Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 03-07-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – तुम इस ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो, तुम्हें बाप द्वारा ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है इसलिए तुम हो आस्तिक” | |
| प्रश्नः- | बाप का कौन सा टाइटिल धर्म स्थापकों को नहीं दे सकते हैं? |
| उत्तर:- | बाबा है सतगुरू। किसी भी धर्म स्थापक को गुरू नहीं कह सकते क्योंकि गुरू वह जो दु:ख से छुड़ाये, सुख में ले जाये। धर्म स्थापन करने वालों के पीछे तो उनके धर्म की आत्मायें ऊपर से नीचे आती हैं, वह किसी को ले नहीं जाते। बाप जब आते हैं तो सभी आत्माओं को घर ले जाते हैं इसलिए वह सभी के सतगुरू हैं। |
| गीत:- | इस पाप की दुनिया से… |
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत की लाइन सुनी। यह है पाप की दुनिया। बच्चे जानते भी हैं, यह पाप आत्माओं की दुनिया है। कितना बुरा अक्षर है। परन्तु मनुष्य यह समझ नहीं सकते कि सचमुच यह पाप आत्माओं की दुनिया है। जरूर कोई पुण्य आत्माओं की दुनिया भी थी, उसको कहा जाता है स्वर्ग। पाप आत्माओं की दुनिया को कहा जाता है नर्क। भारत में ही स्वर्ग और नर्क की चर्चा बहुत है। मनुष्य मरते हैं तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ, तो इससे सिद्ध होता है नर्कवासी थे। पतित दुनिया से पावन दुनिया में गया। परन्तु मनुष्यों को कुछ भी पता नहीं है, जो आता है सो बोल देते हैं। यथार्थ अर्थ कुछ भी नहीं समझते हैं।
बाप आकर तुम बच्चों को तसल्ली देते हैं कि अब थोड़ा धीरज धरो। तुम पापों के बोझ से बहुत भारी हो पड़े हो। अब तुमको पुण्य आत्मा बनाए ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जिसको स्वर्ग कहा जाता है। वहाँ न कोई पाप होगा, न कोई दु:ख होगा। बच्चों को धीरज़ मिला हुआ है। आज यहाँ हैं कल अपने शान्तिधाम, सुखधाम में जायेंगे। जैसे बीमार मनुष्य थोड़ा ठीक होने पर होता है तो डॉक्टर धीरज देते हैं – जल्दी से तुम बहुत अच्छा हो जायेंगे। अब यह तो है बेहद का धीरज़। बेहद का बाप कहते हैं – तुम तो बहुत दु:खी पतित हो गये हो। अब हम तुम बच्चों को आस्तिक बनाते हैं। फिर रचना का भी परिचय देते हैं। ऋषि आदि तो कहते आये हैं कि हम रचयिता और रचना को नहीं जानते हैं। अब उसको कौन जानते हैं। कब और किस द्वारा जान सकते हैं, यह किसको पता नहीं है। ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को कोई जानते ही नहीं। बाप कहते हैं – मैं संगम-युग पर आकर ड्रामा अनुसार तुम बच्चों को पहले-पहले आस्तिक बनाता हूँ फिर तुमको रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ सुनाता हूँ अर्थात् तुम्हारा ज्ञान का तीसरा नेत्र खोलता हूँ। तुमको रोशनी मिल गई है। आंखों की रोशनी चली जाती है तो मनुष्य अन्धे हो जाते हैं। इस समय मनुष्यों को ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं है। मनुष्य होकर उस बाप और रचना के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते तो उनको बुद्धिहीन कहा जाता है। गीत में भी है – एक हैं अन्धे की औलाद अन्धे। दूसरे हैं सज्जे। दिखाते हैं – महाभारत लड़ाई लगी थी और एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हुई थी। बाप ने आत्माओं को आकर राजयोग सिखाया था – सतयुगी स्वराज्य देने के लिए। आत्मायें कहती हैं मैं राजा हूँ, मैं बैरिस्टर हूँ। तुम्हारी आत्मा अब जानती है – हम विश्व का स्वराज्य पा रहे हैं – विश्व के रचयिता बाप द्वारा। वह किसका रचयिता है? नई दुनिया का। बाप नई सृष्टि रचते हैं। क्रियेटर भी है तो उनमें सारा ज्ञान भी है। सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री कोई एक भी नहीं जानते हैं। किसको ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं है। सिवाए बाप के कोई तीसरा नेत्र दे नहीं सकता। वर्ल्ड की हिस्ट्री, जॉग्राफी, मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन… यह सब तुम जानते हो। मूलवतन है आत्माओं की सृष्टि। संन्यासी कहते हैं हम ब्रह्म में लीन हो जायेंगे वा ज्योति ज्योत समायेंगे। ऐसा है नहीं। तुम जानते हो ब्रह्म तत्व में जाकर निवास करेंगे। वह शान्तिधाम घर है। वह कह देते हैं ब्रह्म ही भगवान है, कितना फ़र्क है। ब्रह्म तो तत्व है। जैसे आकाश तत्व है, वैसे ब्रह्म भी तत्व है। जहाँ हम आत्मायें और परमपिता परमात्मा निवास करते हैं, उनको स्वीट होम कहा जाता है। वह है आत्माओं का घर। बच्चों को मालूम पड़ा है, ब्रह्म महतत्व में कोई आत्मायें लीन नहीं होती हैं और आत्मा कभी विनाश को प्राप्त नहीं होती। आत्मा अविनाशी है। यह ड्रामा भी बना बनाया अविनाशी है। इस ड्रामा के कितने एक्टर्स हैं। अभी है संगमयुग, जबकि सभी एक्टर्स हाज़िर हैं। नाटक पूरा होता है तो सब एक्टर्स, क्रियेटर आदि सब आकर हाज़िर होते हैं। इस समय यह बेहद का ड्रामा भी पूरा होता है फिर रिपीट होना है। उन हद के नाटकों में चेन्ज हो सकती है। ड्रामा पुराना हो जाता है। यह तो बेहद का ड्रामा अनादि अविनाशी है। बाप त्रिकालदर्शी, त्रिनेत्री बनाते हैं। देवतायें कोई त्रिकालदर्शी नहीं होते हैं। न शूद्र वर्ण वाले त्रिकालदर्शी होते हैं। त्रिकालदर्शी तो सिर्फ तुम ब्राह्मण वर्ण वाले हो। जब तक ब्राह्मण न बनें तब तक तीसरा नेत्र ज्ञान का मिल न सके। तुम झाड़ के आदि-मध्य-अन्त को, सभी धर्मो को भी जानते हो। तुम भी मास्टर नॉलेजफुल हो जाते हो। बाप बच्चों को आपसमान बनायेंगे ना। ज्ञान का सागर तो एक ही बाप है, जो सभी आत्माओं का बाप है। सभी बच्चों को आस्तिक बनाए त्रिकालदर्शी बनाते हैं।
अब तुम बच्चों को सबको यह कहना है कि शिवबाबा आया है, उनको याद करो। जो आस्तिक बनते हैं वह बाप को अच्छी रीति प्यार करते हैं। तुम्हारे ऊपर बाप का भी प्यार है। तुमको स्वर्ग का वर्सा देते हैं। गाया हुआ है कि विनाश काले विप्रीत बुद्धि विनशन्ती और विनाश काले प्रीत बुद्धि विजयन्ती। गीता में कोई-कोई अक्षर सच्चे हैं। श्रीमद् भगवत गीता है सर्वोत्तम शास्त्र। आदि सनातन देवी-देवता धर्म का शास्त्र। यह भी समझाया है मुख्य धर्म शास्त्र हैं ही 4 और जो धर्म वाले हैं, वह आते ही हैं सिर्फ अपने धर्म की स्थापना करने। राजाई आदि की बात नहीं। उनको गुरू भी नहीं कह सकते। गुरू का तो काम ही है – वापस ले जाना। इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आदि तो आते हैं फिर उनके पिछाड़ी उनकी वंशावली भी आती है। गुरू वह जो दु:ख से छुड़ाये और सुख में