क्या श्री कृष्ण भगवान थे?
Creaate YouTube वीडियो & disclamer, डिस्क्रिप्शन और हैशटैग्स “आज हम इसका 17वाँ विषय कर रहे हैं। आज का विषय है —
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
पूज्य से पुजारी तक आत्मा की 84 जन्मों की गहन यात्रा।
डिस्क्लेमर
यह प्रस्तुति ब्रह्मा कुमारी की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है। इसका उद्देश्य किसी देवी-देवता, धर्म या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह विषय आत्मा की यात्रा, योग अवस्था, भोग अवस्था और विश्व ड्रामा की आध्यात्मिक समझ पर आधारित है। दर्शक इसे श्रद्धा एवं मनन की भावना से सुनें।
एक अत्यंत गहरा प्रश्न।
आज हम एक बहुत सूक्ष्म और गहन प्रश्न पर मनन करेंगे —
क्या श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनती है?
क्या वही आत्मा जो सतयुग में सर्वोच्च पवित्र और दिव्य है, धीरे-धीरे भोग प्रधान अवस्था में आती है?
यदि ऐसा है तो यह परिवर्तन कैसे होता है?
सुंदर कृष्ण से श्याम कृष्ण कैसे बनता है?
गोरे से काला कैसे बनता है?
यह परिवर्तन कैसे होता है?
आज हम आत्मा की पूर्ण यात्रा समझेंगे।
कैसे श्री कृष्ण की सतोप्रधान आत्मा धीरे-धीरे तमोप्रधान बनती है।
सतोप्रधान आत्मा तमोप्रधान कैसे बनती है — इसे हम ध्यानपूर्वक समझने का प्रयास करेंगे।
योग से भोग — और फिर भोग से पुनः योग।
पहले देखेंगे सुंदर से श्याम कैसे होता है, फिर देखेंगे श्याम से सुंदर कैसे बनता है।
योगेश्वर अवस्था क्या है?
सबसे पहले समझें — योगेश्वर अवस्था क्या है?
जब योगेश्वर अवस्था होती है तो आत्मस्मृति होती है।
योगेश्वर किसे कहते हैं?
योग + ईश्वर।
जो ईश्वर से योग लगाए — वह योगेश्वर।
श्री कृष्ण की आत्मा योगेश्वर होती है।
ईश्वर अर्थात स्वामी।
आत्मा योग का स्वामी बनती है। परमात्मा से संबंध जोड़ने में समर्थ बनती है।
देह से नहीं — आत्मा से संबंध।
जब तक मैं स्वयं को आत्मा नहीं समझूँगा, तब तक परमात्मा से संबंध नहीं जोड़ सकता।
जब कृष्ण जन्म ले लेता है, तब वह परमात्मा से योग नहीं करता।
उसका परमात्म संबंध उसके पूर्व जन्म में — संगम युग में होता है।
पहले आत्मस्मृति।
दूसरा — परमात्म संबंध।
फिर — पवित्रता।
फिर — संतोष।
फिर सहज आनंद।
सर्वगुण संपन्न, 16 कला संपूर्ण, संपूर्ण निर्विकारी — यह अवस्था संगम पर बनती है।
योग से शक्ति मिलती है।
आत्मा जब योग में रहती है तो इच्छा सीमित होती है, मन स्थिर होता है, संबंध मधुर होते हैं।
योगेश्वर अवस्था संगम पर बनती है।
परमपिता परमात्मा पूरे कल्प में केवल संगम पर आते हैं।
कृष्ण की आत्मा संगम पर परमात्मा से गुण, ज्ञान और शक्तियाँ प्राप्त करती है।
फिर सतयुग में कृष्ण के रूप में जन्म लेती है।
जब कृष्ण के रूप में जन्म लेता है, तब उसे आत्मस्मृति तो होती है, परंतु परमात्म स्मृति नहीं होती।
उसे यह याद नहीं रहता कि उसने यह सब कैसे प्राप्त किया।
सतयुग की अवस्था
सतयुग में दुख नहीं, संघर्ष नहीं, विकार नहीं।
सहज संतोष है।
राधा-कृष्ण बड़े होकर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं।
विवाह के बाद नाम परिवर्तन होता है।
सतयुग में देवता पवित्र हैं।
यह योग का परिणाम है — योगाभ्यास नहीं, योग का फल है।
संगम पर परीक्षा।
सतयुग में परिणाम।
टॉपर परीक्षा के बाद पढ़ाई नहीं करता — फल भोगता है।
ठीक वैसे ही — संगम पर योगेश्वर, सतयुग में फल।
पतन की शुरुआत
अब पतन कैसे होता है?
सतयुग से त्रेता।
त्रेता से द्वापर।
द्वापर से कलयुग।
आत्मा हर सीढ़ी पर थोड़ा-थोड़ा गिरती है।
पतन अचानक नहीं होता।
पहले सूक्ष्म स्मृति कम होती है।
फिर देह-अभिमान आता है।
फिर इच्छाएँ बढ़ती हैं।
फिर विकार प्रवेश करते हैं।
देह-अभिमान ही दुख का कारण है।
जैसे सूर्य अचानक नहीं डूबता —
धीरे-धीरे प्रकाश घटता है, अंधकार बढ़ता है।
वैसे ही चेतना गिरती है।
भोगेश्वर अवस्था
भोगेश्वर अवस्था क्या है?
बाहरी सुख पर निर्भरता।
इंद्रिय प्रधानता।
तुलना।
असंतोष।
निर्विकारी से विकारी।
पावन से पतित।
शास्त्रों में प्रतीक रूप से दिखाया —
सुंदर कृष्ण श्याम हो गया।
पाँच मुख वाले सर्प का जहर — पाँच विकारों का प्रतीक।
काली देह में कूदना — पतित शरीर में आना।
84 जन्मों की यात्रा
कृष्ण का नाम एक बार रखा जाता है।
पर आत्मा 84 जन्म लेती है।
सतयुग में पूज्य।
त्रेता में पूज्य।
द्वापर में पूजनीय।
कलयुग में पुजारी।
पूज्य — प्रत्यक्ष योग्य।
पूजनीय — जिसकी मूर्ति की पूजा हो।
पुजारी — जो स्वयं पूजा करे।
यही पूज्य से पुजारी की यात्रा है।
क्या यह दोष है?
नहीं।
यह ड्रामा है।
बना-बनाया, एक्यूरेट ड्रामा।
5000 वर्ष बाद हूबहू रिपीट।
अनगिनत बार कृष्ण की आत्मा योगेश्वर से भोगेश्वर बनी है —
और फिर भोगेश्वर से योगेश्वर बनी है।
अंतिम चिंतन
यह पतन समझना है — दोष नहीं, ड्रामा है।
योगेश्वर अवस्था संगम पर बनती है।
भोगेश्वर अवस्था गिरावट की प्रक्रिया है।
प्रश्न यह नहीं कि कृष्ण क्या बना।
प्रश्न यह है —
हम अभी क्या हैं?
क्या हम योगेश्वर बन रहे हैं?
या भोगेश्वर की ओर जा रहे हैं?
