01-12-1989 -“Respect is Attained Only Through Self-Respect”

AV-07/01-12-1989-“स्वमान से ही सम्मान की प्राप्ति”

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“स्वमान से ही सम्मान की प्राप्ति”

आज बापदादा चारों ओर के स्वमानधारी बच्चों को देख रहे हैं। स्वमानधारी बच्चों का ही सारा कल्प सम्मान होता है। एक जन्म स्वमानधारी, सारा कल्प सम्मानधारी। अपने राज्य में भी राज्य-अधिकारी बनने के कारण प्रजा द्वारा सम्मान प्राप्त होता है और आधा कल्प भक्तों द्वारा सम्मान प्राप्त करते हो। अब अपने लास्ट जन्म में भी भक्तों द्वारा देव आत्मा वा शक्ति रूप का सम्मान देख रहे हो और सुन रहे हो। कितना सिक व प्रेम से अभी भी सम्मान दे रहे हैं! इतना श्रेष्ठ भाग्य कैसे प्राप्त किया! मुख्य सिर्फ एक बात के त्याग का यह भाग्य है। कौनसा त्याग किया? देह अभिमान का त्याग किया क्योंकि देह अभिमान के त्याग बिना स्वमान में स्थित हो ही नहीं सकते। इस त्याग के रिटर्न में भाग्यविधाता भगवान ने यह भाग्य का वरदान दिया है। दूसरी बात – स्वयं बाप ने आप बच्चों को स्वमान दिया है। बाप ने बच्चों को चरणों के दास वा दासी से अपने सिर का ताज बना दिया। कितना बड़ा स्वमान दिया! ऐसे स्वमान प्राप्त करने वाले बच्चों का बाप भी सम्मान रखते हैं। बाप बच्चों को सदा अपने से भी आगे रखते हैं। सदा बच्चों के गुणों का गायन करते हैं। हर रोज़ सिक व प्रेम से यादप्यार देने के लिए परमधाम से साकार वतन में आते हैं। वहाँ से भेजते नहीं लेकिन आकर देते हैं। रोज़ यादप्यार मिलता है ना। इतना श्रेष्ठ सम्मान और कोई दे नहीं सकता। स्वयं बाप ने सम्मान दिया है, इसलिए अविनाशी सम्मान अधिकारी बने हो। ऐसी श्रेष्ठता का अनुभव करते हो? स्वमान और सम्मान – दोनों का आपस में सम्बन्ध है।

