(22)19-03-1986 “Amritvela – The time of great attainments”

AV-(22)19-03-1986 “अमृतवेला – श्रेष्ठ प्राप्तियों की वेला”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

19-03-1986 “अमृतवेला – श्रेष्ठ प्राप्तियों की वेला”

आज रूहानी बागवान अपने रूहानी रोज़ फ्लावर्स का बगीचा देख रहे हैं। ऐसा रूहानी गुलाब का बगीचा अब इस संगमयुग पर ही बापदादा द्वारा ही बनता है। बापदादा हर एक रूहानी गुलाब के फूल की रूहानियत की खुशबू और रूहानियत के खिले हुए पुष्पों की रौनक देख रहे हैं। खुशबूदार सभी हैं लेकिन किसकी खुशबू सदाकाल रहने वाली है और किसकी खुशबू थोड़े समय के लिए रहती है। कोई गुलाब सदा खिला हुआ है और कोई कब खिला हुआ कब थोड़ा-सा धूप वा मौसम के हिसाब से मुरझा भी जाते हैं। लेकिन हैं फिर भी रूहानी बागवान के बगीचे के रूहानी गुलाब। कोई-कोई रूहानी गुलाब में ज्ञान की खुशबू विशेष है। कोई में याद की खुशबू विशेष है। तो कोई में धारणा की खुशबू, कोई में सेवा की खुशबू विशेष है। कोई-कोई ऐसे भी हैं जो सर्व खुशबू से सम्पन्न हैं। तो बगीचे में सबसे पहले नज़र किसके ऊपर जायेगी? जिसकी दूर से ही खुशबू आकर्षित करेगी। उस तरफ ही सबकी नज़र पहले जाती है। तो रूहानी बागवान सदैव सभी रूहानी गुलाब के पुष्पों को देखते हैं। लेकिन नम्बरवार। प्यार भी सभी से है क्योंकि हर एक गुलाब पुष्प के अन्दर बागवान प्रति अति प्यार है। मालिक से पुष्पों का प्यार है। और मालिक का पुष्पों से प्यार है। फिर भी शोकेस में सदा रखने वाले रूहानी गुलाब वही होते जो सदा सर्व खुशबू से सम्पन्न हैं और सदा खिले हुए हैं। मुरझाये हुए कभी नहीं। रोज अमृतवेले बापदादा स्नेह और शक्ति की विशेष पालना से सभी रूहानी गुलाब के पुष्पों से मिलन मनाते हैं।

अमृतवेला विशेष प्रभू पालना की वेला है। अमृतवेले विशेष परमात्म मिलन की वेला है। रूहानी रूह-रूहान करने की वेला है। अमृतवेले भोले भण्डारी के वरदानों के खजाने से सहज वरदान प्राप्त होने की वेला है। जो गायन है मन इच्छित फल प्राप्त करना, यह इस समय अमृतवेले के समय का गायन है। बिना मेहनत के खुले खजाने प्राप्त करने की वेला है। ऐसे सुहावने समय को अनुभव से जानते हो ना। अनुभवी ही जानें इस श्रेष्ठ सुख को, श्रेष्ठ प्राप्तियों को। तो बापदादा सभी रूहानी गुलाब को देख-देख हर्षित हो रहे हैं। बापदादा भी कहते हैं वाह मेरे रूहानी गुलाब। आप वाह-वाह के गीत गाते तो बापदादा भी यही गीत गाते। समझा!

