The Secret Mystery from Swaraj to World State |

“स्वराज्य से विश्व राज्य तक का गुप्त रहस्य |

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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अध्याय : स्वराज्य से विश्व राज्य तक का गुप्त रहस्य

(बाबा के दिल तख्त का अधिकारी कौन बन सकता है?)

प्रस्तावना : क्या मैं बाबा के दिल तख्त पर बैठा हूं?

यदि आज स्वयं शिव बाबा हमारे सामने आकर पूछें – “बच्चे, क्या तुम मेरे दिल तख्त पर बैठे हुए हो?” – तो शायद हममें से अधिकांश का उत्तर होगा – “बाबा, मैं रोज मुरली सुनता हूं, अमृतवेले योग करता हूं, सेवा भी करता हूं।”

लेकिन क्या केवल मुरली सुन लेना, योग करना और सेवा करना ही पर्याप्त है? यदि ऐसा होता, तो बाबा बार-बार “स्वराज्य अधिकारी बनो” क्यों कहते?

आज की मुरली में एक अत्यंत गहरा रहस्य छिपा हुआ है। बाबा कहते हैं कि परमात्म तख्त ब्राह्मण आत्माओं के लिए है, लेकिन कौन-सी ब्राह्मण आत्माओं के लिए? केवल नामधारी, सेंटर जाने वाली और मुरली सुनने वाली आत्माओं के लिए नहीं, बल्कि उन आत्माओं के लिए जिन्होंने अपने मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मेंद्रियों पर राज्य स्थापित कर लिया है।

इसी स्वराज्य का परिणाम विश्व राज्य है।


स्वराज्य क्या है?

स्वराज्य का अर्थ है – स्वयं पर राज्य करना।

अपने मन को जहां चाहें, वहां लगाना और जहां न चाहें, वहां से हटा लेना। अपनी बुद्धि को व्यर्थ से बचाकर श्रेष्ठ संकल्पों में लगाना। अपने संस्कारों को विकारों के प्रभाव से मुक्त रखना और अपनी कर्मेंद्रियों को श्रीमत के अनुसार चलाना – यही वास्तविक स्वराज्य है।

दुनिया में करोड़ों लोग दूसरों पर शासन करना चाहते हैं, लेकिन स्वयं पर शासन नहीं कर पाते। कोई क्रोध का दास है, कोई लोभ का, कोई आलस्य का, कोई देह-अभिमान का।

जिसने स्वयं पर विजय नहीं पाई, वह संसार को क्या दिशा देगा?


बाबा के दिल तख्त का अधिकारी कौन?

बाबा पूछते हैं – “दिल तख्त पर कौन बैठ सकता है?”

उत्तर है – “स्वयं को राजा बनाने वाला।”

सिर्फ ज्ञान सुनने वाला नहीं, बल्कि ज्ञान स्वरूप बनने वाला।

मुरली कोटेशन

“स्वराज्य अधिकारी बच्चे ही विश्व राज्य के अधिकारी बनते हैं।”
– साकार मुरली

मुरली कोटेशन

“ज्ञान सुनने वाले नहीं, ज्ञान स्वरूप बनने वाले ही बाप के दिलतख्त-नशीन बनते हैं।”
– अव्यक्त मुरली

दिल तख्त कोई पुरस्कार नहीं है। यह आत्मा की प्राप्त की हुई योग्यता का प्रमाण है।


दिल तख्त मांगने से नहीं, योग्यता से मिलता है

जैसे विश्वविद्यालय में गोल्ड मेडल केवल इच्छा करने से नहीं मिलता, बल्कि वर्षों की मेहनत, अनुशासन और योग्यता से प्राप्त होता है, वैसे ही बाबा का दिल तख्त भी केवल प्रार्थना, स्तुति या इच्छा करने से नहीं मिलता।

आज संसार के लोग सोचते हैं कि भगवान की प्रशंसा कर लें, पूजा कर लें, भेंट चढ़ा दें तो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे।

लेकिन परमात्मा को हमारी प्रशंसा नहीं चाहिए।

परमात्मा को चाहिए – परिवर्तन।

जब आत्मा क्रोध पर विजय प्राप्त करती है, काम विकार को जीतती है, लोभ को समाप्त करती है, देह-अभिमान से ऊपर उठती है और श्रीमत पर चलती है, तब वह स्वतः बाबा के दिल में स्थान बना लेती है।


