अव्यक्त मुरली-(07)20-01-1986 “पुरुषार्थ और परिवर्तन के गोल्डन चांस का वर्ष”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
20-01-1986 “पुरुषार्थ और परिवर्तन के गोल्डन चांस का वर्ष”
आज समर्थ बाप अपने समर्थ बच्चों को देख रहे हैं। जिन समर्थ आत्माओं ने सबसे बड़े ते बड़ा समर्थ कार्य, विश्व को नया श्रेष्ठ विश्व बनाने का दृढ़ संकल्प किया है। हर आत्मा को शान्त वा सुखी बनाने का, समर्थ कार्य करने का संकल्प किया है और इसी श्रेष्ठ संकल्प को लेकर दृढ़ निश्चय बुद्धि बन कार्य को प्रत्यक्ष रूप में ला रहे हैं। सभी समर्थ बच्चों का एक ही यह श्रेष्ठ संकल्प है कि यह श्रेष्ठ कार्य होना ही है। इससे भी ज्यादा यह निश्चित है कि यह कार्य हुआ ही पड़ा है। सिर्फ कर्म और फल के पुरुषार्थ और प्रालब्ध के निमित्त और निर्माण के कर्म फिलॉसाफी के अनुसार निमित्त बन कार्य कर रहे हैं। भावी अटल है। लेकिन सिर्फ आप श्रेष्ठ भावना द्वारा, भावना का फल अविनाशी प्राप्त करने के निमित्त बने हुए हैं। दुनिया की अन्जान आत्मायें यही सोचती हैं कि शान्ति होगी, क्या होगा, कैसे होगा! कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती। क्या सचमुच होगा! और आप कहते हो, होगा तो क्या लेकिन हुआ ही पड़ा है क्योंकि नई बात नहीं है। अनेक बार हुआ है और अब भी हुआ ही पड़ा है। निश्चयबुद्धि निश्चित भावी को जानते हो। इतना अटल निश्चय क्यों है? क्योंकि स्व परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रमाण से जानते हो कि प्रत्यक्ष प्रमाण के आगे और कोई प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है। साथ-साथ परमात्म कार्य सदा सफल है ही है। यह कार्य आत्माओं, महान आत्माओं वा धर्म आत्माओं का नहीं है। परमात्म कार्य सफल हुआ ही पड़ा है, ऐसे निश्चय बुद्धि, निश्चित भविष्य को जानने वाले निश्चिन्त आत्मायें हो। लोग कहते हैं वा डरते हैं कि विनाश होगा और आप निश्चिन्त हो कि नई स्थापना होगी। कितना अन्तर है – असम्भव और सम्भव का। आपके सामने सदा स्वर्णिम दुनिया का, स्वर्णिम सूर्य उदय हुआ ही पड़ा है और उन्हों के सामने हैं विनाश की काली घटायें। अभी आप सभी तो समय समीप होने के कारण सदा खुशी के घुंघरू डाल नाचते रहते हो कि आज पुरानी दुनिया है, कल स्वर्णिम दुनिया होगी। आज और कल इतना समीप पहुँच गये हो।
