(14) 17-04-1969 /1“The main sanskar (inherent trait) of Brahmins – renouncers of everything.”

(14) 17-04-1969 /1“ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार – सर्वस्व त्यागी”

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ब्राह्मणों का सबसे बड़ा संस्कार क्या है? “सर्वस्व त्यागी” बनने का रहस्य | 17 अप्रैल 1969 अव्यक्त मुरली

वैकल्पिक छोटा Title

“सर्वस्व त्यागी” बनो — तभी सच्चा स्नेह, सरलता और सहनशीलता आएगी! | अव्यक्त मुरली


Disclaimer

Disclaimer: यह अध्याय 17 अप्रैल 1969 की अव्यक्त मुरली के दिए गए पाठ पर आधारित एक अध्ययनात्मक एवं चिंतनात्मक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य मुरली के आध्यात्मिक संदेश को सरल भाषा में समझना और आत्म-चिंतन के लिए प्रस्तुत करना है। यह किसी व्यक्तिगत, धार्मिक, चिकित्सकीय, कानूनी या व्यावसायिक सलाह का विकल्प नहीं है। मुरली के मूल अर्थ और संदर्भ को सर्वोपरि मानते हुए पाठक/श्रोता स्वयं मूल मुरली का अध्ययन करें।


अध्याय: ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार — सर्वस्व त्यागी

1. संगठन की असली नींव

बापदादा संगठन को केवल एक स्थान पर एकत्र होने या बाहरी रूप से साथ रहने का माध्यम नहीं मानते। संगठन की वास्तविक शक्ति आत्मिक एकता में है।

मुरली में संगठन के लिए चार मुख्य बातें बताई गई हैं:

  1. आपस में स्नेह
  2. नजदीक सम्बन्ध
  3. सर्विस की जिम्मेवारी
  4. ज्ञान और योग की धारणा का प्रत्यक्ष सबूत

यहाँ प्रश्न केवल इतना नहीं है कि हम संगठन में हैं या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या हमारे संस्कार और संकल्प संगठन को मजबूत बना रहे हैं?

जब एक-दूसरे के संस्कार और संकल्प टकराते हैं, तब दूरी पैदा होती है। इसलिए ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य अपनी मौलिकता खोना नहीं, बल्कि ऐसे मुख्य संस्कारों को धारण करना है जिनसे आपसी स्नेह और सहयोग सहज बन जाए।


2. संगमयुगी ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार

मुरली का केंद्रीय संदेश अत्यंत स्पष्ट है:

“ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार है — सर्वस्व त्यागी।”

साकार ब्रह्मा के जीवन में इस संस्कार को सम्पूर्ण रूप में देखा गया। ब्राह्मण बच्चों में यह संस्कार यथायोग्य और यथाशक्ति विकसित करना है। 

यहाँ सर्वस्व त्याग का अर्थ केवल भौतिक वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है। इसमें देह-अभिमान, अहंकार, अपनी श्रेष्ठता की भावना और दूसरों के अवगुण देखने की आदत का त्याग भी शामिल है।

अर्थात्—

“मेरा” और “मैं” की भावना जितनी कम होती जाती है, उतनी ही आत्मिक सरलता बढ़ती जाती है।


3. सर्वस्व त्यागी बनने से कौन-से गुण आते हैं?

मुरली सर्वस्व त्यागी की दो विशेष निशानियाँ बताती है:

सरलता

सरलता का अर्थ कमजोर होना नहीं है। सरलता का अर्थ है—मन में छल-कपट, बनावट और अनावश्यक जटिलता न रखना।

जिसमें सरलता होती है, उसके साथ सम्बन्ध बनाना सहज होता है।

सहनशीलता

सहनशीलता का अर्थ हर बात को दबाकर रखना भी नहीं है। बल्कि परिस्थिति, व्यक्ति और संस्कारों के अंतर को समझकर स्वयं को स्थिर रखना है।

सरलता + सहनशीलता = सच्चे स्नेह का आधार।

मुरली के अनुसार, जिसमें सरलता और सहनशीलता होगी, वह दूसरों को आकर्षित करेगा और आपसी स्नेह विकसित कर सकेगा। 


