Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 03-01-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – कदम-कदम पर श्रीमत पर चलते रहो, यह ब्रह्मा की मत है या शिवबाबा की, इसमें मूँझो नहीं” | |
| प्रश्नः- | अच्छी ब्रेन वाले बच्चे कौन सी गुह्य बात सहज ही समझ सकते हैं? |
| उत्तर:- | ब्रह्मा बाबा समझा रहे हैं या शिवबाबा – यह बात अच्छी ब्रेन वाले सहज ही समझ लेंगे। कई तो इसमें ही मूँझ जाते हैं। बाबा कहते – बच्चे, बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। तुम मूँझो नहीं। श्रीमत समझकर चलते रहो। ब्रह्मा की मत का रेसपॉन्सिबुल भी शिवबाबा है। |
ओम् शान्ति। रूहानी बाप बच्चों को समझा रहे हैं, तुम समझते हो हम ब्राह्मण ही रूहानी बाप को पहचानते हैं। दुनिया में कोई भी मनुष्यमात्र रूहानी बाप, जिसको गॉड फादर वा परमपिता परमात्मा कहते हैं, उनको जानते नहीं हैं। जब वह रूहानी बाप आये तब ही रूहानी बच्चों को पहचान दे। यह नॉलेज न सृष्टि के आदि में रहती, न सृष्टि के अन्त में रहती। अभी तुमको नॉलेज मिली है, यह है सृष्टि के अन्त और आदि का संगमयुग। इस संगमयुग को भी नहीं जानते तो बाप को कैसे जान सकेंगे। कहते हैं – हे पतित-पावन आओ, आकर पावन बनाओ, परन्तु यह पता नहीं है कि पतित-पावन कौन है और वह कब आयेंगे। बाप कहते हैं – मैं जो हूँ जैसा हूँ, मुझे कोई भी नहीं जानते। जब मैं आकर पहचान दूँ तब मुझे जानें। मैं अपना और सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का परिचय संगमयुग पर एक ही बार आकर देता हूँ। कल्प बाद फिर से आता हूँ। तुमको जो समझाता हूँ वह फिर प्राय: लोप हो जाता है। सतयुग से लेकर कलियुग अन्त तक कोई भी मनुष्य मात्र मुझ परमपिता परमात्मा को नहीं जानते हैं। न ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को जानते। मुझे मनुष्य ही पुकारते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर थोड़ेही पुकारते हैं। मनुष्य दु:खी होते हैं तब पुकारते हैं। सूक्ष्मवतन की तो बात ही नहीं। रूहानी बाप आकर अपने रूहानी बच्चों अर्थात् रूहों को बैठ समझाते हैं। अच्छा, रूहानी बाप का नाम क्या है? बाबा जिसको कहा जाता है, जरूर कुछ नाम होना चाहिए। बरोबर नाम एक ही गाते हैं शिव। यह नामीग्रामी है परन्तु मनुष्यों ने अनेक नाम रखे हैं। भक्ति मार्ग में अपनी ही बुद्धि से यह लिंग रूप बना दिया है। नाम फिर भी शिव है। बाप कहते हैं मैं एक बार आता हूँ। आकर मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा देता हूँ। मनुष्य भल नाम लेते हैं – मुक्तिधाम, निर्वाणधाम, परन्तु जानते कुछ नहीं हैं। न बाप को जानते हैं, न देवताओं को। यह किसको भी पता नहीं है बाप भारत में आकर कैसे राजधानी स्थापन करते हैं। शास्त्रों में भी ऐसी कोई बात नहीं है परमपिता परमात्मा कैसे आकर आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। ऐसे