सूक्ष्म शक्तियों और कर्मेंद्रियों पर राज्य

बाबा कहते हैं कि अपनी सूक्ष्म शक्तियों और कर्मेंद्रियों को श्रीमत अनुसार चलाने वाला ही दिल तख्त का अधिकारी है।

हमारे अंदर अनेक सूक्ष्म शक्तियां हैं –

  • निर्णय शक्ति
  • परख शक्ति
  • सामना करने की शक्ति
  • समेटने की शक्ति
  • सहयोग देने की शक्ति
  • सहन शक्ति

जब ये शक्तियां जागृत होती हैं, तब कर्मेंद्रियां स्वतः नियंत्रण में आ जाती हैं।

यदि मन भटक रहा है, आंखें व्यर्थ देख रही हैं, जिह्वा व्यर्थ बोल रही है, कान व्यर्थ सुन रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि अभी स्वराज्य स्थापित नहीं हुआ।

स्वराज्य का अर्थ है – राजा आत्मा और सेवक कर्मेंद्रियां।


वैज्ञानिक उदाहरण : ट्रांसमीटर और रिसीवर

यदि किसी मोबाइल में नेटवर्क कमजोर हो जाए, तो हम मोबाइल टावर को दोष नहीं देते। हम समझते हैं कि समस्या फोन की स्थिति, नेटवर्क सेटिंग या रिसीवर में है।

ठीक इसी प्रकार शिव बाबा सदैव शक्तिशाली ट्रांसमीटर हैं।

परमात्मा की शक्ति, प्रेम और शांति कभी कम नहीं होती।

कमी हमारे रिसीवर में हो सकती है।

जब आत्मा का रिसीवर शुद्ध, शांत, पवित्र और एकाग्र हो जाता है, तब बाबा के दिल का कनेक्शन स्वतः स्थापित हो जाता है।

उस समय आत्मा को अलग से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि “बाबा, क्या मैं आपके दिल में हूं?”

उसकी स्थिति स्वयं उत्तर बन जाती है।


अपने अंदर परिवर्तन लाओ, दुनिया बदलती नजर आएगी

मनुष्य संसार को बदलना चाहता है, लेकिन स्वयं को बदलना नहीं चाहता।

बाबा कहते हैं –

“पहले स्वयं बदलो, फिर संसार बदलता दिखाई देगा।”

जब एक व्यक्ति क्रोध छोड़ देता है, उसके परिवार का वातावरण बदल जाता है।

जब एक माता शांति स्वरूप बन जाती है, पूरा घर शांत हो जाता है।

जब एक शिक्षक प्रेम और धैर्य से पढ़ाता है, सैकड़ों बच्चों का भविष्य बदल जाता है।

परिवर्तन बाहर से नहीं, भीतर से प्रारम्भ होता है।

विश्व परिवर्तन का पहला कदम आत्म परिवर्तन है।


स्वराज्य से विश्व राज्य तक

हम सतयुग का दृश्य देखते हैं। वहां न हिंदू होंगे, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई, न बौद्ध। वहां सभी एक परिवार होंगे।

वहां शांति होगी।
वहां एकता होगी।
वहां सुख-समृद्धि होगी।
वहां देवी-देवता धर्म होगा।

लेकिन प्रश्न यह है कि उस विश्व राज्य का अधिकारी कौन बनेगा?

उत्तर स्पष्ट है –

जो यहां स्वयं का राजा बनता है, वही वहां विश्व का राजा बनता है।

जो यहां अपने मन पर राज्य नहीं कर सकता, वह वहां राज्य कैसे करेगा?

जो यहां अपनी कर्मेंद्रियों का मालिक नहीं बन सकता, वह विश्व का मालिक कैसे बनेगा?