4. दूसरों के अवगुण न देखना भी त्याग है

त्याग का एक बहुत सूक्ष्म रूप है—दूसरों के अवगुणों को न देखना।

किसी के संस्कार हमारे जैसे न हों, इसका अर्थ यह नहीं कि वह गलत है। संगठन में अनेक आत्माएँ अपने-अपने संस्कारों के साथ आती हैं। इसलिए स्नेह का अर्थ यह नहीं कि सब बिल्कुल एक जैसे दिखाई दें।

सच्चा स्नेह तब प्रकट होता है जब हम अंतर होते हुए भी एकता बनाए रखते हैं।

उदाहरण

यदि किसी सहयोगी की कोई आदत हमें पसंद नहीं आती, तो तीन रास्ते हो सकते हैं:

  • बार-बार उसके अवगुण पर चर्चा करना।
  • मन में दूरी बनाना।
  • आवश्यक बात को उचित रीति से समझाकर, बाकी को छोड़कर सहयोग बनाए रखना।

तीसरा मार्ग त्याग और सहनशीलता का मार्ग है।


5. “बाप-दादा का चित्र” हमारी चलन से दिखाई दे

मुरली में एक बहुत सुंदर जिम्मेवारी दी गई है—हमारी चलन ऐसी हो कि हमारी चलन से बाप और दादा का चित्र दिखाई दे।

केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि हम ज्ञानवान हैं।

हमारी—

  • वाणी,
  • व्यवहार,
  • चेहरे की स्थिति,
  • सम्बन्ध,
  • निर्णय,
  • सेवा और
  • प्रतिक्रिया

इन सबमें ज्ञान और योग का प्रभाव दिखाई देना चाहिए।

मुरली यह भी संकेत करती है कि कभी-कभी हमारी चलन में वह स्थिति दिखाई देती है, लेकिन सदैव नहीं। इसलिए आत्म-जांच आवश्यक है। आत्म-चेकिंग

रोज स्वयं से पूछें:

“आज मेरी चलन देखकर किसी को मेरे शिक्षक और मेरे आदर्श की याद आई या नहीं?”


6. पुरुषार्थ का वास्तविक अर्थ

मुरली एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—यदि एक ही भूल बार-बार होती रहे तो उसे पुरुषार्थ कैसे कहा जाए?

पुरुषार्थ का अर्थ केवल यह कहना नहीं:

“मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

सच्चे पुरुषार्थ की निशानी है कि जिस भूल को पहचान लिया, उसे दोहराने की सम्भावना कम होती जाए।

उदाहरण

यदि किसी परिस्थिति में बार-बार क्रोध आता है, तो केवल बाद में पछताना पर्याप्त नहीं।

सच्चा पुरुषार्थ होगा:

पहली बार → क्रोध को पहचाना।
दूसरी बार → प्रतिक्रिया से पहले रुके।
तीसरी बार → उसी परिस्थिति में शांत रहना सीखा।

यही पुरुषार्थ का प्रैक्टिकल रूप है।


7. स्तुति और निंदा से परे स्थिति

वर्तमान समय की एक बड़ी परीक्षा है—स्तुति।

जब हमारी प्रशंसा होती है तो स्थिति अच्छी रहती है, लेकिन आलोचना होते ही स्थिति गिर जाती है, तो इसका अर्थ है कि हमारी अवस्था बाहरी प्रतिक्रिया पर निर्भर है।

मुरली की शिक्षा है:

स्तुति के आधार पर अपनी स्थिति नहीं रखनी है।

दूसरे हमारी महिमा करें तो भी उस महिमा से प्रभावित नहीं होना है। क्योंकि यदि वर्तमान में ही फल स्वीकार कर लिया, तो भविष्य के फल को कम कर सकते हैं। 

सरल उदाहरण

किसी ने कहा:“आपने बहुत अच्छी सेवा की।”अच्छी बात है। लेकिन अंदर की स्थिति यह हो:

“सेवा मेरी नहीं, बाप की है। मैं निमित्त हूँ।”और यदि कोई कह दे:

 

“आपकी सेवा में कमी थी।”