स्वमानधारी अपने प्राप्त हुए स्वमान में रहते हुए स्वमान के सम्मान में भी रहता और दूसरों को भी सम्मान से देखता, बोलता वा सम्पर्क में आता है। स्व-सम्मान का अर्थ ही है स्व को सम्मान देना। जैसे बाप विश्व की सर्व आत्माओं द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाले हैं, हर एक सम्मान देते। लेकिन जितना ही बाप को सम्मान मिलता है उतना ही सब बच्चों को सम्मान देते हैं। जो देता नहीं है तो देवता बनता नहीं। अनेक जन्म देवता बनते हो और अनेक जन्म देवता रुप का ही पूजन होता है। एक जन्म ब्राह्मण बनते हो लेकिन अनेक जन्म देवता रूप में राज्य करते वा पूज्य बनते हो। देवता अर्थात् देने वाला। अगर इस जन्म में सम्मान नहीं दिया तो देवता कैसे बनेंगे, अनेक जन्मों में सम्मान कैसे प्राप्त करेंगे? फॉलो फादर। साकार स्वरूप ब्रह्मा बाप को देखा – सदा स्वयं को वर्ल्ड सर्वेन्ट (विश्व-सेवाधारी) कहलाया, बच्चों का सर्वेन्ट कहलाया और बच्चों को मालिक बनाया। सदा मालेकम् सलाम किया। सदा छोटे बच्चों को भी सम्मान का स्नेह दिया, होवनहार विश्वकल्याणकारी रूप से देखा। कुमारियों वा कुमारों को, युवा स्थिति वालों को सदा विश्व की नामीग्रामी महान् आत्माओं को चैलेंज करने वाले, असम्भव को सम्भव करने वाले, महात्माओं के सिर झुकाने वाले – ऐसे पवित्र आत्माओं के सम्मान से देखा। सदा अपने से भी कमाल करने वाले महान आत्मा समझ सम्मान दिया ना! ऐसे ही बुजुर्ग-आत्माओं को सदा अनुभवी आत्मा, हमजिन्स आत्मा को सम्मान से देखा। बांधेले बांधेलियों को निरन्तर याद में नम्बरवन के सम्मान से देखा। इसलिए नम्बरवन अविनाशी सम्मान के अधिकारी बने। राज्य सम्मान में भी नम्बरवन – विश्व-महाराजन और पूज्य रूप में भी बाप की पूजा के बाद पहले पूज्य लक्ष्मी-नारायण ही बनते हैं। तो राज्य सम्मान और पूज्य सम्मान – दोनों में नम्बरवन हो गये क्योंकि सर्व को स्वमान, सम्मान दिया। ऐसे नहीं सोचा – सम्मान देवे तो सम्मान दूँ। सम्मान देने वाले निंदक को भी अपना मित्र समझते। सिर्फ सम्मान देने वाले को अपना नहीं समझते लेकिन गाली देने वाले को भी अपना समझते क्योंकि सारी दुनिया ही अपना परिवार है। सर्व आत्माओं का तना आप ब्राह्मण हो। यह सारी शाखायें अर्थात् भिन्न-भिन्न धर्म की आत्मायें भी मूल तना से निकली हैं। तो सभी अपने हुए ना। ऐसे स्वमानधारी सदा अपने को मास्टर रचयिता समझ सर्व के प्रति सम्मान-दाता बनते हैं। सदा अपने को आदि देव ब्रह्मा के आदि रत्न आदि पार्टधारी आत्मायें समझते हो? इतना नशा है? तो सभी ने सुना – बच्चों का सम्मान क्या है, बूढ़ों का सम्मान क्या है, युवा का क्या है? आदि पिता ब्रह्मा ने हमको ऐसे सम्मान से देखा। कितना नशा होगा! तो सदा यह स्मृति रखो कि आदि आत्मा ने जिस श्रेष्ठ दृष्टि से देखा, ऐसी ही श्रेष्ठ स्थिति की सृष्टि में रहेंगे। ऐसे अपने से वायदा करो। वायदे तो करते रहते हो ना! बोल से भी वायदा करते हो, मन से भी करते हो और लिखकर भी करते हो और फिर भूल भी जाते हो। इसलिए वायदे का फायदा नहीं उठा पाते। याद रखो तो फायदा भी उठाओ। सभी अपने को चेक करो – कितने बार वायदा किया है और निभाया कितने बार है? निभाना आता है वा सिर्फ वायदा करना आता है? वा बदलते रहते हो – कभी वायदा करने वाले, कभी निभाने वाले?

टीचर्स क्या समझती हैं? निभाने वालों की लिस्ट में हो ना। टीचर्स को बापदादा सदा साथी शिक्षक कहते हैं। तो साथी की विशेषता क्या होती है? साथी समान होता है। बाप कभी बदलता है क्या? टीचर्स भी वायदा और फायदा – दोनों का बैलेंस रखने वाली हैं। वायदे बहुत और फायदा कम हो – यह बैलेंस नहीं होता। जो दोनों का बैलेंस रखते हैं उसको वरदाता बाप द्वारा यह वरदान वा ब्लैसिंग मिलती है। वह सदा दृढ़ संकल्प से कर्म में सफलतामूर्त बनते हैं। साथी शिक्षक का यही विशेष कर्म है। संकल्प और कर्म समान हों। संकल्प श्रेष्ठ और कर्म साधारण हो जाएं – इसको समानता नहीं कहेंगे। तो सदा टीचर्स अपने को ”साथी शिक्षक“ अर्थात् ”शिक्षक बाप समान“ समझ – इस स्मृति में समर्थ बन चलो। बापदादा को टीचर्स की हिम्मत पर खुशी होती है। हिम्मत रख सेवा के निमित्त तो बन गये हैं ना। लेकिन अभी सदा यह स्लोगन याद रखो – ”हिम्मते टीचर, समान शिक्षक बाप“। यह कभी नहीं भूलना। तो स्वत: ही समान बनने वाला लक्ष्य – ”बापदादा“ आपके सामने रहेगा अर्थात् साथ रहेगा। अच्छा!