अभी इस वर्ष “सम्पूर्णता और समानता” का समीप अनुभव करना है। सम्पूर्णता आप सभी फरिश्तों का विजय माला ले आवाह्न कर रही है। विजय माला के अधिकारी तो बनना है ना। सम्पूर्ण बाप और सम्पूर्ण स्टेज दोनों ही आप बच्चों को बुला रहे हैं कि आओ श्रेष्ठ आत्मायें आओ, समान बच्चे आओ, समर्थ बच्चे आओ, समान बन अपने स्वीट होम में विश्रामी बनो। जैसे बापदादा विधाता है, वरदाता है ऐसे आप भी इस वर्ष विशेष ब्राह्मण आत्माओं प्रति वा सर्व आत्माओं प्रति विधाता बनो, वरदाता बनो। कल देवता बनने वाले हो अब अन्तिम फरिश्ता स्वरूप बनो। फरिश्ता क्या करता? वरदाता बन वरदान देता है। देवता सदा देता है, लेता नहीं है। लेवता नहीं कहते। तो वरदाता और विधाता, फरिश्ता सो देवता… अभी यह महामन्त्र हम फरिश्ता सो देवता, इस मंत्र को विशेष स्मृति स्वरूप बनाओ। मनमनाभव तो हो ही गये, यह आदि का मंत्र रहा। अभी इस समर्थ मंत्र को अनुभव में लाओ। “यह होना चाहिए, यह मिलना चाहिए” यह दोनों ही बातें लेवता बनाती हैं, लेवता-पन के संस्कार देवता बनने में समय डाल देंगे। इसलिए इस संस्कारों को समाप्त करो। पहले जन्म में ब्रह्मा के घर से देवता बन नये जीवन, नये युग के वन नम्बर में आओ। संवत भी वन-वन-वन हो। प्रकृति भी सतोप्रधान नम्बरवन हो। राज्य भी नम्बरवन हो। आपकी गोल्डन स्टेज भी नम्बर वन हो। एक दिन के फर्क में भी वन-वन-वन से बदल जायेगा। अभी से फरिश्ता सो देवता बनने के लिए बहुतकाल के संस्कार प्रैक्टिकल कर्म में इमर्ज करो क्योंकि बहुतकाल का जो गायन है, वह बहुतकाल की सीमा अब समाप्त हो रही है। उसकी डेट नहीं गिनती करो।
विनाश को अन्तकाल कहा जायेगा। उस समय बहुतकाल का चांस तो समाप्त है ही, लेकिन थोड़े समय का चांस भी समाप्त हो जायेगा। इसलिए बापदादा बहुतकाल की समाप्ति का इशारा दे रहे हैं। फिर बहुतकाल की गिनती का चांस समाप्त हो थोड़ा समय पुरूषार्थ, थोड़ा समय प्रालब्ध, यही कहा जायेगा। कर्मों के खाते में अब बहुतकाल खत्म हो थोड़ा समय वा अल्पकाल आरम्भ हो रहा है इसलिए यह वर्ष परिवर्तन काल का वर्ष है। बहुतकाल से थोड़े समय में परिवर्तन होना है, इसलिए इस वर्ष के पुरुषार्थ में बहुतकाल का हिसाब जितना जमा करने चाहो वह कर लो। फिर उल्हना नहीं देना कि हम तो अलबेले होकर चल रहे थे। आज नहीं तो कल बदल ही जायेंगे। इसलिए कर्मों की गति को जानने वाले बनो। नॉलेजफुल बन तीव्रगति से आगे बढ़ो। ऐसा न हो दो हजार का हिसाब ही लगाते रहो। पुरुषार्थ का हिसाब अलग है और सृष्टि परिवर्तन का हिसाब अलग है। ऐसा नहीं सोचो कि अभी 15 वर्ष पड़ा है, अभी 18 वर्ष पड़ा है। 99 में होगा… यह नहीं सोचते रहना। हिसाब को समझो। अपने पुरुषार्थ और प्रालब्ध के हिसाब को जान उस गति से आगे बढ़ो। नहीं तो बहुतकाल के पुराने संस्कार अगर रह गये तो इस बहुतकाल की गिनती धर्मराजपुरी के खाते में जमा हो जायेगी। कोई-कोई का बहुतकाल के व्यर्थ, अयथार्थ कर्म-विकर्म का खाता अभी भी है, बापदादा जानते हैं सिर्फ आउट नहीं करते हैं। थोड़ा-सा पर्दा डालते हैं। लेकिन व्यर्थ और अयथार्थ, यह खाता अभी भी बहुत है। इसलिए यह वर्ष एक्स्ट्रा गोल्डन चांस का