतख्तनशीन बनो।”
उदाहरण:
नाम से कहना — साधारण
दिल से कहना — भाग्य बदल देता है
6. विशेष गिफ्ट — छोटा-सा सुखी और सम्पन्न संसार
मुरली रहस्य:
इस मेले की विशेष गिफ्ट है—
छोटा-सा संसार
जहाँ सदा सुख
सदा सम्पन्नता
सदा परमात्म साथ
Murli Line भावार्थ:
“बाप मिला, संसार मिला।”
7. फरिश्ता अवस्था — मिट्टी से ऊपर उड़ती कला
मुरली संकेत:
इस संसार में रहने वाली आत्माएँ—
✔ देह की मिट्टी से न्यारी
✔ फरिश्ता स्वरूप
✔ उड़ती कला में स्थित
उदाहरण:
दुनिया बोझ में
और संगमयुगी आत्मा —
उड़ान में
8. पूरा चक्र करके जाना — अधूरी प्राप्ति नहीं
बापदादा की चेतावनी:
ऐसा न हो—
एक प्राप्ति में मस्त
और बाकी खज़ाने छूट जाएँ
मुरली निर्देश:
सर्व प्राप्ति लेकर जाना
सम्पन्न स्वरूप बनकर जाना
9. मेला मनाना = महान बनना
मुरली का सार:
मेला मनाना मतलब—
✔ केवल आना-जाना नहीं
✔ बल्कि महान बनना
उदाहरण:
आना = भाग्य का मौका
महान बनना = भाग्य की प्राप्ति
10. याद और सेवा का बैलेंस — सफलता का रहस्य
टीचर्स के लिए मुरली नोट:
जहाँ—
✔ याद + सेवा का बैलेंस
✔ वहाँ स्वतः वरदान
जहाँ बैलेंस नहीं
वहाँ मेहनत
मुरली सूत्र:
“डबल लाइट बन सेवा करो — यही सफलता का आधार है।”
11. संगमयुग — सर्व प्राप्ति का युग
मुरली उद्घोषणा:
संगमयुग—
✔ प्राप्ति का युग
✔ अनुभव का युग
✔ पुरुषोत्तम बनने का युग
उदाहरण:
यह अनुभव
सतयुग में भी नहीं
केवल संगमयुग में
12. खुशी — सबसे बड़ी दुआ और दवा
मुरली का गहन सूत्र:
“खुशी जैसी कोई दुआ और दवा नहीं।”
✔ खुशी में कर्मभोग भी हल्का
✔ सूली भी काँटा बन जाती है
13. भाग्य विधाता का मिलना — सबसे बड़ी प्राप्ति
मुरली निष्कर्ष:
दुनिया को—
✔ धन
✔ संतान
✔ सम्पत्ति
आपको—
स्वयं भाग्य विधाता
Murli Line भावार्थ:
“भाग्य विधाता मिल गया, अब क्या बाकी रहा?”
14. अनुभवी आत्मा — माया से सुरक्षित
मुरली सत्य:
अनुभवी आत्माएँ—
✔ माया से धोखा नहीं खाती
✔ सदा सफल
✔ सदा खुश
अंतिम वरदान (Current Season Blessing)
“सर्व प्राप्ति स्वरूप सन्तुष्ट आत्मा बनो,
और सन्तुष्ट बनाने वाले बनो।”
प्रश्न 1. रूहानी मेला क्या है? यह साधारण मेले से कैसे भिन्न है?
उत्तर :
रूहानी मेला कोई लौकिक या साधारण मेला नहीं है, यह विचित्र आत्माओं और विचित्र बाप का मिलन मेला है।
मुरली भावार्थ :
बापदादा बच्चों की मिलन की लगन को देख रहे हैं। बच्चे देखने के लिए नहीं, बल्कि मिलन मनाने के लिए आए हैं।
उदाहरण :
लौकिक मेले में खर्च होता है,
लेकिन इस रूहानी मेले में —
बिना खर्चे, अधिकार से सर्व प्राप्तियाँ मिलती हैं।
प्रश्न 2. इस मेले को “सागर और नदियों का मिलन” क्यों कहा गया है?
उत्तर :
क्योंकि यह मेला परमात्मा रूपी सागर और आत्मा रूपी नदियों के मिलन का मेला है।
मुरली नोट :
यह ईश्वरीय परिवार के मिलने का मेला है,
जहाँ मिलन केवल इस जन्म का नहीं,
जन्म-जन्म के लिए प्राप्तियों का आधार बनता है।
प्रश्न 3. इस रूहानी मेले में कौन-से खज़ाने उपलब्ध हैं?