चारों ओर के स्वमानधारी सो सम्मानधारी बच्चों को बापदादा नयनों के सम्मुख देखते हुए सम्मान की दृष्टि से यादप्यार दे रहे हैं। सदा राज-सम्मान और पूज्य-सम्मान के समान साथी बच्चों को यादप्यार और नमस्ते।

बिहार ग्रुप:- सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी समझते हो? स्व का राज्य मिला है या मिलने वाला है? स्वराज्य अर्थात् जब चाहो, जैसे चाहो वैसे कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करा सको। कर्मेन्द्रिय जीत अर्थात् स्वराज्य अधिकारी। ऐसे अधिकारी बने हो या कभी-कभी कर्मेन्द्रियां आपको चलाती हैं? कभी मन आपको चलाता है या आप मन को चलाते हो? कभी मन व्यर्थ संकल्प करता है या नहीं करता है? अगर कभी-कभी करता है तो उस समय स्वराज्य अधिकारी कहेंगे? राज्य बहुत बड़ी सत्ता है। राज्य सत्ता चाहे जो कर सकती है, जैसे चलाने चाहे वैसे चला सकती है। यह मन-बुद्धि-संस्कार आत्मा की शक्तियां हैं। आत्मा इन तीनों की मालिक है। यदि कभी संस्कार अपने तरफ खींच लें तो मालिक कहेंगे? तो स्वराज्य-सत्ता अर्थात् कर्मेन्द्रिय-जीत। जो कर्मेन्द्रिय-जीत है वही विश्व की राज्य-सत्ता प्राप्त कर सकता है। स्वराज्य अधिकारी विश्व-राज्य अधिकारी बनता है। तो आप ब्राह्मण आत्माओं का ही स्लोगन है कि स्वराज्य ब्राह्मण जीवन का जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वराज्य अधिकारी की स्थिति सदा मास्टर सर्वशक्तिमान है, कोई भी शक्ति की कमी नहीं। स्वराज्य अधिकारी सदा धर्म अर्थात् धारणामूर्त भी होगा और राज्य अर्थात् शक्तिशाली भी होगा। अभी राज्य में हलचल क्यों हैं? क्योंकि धर्म-सत्ता अलग हो गई है और राज्य-सत्ता अलग हो गई है। तो लंगड़ा हो गया ना! एक सत्ता हुई ना। इसलिए हलचल है। ऐसे आप में भी अगर धर्म और राज्य – दोनों सत्ता नहीं हैं तो विघ्न आयेंगे, हलचल में लायेंगे, युद्ध करनी पड़ेगी। और दोनों ही सत्ता हैं तो सदा ही बेपरवाह बादशाह रहेंगे, कोई विघ्न आ नहीं सकता। तो ऐसे बेपरवाह बादशाह बने हो? या थोड़ी-थोड़ी शरीर की, सम्बन्ध की… परवाह रहती है? पाण्डवों को कमाने की परवाह रहती है, परिवार को चलाने की परवाह रहती है या बेपरवाह रहते हैं? चलाने वाला चला रहा है, कराने वाला करा रहा है – ऐसे निमित्त बनकर करने वाले बेपरवाह बादशाह होते हैं। ”मैं कर रहा हूँ“ – यह भान आया तो बेपरवाह नहीं रह सकते। लेकिन बाप द्वारा निमित्त बना हुआ हूँ – यह स्मृति रहे तो बेफिकर वा निश्चिंत जीवन अनुभव करेंगे। कोई चिंता नहीं। कल क्या होगा – उसकी भी चिंता नहीं। कभी यह थोड़ी-सी चिंता रहती है कि कल क्या होगा, कैसे होगा? पता नहीं विनाश कब होगा, क्या होगा? बच्चों का क्या होगा? पोत्रों-धोत्रों का क्या होगा – यह चिंता रहती है? बेपरवाह बादशाह को सदा ही यह निश्चय रहता है कि जो हो रहा है वह अच्छा, और जो होने वाला है वह और भी बहुत अच्छा होगा क्योंकि कराने वाला अच्छे-ते-अच्छा है ना! इसको कहते हैं निश्चयबुद्धि विजयी। ऐसे बने हो या सोच रहे हो? बनना तो है ही ना! इतनी बड़ी राजाई मिल जाए तो सोचने की क्या बात है? अपना अधिकार कोई छोड़ता है? झोपड़ी वाले भी होंगे, थोड़ी-सी मिलकियत भी होगी – तो भी नहीं छोड़ेंगे। यह तो कितनी बड़ी प्राप्ति है! तो मेरा अधिकार है – इस स्मृति से सदा अधिकारी बन उड़ते चलो। यही वरदान याद रखना कि ”स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है“। मेहनत करके पाने वाले नहीं, अधिकार है। अच्छा! बिहार माना सदा बहार में रहने वाले। पतझड़ में नहीं जाना। कभी आंधी-तूफान न आये, सदा बहार। अच्छा!