मुरलियाँ तो बहुत सुनी हैं। सुन-सुनकर सम्पन्न बन गये हो। अभी महादानी बन बांटने के प्लैन बना रहे हो। यह उमंग बहुत अच्छा है। आज यू.के. अर्थात् ओ.के. रहने वालों का टर्न है। डबल विदेशियों का एक शब्द सुन करके बापदादा सदा मुस्कराते रहते हैं। कौन-सा? थैंक यू। थैंक यू करते हुए भी बाप को भी याद करते रहते हैं क्योंकि सबसे पहले शुक्रिया दिल से बाप का ही मानते हैं। तो जब किसी को भी थैंक-यू करते तो पहले बाप याद आयेगा ना! ब्राह्मण जीवन में पहला शुक्रिया स्वत: ही बाप के प्रति निकलता है। उठते-बैठते अनेक बार थैंक-यू कहते हो – यह भी एक विधि है बाप को याद करने की। यू.के. वाले सर्व भिन्न-भिन्न हद की शक्तियों वालों को मिलाने के निमित्त बने हुए हो ना। अनेक प्रकार के नॉलेज की शक्तियाँ हैं। भिन्न-भिन्न शक्ति वाले, भिन्न-भिन्न वर्ग वाले, भिन्न-भिन्न धर्म वाले, भाषा वाले सभी को मिलाकर एक ही ब्राह्मण वर्ग में लाना, ब्राह्मण धर्म में, ब्राह्मण भाषा में आना। ब्राह्मणों की भाषा भी अपनी है। जो नये समझ भी नहीं सकते कि यह क्या बोलते हैं। तो ब्राह्मणों की भाषा, ब्राह्मणों की डिक्शनरी ही अपनी है। तो यू.के. वाले सभी को एक बनाने में बिजी रहते हो ना। संख्या भी अच्छी है और स्नेह भी अच्छा है हर एक स्थान की अपनी-अपनी विशेषता तो है ही है लेकिन आज यू.के.का सुना रहे हैं। यज्ञ स्नेही, यज्ञ सहयोगी यह विशेषता अच्छी दिखाई देती है। हर कदम पर पहले यज्ञ अर्थात् मधुबन का हिस्सा निकालने में अच्छे नम्बर में जा रहे हैं। डायरेक्ट मधुबन की याद एक स्पेशल लिफ्ट बन जाती है। हर कार्य में, हर कदम में मधुबन अर्थात् बाप की याद है या बाप की पढ़ाई है या बाप का ब्रह्मा भोजन है या बाप से मिलन है। मधुबन स्वत: ही बाप की याद दिलाने वाला है। कहाँ भी रहते मधुबन की याद आना अर्थात् विशेष स्नेह, लिफ्ट बन जाता है। चढ़ने की मेहनत से छूट जाते। सेकेण्ड में स्विच ऑन किया और पहुँचे।

बापदादा को और कोई हीरे मोती तो चाहिए नहीं। बाप को स्नेह की छोटी वस्तु ही हीरे रत्न हैं। इसलिए सुदामा के कच्चे चावल गाये हुए हैं। इसका भाव अर्थ यही है कि स्नेह की छोटी-सी सुई में भी मधुबन याद आता है। तो वह भी बहुत बड़ा अमूल्य रत्न है क्योंकि स्नेह का दाम है। वैल्यु स्नेह की है। चीज़ की नहीं। अगर कोई वैसे ही भल कितना भी दे देवे लेकिन स्नेह नहीं तो उसका जमा नहीं होता और स्नेह से थोड़ा भी जमा करे तो उनका पदम जमा हो जाता है। तो बाप को स्नेह पसन्द है। तो यू.के. वालों की विशेषता – यज्ञ स्नेही, यज्ञ सहयोगी आदि से रहे हैं। यही सहज योग भी है। सहयोग, सहज योग है। सहयोग का संकल्प आने से भी याद तो बाप की रहेगी ना। तो सहयोगी, सहज योगी स्वत: ही बन जाते हैं। योग बाप से होता, मधुबन अर्थात् बापदादा से। तो सहयोगी बनने वाले भी सहजयोग की सब्जेक्ट में अच्छे नम्बर ले लेते हैं। दिल का सहयोग बाप को प्रिय है। इसलिए यहाँ यादगार भी दिलवाला मन्दिर बनाया है। तो दिलवाला बाप को दिल का स्नेह, दिल का सहयोग ही प्रिय है। छोटी दिल वाले छोटा सौदा कर खुश हो जाते और बड़ी दिल वाले बेहद का सौदा करते हैं। फाउण्डेशन बड़ी दिल है तो विस्तार भी बड़ा हो रहा है। जैसे कई जगह पर वृक्ष देखे होंगे तो वृक्ष की शाखायें भी तना बन जाती हैं। तो यू.के. के फाउण्डेशन से तना निकला, शाखायें निकलीं। अब वह शाखायें भी तना बन गई। उस तना से भी शाखायें निकल रही हैं। जैसे आस्ट्रेलिया निकला, अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका निकले। सब तना बन गये। और हर एक तना की शाखायें भी अच्छी तरह से वृद्धि को पा रही हैं क्योंकि फाउण्डेशन स्नेह और सहयोग के पानी से मजबूत है। इसलिए विस्तार भी अच्छा है और फल भी अच्छे हैं।