इसलिए बाबा कहते हैं –

“स्वराज्य ही विश्व राज्य का आधार है।”


बाबा का दिल जीतना ही विश्व का तख्त जीतना है

दिल तख्त और विश्व तख्त अलग-अलग नहीं हैं।

दिल तख्त विश्व राज्य का प्रवेश द्वार है।

जो निरंतर बाबा के दिल तख्त पर बैठता है, उसका सतयुग में राज्य भी निरंतर होता है।

जो यहां कभी-कभी स्वराज्य में रहता है और कभी विकारों का दास बन जाता है, उसका राज्य भी उतना ही सीमित होता है।

स्वराज्य की निरंतरता ही विश्व राज्य की निरंतरता बनती है।


अंतिम निष्कर्ष

दिल तख्त कोई सम्मान नहीं, बल्कि आत्मा की अर्जित की हुई योग्यता का प्रमाण है।

जब आत्मा अपनी सूक्ष्म शक्तियों की स्वामी बन जाती है, अपनी कर्मेंद्रियों पर राज्य कर लेती है, श्रीमत पर चलती है और ज्ञान स्वरूप बन जाती है, तब वह स्वतः बाबा के दिल तख्त की अधिकारी बन जाती है।

स्वराज्य ही दिल तख्त का द्वार है।

और दिल तख्त ही विश्व राज्य का द्वार है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं कि “क्या

प्रश्न 1 : क्या बाबा किसी विशेष कृपा से हमें अपने दिल तख्त पर बैठाते हैं?

उत्तर :
नहीं। परमात्मा किसी को विशेष कृपा करके दिल तख्त पर नहीं बैठाते। परमात्मा तो ज्ञान, योग और श्रीमत का खजाना सभी आत्माओं को समान रूप से देते हैं। दिल तख्त की प्राप्ति आत्मा के पुरुषार्थ, परिवर्तन और योग्यता पर निर्भर करती है। जो आत्मा स्वयं को बदलती है, वही उस तख्त की अधिकारी बनती है।


प्रश्न 2 : वास्तविक प्रश्न क्या होना चाहिए – “क्या बाबा मुझे दिल तख्त देंगे?” या कुछ और?

उत्तर :
वास्तविक प्रश्न यह होना चाहिए –

“क्या मैंने स्वयं पर इतना राज्य स्थापित कर लिया है कि मैं उस तख्त का अधिकारी बन गया हूं?”

बाबा से प्राप्ति मांगने के बजाय हमें स्वयं को योग्य बनाने पर ध्यान देना चाहिए।


प्रश्न 3 : स्वराज्य अधिकारी किसे कहा जाता है?

उत्तर :
जो आत्मा अपने मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मेंद्रियों की स्वामी बन जाती है, वह स्वराज्य अधिकारी कहलाती है। वह परिस्थितियों की दासी नहीं रहती, बल्कि अपनी स्थिति की मालिक बन जाती है।

मुरली कोटेशन

“स्वराज्य अधिकारी ही विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं।”
— साकार मुरली, 28 जनवरी 1973


प्रश्न 4 : जो स्वयं पर राज्य नहीं कर सकता, क्या वह विश्व राज्य का अधिकारी बन सकता है?

उत्तर :
नहीं। यदि कोई आत्मा अपने क्रोध, आलस्य, मोह, देह-अभिमान और नकारात्मक संस्कारों पर विजय नहीं प्राप्त कर सकती, तो वह विश्व पर राज्य करने की अधिकारी नहीं बन सकती।

मुरली कोटेशन

“जो स्वयं पर राज्य नहीं कर सकते, वे विश्व पर राज्य करने के अधिकारी नहीं बन सकते।”
— अव्यक्त वाणी, 18 जनवरी 1980


प्रश्न 5 : विश्व में अशांति क्यों दिखाई देती है?

उत्तर :
क्योंकि अधिकांश लोग संसार को बदलना चाहते हैं, लेकिन स्वयं को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं।

पति चाहता है कि पत्नी बदल जाए।
पत्नी चाहती है कि पति बदल जाए।
माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे बदल जाएं।
देश चाहते हैं कि दूसरे देश बदल जाएं।

लेकिन बाबा का संदेश है –

“पहले स्वयं बदलो, फिर संसार बदला हुआ दिखाई देगा।”


प्रश्न 6 : विश्व परिवर्तन का आरंभ कहां से होता है?

उत्तर :
विश्व परिवर्तन का आरंभ आत्म परिवर्तन से होता है।

जब एक व्यक्ति बदलता है तो उसका परिवार बदलता है। परिवार बदलता है तो समाज बदलता है। समाज बदलता है तो राष्ट्र बदलता है और राष्ट्र बदलते हैं तो विश्व बदल जाता है।

इसलिए स्वराज्य विश्व परिवर्तन की पहली सीढ़ी है।


प्रश्न 7 : स्वराज्य की शक्ति को एक साधारण उदाहरण से कैसे समझा जा सकता है?