2\. अपने को रूहानी दृष्टि से सृष्टि को बदलने वाला अनुभव करते हो? सुनते थे कि दृष्टि से सृष्टि बदल जाती है लेकिन अभी अनुभवी बन गये। रूहानी दृष्टि से सृष्टि बदल गई ना! अभी आपके लिए बाप संसार है, तो सृष्टि बदल गई। पहले की सृष्टि अर्थात् संसार और अभी के संसार में फ़र्क हो गया ना! पहले संसार में बुद्धि भटकती थी और अभी बाप ही संसार हो गया। तो बुद्धि का भटकना बंद हो गया, एकाग्र हो गई क्योंकि पहले की जीवन में, कभी देह के सम्बन्ध में, कभी देह के पदार्थ में – अनेकों में बुद्धि जाती थी। अभी यह सब बदल गया। अभी देह याद रहती या देही? अगर देह में कभी बुद्धि जाती है तो राँग समझते हो ना! फिर बदल लेते हो, देह के बजाय अपने को देही समझने का अभ्यास करते हो। तो संसार बदल गया ना! स्वयं भी बदल गये। बाप ही संसार है या अभी संसार में कुछ रहा हुआ है? विनाशी धन या विनाशी सम्बन्ध के तरफ बुद्धि तो नहीं जाती? अभी मेरा रहा ही नहीं। ”मेरे पास बहुत धन है“ – यह संकल्प या स्वप्न में भी नहीं होगा क्योंकि सब बाप के हवाले कर दिया। मेरे को तेरा बना लिया ना! या मेरा, मेरा ही है और बाप का भी मेरा है, ऐसे तो नहीं समझते? यह विनाशी तन, धन पुराना मन, मेरा नहीं, बाप को दे दिया। पहला-पहला परिवर्तन होने का संकल्प ही यह किया कि सब कुछ तेरा और तेरा कहने से ही फायदा है। इसमें बाप का फायदा नहीं है, आपका फायदा है क्योंकि मेरा कहने से फंसते हो, तेरा कहने से न्यारे हो जाते हो। मेरा कहने से बोझ वाले बन जाते हो और तेरा कहने से डबल लाइट ”ट्रस्टी“ बन जाते हो। तो क्या अच्छा है? हल्का बनना अच्छा है या भारी बनना अच्छा है? आजकल के जमाने में शरीर से भी कोई भारी होता है तो अच्छा नहीं लगता। सभी अपने को हल्का करने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि भारी होना माना नुकसान है और हल्का होने से फायदा है। ऐसे ही मेरा-मेरा कहने से बुद्धि पर बोझ पड़ जाता है, तेरा-तेरा कहने से बुद्धि हल्की बन जाती है। जब तक हल्के नहीं बने तब तक ऊंची स्थिति तक पहुंच नहीं सकते। उड़ती कला ही आनंद की अनुभूति कराने वाली है। हल्का रहने में ही मजा है। अच्छा!

जब बाप मिला तो माया उसके आगे क्या है? माया है रुलाने वाली और बाप है वर्सा देने वाला, प्राप्ति कराने वाला। सारे कल्प में ऐसी प्राप्ति कराने वाला बाप मिल नहीं सकता! स्वर्ग में भी नहीं मिलेगा। तो एक सेकेण्ड भी भूलना नहीं चाहिए। हद की प्राप्ति कराने वाला भी नहीं भूलता है तो बेहद की प्राप्ति कराने वाला भूल कैसे सकता! तो सदा यही याद रखना कि ट्रस्टी हैं। कभी भी अपने ऊपर बोझ नहीं रखना। इससे सदा हंसते, गाते, उड़ते रहेंगे। जीवन में और क्या चाहिए! हंसना, गाना और उड़ना। जब प्राप्ति होगी तब तो हंसेंगे ना। नहीं तो रोयेंगे। तो यह वरदान स्मृति में रखना कि हम हंसने-गाने और उड़ने वाले हैं, सदा ही बाप के संसार में रहने वाले हैं। और कुछ है ही नहीं जहाँ बुद्धि जाए। स्वप्न में भी रोना नहीं। माया रुलाए तो भी नहीं रोना। मन का भी रोना होता है, सिर्फ आंखों का रोना ही नहीं होता। तो माया रुलाती है, बाप हंसाते हैं। सदा बिहार माना खुश रहने वाले – खुशबहार। और बंगाल माना सदा मीठा रहने वाले। बंगाल में मिठाइयां अच्छी होती हैं ना, बहुत वैरायटी होती है। तो जहाँ मधुरता है वहाँ ही पवित्रता है। बिना पवित्रता के मधुरता आ नहीं सकती। तो सदा मधुर रहने वाले और सदा खुशबहार रहने वाले। अच्छा! टीचर्स भी खुशबहार को देख करके सदा-बहार में ही रहती हैं ना। अच्छा!