वर्ष है – जैसे पुरुषोत्तम युग है वैसे यह पुरुषार्थ और परिवर्तन के गोल्डन चांस का वर्ष है इसलिए विशेष हिम्मत और मदद के इस विशेष वरदान के वर्ष को साधारण 50 वर्ष के समान नहीं गंवाना। अभी तक बाप स्नेह के सागर बन सर्व सम्बन्ध के स्नेह में, अलबेलापन, साधारण पुरुषार्थ इसको देखते-सुनते भी न सुन, न देख बच्चों को स्नेह की एक्स्ट्रा मदद से, एक्स्ट्रा मार्क्स देकर बढ़ा रहे हैं। लिफ्ट दे रहे हैं। लेकिन अभी समय परिवर्तन हो रहा है। इसलिए अभी कर्मों की गति को अच्छी तरह से समझ समय का लाभ लो। सुनाया था ना कि 18वाँ अध्याय आरम्भ हो गया है। 18 अध्याय की विशेषता – अब स्मृति स्वरूप बनो। अभी स्मृति, अभी विस्मृति नहीं। स्मृति स्वरूप अर्थात् बहुतकाल स्मृति स्वत: और सहज रहे। अभी युद्ध के संस्कार, मेहनत के संस्कार, मन को मुँझाने के संस्कार इसकी समाप्ति करो। नहीं तो यही बहुतकाल के संस्कार बन अन्त मति सो भविष्य गति प्राप्त कराने के निमित्त बन जायेंगे। सुनाया ना अभी बहुतकाल के पुरुषार्थ का समय समाप्त हो रहा है और बहुतकाल की कमजोरी का हिसाब शुरू हो रहा है। समझ में आया! इसलिए यह विशेष परिवर्तन का समय है। अभी वरदाता है फिर हिसाब-किताब करने वाले बन जायेंगे। अभी सिर्फ स्नेह का हिसाब है। तो क्या करना है! स्मृति स्वरूप बनो। स्मृति स्वरूप स्वत: ही नष्टोमोहा बना ही देगा। अभी तो मोह की लिस्ट बड़ी लम्बी हो गई है। एक स्व की प्रवृत्ति, एक दैवी परिवार की प्रवृत्ति, सेवा की प्रवृत्ति, हद के प्राप्तियों की प्रवृत्ति – इन सभी से नष्टोमोहा अर्थात् न्यारा बन प्यारा बनो। मैं-पन अर्थात् मोह, इससे नष्टोमोहा बनो। तब बहुतकाल के पुरूषार्थ से बहुतकाल के प्रालब्ध की प्राप्ति के अधिकारी बनेंगे। बहुतकाल अर्थात् आदि से अन्त तक की प्रालब्ध का फल। वैसे तो एक-एक प्रवृत्ति से निवृत्त होने का राज़ भी अच्छी तरह से जानते हो और भाषण भी अच्छा कर सकते हो। लेकिन निवृत्त होना अर्थात् नष्टोमोहा होना। समझा! प्वॉइंट्स तो आपके पास बापदादा से भी ज्यादा हैं इसलिए प्वाइंट्स क्या सुनायें, प्वाइंट्स तो हैं अब प्वॉइन्ट बनो।
“पुरुषार्थ और परिवर्तन का गोल्डन चांस – 1986 का महावर्ष”
(अव्यक्त मुरली 20-01-1986 पर आधारित)
भूमिका : समर्थ बाप समर्थ बच्चों को देख रहे हैं
बापदादा कहते हैं —
आज समर्थ बाप अपने समर्थ बच्चों को देख रहे हैं।
जिन आत्माओं ने विश्व को नया श्रेष्ठ विश्व बनाने का दृढ़ संकल्प लिया है।
हर आत्मा को शान्त और सुखी बनाने का संकल्प लिया है।
यह कोई साधारण सेवा नहीं, यह परमात्म कार्य है।
और परमात्म कार्य कभी असफल नहीं होता।
अध्याय 1 : भावी अटल है – हुआ ही पड़ा है
दुनिया सोचती है –
“शान्ति कैसे आएगी?”
“परिवर्तन होगा भी या नहीं?”