उत्तर :
मान लीजिए एक पिता बहुत क्रोधी स्वभाव का है। उसके कारण पूरे घर में अशांति रहती है।

एक दिन वह राजयोग का अभ्यास प्रारम्भ करता है। वह अपने क्रोध को पहचानता है, स्वयं को आत्मा समझने का अभ्यास करता है और प्रतिक्रिया देने के स्थान पर शांति का अभ्यास करता है।

कुछ महीनों बाद वह धैर्यवान, सहनशील और प्रेममय बन जाता है।

परिणाम क्या हुआ?

सिर्फ एक व्यक्ति बदला, लेकिन पूरे परिवार का वातावरण बदल गया।

यही स्वराज्य की शक्ति है।


प्रश्न 8 : बाबा का दिल जीतने का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर :
बाबा का दिल जीतने का अर्थ किसी पद, सम्मान या पुरस्कार को प्राप्त करना नहीं है।

जब आत्मा की हर सोच में कल्याण, हर शब्द में मधुरता, हर कर्म में पवित्रता और हर संबंध में दुआएं होती हैं, तब वह स्वतः बाबा के दिल में स्थान बना लेती है।


प्रश्न 9 : दिलतख्त-नशीन कौन बनते हैं?

उत्तर :
दिलतख्त-नशीन वे आत्माएं बनती हैं जो केवल ज्ञान सुनती नहीं, बल्कि ज्ञान को अपने जीवन में धारण करके ज्ञान स्वरूप बन जाती हैं।

मुरली कोटेशन

“दिलतख्त-नशीन वही बनते हैं जो ज्ञान को जीवन में उतारकर ज्ञान स्वरूप बन जाते हैं।”
— अव्यक्त वाणी, 20 जनवरी 1982


प्रश्न 10 : क्या स्वर्ग भविष्य की कोई दूर की घटना है?

उत्तर :
नहीं। स्वर्ग का बीज वर्तमान में बोया जा रहा है।

आज जो आत्मा स्वराज्य का अभ्यास कर रही है, वही कल विश्व राज्य की अधिकारी बनेगी।

आज का पुरुषार्थ ही कल का भाग्य बनता है।


प्रश्न 11 : यदि मैं अपने मन को नियंत्रित नहीं कर सकता, तो इसका क्या अर्थ है?

उत्तर :
यदि मन हमें चलाता है, परिस्थितियां हमें प्रभावित करती हैं और क्रोध, मोह या व्यर्थ संकल्प हम पर शासन करते हैं, तो इसका अर्थ है कि स्वराज्य की यात्रा अभी प्रारंभ हुई है।

हमें अपने ऊपर और अधिक पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है।


प्रश्न 12 : मैं कैसे जानूं कि मैं बाबा के दिल तख्त की ओर आगे बढ़ रहा हूं?

उत्तर :
यदि धीरे-धीरे—

  • मन शांत हो रहा है,
  • प्रतिक्रियाएं कम हो रही हैं,
  • सहन शक्ति बढ़ रही है,
  • कर्मेंद्रियां श्रीमत पर चल रही हैं,
  • ज्ञान जीवन में उतर रहा है,
  • संबंधों में दुआएं बढ़ रही हैं,

तो समझिए कि आत्मा बाबा के दिल तख्त की ओर आगे बढ़ रही है।


प्रश्न 13 : स्वराज्य, दिल तख्त और विश्व राज्य का आपसी संबंध क्या है?

उत्तर :
इन तीनों का संबंध सीढ़ियों की तरह है।

पहली सीढ़ी – स्वराज्य
स्वयं पर राज्य करना।

दूसरी सीढ़ी – दिल तख्त
श्रेष्ठ स्थिति के कारण बाबा के दिल में स्थान प्राप्त करना।

तीसरी सीढ़ी – विश्व राज्य
भविष्य में विश्व राज्य की अधिकारी आत्मा बनना।

इसलिए कहा गया है—

स्वराज्य ही दिल तख्त का द्वार है।

दिल तख्त ही विश्व राज्य का द्वार है।

और जो आज स्वयं का राजा बन जाता है, वही कल विश्व का राजा बनता है।

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