दिल्ली ज़ोन:- दिल्ली को बापदादा ”दिल“ कहते हैं। नाम है दिल्ली अर्थात् दिल ली। बाप ने आकर दिल ली और आपने आकर क्या किया? बाप को दिल में बिठा दिया। दिल में और तो कोई नहीं है ना! न व्यक्ति, न वस्तु। कोई वस्तु भी आकर्षित करती है तो वह भी दिल में बिठाया ना! वस्तु के पीछे भी अगर दिल लग गई तो बाप भूल जायेगा ना! बाप को भूला तो माया का लगा बम गोला। बॉम्ब (गोला) लगने से कितना नुक्सान हो जाता है! तो यह भी बॉम्ब लगता है तो बहुत नुक्सान कर देता है। दिल है ही बाप के लिए तो दूसरा कैसे आ सकता है? जो आसन जिसका होगा, वही बैठेगा ना! अभी प्राइम मिनिस्टर की सीट पर जो फिक्स होगा वही बैठेगा। तो दिल है दिलाराम के लिए। एक ही काम मिला है – बाप को याद करो, बस। जिसके दिल में बाप है वह सदा ही ‘वाह-वाह’ के गीत गाता है और बाप नहीं तो ‘हाय-हाय’ के गीत गाता है। दुनिया वाले ‘हाय-हाय’ करते और आप ‘वाह-वाह’ करते। स्वयं भी ‘वाह-वाह’ हो गये, बाप भी ‘वाह-वाह’ और ड्रामा में जो कुछ चल रहा है वह भी ”वाह-वाह“। तो सदा ‘वाह-वाह‘ के गीत गाने वाले हो या कभी ‘हाय-हाय’ भी कर देते हो! मन से भी, स्वप्न में भी कभी ‘हाय’ नहीं निकल सकती। ‘हाय’ क्या हो गया! यह कभी कहते हो? जो हुआ वह भी वाह, जो हो रहा है वह भी ‘वाह’, जो होना है वह भी ‘वाह’। तीनों ही काल – वाह-वाह है। एक काल भी खराब नहीं हो सकता। क्योंकि बाप भी अच्छे-ते-अच्छा, संगमयुग भी सबसे अच्छा और जो प्राप्ति है वह भी अच्छे-ते-अच्छी और भविष्य जो प्राप्त होना है वह भी अच्छे-ते-अच्छा। सब अच्छा होना है तो वाह-वाह के गीत गाते रहो। जहाँ सब अच्छा लगेगा वहाँ इच्छा नहीं होगी। अगर इच्छा होती है तो अच्छा नहीं होता और अच्छा होता है तो इच्छा नहीं होती। क्योंकि अच्छा तब कहेंगे जब सब प्राप्त हो। जब अप्राप्ति होती है तब इच्छा होती है। तो कोई अप्राप्ति है? माताओं को गहने चाहिए? सोना चाहिए? पांडवों को लाख वा पद्म चाहिए? करोड़ चाहिए? नहीं चाहिए? क्योंकि अब के करोड़पति बनना अर्थात् सदा के करोड़ गंवाना। अभी क्या करेंगे? या झूठी माया, झूठी काया – झूठा क्या करेंगे! शरीर निर्वाह के लिए, दाल-रोटी के लिए तो बहुत मिल रहा है और मिलता रहेगा। बाकि क्या चाहिए? लॉटरी वगैरह चाहिए? कई बच्चे समझते हैं लॉटरी आयेगी तो यज्ञ में लगा देंगे। लेकिन ऐसा पैसा यज्ञ में नहीं लगता। होती अपनी इच्छा है लेकिन कहते हैं लॉटरी आयेगी तो सेवा करेंगे! अभी तो सच्ची कमाई जमा कर रहे हो, इसलिए इच्छा मात्रम् अविद्या। क्योंकि इच्छा में अगर गये तो इच्छा के पीछे भागना ऐसे ही है जैसे मृगतृष्णा। तो इच्छा समाप्त हो गई, अच्छे बन गये! जब रचयिता ही आपका हो गया तो रचना क्या करेंगे! बेहद के आगे हद क्या लगती है? कुछ भी नहीं है। हद में फंस गये तो बेहद गया।