लेकिन आप आत्माएँ कहती हो —
“होगा नहीं, हुआ ही पड़ा है।”
उदाहरण:
जैसे सूर्य उदय होने वाला हो तो अंधकार डराता है,
लेकिन जिन्हें सुबह का ज्ञान है वे निश्चिन्त रहते हैं।
वैसे ही —
दुनिया विनाश की काली घटाएँ देख रही है
और आप स्वर्णिम सूर्य को देख रहे हो।
अध्याय 2 : स्व-परिवर्तन ही सबसे बड़ा प्रमाण है
आपका अटल निश्चय क्यों है?
क्योंकि आपने स्वयं में परिवर्तन देखा है।
क्रोध कम हुआ
अहंकार कम हुआ
व्यर्थ चिंतन कम हुआ
स्मृति बढ़ी
प्रत्यक्ष प्रमाण के आगे कोई और प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
अध्याय 3 : सम्पूर्णता और समानता की पुकार
बापदादा कह रहे हैं —
अब इस वर्ष
“सम्पूर्णता और समानता” का समीप अनुभव करना है।
सम्पूर्णता विजय माला लेकर आपको बुला रही है।
बाप का निमंत्रण:
आओ श्रेष्ठ आत्मायें
आओ समान बच्चे
आओ समर्थ बच्चे
और अपने स्वीट होम में विश्राम करो
अध्याय 4 : फरिश्ता बनो – वरदाता बनो
अब लक्ष्य है —
फरिश्ता स्वरूप
वरदाता स्वरूप
विधाता स्वरूप
फरिश्ता क्या करता है?
सदा देता है — लेता नहीं।
देवता भी देता है, लेता नहीं।
इसलिए लेवता नहीं, देवता बनो।
महामंत्र:
“फरिश्ता सो देवता”
अध्याय 5 : यह 18वाँ अध्याय चल रहा है
बापदादा कहते हैं —
अब 18वाँ अध्याय शुरू हो गया है।
अर्थात —
अब स्मृति स्वरूप बनो
अभी स्मृति, विस्मृति नहीं
अब युद्ध नहीं, स्थिति चाहिए
अब मेहनत नहीं, सहज स्थिति चाहिए
अध्याय 6 : बहुतकाल समाप्त — अल्पकाल आरम्भ
अब बहुतकाल का पुरुषार्थ समाप्त हो रहा है
और अल्पकाल का पुरुषार्थ आरम्भ हो रहा है।
अब यह मत सोचो —
“अभी 15 साल हैं”
“अभी 20 साल हैं”
“99 में होगा”
समय समीप है
परिवर्तन काल चल रहा है
यही गोल्डन चांस है
अध्याय 7 : यह वर्ष एक्स्ट्रा गोल्डन चांस का वर्ष है
जैसे पुरुषोत्तम युग होता है
वैसे यह वर्ष है —
पुरुषार्थ और परिवर्तन का पुरुषोत्तम वर्ष
बापदादा एक्स्ट्रा मदद दे रहे हैं
एक्स्ट्रा मार्क्स दे रहे हैं
लिफ्ट दे रहे हैं
लेकिन अब समय बदल रहा है।
अब कर्मों का हिसाब खुलेगा।
अध्याय 8 : नष्टोमोहा बनो – न्यारे और प्यारे बनो
आज मोह की लिस्ट बहुत लंबी हो गई है —
स्व की प्रवृत्ति
परिवार की प्रवृत्ति
सेवा की प्रवृत्ति
हद की प्राप्तियाँ
इन सबसे न्यारे बनो
प्यारे बनो
नष्टोमोहा बनो
अध्याय 9 : प्वाइंट्स नहीं, प्वाइंट बनो
बापदादा कहते हैं —
तुम्हारे पास प्वाइंट्स बहुत हैं
लेकिन अब प्वाइंट बनो
ज्ञान बोलने वाला नहीं
ज्ञान जीने वाला बनो
मुरली नोट्स (Reference)
अव्यक्त मुरली – 20 जनवरी 1986
मुख्य मुरली वाक्य:
-
यह वर्ष पुरुषार्थ और परिवर्तन का गोल्डन चांस है
-
भावी अटल है — हुआ ही पड़ा है
-
स्मृति स्वरूप बनो
-
फरिश्ता सो देवता बनो
-
नष्टोमोहा बनो
-
बहुतकाल समाप्त, अल्पकाल आरम्भ
समापन संदेश
आज नहीं तो कल बदलना ही है
तो आज ही बदल जाएँ
क्योंकि यह साधारण समय नहीं है
यह परिवर्तन काल है
यह गोल्डन चांस है
यह पुरुषोत्तम पुरुषार्थ का समय है
समर्थ बाप समर्थ बच्चों को देख रहे हैं
प्रश्न 1: बापदादा आज किन बच्चों को देख रहे हैं?
