PR:-(02)क्यों बढ़ रहा है ये समाज में मतभेद? आत्मा की दृष्टि से एकता का रहस्य।
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
परमात्मा क्या कहते हैं?
आज हम दूसरा विषय कर रहे हैं — क्यों बढ़ रहा है समाज में मतभेद?
आज समाज के अंदर हर एक अपनी मत पर चलता है और एक की मत दूसरे से नहीं मिलती।
जब इसी धरती पर स्वर्ग था, सभी एक ही मत वाले थे।
आज एक की मत दूसरे से नहीं मिलती, मतभेद है।
क्यों बढ़ रहा है ये समाज में मतभेद?
आत्मा की दृष्टि से एकता का रहस्य।
आज हम बात करने जा रहे हैं उस समस्या की, जो हर घर, समाज और राष्ट्र में धीरे-धीरे गहरी होती जा रही है — सामाजिक टकराव और मतभेद।
क्योंकि मतभेद ही हमारी आपस में टकराव का कारण है।
एक दूसरे के साथ हमारे विचार नहीं मिलते।
एक दूसरे के विचारों के साथ हमारी टकराहट है।
धर्म अलग-अलग हैं।
विचारधाराएं अलग-अलग हैं।
जातियां अलग-अलग हैं।
भाषाएं अलग-अलग हैं।
यहां तक कि अपनी व्यक्तिगत सोच में भी हजारों दीवारें खड़ी हैं।
हर आत्मा, हर व्यक्ति की अपनी ही सोच है, अपने ही विचार हैं।
लेकिन सवाल उठता है:
क्या यह दीवारें सच में हैं या सिर्फ हमारी दृष्टि की भूल है?
विभाजन का चित्र:
आज का भारत अनेक विभाजनों में बंट चुका है।
आज का समाज मानो अनेक टुकड़ों में बटा हुआ है।
किसी को अपने धर्म पर गर्व है, किसी को अपनी विचारधारा सर्वोपरि लगती है।
कोई अपने संस्कारों को श्रेष्ठ समझता है।
परिणाम: मतभेद, झगड़े, वाद-विवाद…
और सबसे बड़ी बात — “मैं सही हूं, तुम गलत हो।”
मतभेद की जड़ यही है।
इसी सोच ने मनुष्य को मनुष्य से दूर कर दिया है।
प्यार खत्म हो गया है।
परमात्मा की दृष्टि — विविध संस्कारों का दिव्य खेल
परमात्मा समझाते हैं कि बच्चे,
हर आत्मा यूनिक है,
और उसका पार्ट भी यूनिक है।
यह सारा संसार विविध संस्कारों का दिव्य खेल है।
वैरायटी होने के कारण यह संभव ही नहीं कि सभी के संस्कार एक जैसे हों।
शिव बाबा की दृष्टि से यह पूरा विश्व-नाटक 5000 वर्षों का एक सुंदर चक्र है,
जिसमें हर धर्म, हर संस्कृति, हर विचारधारा का अपना निश्चित और सम्मानजनक पार्ट है।
सभी धर्म अपने निश्चित समय पर इस धरती पर आते हैं।
कोई भी धर्म पहले या बाद में नहीं आ सकता।
हर धर्म का एक्यूरेट टाइम है।
यह सृष्टि के झाड़ का चित्र है —
सतयुग में केवल एक धर्म था:
आदि सनातन देवी-देवता धर्म।
त्रेता में भी धर्म एक ही रहता है,
लेकिन उसकी अवस्था और गुणों में अंतर आ जाता है।
त्रेता के अंत में भूखंड टूट जाते हैं,
और वे एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं।
जिस भूखंड के लोग जहां चले गए,
उन्होंने सोचा — “हम बच गए, बाकी सब मर गए।”
लगभग 2000 वर्ष तक एक महाद्वीप दूसरे से अनजान रहा।
500 वर्ष पहले जब पानी के जहाज बने तो महाद्वीप आपस में जुड़े।
सभी धर्म धीरे-धीरे प्रकट होते गए।
भाषाएं, रिवाज, संस्कार — सब वातावरण अनुसार बदलते गए।
हर आत्मा का सम्मानजनक पार्ट
हर आत्मा यूनिक है।
उसका रोल 5000 साल के चक्र में बिल्कुल निश्चित है।
इसलिए परमात्मा किसी को गलत नहीं कहते।
वे समझाते हैं —
यह सब भिन्न-भिन्न संस्कारों का खेल है।
किसी में सेवा-भाव प्रबल है,
कोई व्यवस्था-प्रेमी है,
कोई आध्यात्मिकता को प्रधान मानता है,
कोई विज्ञान को,
कोई कला को,
कोई व्यापार को।
संगम युग की विशेषता
संगम युग पर सभी प्रकार की आत्माएं सामने आती हैं —
देवी-देवता जैसे संस्कार,
असुर जैसे संस्कार —
ऊंच और निम्न दोनों।
संस्कार आमने-सामने आते हैं ताकि आत्मा चुन सके —
मुझे किस दिशा में जाना है?
मैं अपने संस्कारों को कहां उठाना चाहता/चाहती हूं?
यह समय है —
क्लैश को क्लैरिटी में बदलने का।
परमात्मा की यूनिवर्सिटी
परमात्मा की यूनिवर्सिटी किसी धर्म के खिलाफ नहीं है।
हर धर्म के मूल आत्मिक मूल्य —
प्रेम, शांति, अहिंसा, सत्य
इन्हीं कॉमन वैल्यूज़ पर एकता बन सकती है।
परमात्मा ने समझाया कि सभी धर्म एक ही मूल से निकले हैं।
सतयुग और त्रेता में तो और कोई धर्म होता ही नहीं।
द्वापर में आकर धर्म-पिता —
इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, मोहम्मद, शंकराचार्य
आदि अपने-अपने धर्म की स्थापना करते हैं।
वे सभी परमात्मा से प्रेरणा लेकर
मानवता को एक श्रेष्ठ, संतुलित, और प्रेमपूर्ण जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
हमारी दृष्टि
हर आत्मा इस विश्व-नाटक का एक्टर है।
कोई गलत नहीं है।
हर एक्टर का पार्ट उसकी रिकॉर्डिंग अनुसार है।