दिल्ली वालों को तो नशा चाहिए – दिल्ली में जमुना के किनारे महल बनेंगे! तो सिर्फ महल देखने वाले बनेंगे या महल में रहने वाले? सभी राज्य करेंगे या देखेंगे? अच्छा! बाप मिला सब-कुछ मिला। याद और सेवा के सिवाय और कोई कार्य है ही नहीं। अगर दफ्तर में जाते हो, बिजनेस करते हो – तो भी सेवा के लिए। इस लक्ष्य से कहीं भी जायेंगे तो सेवा होगी। अगर यह समझकर जायेंगे कि ड्यूटी बजाने जा रहा हूँ, जाना ही है तो सेवा नहीं होगी। काम करके लौट आयेंगे लेकिन सेवा नहीं कर सकेंगे। सेवा के निमित्त यह कर रहा हूँ – तो सेवा आपके पास स्वत: ही आयेगी और जितनी सेवा करेंगे उतनी और खुशी बढ़ती जायेगी। भविष्य तो है ही लेकिन प्रत्यक्षफल ‘खुशी’ मिलती है। तो फल खाओ, मेहनत नहीं करो। सेवा याद नहीं रहेगी तो मेहनत करनी पड़ेगी। खाली बुद्धि रहना अर्थात् माया का आह्वान करना और बुद्धि को याद और सेवा में बिजी रखा तो सदा ही फल खाते रहेंगे। अच्छा!

दिल्ली वालों को बापदादा विशेष सहयोग देते हैं, क्यों? क्योंकि समय पर सहयोगी पहले दिल्ली निवासी बने हैं। जब यज्ञ में आवश्यकता थी तब सहयोगी बनें। तो जो समय पर सहयोगी बनता है उसको ऑटोमेटिकली विशेष सहयोग मिलता है। दिल्ली निवासियों को यह विशेष लिफ्ट है। स्थापना में सहयोग के निमित्त दिल्ली बनी है, उसमें भी विशेष मातायें। तो बापदादा किसका रखता नहीं है, अभी ही देता है। एक का पद्मगुणा करके दे देता है। तो एक्स्ट्रा लिफ्ट हुई ना। जब स्थापना में पहला नम्बर बने तो राज्य में भी पहला नम्बर बनेंगे। समझा?

अध्याय: “स्वमान से ही सम्मान की प्राप्ति”

 प्रस्तावना: स्वमान – जीवन की सबसे बड़ी पूंजी

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आज के इस आध्यात्मिक ज्ञान में बापदादा एक गहरी सच्चाई बताते हैं—सम्मान पाने का एक ही आधार है: स्वमान (Self-Respect)
यदि आत्मा स्वयं को पहचान ले, अपनी श्रेष्ठता को स्वीकार कर ले, तो उसे दुनिया से सम्मान मांगने की आवश्यकता नहीं रहती—सम्मान स्वयं उसके पीछे आता है।

मुरली संदर्भ:
“एक जन्म स्वमानधारी, सारा कल्प सम्मानधारी।” (साकार मुरली)

इसका अर्थ है—यदि संगमयुग में हमने अपने स्वमान को पहचान लिया, तो पूरे कल्प में हमें सम्मान ही सम्मान मिलेगा।


 स्वमान क्या है? (What is Self-Respect?)

स्वमान का अर्थ है—
 मैं शरीर नहीं, एक पवित्र आत्मा हूँ
 मैं परमात्मा की संतान हूँ मैं शांति, प्रेम और शक्ति का स्वरूप हूँ

जब आत्मा इस पहचान में स्थिर होती है, तब उसे किसी बाहरी सम्मान की आवश्यकता नहीं रहती।

मुरली पॉइंट:
“देह-अभिमान का त्याग किए बिना स्वमान में स्थित हो नहीं सकते।”

उदाहरण:
जैसे कोई राजा अपनी पहचान भूल जाए और भीख मांगने लगे, तो लोग उसका सम्मान नहीं करेंगे।
लेकिन जैसे ही उसे अपनी असली पहचान याद आती है—वह फिर से सम्मान का अधिकारी बन जाता है।


 देह-अभिमान: स्वमान का सबसे बड़ा शत्रु

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बापदादा कहते हैं—
स्वमान का सबसे बड़ा बाधक है: देह-अभिमान (Body Consciousness)

जब हम अपने शरीर, पद, धन, संबंध या रूप को “मैं” मान लेते हैं, तब हम स्वमान से गिर जाते हैं।

📜 मुरली संदर्भ:
“देह-अभिमान के त्याग के बिना स्वमान संभव नहीं।”

👉 सरल उदाहरण:

  • कोई आपको कुछ कह दे → अगर आप शरीर समझते हैं तो दुख होगा
  • लेकिन यदि आप आत्मा समझते हैं → तो आप शांत रहेंगे

