(7) If God knows everything, why doesn’t He prevent suffering and injustice?

(7)यदि परमात्मा सब कुछ जानते हैं, तो वे दुख और अन्याय को रोकते क्यों नहीं?

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

यदि परमात्मा सर्वज्ञ हैं तो दुख और पाप क्यों नहीं रोकते? | कर्म सिद्धांत, ड्रामा और परमात्मा की भूमिका | BK Spiritual Analysis


डिस्क्लेमर

यह प्रस्तुति किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय, घटना अथवा परिस्थिति पर निर्णय देने या किसी की आलोचना करने के उद्देश्य से नहीं बनाई गई है।

इसका उद्देश्य केवल ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर परमात्मा, कर्म सिद्धांत, विश्व-ड्रामा, आत्मा की स्वतंत्रता एवं पुरुषार्थ के आध्यात्मिक दृष्टिकोण को समझना है।

इस विषय में प्रस्तुत विचार ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित हैं। प्रत्येक आत्मा अपने अनुभव, विवेक एवं विश्वास के अनुसार इन बिंदुओं पर चिंतन कर सकती है।


चर्चित घटनाओं का आध्यात्मिक विश्लेषण

पब्लिक के मन के प्रश्न — ईश्वरीय ज्ञान के उत्तर


अध्याय 1

संसार का सबसे बड़ा प्रश्न

जब संसार में दुख दिखाई देता है…

जब कोई दुर्घटना होती है…

जब निर्दोष व्यक्ति पीड़ित दिखाई देता है…

तब मन में सबसे बड़ा प्रश्न उठता है—

यदि परमात्मा सर्वज्ञ हैं तो वे दुख और गलत कर्मों को रोकते क्यों नहीं?

क्या परमात्मा सब कुछ जानते हैं?

यदि जानते हैं तो रोकते क्यों नहीं?

यदि रोक सकते हैं तो रोकते क्यों नहीं?

यही प्रश्न सदियों से मानव मन को विचलित करता आया है।


मुरली नोट्स

साकार मुरली (लगभग 15-09-1969)

परमात्मा ज्ञान का सागर है, कर्म करने वाला नहीं।

अव्यक्त मुरली (लगभग 18-01-1980)

बाप रास्ता दिखाता है, चलना बच्चों का पुरुषार्थ है।


अध्याय 2

परमात्मा सर्वज्ञ हैं, लेकिन कर्म नहीं करते

सर्वज्ञ का अर्थ है—

ज्ञान का सागर।

परमात्मा

  • सत्य बताते हैं।
  • ज्ञान देते हैं।
  • शक्ति देते हैं।
  • मार्गदर्शन देते हैं।

लेकिन…

वे किसी आत्मा की जगह कर्म नहीं करते।


मुख्य सिद्धांत

ज्ञान परमात्मा का कार्य है।

कर्म आत्मा का कार्य है।


उदाहरण

यदि डॉक्टर सही दवा बता दे…

लेकिन मरीज दवा न खाए…

तो बीमारी किसकी जिम्मेदारी है?

डॉक्टर की नहीं।

मरीज की।

इसी प्रकार परमात्मा ज्ञान देते हैं।

चलना हमें है।


मुरली नोट

साकार मुरली (लगभग 20-07-1972)

बाप श्रीमत देता है, चलना बच्चे का काम है।


अध्याय 3

स्वतंत्र इच्छा और कर्म सिद्धांत

हर आत्मा स्वतंत्र है।

लेकिन…

स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है।

कर्म करने में स्वतंत्र।

फल लेने में परतंत्र।


नियम

सुख दिया—

सुख मिलेगा।

दुख दिया—

दुख मिलेगा।

यही कर्म सिद्धांत है।


उदाहरण

बीज आम का बोया।

फल नीम का नहीं मिलेगा।

जो बोया वही मिलेगा।


मुरली नोट

साकार मुरली (लगभग 24-01-1970)

जैसा कर्म, वैसा फल।


अध्याय 4

सूर्य का उदाहरण

सूर्य सबको समान प्रकाश देता है।

वह यह निर्णय नहीं करता—

कौन उस प्रकाश का सदुपयोग करेगा।

कौन दुरुपयोग करेगा।


उदाहरण

एक किसान उसी सूर्य से खेत उगाता है।

एक अपराधी उसी प्रकाश में अपराध भी कर सकता है।

सूर्य जिम्मेदार नहीं।

प्रयोग करने वाला जिम्मेदार है।


आध्यात्मिक अर्थ

परमात्मा भी

ज्ञान देते हैं।

शक्ति देते हैं।

लेकिन प्रयोग आत्मा करती है।


अध्याय 5

शिक्षक का उदाहरण

एक शिक्षक सभी विद्यार्थियों को समान शिक्षा देता है।

लेकिन परीक्षा…

विद्यार्थी स्वयं देता है।

शिक्षक उत्तर-पुस्तिका नहीं लिख सकता।


आध्यात्मिक अर्थ

परमात्मा

ज्ञान देते हैं।

लेकिन कर्म हमें करने होते हैं।


मुरली नोट

अव्यक्त मुरली (लगभग 22-03-1985)