ले जाये। वह तो सिर्फ धर्म स्थापन करने आते हैं। यहाँ तो बहुतों को गुरू कह देते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी गुरू नहीं कह सकते। एक शिवबाबा ही सर्व का सद्गति दाता है। पुकारते भी एक राम को हैं। शिवबाबा को भी राम कहते हैं। बहुत भाषायें हैं, तो नाम भी बहुत रख दिये हैं। असुल नाम है शिव। उनको सोमनाथ भी कहते हैं। सोमरस पिलाया अर्थात् ज्ञान धन दिया। बाकी पानी आदि की तो बात ही नहीं। तुमको सम्मुख नॉलेजफुल, ब्लिसफुल बना रहे हैं। बाप तो ज्ञान का सागर है। तुम बच्चों को ज्ञान नदियाँ बनाते हैं। सागर एक होता है। एक सागर से अनेक नदियाँ निकलती हैं। अभी तुम हो संगम पर। इस समय यह सारी धरती रावण का स्थान है। सिर्फ एक लंका नहीं थी, सारी धरती पर रावण का राज्य है। रामराज्य में बहुत थोड़े मनुष्य होंगे। यह सिर्फ अभी तुम्हारी बुद्धि में है। बाबा ने समझाया है – मैं 3 धर्मो की स्थापना करता हूँ – ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय। फिर वैश्य, शूद्र वर्ण में और सभी आकर अपना-अपना धर्म स्थापन करते हैं। अनेक धर्मो का विनाश भी कराते हैं। भारत में त्रिमूर्ति का चित्र भी बनाते हैं। परन्तु उसमें शिव का चित्र गुम कर दिया है। शिव से ही सिद्ध होता है कि परमपिता परमात्मा शिव ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना कराते हैं, उनको करनकरावनहार कहा जाता है। खुद भी कर्म करते हैं, तुम बच्चों को भी सिखलाते हैं। कर्म-अकर्म-विकर्म की गति भी समझाते हैं। रावण राज्य में तुम जो कर्म करते हो वह विकर्म बन जाता है। सतयुग में जो कर्म करते हो वह अकर्म हो जाता है। यहाँ विकर्म ही होता है क्योंकि रावण का राज्य है। सतयुग में 5 विकार होते ही नहीं। एक-एक बात समझने की है और सेकेण्ड में समझाई जाती है। ओम् का अर्थ वो लोग तो बहुत विस्तार से समझाते हैं। बाप कहते हैं – ओम् माना अहम् आत्मा और यह मेरा शरीर। कितना सहज है। और तुम समझते हो हम सुखधाम में जा रहे हैं। श्रीकृष्ण के मन्दिर को सुखधाम कहते हैं। है भी कृष्णपुरी। मातायें, कृष्णपुरी में जाने के लिए बहुत मेहनत करती हैं। तुम अभी भक्ति नहीं करते हो। तुमको ज्ञान मिला है और कोई मनुष्य मात्र में यह ज्ञान नहीं है। मैं तुमको पावन बनाकर जाता हूँ फिर पतित कौन बनाते हैं? यह कोई बता न सके। सब मेल अथवा फीमेल भक्तियाँ हैं, सीतायें हैं। सबकी सद्गति करने वाला बाप है। सब रावण की जेल में हैं। यह है ही दु:खधाम। बाप तुमको सुखधाम का मालिक बनाते हैं। ऐसे बाप को 5 हजार वर्ष बाद सिर्फ तुम देखते हो। लक्ष्मी-नारायण की आत्मा को अब नॉलेज है। हम छोटेपन में यह (कृष्ण) हैं फिर बड़े बनेंगे, ऐसे शरीर छोड़ेंगे। फिर दूसरा लेंगे और कोई को यह नॉलेज नहीं है।
बाप कहते हैं – तुम सब पार्वतियाँ हो, शिवबाबा तुमको अमरकथा सुना रहे हैं – अमर बनाने के लिए, अमरलोक में ले जाने के लिए। यह मृत्युलोक है। तुम सब पार्वतियाँ अमरनाथ द्वारा अमरकथा सुन रही हो। तुम सच-सच बनते हो सिर्फ बाप को याद करने से तुम्हारी आत्मा अमर बनती है, जहाँ दु:ख की बात नहीं होती। जैसे सर्प एक खाल छोड़ दूसरी लेते हैं। यह सब मिसाल यहाँ के हैं। भ्रमरी का मिसाल भी यहाँ का है। तुम ब्राह्मण क्या करते हो? विकारी