अध्याय: अमृतवेला – श्रेष्ठ प्राप्तियों की वेला

(Avyakt Murli – 19 मार्च 1986)


 भूमिका: रूहानी बागवान और रूहानी गुलाब

आज रूहानी बागवान
अपने रूहानी रोज़ फ्लावर्स के बगीचे को देख रहे हैं।

यह बगीचा कोई साधारण बगीचा नहीं है—
यह संगमयुग का रूहानी गुलाबों का बगीचा है
जो स्वयं बापदादा द्वारा रचा गया है।

 हर आत्मा एक रूहानी गुलाब है
 हर गुलाब में खुशबू है
 लेकिन नम्बरवार खुशबू है

Murli Note (19-03-1986):
“सब खुशबूदार हैं,
परन्तु नम्बरवार।”


 रूहानी खुशबू के प्रकार

बापदादा देखते हैं—

  • किसी गुलाब में ज्ञान की खुशबू

  • किसी में याद की खुशबू

  • किसी में धारणा की खुशबू

  • किसी में सेवा की खुशबू

  • और कोई-कोई सर्व खुशबू से सम्पन्न

उदाहरण:
जैसे बगीचे में दूर से वही फूल आकर्षित करता है
जिसकी खुशबू सदा रहती है—
वैसे ही आत्मिक संसार में
सर्व गुण सम्पन्न आत्माएँ शोकेस बनती हैं।


 सदा खिले रहने वाले गुलाब कौन?

कुछ गुलाब—

  • सदा खिले रहते हैं

  • मौसम से प्रभावित नहीं होते

  • कभी मुरझाते नहीं

 यही हैं
सदा अमृतवेले वाले
सदा प्रभु पालना लेने वाले

Murli Note:
“शोकेस में वही रहते हैं
जो सदा खिले रहते हैं।”


 अमृतवेला क्या है?

अमृतवेला—

  • विशेष प्रभु पालना की वेला

  • विशेष परमात्म मिलन की वेला

  • भोले भण्डारी के खजाने खुले मिलने की वेला

  • बिना मेहनत मन-इच्छित फल पाने की वेला

Murli Note (19-03-1986):
“अमृतवेले
बिना मेहनत
खुले खजाने मिलते हैं।”

अनुभव की बात:
अमृतवेले का सुख
सिर्फ अनुभवी आत्मा ही जान सकती है।


 बापदादा और बच्चों का वाह-वाह का गीत

बच्चे—
“वाह बाबा!”

बापदादा—
“वाह मेरे रूहानी गुलाब!”

 यह है
प्यार का रेस्पॉन्स
मिलन का मधुर संवाद


 सुनने से महादानी बनने तक

आपने—

  • मुरलियाँ बहुत सुनीं

  • सुन-सुनकर सम्पन्न बने

  • अब महादानी बन बाँटने के प्लैन बना रहे हो

 यह उमंग
बापदादा को बहुत प्रिय है।


 “Thank You” – स्मृति की सहज विधि

डबल विदेशी बच्चों की विशेषता—

“Thank You”

 लेकिन ब्राह्मण जीवन में—
सबसे पहला Thank You
दिल से बाप के लिए निकलता है।

Murli Note:
“थैंक-यू कहना भी
याद की एक विधि है।”


 यू.के. की विशेषता – सबको एक बनाने वाली शक्ति

यू.के. सेवाधारी—

  • भिन्न धर्म

  • भिन्न भाषा

  • भिन्न वर्ग

  • भिन्न संस्कार

 सबको लाकर
एक ब्राह्मण धर्म
एक ब्राह्मण भाषा
में पिरो देते हैं।

 ब्राह्मणों की भाषा
दुनिया से न्यारी है।


 मधुबन – स्पेशल लिफ्ट

मधुबन—

  • बाप की याद

  • बाप की पढ़ाई

  • बाप का ब्रह्मा भोजन

  • बाप से मिलन

 जहाँ भी रहते
अगर मधुबन याद आ गया—
सेकण्ड में स्विच ऑन
ऊँचाई पर पहुँच गये

Murli Note:
“मधुबन की याद
स्पेशल लिफ्ट है।”