नहीं सतयुग में देवताओं को ज्ञान था, जो गुम हो गया। नहीं, अगर देवताओं में भी यह ज्ञान होता तो चलता आता। इस्लामी, बौद्धी आदि जो हैं उन्हों का ज्ञान चलता आता है। सब जानते हैं – यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है। मैं जब आता हूँ तो जो आत्मायें पतित बन राज्य गवाँ बैठी हैं उन्हों को आकर फिर पावन बनाता हूँ। भारत में राज्य था फिर गँवाया कैसे है, वह भी किसको पता नहीं इसलिए बाप कहते हैं बच्चों की कितनी तुच्छ बुद्धि बन गई है। मैं बच्चों को यह ज्ञान दे प्रालब्ध देता हूँ फिर सभी भूल जाते हैं। कैसे बाप आया, कैसे बच्चों को शिक्षा दी, वह सब भूल जाते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। बच्चों को विचार सागर मंथन करने की बड़ी बुद्धि चाहिए।
बाप कहते हैं यह जो शास्त्र आदि तुम पढ़ते आये हो यह सतयुग-त्रेता में नहीं पढ़ते थे। वहाँ थे ही नहीं। तुम यह नॉलेज भूल जाते हो फिर गीता आदि शास्त्र कहाँ से आया? जिन्होंने गीता सुनकर यह पद पाया है वही नहीं जानते तो और फिर कैसे जान सकते। देवतायें भी जान नहीं सकते। हम मनुष्य से देवता कैसे बनें। वह पुरुषार्थ का पार्ट ही बन्द हो गया। तुम्हारी प्रालब्ध शुरू हो गई। वहाँ यह नॉलेज हो कैसे सकती। बाप समझाते हैं यह नॉलेज तुमको फिर से मिल रही है, कल्प पहले मिसल। तुमको राजयोग सिखलाए प्रालब्ध दी जाती है। फिर वहाँ तो दुर्गति है नहीं। तो ज्ञान की बात भी नहीं उठ सकती। ज्ञान है ही सद्गति पाने के लिए। वह देने वाला एक बाप है। सद्गति और दुर्गति का अक्षर यहाँ से निकलता है। सद्गति को भारतवासी ही पाते हैं। समझते हैं हेविनली गॉड फादर ने हेविन रचा था। कब रचा? यह कुछ भी पता नहीं। शास्त्रों में लाखों वर्ष लिख दिया है। बाप कहते हैं – बच्चों, तुमको फिर से नॉलेज देता हूँ फिर यह नॉलेज खलास हो जाती है तो भक्ति शुरू होती है। आधाकल्प है ज्ञान, आधाकल्प है भक्ति। यह भी कोई नहीं जानते हैं। सतयुग की आयु ही लाखों वर्ष दे दी है। तो मालूम कैसे पड़े। 5 हज़ार वर्ष की बात भी भूल गये हैं। तो लाखों वर्ष की बात कैसे जान सकें। कुछ भी समझते नहीं। बाप कितना सहज समझाते हैं। कल्प की आयु 5 हज़ार वर्ष है। युग ही 4 हैं। चारों का इक्वल टाइम 1250 वर्ष है। ब्राह्मणों का यह मिड-गेड युग है। बहुत छोटा है उन 4 युगों से। तो बाप भिन्न-भिन्न रीति से, नई-नई प्वॉइंट्स सहज रीति बच्चों को समझाते रहते हैं। धारणा तुमको करनी है। मेहनत तुमको करनी है। ड्रामा अनुसार जो समझाता आया हूँ वह पार्ट चला आता है। जो बताने का था वही आज बता रहा हूँ। इमर्ज होता रहता है। तुम सुनते जाते हो। तुमको ही धारण करना और कराना है। मुझे तो धारण नहीं करना है। तुमको सुनाता हूँ, धारणा कराता हूँ। हमारी आत्मा में पार्ट है पतितों को पावन बनाने का। जो कल्प पहले समझाया था वही निकलता रहता है। मैं पहले से जानता नहीं था कि क्या सुनाऊंगा। भल इनकी सोल विचार सागर मंथन करती हो। यह विचार सागर मंथन कर सुनाते हैं या बाबा सुनाते हैं – यह बड़ी गुह्य बातें हैं, इसमें ब्रेन बड़ी अच्छी चाहिए। जो सर्विस में तत्पर होंगे उनका ही विचार सागर मंथन चलता होगा।