कीड़ों को बदल देवता बनाते हो। मनुष्य की ही बात है। भ्रमरी का तो यह एक दृष्टान्त हैं। तुम ब्राह्मण बच्चे अभी बाप द्वारा अमर कथा सुन रहे हो, औरों को बैठ ज्ञान की भूँ-भूँ करते हो, जिससे मनुष्य से देवता, स्वर्ग की परी बन जायेंगे। बाकी ऐसे नहीं कि मानसरोवर में डुबकी लगाने से कोई परी बन जायेंगे। यह सब है झूठ। तुम झूठ ही सुनते आये हो, अब बाप ट्रूथ सुनाते हैं। अब बाप कहते हैं – अपने को आत्मा समझो। तुम समझते हो निराकार परमपिता परमात्मा इस मुख द्वारा सुना रहे हैं। हम इन कानों द्वारा सुन रहे हैं। आत्म-अभिमानी बनना है, फिर परमात्मा भी रियलाइज कराते हैं। मैं कौन हूँ? दूसरा कोई आत्म-अभिमानी बना न सके। सिवाए बाप के और कोई कह न सके कि तुम आत्म-अभिमानी बनो। शिव जयन्ति भी मनाते हैं परन्तु उनकी जयन्ति कैसे है, यह नहीं जानते। बाप ही खुद आकर समझाते हैं – मैं साधारण बूढ़े तन में प्रवेश करता हूँ। नहीं तो ब्रह्मा आयेगा कहाँ से? पतित तन ही चाहिए। सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा में विराजमान होकर तो ब्राह्मण नहीं रचेंगे। कहते हैं मैं पतित शरीर, पतित दुनिया में आता हूँ। गाया हुआ है – ब्रह्मा द्वारा स्थापना। फिर जिसकी स्थापना करते हैं, जो यह ज्ञान पाते हैं वह देवता बन जाते हैं। मनुष्य ब्रह्मा का चित्र देखकर मूँझ जाते हैं। कहते हैं यह तो दादा का चित्र है। प्रजापिता ब्रह्मा तो जरूर यहाँ होगा। सूक्ष्मवतन में कैसे प्रजा रचेंगे। प्रजापिता के बच्चे हजारों ब्रह्माकुमार कुमारियाँ हैं। झूठ थोड़ेही होगा। हम शिवबाबा द्वारा वर्सा पा रहे हैं। तुम बच्चों को समझाया है वह अव्यक्त ब्रह्मा है। प्रजापिता तो साकार में चाहिए। यह पतित ही तो पावन बनते हैं। तत् त्वम्। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) आत्म-अभिमानी बनकर इन कानों द्वारा अमरकथा सुननी है। ज्ञान की भूँ-भूँ कर आप समान बनाने की सेवा में रहना है।
2) बाप समान नॉलेजफुल, ब्लिसफुल बनना है। सोमरस पीना और पिलाना है।
| वरदान:- | माया के विघ्नों को खेल के समान अनुभव करने वाले मास्टर विश्व-निर्माता भव जैसे कोई बुजुर्ग के आगे छोटे बच्चे अपने बचपन के अलबेलेपन के कारण कुछ भी बोल दें, कोई ऐसा कर्तव्य भी कर लें तो बुजुर्ग लोग समझते हैं कि यह निर्दोष, अन्जान, छोटे बच्चे हैं। कोई असर नहीं होता है। ऐसे ही जब आप अपने को मास्टर विश्व-निर्माता समझेंगे तो यह माया के विघ्न बच्चों के खेल समान लगेंगे। माया किसी भी आत्मा द्वारा समस्या, विघ्न वा परीक्षा पेपर बनकर आ जाए तो उसमें घबरायेंगे नहीं लेकिन उन्हें निर्दोष समझेंगे। |
| स्लोगन:- | स्नेह, शक्ति और ईश्वरीय आकर्षण स्वयं में भरो तो सब सहयोगी बन जायेंगे। |
ये अव्यक्त इशारे – ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
अभी ज्वालामुखी बन आसुरी संस्कार, आसुरी स्वभाव सब-कुछ भस्म करो। जैसे देवियों के यादगार में दिखाते हैं कि ज्वाला से असुरों का संघार किया। असुर कोई व्यक्ति नहीं लेकिन आसुरी शक्तियों को खत्म किया। यह अभी आपकी ज्वालास्वरूप स्थिति का यादगार है। अब ऐसी योग की ज्वाला प्रज्जवलित करो जिसमें यह कलियुगी संसार जलकर भस्म हो जाये।