👉 इसलिए स्वमान = आत्मा की पहचान
और देह-अभिमान = दुख का कारण


🔹 स्वमान और सम्मान का गहरा संबंध

बापदादा स्पष्ट कहते हैं—
👉 जो स्वयं को सम्मान देता है, वही दूसरों को भी सम्मान दे सकता है
👉 और जो दूसरों को सम्मान देता है, वही सच्चा देवता बनता है

📜 मुरली पॉइंट:
“देवता अर्थात् देने वाला।”

👉 उदाहरण (जीवन से):
एक व्यक्ति ऑफिस में सबको सम्मान देता है—छोटे-बड़े का भेद नहीं करता
👉 धीरे-धीरे सभी उसे सम्मान देने लगते हैं

👉 दूसरा व्यक्ति अहंकार में रहता है
👉 उसे कोई दिल से सम्मान नहीं देता


🔹 ब्रह्मा बाप का उदाहरण: सम्मान देने की कला

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साकार रूप में ब्रह्मा बाप ने हमें सिखाया—
 स्वयं को “विश्व सेवाधारी” कहा
 बच्चों को मालिक बनाया
 छोटे-बड़े सभी को सम्मान दिया

मुरली संदर्भ:
“ब्रह्मा बाप ने सदा बच्चों को अपने से भी आगे रखा।”

गहरा संदेश:
सच्चा महान वही है—जो दूसरों को महान बना दे


 स्वराज्य अधिकारी बनना: सच्चा सम्मान

स्वमान का अगला चरण है—स्वराज्य (Self-Mastery)

 जब आत्मा अपनी इन्द्रियों, मन और संस्कारों पर नियंत्रण रखती है
 तब वह स्वराज्य अधिकारी बनती है

मुरली पॉइंट:
“स्वराज्य ब्राह्मण जीवन का जन्मसिद्ध अधिकार है।”

उदाहरण:

  • मन कहे: गुस्सा करो → लेकिन आप शांत रहें
  • इन्द्रियां कहें: गलत देखो → लेकिन आप संयम रखें

यही है सच्चा राजा बनना


 “मेरा” से “तेरा” तक: हल्का बनने का रहस्य

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बापदादा कहते हैं—
 “मेरा” कहने से बोझ बढ़ता है
 “तेरा” कहने से आत्मा हल्की हो जाती है

मुरली संदर्भ:
“मेरा कहने से फंसते हो, तेरा कहने से न्यारे हो जाते हो।”

जीवन उदाहरण:

  • “मेरा पैसा, मेरा परिवार” → चिंता
  • “सब परमात्मा का है” → शांति

हल्की आत्मा ही उड़ती है (उच्च स्थिति में जाती है)


 ‘वाह-वाह’ जीवन: सुखी रहने का मंत्र

बापदादा कहते हैं—
 हर स्थिति में “वाह-वाह” देखो

मुरली पॉइंट:
“जो हुआ वह भी अच्छा, जो हो रहा है वह भी अच्छा, जो होगा वह भी अच्छा।”

उदाहरण:

  • नौकरी गई → “शायद कुछ बेहतर आने वाला है”
  • समस्या आई → “यह भी सीख है”

 यही है निश्चयबुद्धि विजयी आत्मा


 निष्कर्ष: स्वमान = जीवन का असली सम्मान

 स्वमान अपनाओ
 देह-अभिमान छोड़ो
 सभी को सम्मान दो
 स्वयं को आत्मा समझो

तब आप स्वतः ही—
 राज-सम्मान के अधिकारी
 पूज्य आत्मा
 और सुखी जीवन के अनुभवकर्ता बन जाएंगे

“स्वमान से ही सम्मान की प्राप्ति”


 1. प्रश्न: स्वमान को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी क्यों कहा गया है?

उत्तर:
स्वमान वह आंतरिक शक्ति है जिससे आत्मा अपनी असली पहचान को समझती है। जब आत्मा स्वयं को पहचान लेती है, तो उसे बाहरी सम्मान की आवश्यकता नहीं रहती।
मुरली संदर्भ: “एक जन्म स्वमानधारी, सारा कल्प सम्मानधारी।”
अर्थात—एक जन्म का स्वमान पूरे कल्प का सम्मान दिलाता है।


 2. प्रश्न: स्वमान (Self-Respect) की सही परिभाषा क्या है?

उत्तर:
स्वमान का अर्थ है—
 मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ
 मैं परमात्मा की संतान हूँ
 मैं शांति, प्रेम और शक्ति का स्वरूप हूँ

जब यह स्मृति पक्की हो जाती है, तब आत्मा स्थिर और शक्तिशाली बन जाती है।


 3. प्रश्न: स्वमान में स्थित होने के लिए सबसे जरूरी क्या है?