वास्तव में कन्यायें बंधनमुक्त होती हैं। वह इस रूहानी पढ़ाई में लग जाएं, बंधन तो कोई है नहीं। कुमारियां अच्छा उठा सकती हैं, उनको है ही पढ़ना और पढ़ाना। उनको कमाई करने की दरकार नहीं है। कुमारी अगर अच्छी रीति से यह नॉलेज समझ जाए तो सबसे अच्छी है। सेन्सीबुल होगी तो बस इस रूहानी कमाई में लग जायेगी। कई तो शौक से लौकिक पढ़ाई पढ़ती रहती हैं। समझाया जाता है – इससे कोई फायदा नहीं। तुम यह रूहानी पढ़ाई पढ़कर सर्विस में लग जाओ। वह पढ़ाई तो कोई काम की नहीं है। पढ़कर चले जाते हैं गृहस्थ व्यवहार में। गृहस्थी मातायें बन जाती हैं। कन्याओं को तो इस नॉलेज में लग जाना चाहिए। कदम-कदम श्रीमत पर चल धारणा में लग जाना है। मम्मा शुरू से आई और फिर इस पढ़ाई में लग गई, कितनी कुमारियां तो गुम हो गई। कुमारियों को अच्छा चांस है। श्रीमत पर चले तो बहुत फर्स्टक्लास हो जाएं। यह श्रीमत है वा ब्रह्मा की मत है – इसमें ही मूँझ पड़ते हैं। फिर भी यह बाबा का रथ है ना। इनसे कुछ भूल हो जाए, तुम श्रीमत पर चलते रहेंगे तो वह आपेही ठीक कर देंगे। श्रीमत मिलेगी भी इन द्वारा। सदैव समझना चाहिए श्रीमत मिलती है फिर कुछ भी हो – रेसपान्सिबुल खुद है। इनसे कुछ हो जाता है, बाबा कहते हैं मैं रेसपान्सिबुल हूँ। ड्रामा में यह राज़ नूँधा हुआ है। इनको भी सुधार सकते हैं। फिर भी बाप है ना। बापदादा दोनों इकट्ठे हैं तो मूँझ पड़ते हैं। पता नहीं शिवबाबा कहते हैं वा ब्रह्मा कहते हैं। अगर समझें शिवबाबा ही मत देते हैं तो कभी भी हिले नहीं। शिवबाबा जो समझाते हैं सो राइट ही है। तुम कहते हो बाबा आप ही हमारे बाप-टीचर-गुरू हो। तो श्रीमत पर चलना चाहिए ना। जो कहे उस पर चलो। हमेशा समझो शिवबाबा कहते हैं – वह है कल्याणकारी, इनकी रेसपान्सिबिल्टी भी उन पर है। उनका रथ है ना। मूँझते क्यों हो, पता नहीं यह ब्रह्मा की राय है या शिव की? तुम क्यों नहीं समझते हो शिवबाबा ही समझाते हैं। श्रीमत जो कहे सो करते रहो। दूसरे की मत पर तुम आते ही क्यों हो। श्रीमत पर चलने से कभी झुटका नहीं आयेगा। परन्तु चल नहीं सकते, मूँझ पड़ते हैं। बाबा कहते हैं तुम श्रीमत पर निश्चय रखो तो मैं रेसपान्सिबुल हूँ। तुम निश्चय ही नहीं रखते हो तो फिर मैं भी रेसपान्सिबुल नहीं। हमेशा समझो श्रीमत पर चलना ही है। वह जो कहे, चाहे प्यार करो, चाहे मारो….. यह उनके लिए गायन है। इसमें लात आदि मारने की तो बात नहीं है। परन्तु किसको निश्चय बैठना ही बड़ा मुश्किल है। निश्चय पूरा बैठ जाए तो कर्मातीत अवस्था हो जाए। लेकिन वह अवस्था आने में भी टाइम