ज्ञान का तीसरा नेत्र और सतगुरु की पहचान | 03-07-2026 प्रातः मुरली प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. इस समय की दुनिया को पाप की दुनिया क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
शिवबाबा समझाते हैं कि वर्तमान समय कलियुग है, जहाँ अधिकांश आत्माएँ विकारों के प्रभाव में आकर कर्म करती हैं। इसलिए यह पाप आत्माओं की दुनिया कहलाती है। इसके विपरीत सतयुग पुण्य आत्माओं की दुनिया अर्थात् स्वर्ग है, जहाँ दुःख, पाप और विकारों का नामोनिशान नहीं होता।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“यह पाप आत्माओं की दुनिया है… जरूर कोई पुण्य आत्माओं की दुनिया भी थी, उसको कहा जाता है स्वर्ग।”
प्रश्न 2. बाप धर्म-स्थापकों से अलग कैसे हैं?
उत्तर:
धर्म-स्थापक केवल अपने-अपने धर्म की स्थापना करते हैं, जबकि परमात्मा शिव सभी आत्माओं को पावन बनाकर शान्तिधाम ले जाते हैं और फिर नई दुनिया की स्थापना करते हैं। इसलिए उन्हें सतगुरु कहा जाता है।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“बाबा है सतगुरू… बाप जब आते हैं तो सभी आत्माओं को घर ले जाते हैं इसलिए वह सभी के सतगुरू हैं।”
उदाहरण:
जैसे कोई शिक्षक केवल एक विषय पढ़ाता है, लेकिन विश्वविद्यालय का कुलपति पूरे संस्थान का मार्गदर्शन करता है। उसी प्रकार धर्म-स्थापक एक धर्म स्थापित करते हैं, जबकि परमात्मा सम्पूर्ण मानवता का कल्याण करते हैं।
प्रश्न 3. ज्ञान का तीसरा नेत्र क्या है?
उत्तर:
ज्ञान का तीसरा नेत्र वह आध्यात्मिक बुद्धि है जिसके द्वारा आत्मा सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त को समझती है। यह नेत्र केवल परमपिता परमात्मा ही प्रदान करते हैं।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“मैं तुमको रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ सुनाता हूँ अर्थात् तुम्हारा ज्ञान का तीसरा नेत्र खोलता हूँ।”
प्रश्न 4. आस्तिक किसे कहा जाता है?
उत्तर:
आस्तिक वह है जो परमात्मा, आत्मा और सृष्टि के सत्य ज्ञान को जानता है तथा परमात्मा के साथ प्रेमपूर्वक योग रखता है।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“अब हम तुम बच्चों को आस्तिक बनाते हैं।”
प्रश्न 5. त्रिकालदर्शी कौन बन सकता है?
उत्तर:
केवल ब्राह्मण जीवन जीने वाली आत्माएँ ही त्रिकालदर्शी बनती हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र प्राप्त होता है।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“त्रिकालदर्शी तो सिर्फ तुम ब्राह्मण वर्ण वाले हो।”
प्रश्न 6. सतगुरु किसे कहा जाता है?
उत्तर:
सतगुरु वह है जो आत्मा को दुःख से मुक्त करके सुखधाम और शान्तिधाम का अधिकारी बनाता है। यह कार्य केवल परमात्मा शिव करते हैं।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“गुरू वह जो दु:ख से छुड़ाये और सुख में ले जाये।”
प्रश्न 7. शिवबाबा को ज्ञान का सागर क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान, आत्मा का ज्ञान, कर्म का ज्ञान तथा समय का ज्ञान केवल परमात्मा के पास है। वे ही बच्चों को अपने समान नॉलेजफुल बनाते हैं।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“ज्ञान का सागर तो एक ही बाप है।”
प्रश्न 8. ब्रह्म महातत्त्व और परमात्मा में क्या अंतर है?
