RAJYOG(01)-सही राज योग क्या है?भ्रम और वास्तविकता।
आज का वंडरफुल विषय है कि सही राज योग क्या है?
भ्रम और वास्तविकता।
कि भ्रम क्या है? और वास्तविकता क्या है?
जब तक वास्तविकता नहीं समझ में आएगी तब तक हम भ्रम में जीते रहेंगे।
पहले हम देखें गलतियां क्या हैं?
केवल क्रियाएं।
केवल क्रियाएं नहीं। क्रियाएं तो भक्ति मार्ग में होती हैं। यह करो, यह करो, आरती करो, पूजा करो, पाठ करो।
परंतु यहां क्या है? स्वयं की पहचान।
वहां होती है भक्ति मार्ग में चमत्कार की चाह।
हमें यह मिल जाए, चमत्कार करें, चमत्कार से यह मिल जाए, मेरी नौकरी लग जाए, मेरा पति अच्छा मिल जाए, मेरे जीवन में यह हो जाए।
तो वह है हमारी चमत्कार की चाह।
और वहां है अंधविश्वास और मान-सम्मान की इच्छा।
परंतु बाबा कहते हैं, योग का मतलब है…
योग का मतलब क्या है?
स्वयं की पहचान।
आत्मा से परमात्मा का संबंध।
पहचान के बाद बाप की भी पहचान और आत्मा और परमात्मा का संबंध भी पता लगता है कि आत्मा का परमात्मा के साथ क्या संबंध है।
क्योंकि जब यह पता लगता है तभी हम अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकते हैं।
यही है सच्चा राज योग।
यही है सच्चा राज योग जो हमारे जीवन को बदल देता है।
राजयोग में वंडरफुल विशेषता है।
यह हमारे जीवन को बदल देता है।
तो ऐसा राजयोग हम सीखना चाहेंगे।
इस सच्चाई को जानना भी चाहेंगे।
सही राजयोग क्या है? भ्रम और वास्तविकता।
यह हमारा आज का विषय है।
आज योग के नाम पर कई विधियां प्रचलित हैं।
कोई कहता है ऐसे करो, कोई कहता है वैसे करो।
कमेंट्री, कोई कहता है म्यूजिक, कोई कहता है रंग।
अलग-अलग तरीके से योग सिखा रहे हैं।
लेकिन बाबा स्पष्ट कहते हैं—
योग का अर्थ है याद।
योग का अर्थ है याद।
याद माना?
भाई, बाबा की श्रीमत पर चलना।
याद माना बाबा की श्रीमत पर चलना।
क्योंकि याद उसको किया जाता है जिस पर प्यार होता है।
और प्यार किससे होता है?
जिससे प्राप्ति होती है।
जिससे प्राप्ति होती है उससे प्यार होता है।
तो इसलिए योग का अर्थ है परमात्मा से प्यार करना और परमात्मा की मत पर अपने जीवन को चलाना।
समझ में आ गया?
मुरली है 18 जनवरी 1969।
अव्यक्त मुरली।
राजयोग की सच्चाई क्या है?
राजयोग = आत्मा की स्मृति।
पहले-पहले आत्म स्मृति चाहिए।
फिर परमात्मा से संबंध चाहिए।
क्योंकि आत्म स्मृति जमा परमात्मा से हमारा रिश्ता।
क्या रिश्ता है परमात्मा से हमारा?
कि वह हमारा बाप भी है, टीचर भी है और सतगुरु भी है।
ठीक है?
बाबा कहते—अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो।
अपने को आत्मा समझकर क्या करो?
मुझे याद करो।
भ्रम—अब इसमें क्या हुआ?
हमने क्या गलती कर दी?
हमने समझा कमेंट्री ही योग है।
हमें कोई भाई या बहन बैठकर कमेंट्री करा रहा है और हम समझते हैं कि यही योग है।
बाबा कहते—याद की यात्रा में शांति चाहिए, शब्द नहीं।
याद की यात्रा किसको मालूम है? कौन बताएगा?
बाबा की मत पर चलते-चलते अपने जीवन में लगातार सुधार।
लगातार आत्मा के अंदर सुधार होना।
हर पल अपने में सुधार लाना।
लगातार अपने में यदि हम सुधार कर रहे हैं तो हम याद की यात्रा पर हैं।
और हमें अपने में सुधार करने के लिए शांति चाहिए।
हम शांति में बैठकर अपने आप को सुधारें।
अपनी कमियों को अपने जीवन से निकालें।
ठीक है कि नहीं?
परंतु होता क्या है कि यदि हम शब्द बोल रहे हैं, तो हम अपने जीवन को देख नहीं पाते।
हम उसमें सुधार नहीं कर पाते।
परिवर्तन नहीं आता।
इसलिए हमें केवल शब्दों के बहाव में नहीं बहना है।
हमें वास्तव में अपने आप को सुधारना है।
अपने आप को बैठकर समझाना है।
जिसको बाबा कहते हैं—मनमनाभव।
अपने मन को बैठकर मनाना है।
उसके लिए शब्द नहीं चाहिए।
गाइडेड कमेंट्री नयों के लिए ठीक है, समझाने के लिए ठीक है।
परंतु समझाना तो मुझे खुद को अपने आप है।
म्यूजिक से योग लगता है?