उत्तर :
इस मेले में —
✔ खुले भण्डार
✔ खुले खज़ाने
✔ भाग्य की श्रेष्ठ लॉटरी
मुरली की विशेष घोषणा :
जो चाहिए, जितना चाहिए, अभी चाहिए —
सब कुछ उसी सेकेंड मिल सकता है।
उदाहरण :
लौकिक लॉटरी में पहले टिकट, बाद में नम्बर,
यहाँ —
पहले दृढ़ संकल्प, उसी क्षण लॉटरी।
प्रश्न 4. “राज्य पद की सीट बुकिंग” से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
इस मेले में राजयोगी आत्माएँ जन्म-जन्म के लिए विश्व राज्य का अधिकार ले सकती हैं।
मुरली भाव :
जितनी बड़ी प्राप्ति की सीट चाहिए,
उतनी बड़ी सीट अभी पुरुषार्थ से बुक हो सकती है।
मुरली नोट :
यह सुनने की बात नहीं,
यह पुरुषार्थ की बुकिंग है।
प्रश्न 5. इस मेले का सबसे बड़ा गोल्डन चांस कौन-सा है?
उत्तर :
इस मेले का सबसे बड़ा अवसर है —
“दिल से मेरा बाबा कहो और बाप के दिलतख्तनशीन बनो।”
उदाहरण :
नाम से कहना — साधारण है,
दिल से कहना — भाग्य बदल देता है।
प्रश्न 6. इस मेले में मिलने वाली विशेष गिफ्ट क्या है?
उत्तर :
इस मेले की विशेष गिफ्ट है —
✔ छोटा-सा सुखी संसार
✔ सदा सम्पन्नता
✔ सदा परमात्म साथ
मुरली भावार्थ :
“बाप मिला, संसार मिला।”
प्रश्न 7. फरिश्ता अवस्था का अनुभव कैसे होता है?
उत्तर :
जो इस रूहानी संसार में रहते हैं, वे —
✔ देह की मिट्टी से न्यारे
✔ फरिश्ता स्वरूप
✔ उड़ती कला में स्थित रहते हैं
उदाहरण :
दुनिया बोझ में है,
और संगमयुगी आत्मा —
उड़ान में।
प्रश्न 8. बापदादा ने अधूरी प्राप्ति के लिए क्या चेतावनी दी है?
उत्तर :
बापदादा कहते हैं —
ऐसा न हो कि
एक प्राप्ति में मस्त होकर
बाकी खज़ाने छूट जाएँ।
मुरली निर्देश :
सर्व प्राप्ति लेकर जाना है
सम्पन्न स्वरूप बनकर जाना है।
प्रश्न 9. मेला मनाने का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर :
मेला मनाना मतलब —
✔ केवल आना-जाना नहीं
✔ बल्कि महान बनना
उदाहरण :
आना = अवसर
महान बनना = भाग्य की प्राप्ति
प्रश्न 10. सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या बताया गया है?
उत्तर :
याद और सेवा का बैलेंस
टीचर्स के लिए मुरली नोट :
जहाँ बैलेंस है —
✔ वहाँ स्वतः वरदान
जहाँ बैलेंस नहीं —
वहाँ मेहनत
मुरली सूत्र :
“डबल लाइट बन सेवा करो — यही सफलता का आधार है।”
प्रश्न 11. संगमयुग को विशेष क्यों कहा गया है?
उत्तर :
क्योंकि संगमयुग —
✔ सर्व प्राप्ति का युग
✔ अनुभव का युग
✔ पुरुषोत्तम बनने का युग है
उदाहरण :
जो अनुभव यहाँ होता है,
वह सतयुग में भी नहीं होता।
प्रश्न 12. खुशी को सबसे बड़ी दुआ और दवा क्यों कहा गया है?
उत्तर :
क्योंकि खुशी में —
✔ कर्मभोग हल्का हो जाता है
✔ सूली भी काँटा बन जाती है
मुरली सूत्र :
“खुशी जैसी कोई दुआ और दवा नहीं।”
प्रश्न 13. सबसे बड़ी प्राप्ति कौन-सी मानी गई है?
उत्तर :
दुनिया को मिलता है —
✔ धन
✔ संतान
✔ सम्पत्ति
आपको मिलता है —
स्वयं भाग्य विधाता
मुरली भावार्थ :
“भाग्य विधाता मिल गया, अब क्या बाकी रहा?”
प्रश्न 14. अनुभवी आत्मा की पहचान क्या है?
उत्तर :
अनुभवी आत्माएँ —
✔ माया से धोखा नहीं खाती
✔ सदा सफल रहती हैं
✔ सदा खुश रहती हैं
अंतिम वरदान (Current Season Blessing)
“सर्व प्राप्ति स्वरूप सन्तुष्ट आत्मा बनो,
और सन्तुष्ट बनाने वाले बनो।”
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली (26-04-1984) पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, ईश्वरीय स्मृति और जीवन में सर्व प्राप्तियों का अनुभव कराना है।
यह किसी भी धर्म, व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध नहीं है।
यह प्रस्तुति केवल आध्यात्मिक अध्ययन और आत्म-उन्नति के लिए है।
कृपया इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखें और समझें।
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