बाप शिक्षक है, परीक्षा तुम्हें स्वयं पास करनी है।


अध्याय 6

विश्व-ड्रामा का सिद्धांत

ब्रह्माकुमारी ज्ञान के अनुसार

विश्व

एक

अनादि

अनन्त

अविनाशी

ड्रामा है।

इसमें प्रत्येक आत्मा अपनी भूमिका निभाती है।


मुख्य सिद्धांत

परमात्मा

ड्रामा नहीं बदलते।

आत्माओं को बदलने की प्रेरणा देते हैं।


मुरली नोट

साकार मुरली (लगभग 05-05-1971)

ड्रामा अचल-अडोल है।


अध्याय 7

परमात्मा दंड क्यों नहीं देते?

क्योंकि

कर्म का न्याय

स्वतः चलता है।

परमात्मा न्यायाधीश नहीं…

ज्ञानदाता हैं।


उदाहरण

यदि किसी ने किसी को दुख दिया…

तो उसका हिसाब कर्म के अनुसार स्वयं बनेगा।

परमात्मा अलग से दंड नहीं देते।


अध्याय 8

दुख क्यों आता है?

दुख

परमात्मा की सजा नहीं है।

दुख

हमारे

विचार

संस्कार

निर्णय

और कर्मों का परिणाम है।


मुरली नोट

साकार मुरली (लगभग 11-02-1973)

कर्मों का हिसाब बिल्कुल सटीक चलता है।


अध्याय 9

परमात्मा का वास्तविक कार्य

परमात्मा आते हैं—

दंड देने नहीं।

दोष बताने नहीं।

बल्कि—

अज्ञान को ज्ञान में बदलने।

कमजोर को शक्तिशाली बनाने।

अशांति को शांति में बदलने।

मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म की दिशा देने।


मुरली नोट

अव्यक्त मुरली (लगभग 18-01-1982)

परिवर्तन ज्ञान और योग से होता है।


अध्याय 10

क्या प्रार्थना करनी चाहिए?

सामान्य प्रार्थना—

“भगवान मेरा दुख दूर कर दो।”

ईश्वरीय ज्ञान कहता है—

“बाबा, मुझे इतना शक्तिशाली बना दो कि मैं परिस्थिति को सही रीति से पार कर सकूं।”

यही श्रेष्ठ प्रार्थना है।


अध्याय 11

आत्मचिंतन

स्वयं से पूछें—

1.

क्या मैं परिस्थिति बदलने की प्रार्थना करता हूँ…

या स्वयं को बदलने की?

2.

क्या मैं अपने प्रत्येक कर्म के प्रति जागरूक हूँ?

3.

क्या मैं प्रत्येक आत्मा के प्रति शुभ भावना रखता हूँ?

4.

क्या मैं अपने संस्कार बदलने का पुरुषार्थ कर रहा हूँ?


आज का स्वमान

मैं एक जिम्मेदार और जागरूक आत्मा हूँ।

परमात्मा के ज्ञान और शक्ति से

मैं अपने विचार,

संस्कार

और कर्म

श्रेष्ठ बना रहा हूँ।


मुख्य सीख

✔ परमात्मा सर्वज्ञ हैं।

✔ परमात्मा ज्ञानदाता हैं।

✔ कर्म आत्मा करती है।

✔ फल कर्मानुसार मिलता है।

✔ ड्रामा निश्चित है।

✔ परमात्मा ड्रामा नहीं बदलते।

✔ परमात्मा आत्मा को बदलने की शक्ति देते हैं।

✔ पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है।


समापन संदेश

परमात्मा संसार को बदलने नहीं आते…

वे मनुष्य की चेतना बदलने आते हैं।

वे हमारे स्थान पर कर्म नहीं करते…

बल्कि हमें इतना जागरूक, शक्तिशाली और ज्ञानवान बनाते हैं कि हम स्वयं अपने कर्मों को श्रेष्ठ बना सकें।

यही ईश्वरीय ज्ञान का सार है—

“ज्ञान परमात्मा का उपहार है, और श्रेष्ठ कर्म आत्मा का उत्तरदायित्व।”

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