अव्यक्त मुरली-(32)“विस्तार को बिन्दी में समाओ”
( प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“बापदादा का बुलावा: क्या हम उड़न आसन पर चलने के लिए तैयार हैं?”
1. बापदादा क्यों आते हैं?
बापदादा इस साकारी देह और दुनिया में इसलिए आते हैं ताकि हम सभी आत्माओं को इस पुराने शरीर और पुरानी दुनिया से दूर ले जाएँ।
वे दूर-देश वासी बनकर आते हैं, ताकि हमें भी हमारे मूल व प्यारे देश — शांतिधाम में वापस ले जा सकें।
2. क्या हम तैयार हैं चलने के लिए?
जैसे यात्रा से पहले सभी सामानों को समेटा जाता है, वैसे ही आत्मिक यात्रा के लिए हमें भी सभी प्रवृत्तियों से — चाहे वो शरीर, सेवा, संबंध या संस्कार से जुड़ी हों — पूर्ण समपर्ण करना होगा।
बापदादा पूछते हैं — क्या हम डबल लाइट होकर सेकेण्ड में उड़ने को तैयार हैं?
3. किनारों की रस्सियाँ छोड़नी होंगी
बापदादा इशारा देते हैं कि किसी भी प्रवृत्ति की रस्सी — सेवा, संबंध, “मेरा-पन” — हमें सहारा बनाकर न बैठ जाए।
हमें हर बंधन से पहले से ही विदाई ले लेनी है।
“मेरापन लाया तो गुलदस्ता मुरझाया।” — यह याद रखना है।
4. विस्तार से सार में आने की शक्ति
सेवा का वृक्ष अब पूर्ण विस्तार में है। लेकिन अब उसे बीज स्वरूप में समा जाना है।
सेवा हो, लेकिन “सार” और “साक्षी” बनकर।
सेवा में प्यारे भी बनो, पर न्यारे भी रहो।
5. उड़ती कला और अन्तिम वाहन की तैयारी
वह समय आने वाला है जब बापदादा कहेंगे — “अब साथ चलो।”
क्या हमारे संकल्प, कर्म, और संबंध इतने हल्के हैं कि हम उड़न आसन में बैठकर बाप के साथ उड़ सकें?
कहीं सोचने का समय तो नहीं लगेगा?
अगर हाँ, तो तैयारी अधूरी है।
6. सेवा में क्वालिटी और वैरायटी
इस वर्ष हमें हर आत्मा को अनुभवी मूर्त, रुहानी गुलाब, और सिद्ध स्वरूप बनाना है।
गुलदस्ते में सिर्फ पत्ते नहीं, मीठे फल भी होने चाहिए।
हर आत्मा को बाप से जोड़ो — न कि “मेरे” से।
7. सेवाधारियों की विशेष भूमिका
यज्ञ की सेवा करने वालों का भाग्य विशेष होता है।
मधुबन में रहते हुए सेवा, संगठित प्रयास, और कमाई — तीनों सदा जमा होती हैं।
सेवा करते हुए सदा याद रखें — “See Father, Follow Father”।
Questions and Answers Format:
प्रश्न 1: बापदादा क्यों आते हैं?
उत्तर: बापदादा आत्माओं को इस शरीर और दुनिया से मुक्त करने आते हैं। वे हमें मूल देश — शांतिधाम — वापस ले जाने के लिए आते हैं।
प्रश्न 2: क्या हम उड़न आसन के लिए तैयार हैं?
उत्तर: यदि हमारी आत्मा सभी प्रवृत्तियों, संबंधों और संस्कारों से डबल लाइट हो चुकी है — तभी हम उड़ने के लिए तैयार कहे जा सकते हैं।
प्रश्न 3: किनारों की रस्सियाँ क्या हैं?
उत्तर: “सेवा”, “संबंध”, “मेरा-पन”, और “संस्कार” — ये रस्सियाँ हमारी उड़न गति में रुकावट बन सकती हैं। इन्हें पहचानकर छोड़ना होगा।
प्रश्न 4: सेवा में प्यारे और न्यारे कैसे बनें?
उत्तर: सेवा करते समय हमें “साक्षी” और “सार” रूप में रहना है — जिससे हम खुद को उसमें नहीं उलझाएँ।
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