उत्तर:
बापदादा आज समर्थ बाप बनकर अपने समर्थ बच्चों को देख रहे हैं —
वे आत्माएँ जिन्होंने विश्व को नया श्रेष्ठ विश्व बनाने का दृढ़ संकल्प लिया है और हर आत्मा को शान्त व सुखी बनाने का संकल्प किया है।
प्रश्न 2: यह सेवा साधारण क्यों नहीं है?
उत्तर:
क्योंकि यह आत्माओं का नहीं, बल्कि परमात्मा का कार्य है।
और परमात्म कार्य कभी असफल नहीं होता।
अध्याय 1 : भावी अटल है – हुआ ही पड़ा है
प्रश्न 3: दुनिया परिवर्तन को लेकर क्या सोचती है?
उत्तर:
दुनिया सोचती है —
“शान्ति कैसे आएगी?”
“परिवर्तन होगा भी या नहीं?”
प्रश्न 4: आप आत्माओं का निश्चय क्या है?
उत्तर:
आप आत्माएँ कहती हो —
“होगा नहीं, हुआ ही पड़ा है।”
प्रश्न 5: इसका उदाहरण क्या है?
उत्तर:
जैसे सूर्य उदय होने वाला हो तो अंधकार डराता है,
लेकिन जिन्हें सुबह का ज्ञान है वे निश्चिन्त रहते हैं।
वैसे ही दुनिया विनाश की काली घटाएँ देख रही है
और आप स्वर्णिम सूर्य को देख रहे हो।
अध्याय 2 : स्व-परिवर्तन ही सबसे बड़ा प्रमाण है
प्रश्न 6: हमारा अटल निश्चय क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि हमने स्वयं में परिवर्तन देखा है।
क्रोध कम हुआ
अहंकार कम हुआ
व्यर्थ चिंतन कम हुआ
स्मृति बढ़ी
प्रश्न 7: स्व-परिवर्तन क्यों सबसे बड़ा प्रमाण है?
उत्तर:
क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण के आगे किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।
अध्याय 3 : सम्पूर्णता और समानता की पुकार
प्रश्न 8: इस वर्ष बापदादा हमें क्या अनुभव कराना चाहते हैं?
उत्तर:
इस वर्ष “सम्पूर्णता और समानता” का समीप अनुभव कराना चाहते हैं।
प्रश्न 9: सम्पूर्णता किस रूप में हमें बुला रही है?
उत्तर:
सम्पूर्णता विजय माला लेकर हमें बुला रही है —
आओ श्रेष्ठ आत्मायें,
आओ समान बच्चे,
आओ समर्थ बच्चे
और अपने स्वीट होम में विश्राम करो।
अध्याय 4 : फरिश्ता बनो – वरदाता बनो
प्रश्न 10: इस समय हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए?
उत्तर:
फरिश्ता स्वरूप
वरदाता स्वरूप
विधाता स्वरूप
प्रश्न 11: फरिश्ता क्या करता है?
उत्तर:
फरिश्ता सदा देता है — लेता नहीं।
प्रश्न 12: देवता किसे कहते हैं?