 स्नेह का मूल्य – सुदामा के चावल

बापदादा कहते हैं—

  • बाप को हीरे-मोती नहीं चाहिए

  • स्नेह की छोटी वस्तु ही अमूल्य है

 इसलिए—
सुदामा के कच्चे चावल गाये गये।

Murli Note:
“वैल्यू वस्तु की नहीं
स्नेह की है।”


 सहयोग ही सहज योग है

  • सहयोग का संकल्प

  • स्वतः बाप की याद

  • स्वतः सहज योग

 इसलिए—
यज्ञ सहयोगी = सहज योगी

Murli Note:
“दिल का सहयोग
बाप को प्रिय है।”


 दिलवाला मन्दिर का रहस्य

दिलवाला मन्दिर क्यों?

 क्योंकि बाप को
दिल का सौदा चाहिए।

  • छोटी दिल → छोटा सौदा

  • बड़ी दिल → बेहद का सौदा

फाउण्डेशन बड़ी दिल है
तो विस्तार भी बड़ा होगा।


 यू.के. से विश्व विस्तार का रहस्य

यू.के. से—

  • ऑस्ट्रेलिया

  • अमेरिका

  • यूरोप

  • अफ्रीका

 जैसे वृक्ष की शाखाएँ
खुद तना बन जाती हैं—

वैसे ही
स्नेह और सहयोग से
विश्व विस्तार होता है।

Murli Note:
“फाउण्डेशन मजबूत
तो फल भी श्रेष्ठ।”


 समापन संदेश

सदा—

  • अमृतवेले वाले बनो

  • सदा खिले रूहानी गुलाब बनो

  • स्नेह और सहयोग से सेवा करो

  • खुले खजानों के अधिकारी बनो

 ऐसे श्रेष्ठ आत्माओं को
बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते

प्रश्न 1: बापदादा आज किस दृश्य को देख रहे हैं?

उत्तर:
बापदादा आज अपने रूहानी रोज़ फ्लावर्स के बगीचे को देख रहे हैं।
यह संगमयुग का वह रूहानी बगीचा है,
जो स्वयं बापदादा द्वारा रचा गया है,
जहाँ हर आत्मा एक रूहानी गुलाब है।

Murli Note (19-03-1986):
“सब खुशबूदार हैं,
परन्तु नम्बरवार।”


 प्रश्न 2: रूहानी गुलाबों की खुशबू से क्या तात्पर्य है?

उत्तर:
रूहानी खुशबू का अर्थ है आत्मा के भीतर—

  • ज्ञान

  • याद

  • धारणा

  • सेवा

  • या इन सभी गुणों की सम्पन्नता

हर आत्मा में खुशबू है,
लेकिन नम्बरवार है।


 प्रश्न 3: सर्व खुशबू से सम्पन्न आत्माएँ कौन-सी कहलाती हैं?

उत्तर:
जो आत्माएँ—

  • ज्ञान, याद, धारणा और सेवा

  • चारों में संतुलित और सम्पन्न होती हैं

  • वही शोकेस आत्माएँ बनती हैं

 जैसे बगीचे में दूर से वही फूल आकर्षित करता है
जिसकी खुशबू सदा रहती है।


 प्रश्न 4: सदा खिले रहने वाले रूहानी गुलाब कौन हैं?

उत्तर:
वे आत्माएँ—

  • जो परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होतीं

  • जो सदा अमृतवेले वाले हैं

  • जो नियमित प्रभु पालना लेते हैं

Murli Note:
“शोकेस में वही रहते हैं
जो सदा खिले रहते हैं।”


 प्रश्न 5: अमृतवेला क्या है?

उत्तर:
अमृतवेला—

  • विशेष प्रभु पालना की वेला है

  • विशेष परमात्म मिलन की वेला है

  • भोले भण्डारी से खुले खजाने लेने की वेला है

  • बिना मेहनत मन-इच्छित फल प्राप्त करने की वेला है

Murli Note (19-03-1986):
“अमृतवेले
बिना मेहनत
खुले खजाने मिलते हैं।”


 प्रश्न 6: अमृतवेले का सुख कौन जान सकता है?

उत्तर:
अमृतवेले का वास्तविक सुख
केवल वही आत्मा जान सकती है
जो स्वयं अमृतवेले का अनुभव करती है।
यह अनुभव शब्दों से नहीं,
स्थिति से जाना जाता है।


 प्रश्न 7: बापदादा और बच्चों के बीच “वाह-वाह” का क्या रहस्य है?