तब भी स्थिति न गिरे।

यही सर्वस्व त्यागी की परीक्षा है—
स्तुति मिले तो भी हल्के, निंदा मिले तो भी हल्के।


8. गुप्त पुरुषार्थ और गुप्त पद

मुरली का एक विशेष सूत्र है:

“जितना गुप्त पुरुषार्थ, उतना गुप्त मददगार, उतना ही गुप्त पद।” 

इसका अर्थ है कि सच्चा आध्यात्मिक पुरुषार्थ प्रदर्शन पर आधारित नहीं होता।

जिस सेवा को करने के बाद तुरंत प्रशंसा चाहिए, वहाँ अभी फल की इच्छा जुड़ी हुई है।

लेकिन जब व्यक्ति चुपचाप, ईमानदारी से और बाप की याद में अपना कर्तव्य करता है, तब उसका पुरुषार्थ अधिक गहरा होता है।


9. संगम पर ठहरकर निर्णय करना

मुरली का अगला महत्वपूर्ण संदेश है:

“संगम पर ठहरना है।”

संगम का अर्थ यहाँ केवल समय का संगम नहीं, बल्कि दोनों पक्षों को देखकर संतुलित निर्णय करने की अवस्था भी है।

न केवल इस तरफ।

न केवल उस तरफ।

बल्कि बीच में ठहरकर दोनों को देखकर निर्णय करना।

उदाहरण: गृहस्थ और सेवा

यदि कोई ब्राह्मण परिवार की जिम्मेदारियाँ भी निभाता है और सेवा में भी मददगार है, तो केवल एक पक्ष को पकड़ लेना उचित नहीं।

उसे दोनों जिम्मेदारियों को समझकर संतुलन बनाना होगा।

संतुलन की अवस्था ही संगम की अवस्था है।


10. “बीच” ही बीज है

मुरली में एक सूक्ष्म संकेत मिलता है:

बीच की अवस्था = बीज की अवस्था।

बीज छोटा और सूक्ष्म होता है, लेकिन उसके अंदर विशाल वृक्ष की सम्भावना होती है।

इसी प्रकार बीच में स्थिर रहने की अवस्था बाहरी रूप से बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन उसमें सही निर्णय की बड़ी शक्ति होती है।

अभ्यास

किसी महत्वपूर्ण परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय:

रुको → याद में ठहरो → दोनों पक्ष देखो → निर्णय करो → कर्म करो।

यही “संगम पर ठहरना” का व्यावहारिक अभ्यास हो सकता है।


11. बालक भी, मालिक भी

मुरली एक और सुंदर संतुलन सिखाती है:

जहाँ बालक बनना है, वहाँ बालक।
जहाँ मालिक बनना है, वहाँ मालिक।

बालकपन

बालकपन अर्थात्—

  • आज्ञा को सहज स्वीकार करना।
  • अनावश्यक संकल्पों में न जाना।
  • निर्देशन मिलने पर उसका पालन करना।
  • “मेरी ही बात सही है” की जिद न रखना।

मालिकपन

मालिकपन अर्थात्—

  • आवश्यकता होने पर अपनी राय देना।
  • जिम्मेवारी को समझना।
  • सही निर्णय में भागीदार बनना।
  • अपनी भूमिका के अनुसार पहल करना।

लेकिन हर जगह मालिक बनना भी ठीक नहीं और हर जगह केवल बालक बनना भी नहीं।


12. मालिक और बालक का संतुलन — एक उदाहरण

मान लीजिए किसी सेवा के विषय में निर्णय लेना है।

पहले सभी अपनी राय देते हैं।

यहाँ मालिकपन है।

लेकिन जब सामूहिक रूप से अंतिम निर्णय हो गया, तब:

“अब मेरी राय नहीं मानी गई इसलिए मैं अलग चलूँगा”

यह संस्कारों का टकराव पैदा कर सकता है।

अतः—

राय देते समय मालिक,
निर्णय हो जाने पर बालक।

यही बुद्धि की जजमेंट है।


13. बहुरूपी बनना — लेकिन सुल्टे रूप में

ब्राह्मण जीवन में सदैव एक ही भूमिका नहीं होती।

कभी—

  • बालक बनना है,
  • कभी मालिक,
  • कभी सहयोगी,
  • कभी सेवाधारी,
  • कभी मार्गदर्शक,
  • कभी शांत दृष्टा।