म्यूजिक मन को शांत कर सकता है।
लेकिन बाबा का संकेत—
मन को एक में लगाओ।
बस मेरी बात ही सुनो।
मेरी बात ही देखो।
जैसे मैं कहता हूं वैसे करो।
तो यह है मन को एक में लगाना।
जिसमें मन लग गया, वह फिर उसी प्रकार से सोचता है, देखता है, बोलता है और कर्म करता है।
मुरली 12 मार्च 1972।
निष्कर्ष—सच्चा योग अंदर की स्थिति है।
सच्चा योग क्या है?
अंदर की स्थिति।
हमारे अंदर की अवस्था बताती है कि हमारा बाबा के साथ कनेक्शन है या नहीं।
बाबा की श्रीमत पर हम चल रहे हैं या नहीं।
बाहरी साधन सहायक हो सकते हैं लेकिन आधार नहीं।
साधन सहायक हो सकते हैं, परंतु उनको आधार नहीं बनाना।
बाबा कहते हैं—साधनों को अपना साधन बनाओ, उनका आधार नहीं।
जैसे वातावरण बना लिया जाए, हल्की ट्यून चल रही हो, सब शांत हों—तो सहयोग मिलेगा।
परंतु जब अंत समय आएगा तब यह सब नहीं मिलेगा।
चारों तरफ हाय-हाय हो रही होगी।
तो आपका योग नहीं लगेगा यदि आप साधनों पर निर्भर हैं।
इसलिए कोई आधार नहीं बनाना।
कुर्सी मिले तो मैं योग लगाऊं, नीचे नहीं बैठ सकता—ऐसा नहीं।
कोई भी साधन आधार नहीं बनाना है।
उनका सहयोग लेना है, लाभ उठाना है, परंतु उन पर आधारित नहीं होना है।
भ्रम क्या है?
दुनिया में मैक्सिमम भाई-बहन कहते हैं—आओ बाबा को याद करें।
हम दो मिनट बाबा को याद करें।
मैं दो घंटे अमृतवेले बाबा को याद करता हूं।
एक घंटा शाम को याद करता हूं।
यह जो बाबा के महावाक्य हैं…
बाबा कहते—अब तक क्या कर रहे थे?
अब शाम को एक घंटा याद करने बैठे हो तो सवेरे से क्या कर रहे थे?
याद करने के लिए सारा दिन गवा दिया?
बाबा कहते—याद में रहना है।
चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, बात करते, लेते-देते—कुछ भी करते बाबा की याद में रहना है।
हम सोचते हैं अब मुझे बाबा को याद करना है।
लेकिन बाबा कहते हैं—स्मृति स्वरूप बनो।
याद करने वाले नहीं।
हर वक्त याद में रहने वाले बनो।
मेरी याद तुम्हारे जीवन में दिखाई दे।
स्मृति स्वरूप बनो।
अंतर क्या है?
याद करने में प्रयास है।
याद करने में संघर्ष है।
परंतु याद में रहना एक स्वाभाविक स्थिति है।
बाबा कहते हैं—जैसा सिमरन वैसा स्वरूप।
जैसा आप बाबा को याद करेंगे, बाबा की श्रीमत का मंथन करेंगे, वैसा आपका स्वरूप बनेगा।
मुरली 10 फरवरी 1971।
बिना साधन के योग।
कोई भी साधन का उपयोग नहीं करना।
यह शरीर भी एक साधन है।
योग में इस शरीर की भी परवाह न रहे।
बाबा का स्पष्ट निर्देश है—
चलते-फिरते, खाते-पीते मुझे याद करो।
अर्थात मेरी श्रीमत पर चलो।
जब शरीर प्रयोग हो गया तो आत्मा का योग नहीं हुआ।
वह शरीर का योग हो गया।
कमेंट्री सुन रहे हो तो कान प्रयोग हो रहे हैं।
जबकि हमें परमात्मा को आत्मिक अवस्था में याद करना है।
आत्मा ने परमात्मा को याद करना है, शरीर ने नहीं।
शरीर द्वारा हमें मालूम हुआ कि मैं यह शरीर नहीं हूं।
मैं इस शरीर से अलग आत्मा हूं।
तो मैं आत्मा हूं।
मुझे आत्मा समझकर परमात्मा से मिलन मनाना है।
परमात्मा की श्रीमत पर चलना है।
चलना इसी शरीर से है, परंतु अनुभव करना है कि मैं आत्मा इस देह से न्यारी हूं।
अंत समय जब लास्ट टाइम आएगा—
बाबा कहते हैं, अंतकाल जो स्मृति होगी वही स्थिति बनेगी।
जिसको दुनिया में भी कहा गया—अंत मति सो गति।
बाबा ने समझाया—
अंत में आपकी अवस्था कितनी पवित्र बनी है, वही डिसाइड करेगी।
वही हमारे रिजल्ट को डिसाइड करेगा।
उस समय कौन 100% बना है, कौन 99%, कौन 80%, कौन 60%, कौन 40%—
उसी प्रकार से गति मिलेगी।
निष्कर्ष—
याद करना नहीं पड़े, ऐसी अपनी स्थिति बनानी है।
ऐसी अपनी स्थिति बनानी है।