उत्तर:
जो सदा देता है, लेता नहीं।
इसलिए लेवता नहीं, देवता बनो।
प्रश्न 13: इस समय का महामंत्र क्या है?
उत्तर:
“फरिश्ता सो देवता”
अध्याय 5 : यह 18वाँ अध्याय चल रहा है
प्रश्न 14: 18वाँ अध्याय शुरू होने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
अब स्मृति स्वरूप बनने का समय है।
अब युद्ध नहीं, स्थिति चाहिए।
अब मेहनत नहीं, सहज स्थिति चाहिए।
अध्याय 6 : बहुतकाल समाप्त — अल्पकाल आरम्भ
प्रश्न 15: अब समय की स्थिति क्या है?
उत्तर:
अब बहुतकाल का पुरुषार्थ समाप्त हो रहा है
और अल्पकाल का पुरुषार्थ आरम्भ हो रहा है।
प्रश्न 16: हमें कैसी सोच छोड़नी चाहिए?
उत्तर:
यह सोचना छोड़ दो —
“अभी 15 साल हैं”
“अभी 20 साल हैं”
“99 में होगा”
क्योंकि समय समीप है और परिवर्तन काल चल रहा है।
अध्याय 7 : यह वर्ष एक्स्ट्रा गोल्डन चांस का वर्ष है
प्रश्न 17: यह वर्ष विशेष क्यों है?
उत्तर:
यह पुरुषार्थ और परिवर्तन का पुरुषोत्तम वर्ष है।
बापदादा एक्स्ट्रा मदद दे रहे हैं,
एक्स्ट्रा मार्क्स दे रहे हैं,
लिफ्ट दे रहे हैं।
प्रश्न 18: अब किस बात का हिसाब खुलेगा?
उत्तर:
अब कर्मों का हिसाब खुलेगा।
अध्याय 8 : नष्टोमोहा बनो – न्यारे और प्यारे बनो
प्रश्न 19: आज मोह किन-किन रूपों में बढ़ गया है?
उत्तर:
स्व की प्रवृत्ति
परिवार की प्रवृत्ति
सेवा की प्रवृत्ति
हद की प्राप्तियाँ
प्रश्न 20: समाधान क्या है?
उत्तर:
इन सबसे न्यारे बनो,
प्यारे बनो,
नष्टोमोहा बनो।
अध्याय 9 : प्वाइंट्स नहीं, प्वाइंट बनो
प्रश्न 21: बापदादा हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं?
उत्तर:
प्वाइंट्स सुनाने वाले नहीं,
प्वाइंट बनने वाले बनो।
ज्ञान बोलने वाले नहीं,
ज्ञान जीने वाले बनो।
मुरली नोट्स (Reference)
अव्यक्त मुरली – 20 जनवरी 1986
मुख्य मुरली वाक्य:
✔ यह वर्ष पुरुषार्थ और परिवर्तन का गोल्डन चांस है
✔ भावी अटल है — हुआ ही पड़ा है
✔ स्मृति स्वरूप बनो
✔ फरिश्ता सो देवता बनो
✔ नष्टोमोहा बनो
✔ बहुतकाल समाप्त, अल्पकाल आरम्भ
समापन प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 22: हमें आज क्या संकल्प लेना चाहिए?
उत्तर:
आज नहीं तो कल बदलना ही है,
तो आज ही बदल जाएँ।
क्योंकि यह साधारण समय नहीं,
यह परिवर्तन काल है,
यह गोल्डन चांस है,
यह पुरुषोत्तम पुरुषार्थ का समय है।
Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के अव्यक्त मुरली दिनांक 20 जनवरी 1986 पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन और आत्म-परिवर्तन के उद्देश्य से बनाया गया है।
इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समाज या संस्था की आलोचना करना नहीं है, बल्कि स्वयं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
यह वीडियो केवल आध्यात्मिक जागृति और आत्मिक उन्नति के लिए है।
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