इसलिए मुरली कहती है कि बहुरूपी बनना है।

लेकिन “उल्टे रूप से” नहीं, बल्कि “सुल्टे रूप से।” 

अर्थात् परिस्थिति के अनुसार सही स्वरूप धारण करना ही सच्ची योग्यता है।


14. आज का आत्म-चेकिंग चार्ट

दिन के अंत में स्वयं से ये प्रश्न पूछें:

  1. क्या आज मेरी किसी बात से किसी आत्मा को स्नेह का अनुभव हुआ?
  2. क्या मैंने किसी के अवगुण को देखकर उसे मन में पकड़ लिया?
  3. क्या आज मैंने स्तुति की इच्छा की?
  4. निंदा या आलोचना मिलने पर मेरी स्थिति कैसी रही?
  5. क्या मैंने किसी पुराने संस्कार को दोहराया?
  6. क्या आज मैंने किसी परिस्थिति में संगम पर ठहरकर निर्णय किया?
  7. कहाँ मुझे बालक बनना था और मैं मालिक बन गया?
  8. कहाँ मुझे मालिक बनकर जिम्मेवारी लेनी थी और मैं पीछे हट गया?
  9. क्या मेरी चलन से ज्ञान और योग का सबूत दिखाई दिया?
  10. क्या आज मैं कल से थोड़ा अधिक सर्वस्व त्यागी बना?

15. मुरली के मुख्य नोट्स

मुख्य विषय

ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार — सर्वस्व त्यागी

संगठन के चार आधार

  • आपसी स्नेह
  • नजदीक सम्बन्ध
  • सर्विस की जिम्मेवारी
  • ज्ञान-योग की धारणा का सबूत

सर्वस्व त्यागी की निशानियाँ

  • सरलता
  • सहनशीलता
  • निरहंकारिता
  • दूसरों के अवगुण न देखना
  • देह-अभिमान का त्याग

सच्चे पुरुषार्थ की निशानी

एक ही भूल को बार-बार न दोहराना।

स्थिति की परीक्षा

स्तुति और निंदा दोनों में समान स्थिति।

निर्णय की युक्ति

संगम पर ठहरकर दोनों तरफ देखकर जजमेंट करना।

भूमिका की समझ

जहाँ आवश्यक हो वहाँ मालिक, जहाँ आवश्यक हो वहाँ बालक।

अंतिम लक्ष्य

ऐसी चलन कि हमारी चलन से बाप और दादा का चित्र दिखाई दे।


16. एक मिनट का मुरली चिंतन

मैं कौन हूँ?

मैं संगमयुगी ब्राह्मण आत्मा हूँ।

मेरा मुख्य संस्कार क्या है?

सर्वस्व त्यागी।

मैं क्या त्याग करूँ?

अहंकार, देह-अभिमान, दूसरों के अवगुण देखना और स्तुति की इच्छा।

मुझे क्या धारण करना है?

सरलता और सहनशीलता।

मुझे कहाँ ठहरना है?

संगम की बीच वाली अवस्था में।

मुझे कब बालक बनना है?

जब आज्ञा और निर्देशन को सहज स्वीकार करना हो।

मुझे कब मालिक बनना है?

जब अपनी जिम्मेवारी के अनुसार राय और निर्णय देना हो।

मेरी सबसे बड़ी पहचान क्या हो?

मेरी वाणी से नहीं, मेरी चलन से बाप और दादा का चित्र दिखाई दे।


समापन

सर्वस्व त्यागी बनना संसार छोड़ना नहीं, बल्कि अपने अंदर के “मैं” और “मेरा” को हल्का करना है।

जब त्याग आता है तो सरलता आती है।
जब सरलता आती है तो सहनशीलता आती है।
जब सहनशीलता आती है तो स्नेह सहज बनता है।
जब स्नेह आता है तो संगठन मजबूत होता है।
और जब संगठन मजबूत होता है तो ज्ञान और योग का प्रत्यक्ष सबूत दिखाई देता है।

इसलिए आज का मुख्य संकल्प:

“मैं सर्वस्व त्यागी ब्राह्मण आत्मा हूँ।
मेरी स्थिति स्तुति पर नहीं, बाप की याद पर आधारित होगी।
मैं संगम पर ठहरकर निर्णय करूँगा और समय के अनुसार बालक तथा मालिक—दोनों स्वरूपों को सुल्टे रूप में धारण करूँगा।”

ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार — सर्वस्व त्यागी

मुरली प्रश्नोत्तर — 17 अप्रैल 1969

प्रश्न 1. संगठन के लिए मुख्य चार बातें कौन-सी जरूरी हैं?