चाहिए। वह होगी अन्त में, इसमें निश्चय बड़ा अडोल चाहिए। शिवबाबा से तो कभी कोई भूल हो न सके, इनसे हो सकती है। यह दोनों हैं इकट्ठे। परन्तु तुमको निश्चय भी रखना है – शिवबाबा समझाते हैं, उस पर हमको चलना पड़े। तो बाबा की श्रीमत समझकर चलते चलो। तो उल्टा भी सुल्टा हो जायेगा। कहाँ मिसअन्डरस्टैंडिंग भी हो जाती है। शिवबाबा और ब्रह्मा बाबा की मुरली को भी बड़ा अच्छी रीति समझना है। बाबा ने कहा व इसने कहा। ऐसे नहीं कि ब्रह्मा बोलते ही नहीं है। परन्तु बाबा ने समझाया है – अच्छा, समझो यह ब्रह्मा कुछ नहीं जानते, शिवबाबा ही सब कुछ सुनाते हैं। शिवबाबा के रथ को स्नान कराता हूँ, शिवबाबा के भण्डारे की सर्विस करता हूँ – यह याद रहे तो भी बहुत अच्छा है। शिवबाबा की याद में रहते कुछ भी करे तो बहुतों से तीखे जा सकते हैं। मुख्य बात है ही शिवबाबा के याद की। अल्फ और बे। बाकी है डिटेल।
बाप जो समझाते हैं उस पर अटेन्शन देना है। बाप ही पतित-पावन, ज्ञान का सागर है ना। वही पतित शूद्रों को आकर ब्राह्मण बनाते हैं। ब्राह्मणों को ही पावन बनाते हैं, शूद्रों को पावन नहीं बनाते, यह सब बातें कोई भागवत आदि में नहीं हैं। थोड़े-थोड़े अक्षर हैं। मनुष्यों को तो यह भी पता नहीं है कि राधे-कृष्ण ही लक्ष्मी-नारायण हैं। मूँझ जाते हैं। देवतायें तो हैं ही सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी। लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी, सीता-राम की डिनायस्टी। बाप कहते हैं भारतवासी स्वीट चिल्ड्रेन याद करो, लाखों वर्ष की तो बात ही नहीं है। कल की बात है। तुमको राज्य दिया था। इतना अकीचार (अथाह) धन दौलत दिया। बाप ने सारे विश्व का तुमको मालिक बनाया, और कोई खण्ड थे नहीं, फिर तुमको क्या हुआ! विद्वान, आचार्य, पण्डित कोई भी इन बातों को नहीं जानते। बाप ही कहते हैं – अरे भारतवासियों, तुमको राज्य-भाग्य दिया था ना। तुम भी कहेंगे शिवबाबा कहते हैं – इतना तुमको धन दिया फिर तुमने कहाँ गँवा दिया! बाप का वर्सा कितना जबरदस्त है। बाप ही पूछते हैं ना वा बाप चला जाता है तो मित्र-सम्बन्धी पूछते हैं। बाप ने तुमको इतने पैसे दिये सब कहाँ गँवायें! यह तो बेहद का बाप है। बाप ने कौड़ी से हीरे जैसा बनाया। इतना राज्य दिया फिर पैसा कहाँ गया? तुम क्या जवाब देंगे? किसको भी समझ में नहीं आता है। तुम समझते हो बाबा पूछते ठीक हैं – इतने कंगाल कैसे बने हो! पहले सब कुछ सतोप्रधान था फिर कला कम होती गई तो सब कुछ कम होता गया। सतयुग में तो सतोप्रधान थे, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। राधे-कृष्ण से लक्ष्मी-नारायण का नाम जास्ती है। उन्हों की कोई ग्लानि नहीं लिखी है और सबके लिए निंदा लिखी है। लक्ष्मी-नारायण के राज्य में कोई दैत्य आदि नहीं बताते हैं। तो यह बातें समझने की हैं। बाबा ज्ञान धन से झोली भर रहे हैं। बाप कहते हैं बच्चे इस माया से खबरदार रहो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉनिंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सेन्सीबुल बन सच्ची सेवा में लग जाना है। जवाबदार एक बाप है इसलिए श्रीमत में संशय नहीं उठाना है। निश्चय में अडोल रहना है।