उत्तर:
ब्रह्म एक तत्व है, जबकि परमात्मा चेतन ज्योति-बिंदु आत्मा हैं। आत्माएँ और परमात्मा ब्रह्म महातत्त्व में निवास करते हैं, लेकिन उसमें लीन नहीं होते।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“ब्रह्म तो तत्व है… जहाँ हम आत्मायें और परमपिता परमात्मा निवास करते हैं।”
प्रश्न 9. वर्तमान समय को संगमयुग क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि यही वह समय है जब परमात्मा पृथ्वी पर आकर नई दुनिया की स्थापना करते हैं, आत्माओं को ज्ञान देते हैं और पुराने संसार का परिवर्तन प्रारम्भ होता है।
प्रश्न 10. कर्म, अकर्म और विकर्म में क्या अंतर है?
उत्तर:
- विकर्म — रावण राज्य में विकारों के वश होकर किए गए कर्म।
- अकर्म — सतयुग में किए गए कर्म जिनका बंधन नहीं बनता।
- श्रेष्ठ कर्म — संगमयुग में श्रीमत अनुसार किए गए कर्म।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“रावण राज्य में तुम जो कर्म करते हो वह विकर्म बन जाता है। सतयुग में जो कर्म करते हो वह अकर्म हो जाता है।”
प्रश्न 11. शिवबाबा हमें क्या वर्सा देते हैं?
उत्तर:
शिवबाबा आत्माओं को पवित्र बनाकर स्वर्ग, सुख, शान्ति, पवित्रता और विश्व-राज्य का वर्सा देते हैं।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“तुमको स्वर्ग का वर्सा देते हैं।”
प्रश्न 12. अमरकथा का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:
अमरकथा वह आध्यात्मिक ज्ञान है जिसके द्वारा आत्मा जन्म-मरण के दुःख से मुक्त होकर अमरलोक अर्थात् सतयुग की अधिकारी बनती है।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“शिवबाबा तुमको अमरकथा सुना रहे हैं – अमर बनाने के लिए।”
प्रश्न 13. भ्रमरी का उदाहरण हमें क्या शिक्षा देता है?
उत्तर:
जैसे भ्रमरी कीड़े को अपने समान बना देती है, वैसे ही ब्राह्मण आत्माएँ ज्ञान देकर मनुष्यों को देवतुल्य बनाती हैं।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“तुम ब्राह्मण विकारी कीड़ों को बदल देवता बनाते हो।”
प्रश्न 14. आत्म-अभिमानी बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
अपने को शरीर नहीं बल्कि शुद्ध, अविनाशी आत्मा समझकर जीवन जीना ही आत्म-अभिमान है। यही राजयोग का आधार है।
मुरली महावाक्य (03-07-2026):
“अपने को आत्मा समझो।”
प्रश्न 15. इस मुरली की मुख्य धारणा क्या है?
उत्तर:
- आत्म-अभिमानी बनकर ज्ञान की अमरकथा सुनना और दूसरों को सुनाना।
- बाप समान नॉलेजफुल और ब्लिसफुल बनकर सोमरस (ज्ञान) स्वयं पीना और दूसरों को पिलाना।
धारणा (03-07-2026):
“आत्म-अभिमानी बनकर अमरकथा सुननी है तथा ज्ञान की भूँ-भूँ कर आप समान बनाने की सेवा करनी है।”Disclaimer (डिस्क्लेमर):यह वीडियो केवल आध्यात्मिक, शैक्षिक एवं प्रेरणात्मक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें व्यक्त विचार प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की साकार मुरलियों, आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं राजयोग ज्ञान पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी धर्म, संप्रदाय, संस्था, व्यक्ति अथवा समुदाय की भावनाओं को आहत करना, आलोचना करना या किसी प्रकार की धार्मिक श्रेष्ठता सिद्ध करना नहीं है। इस वीडियो का उद्देश्य केवल आत्म-जागृति, आध्यात्मिक चिंतन, नैतिक मूल्यों तथा ईश्वरीय ज्ञान का प्रसार करना है। दर्शकों से निवेदन है कि वे इसे आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मकल्याण की भावना से देखें।
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