उत्तर:
संगठन के लिए मुख्य चार बातें जरूरी हैं:

  1. आपस में एक-दूसरे के प्रति स्नेह।
  2. नजदीक सम्बन्ध।
  3. सर्विस की जिम्मेवारी।
  4. ज्ञान और योग की धारणा का सबूत।

प्रश्न 2. एक-दूसरे से दूर होने का मुख्य कारण क्या है?

उत्तर:
एक-दूसरे के संस्कार और संकल्प आपस में नहीं मिलते, इसलिए दूरी पैदा होती है।

प्रश्न 3. संगमयुगी ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार कौन-सा है?

उत्तर:
संगमयुगी ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार है — सर्वस्व त्यागी।

प्रश्न 4. साकार ब्रह्मा का मुख्य संस्कार क्या था?

उत्तर:
साकार ब्रह्मा का मुख्य संस्कार सर्वस्व त्याग था, जिसे उनके जीवन में सम्पूर्ण रूप से देखा गया।

प्रश्न 5. निरहंकारी होने का अर्थ क्या है?

उत्तर:
निरहंकारी होने का अर्थ है सर्वस्व त्यागी बनना — अपने “मैं” और “मेरा” का त्याग करना तथा देह-अभिमान से ऊपर उठना।

प्रश्न 6. सर्वस्व त्यागी बनने से कौन-से मुख्य गुण आते हैं?

उत्तर:
सर्वस्व त्यागी बनने से मुख्य रूप से सरलता और सहनशीलता आती है।

प्रश्न 7. दूसरों के अवगुणों को न देखना भी त्याग क्यों है?

उत्तर:
क्योंकि दूसरों के अवगुणों को देखना और मन में रखना स्वयं की स्थिति को प्रभावित करता है। इसलिए उनके अवगुणों को न देखना और छोड़ देना भी त्याग का अभ्यास है।

प्रश्न 8. एक-दूसरे के स्नेही कैसे बन सकते हैं?

उत्तर:
केवल पत्र-व्यवहार या संगठन में साथ रहने से सच्चा स्नेह नहीं बनता। संस्कार और संकल्पों में सामंजस्य लाना होगा। इसके लिए सर्वस्व त्यागी, सरल और सहनशील बनना आवश्यक है।

प्रश्न 9. ब्राह्मणों की चलन कैसी होनी चाहिए?

उत्तर:
चलन ऐसी होनी चाहिए कि हमारी वाणी और व्यवहार से बाप और दादा का चित्र दिखाई दे। केवल बोलने से नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल चलन से ज्ञान और योग का सबूत दिखाई देना चाहिए।

प्रश्न 10. सच्चे पुरुषार्थ की निशानी क्या है?

उत्तर:
सच्चे पुरुषार्थ की निशानी है कि एक बार जो भूल पहचान ली, उसे बार-बार न दोहराया जाए। यदि वही गलती बार-बार होती रहे, तो पुरुषार्थ को प्रैक्टिकल रूप में लाना अभी बाकी है।

प्रश्न 11. स्तुति और निंदा से स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर:
यदि हमारी स्थिति स्तुति पर आधारित है तो स्तुति मिलने पर स्थिति अच्छी और निंदा होने पर स्थिति कमजोर हो सकती है। इसलिए अपनी स्थिति स्तुति या निंदा पर नहीं, बाप की याद पर आधारित रखनी है।

प्रश्न 12. दूसरों की महिमा से प्रभावित क्यों नहीं होना चाहिए?