2) विचार सागर मंथन कर बाप की हर समझानी पर अटेन्शन देना है। स्वयं ज्ञान को धारण कर दूसरों को सुनाना है।
| वरदान:- | अपने अनादि-आदि रीयल रूप को रियलाइज करने वाले सम्पूर्ण पवित्र भव आत्मा के अनादि और आदि दोनों काल का ओरीज्नल स्वरुप पवित्र है। अपवित्रता आर्टीफिशल, शूद्रों की देन है। शूद्रों की चीज़ ब्राह्मण यूज़ नहीं कर सकते इसलिए सिर्फ यही संकल्प करो कि अनादि-आदि रीयल रूप में मैं पवित्र आत्मा हूँ, किसी को भी देखो तो उसके रीयल रूप को देखो, रीयल को रियलाइज करो, तो सम्पूर्ण पवित्र बन फर्स्टक्लास वा एयरकन्डीशन की टिकेट के अधिकारी बन जायेंगे। |
| स्लोगन:- | परमात्म दुआओं से अपनी झोली भरपूर करो तो माया समीप नहीं आ सकती। |
अव्यक्त इशारे – इस अव्यक्ति मास में बन्धनमुक्त रह जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव करो
मैजॉरिटी बच्चों ने अभी लोहे की जंजीरें तो काट ली हैं लेकिन बहुत महीन और रॉयल धागे अभी भी बंधे हुए हैं। कई पर्सनैलिटी फील करने वाले हैं, स्वयं में अच्छाईयां हैं नहीं लेकिन महसूस ऐसे होती हैं कि हम बहुत अच्छे हैं। हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं। यह जीवन-बन्ध के धागे मैजॉरिटी में हैं, बापदादा अब इन धागों से भी मुक्त, जीवनमुक्त देखना चाहते हैं।
प्रश्न 1:
अच्छी ब्रेन वाले बच्चे कौन-सी गुह्य बात सहज ही समझ लेते हैं?
उत्तर:
अच्छी ब्रेन वाले बच्चे यह सहज ही समझ लेते हैं कि समझाने वाला ब्रह्मा बाबा हों या शिवबाबा—श्रीमत एक ही है। वे इसमें नहीं उलझते कि किसने कहा, बल्कि यह समझते हैं कि बापदादा दोनों इकट्ठे हैं और ब्रह्मा की मत की जिम्मेदारी भी स्वयं शिवबाबा लेते हैं।
प्रश्न 2:
बाबा “मूँझो नहीं” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि मूँझने से निश्चय हिलता है। बाबा कहते हैं—श्रीमत समझकर चलते रहो, क्योंकि श्रीमत पर चलने से कभी नुकसान नहीं होता। मूँझ केवल तब होती है जब मनुष्य व्यक्ति को देखता है, परमात्मा को नहीं।
प्रश्न 3:
रूहानी बाप को दुनिया क्यों नहीं जानती?
उत्तर:
क्योंकि रूहानी बाप स्वयं आकर पहचान नहीं देते, तब तक कोई उन्हें जान नहीं सकता। यह ज्ञान न सृष्टि के आदि में होता है, न अंत में—यह केवल संगमयुग पर ही मिलता है।
प्रश्न 4:
संगमयुग को न जानने से क्या नुकसान होता है?
उत्तर:
जो संगमयुग को नहीं जानते, वे बाप को भी नहीं जान सकते। और जब बाप को नहीं जानेंगे तो न वर्सा समझेंगे, न मुक्ति-जीवनमुक्ति का रहस्य।
प्रश्न 5:
रूहानी बाप का वास्तविक नाम क्या है?