उत्तर:
जब बच्चे कहते हैं—
“वाह बाबा!”

तो बापदादा कहते हैं—
“वाह मेरे रूहानी गुलाब!”

 यह प्यार का रेस्पॉन्स
और मिलन का मधुर संवाद है।


प्रश्न 8: सुनने से महादानी बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर:
बच्चों ने—

  • मुरलियाँ सुनीं

  • सुन-सुनकर स्वयं सम्पन्न बने

  • अब महादानी बनकर
    दूसरों को देने के प्लैन बना रहे हैं

 यह उमंग बापदादा को बहुत प्रिय है।


 प्रश्न 9: “Thank You” कहना याद की विधि कैसे है?

उत्तर:
डबल विदेशी बच्चों की विशेषता है—
“Thank You”

लेकिन ब्राह्मण जीवन में
सबसे पहला Thank You
स्वतः दिल से बाप के लिए निकलता है।

Murli Note:
“थैंक-यू कहना भी
याद की एक विधि है।”


 प्रश्न 10: यू.के. सेवाधारियों की मुख्य विशेषता क्या है?

उत्तर:
यू.के. के सेवाधारी—

  • भिन्न धर्म

  • भिन्न भाषा

  • भिन्न वर्ग

  • भिन्न संस्कार

 सबको लाकर
एक ब्राह्मण धर्म और ब्राह्मण भाषा
में पिरो देते हैं।


 प्रश्न 11: मधुबन को “स्पेशल लिफ्ट” क्यों कहा गया है?

उत्तर:
मधुबन—

  • बाप की याद

  • बाप की पढ़ाई

  • बाप का ब्रह्मा भोजन

  • बाप से मिलन

जहाँ भी रहते
अगर मधुबन याद आ गया—
तो सेकण्ड में स्विच ऑन
और आत्मा ऊँचाई पर पहुँच जाती है।

Murli Note:
“मधुबन की याद
स्पेशल लिफ्ट है।”


 प्रश्न 12: स्नेह का मूल्य सुदामा के चावल से कैसे स्पष्ट होता है?

उत्तर:
बापदादा कहते हैं—

  • बाप को हीरे-मोती नहीं चाहिए

  • स्नेह की छोटी वस्तु भी अमूल्य है

इसलिए सुदामा के
कच्चे चावल गाये गये।

Murli Note:
“वैल्यू वस्तु की नहीं
स्नेह की है।”


 प्रश्न 13: सहयोग को सहज योग क्यों कहा गया है?

उत्तर:
जब आत्मा सहयोगी बनती है—

  • स्वतः बाप की याद रहती है

  • स्वतः योग की स्थिति बनती है

 इसलिए—
यज्ञ सहयोगी = सहज योगी

Murli Note:
“दिल का सहयोग
बाप को प्रिय है।”


 प्रश्न 14: दिलवाला मन्दिर का गूढ़ रहस्य क्या है?

उत्तर:
दिलवाला मन्दिर इस बात का संकेत है कि—

  • बाप को दिल का सौदा चाहिए

  • वस्तु नहीं, भावना चाहिए

 छोटी दिल → छोटा सौदा
 बड़ी दिल → बेहद का सौदा


 प्रश्न 15: यू.के. से विश्व विस्तार कैसे हुआ?

उत्तर:
यू.के. से—

  • ऑस्ट्रेलिया

  • अमेरिका

  • यूरोप

  • अफ्रीका

 जैसे वृक्ष की शाखाएँ
खुद तना बन जाती हैं—
वैसे ही स्नेह और सहयोग से
विश्व विस्तार होता है।

Murli Note:
“फाउण्डेशन मजबूत
तो फल भी श्रेष्ठ।”


 प्रश्न 16: इस मुरली का मुख्य समापन संदेश क्या है?

उत्तर:
बापदादा का संदेश है—

  • सदा अमृतवेले वाले बनो

  • सदा खिले रूहानी गुलाब बनो

  • स्नेह और सहयोग से सेवा करो

  • खुले खजानों के अधिकारी बनो

 ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को
बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्मा कुमारीज़ की अव्यक्त मुरली (19 मार्च 1986) पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्म-उन्नति हेतु प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति और विश्व कल्याण का संदेश देना है।

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