उत्तर:
क्योंकि महिमा सुनकर यदि हम स्वयं ही प्रभावित हो जाएँ तो वर्तमान में ही फल स्वीकार कर लेते हैं। सच्चा पुरुषार्थ गुप्त और निरहंकारी होना चाहिए।

प्रश्न 13. गुप्त पुरुषार्थ का क्या महत्व है?

उत्तर:
मुरली का संदेश है कि जितना गुप्त पुरुषार्थ, उतना गुप्त मददगार और उतना ही गुप्त पद। इसलिए सेवा और पुरुषार्थ में दिखावे के बजाय आंतरिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 14. किसी भी कार्य का निर्णय कैसे करना चाहिए?

उत्तर:
संगमयुगी बनकर संगम पर ठहरकर निर्णय करना चाहिए। किसी एक तरफ अधिक झुकने के बजाय दोनों पक्षों को देखकर संतुलित जजमेंट करनी चाहिए।

प्रश्न 15. “संगम पर ठहरना” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
इसका अर्थ है किसी भी परिस्थिति में तुरंत एक तरफ झुकने के बजाय दोनों पक्षों को समझकर बीच की संतुलित अवस्था में स्थित होकर निर्णय करना।

प्रश्न 16. “बीच की अवस्था ही बीज है” का क्या भाव है?

उत्तर:
बीच की अवस्था सूक्ष्म और शक्तिशाली होती है। जैसे बीज में पूरे वृक्ष की शक्ति छिपी होती है, वैसे ही संतुलित अवस्था में सही निर्णय और सही कर्म की शक्ति होती है।

प्रश्न 17. ब्राह्मण जीवन में बालक और मालिक दोनों बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर:
जहाँ आज्ञा और निर्देशन को सहज स्वीकार करना है वहाँ बालक बनना है। जहाँ अपनी जिम्मेवारी के अनुसार राय देनी है वहाँ मालिक बनना है।

प्रश्न 18. निर्णय हो जाने के बाद क्या करना चाहिए?

उत्तर:
राय देते समय मालिक बन सकते हैं, लेकिन जब अंतिम निर्णय हो जाए तो बालक बनकर उसे स्वीकार करना चाहिए। अपनी राय को ही सही मानकर टकराव पैदा नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 19. हर समय मालिक बनने से क्या समस्या हो सकती है?

उत्तर:
यदि जहाँ बालक बनना चाहिए वहाँ भी मालिक बनेंगे, तो दो मालिकों के संस्कारों का टकराव हो सकता है। इसलिए समय और परिस्थिति के अनुसार सही स्वरूप धारण करना आवश्यक है।

प्रश्न 20. “बहुरूपी बनना है” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
हर परिस्थिति में एक ही स्वरूप में नहीं रहना है। समय और परिस्थिति के अनुसार बालक, मालिक, सहयोगी, सेवाधारी आदि उचित स्वरूप धारण करना है—लेकिन सुल्टे रूप से, उल्टे रूप से नहीं।

प्रश्न 21. सर्वस्व त्यागी की सबसे बड़ी पहचान क्या है?

उत्तर:
उसकी पहचान सरलता, सहनशीलता, निरहंकारिता और देह-अभिमान से मुक्त चलन में दिखाई देगी।

प्रश्न 22. आज का मुख्य आत्म-चेकिंग प्रश्न क्या होना चाहिए?

उत्तर:
“क्या मेरी चलन से बाप और दादा का चित्र दिखाई देता है?”

यदि इसका उत्तर सदैव “हाँ” नहीं है, तो अभी पुरुषार्थ को और प्रैक्टिकल बनाना है।

मुख्य स्मृति

“ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार — सर्वस्व त्यागी।”

सर्वस्व त्याग → सरलता → सहनशीलता → स्नेह → संगठन की शक्ति।

आज का संकल्प

मैं सर्वस्व त्यागी ब्राह्मण आत्मा हूँ। मैं स्तुति और निंदा से प्रभावित हुए बिना अपनी स्थिति बाप की याद पर रखूँगा। मैं संगम पर ठहरकर निर्णय करूँगा और समय के अनुसार बालक तथा मालिक—दोनों स्वरूपों को सुल्टे रूप में धारण करूँगा।

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