उत्तर:
रूहानी बाप का एक ही वास्तविक नाम “शिव” है। यह नामी-ग्रामी है, परन्तु भक्ति मार्ग में मनुष्यों ने अपनी बुद्धि से अनेक रूप और नाम बना दिए।
प्रश्न 6:
बाप कितनी बार आते हैं और क्यों?
उत्तर:
बाप कहते हैं—मैं एक ही बार आता हूँ और आकर मुक्ति और जीवनमुक्ति का वर्सा देता हूँ। कल्प-कल्प बाद फिर वही कार्य दोहराता हूँ।
प्रश्न 7:
शास्त्र सतयुग-त्रेता में क्यों नहीं थे?
उत्तर:
क्योंकि वहाँ दुर्गति नहीं होती, इसलिए ज्ञान की आवश्यकता भी नहीं होती। ज्ञान केवल सद्गति पाने के लिए है, और सद्गति देने वाला एक ही बाप है।
प्रश्न 8:
ज्ञान और भक्ति का चक्र क्या है?
उत्तर:
आधा कल्प ज्ञान, आधा कल्प भक्ति। जब ज्ञान लोप होता है तब भक्ति शुरू होती है। यह बात दुनिया नहीं जानती।
प्रश्न 9:
कल्प की वास्तविक आयु कितनी है?
उत्तर:
कल्प की आयु 5000 वर्ष है। चारों युगों का समय समान—1250-1250 वर्ष। लाखों वर्षों की बात मनुष्य की कल्पना है।
प्रश्न 10:
विचार-सागर-मंथन किसका चलता है?
उत्तर:
जो सेवा में तत्पर रहते हैं, जिनकी बुद्धि विशाल है, उन्हीं का विचार-सागर-मंथन चलता है। यह बड़ी गुह्य बात है।
प्रश्न 11:
कन्याओं के लिए इस ज्ञान में विशेष चांस क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि कन्याएँ बंधनों से मुक्त होती हैं। यदि वे इस रूहानी पढ़ाई में लग जाएँ तो बहुत फर्स्ट-क्लास बन सकती हैं और सच्ची सेवा कर सकती हैं।
प्रश्न 12:
अगर ब्रह्मा बाबा से कोई भूल हो जाए तो क्या करें?
उत्तर:
बाबा कहते हैं—तुम श्रीमत पर चलते रहो, उसकी जिम्मेदारी मैं स्वयं लेता हूँ। यह मेरा रथ है, ड्रामा में यह राज़ नूँधा हुआ है।
प्रश्न 13:
श्रीमत पर चलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
उत्तर:
श्रीमत पर चलने से कभी झटका नहीं लगता। उल्टा भी सुल्टा हो जाता है। निश्चय अडोल हो जाए तो कर्मातीत अवस्था निश्चित है।
प्रश्न 14:
मुख्य याद किसकी रखनी है?
उत्तर:
मुख्य बात है शिवबाबा की याद—अल्फ और बे। बाकी सब डिटेल है।
प्रश्न 15:
बाप की पढ़ाई का अंतिम लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
पतित शूद्रों को ब्राह्मण बनाकर, ब्राह्मणों को पावन देवता बनाना और फिर विश्व राज्य का अधिकारी बनाना।
धारणा का सार
प्रश्न: धारणा की सबसे मुख्य बात क्या है?
उत्तर:
निश्चय अडोल रखो—श्रीमत पर चलो, जवाबदार एक बाप है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)यह वीडियो ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मुरली एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान, आत्म-चिंतन एवं ईश्वरीय श्रीमत की समझ को गहरा करना है। यह वीडियो किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या मत के विरोध में नहीं है। सभी दर्शक अपने विवेक एवं आत्म-अनुभूति के आधार पर विचार करें।
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