उत्तर:
देह-अभिमान का त्याग करना सबसे आवश्यक है।
मुरली पॉइंट: “देह-अभिमान का त्याग किए बिना स्वमान में स्थित हो नहीं सकते।”

जब तक हम शरीर को “मैं” मानते हैं, तब तक हम आत्मा की स्थिति में नहीं आ सकते।


 4. प्रश्न: देह-अभिमान स्वमान का सबसे बड़ा शत्रु कैसे है?

उत्तर:
जब हम अपने रूप, पद, धन या संबंधों को ही अपनी पहचान बना लेते हैं, तो हम दुख और अस्थिरता में आ जाते हैं।

 उदाहरण:
किसी के कुछ कहने पर दुख होना = देह-अभिमान
शांत रहना = आत्म-अभिमान

इसलिए देह-अभिमान दुख का कारण और स्वमान सुख का आधार है।


 5. प्रश्न: स्वमान और सम्मान का आपस में क्या संबंध है?

उत्तर:
 जो स्वयं को सम्मान देता है, वही दूसरों को सम्मान दे सकता है
 और जो दूसरों को सम्मान देता है, वही सच्चा सम्मान पाता है

मुरली पॉइंट: “देवता अर्थात् देने वाला।”

देवता वही बनता है जो देता है—सम्मान भी।


 6. प्रश्न: ब्रह्मा बाप से हमें सम्मान देने की क्या सीख मिलती है?

उत्तर:
ब्रह्मा बाप ने—
 स्वयं को सेवाधारी कहा
 बच्चों को मालिक बनाया
 सभी को सम्मान दिया

मुरली संदर्भ: “ब्रह्मा बाप ने सदा बच्चों को अपने से भी आगे रखा।”

 सच्चा महान वही है जो दूसरों को महान बना दे।


 7. प्रश्न: स्वराज्य अधिकारी कौन होता है?

उत्तर:
जो अपनी इन्द्रियों, मन और संस्कारों पर नियंत्रण रखता है, वही स्वराज्य अधिकारी है।

मुरली पॉइंट: “स्वराज्य ब्राह्मण जीवन का जन्मसिद्ध अधिकार है।”

 उदाहरण:
मन गुस्सा करे → फिर भी शांत रहना
इन्द्रियां आकर्षित हों → फिर भी संयम रखना

यही सच्चा राज है।


 8. प्रश्न: “मेरा” और “तेरा” में क्या अंतर है?

उत्तर:
 “मेरा” = बोझ, चिंता, बंधन
 “तेरा” = हल्कापन, शांति, स्वतंत्रता

मुरली संदर्भ: “मेरा कहने से फंसते हो, तेरा कहने से न्यारे हो जाते हो।”

 “सब परमात्मा का है” यह भावना आत्मा को उड़ने योग्य बनाती है।


 9. प्रश्न: ‘वाह-वाह’ जीवन जीने का क्या अर्थ है?

उत्तर:
हर परिस्थिति को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार करना ही ‘वाह-वाह’ जीवन है।

मुरली पॉइंट:
“जो हुआ वह भी अच्छा, जो हो रहा है वह भी अच्छा, जो होगा वह भी अच्छा।”

 इससे आत्मा निश्चयबुद्धि और विजयी बनती है।


 10. प्रश्न: स्वमान अपनाने से जीवन में क्या परिवर्तन आता है?

उत्तर:
 आत्मा हल्की और खुश रहती है
 दूसरों से स्वतः सम्मान मिलता है
 मन शांत और स्थिर रहता है
 जीवन में सफलता और सुख बढ़ता है


 11. प्रश्न: स्वमानधारी बनने के लिए हमें क्या-क्या अभ्यास करना चाहिए?

उत्तर:
 रोज़ स्वयं को आत्मा समझने का अभ्यास
 देह-अभिमान को पहचानकर त्याग करना
 सभी को सम्मान देना
 “सब कुछ तेरा है” का भाव रखना
 हर स्थिति में “वाह-वाह” सोचना


 12. प्रश्न: निष्कर्ष रूप में स्वमान का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

उत्तर:
स्वमान अपनाने से—
 राज-सम्मान मिलता है
 आत्मा पूज्य बनती है
 जीवन सुख, शांति और आनंद से भर जाता है

Disclaimer

यह आध्यात्मिक ज्ञान ब्रह्मा कुमारीज़ के मुरली सिद्धांतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्म-चेतना, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक उन्नति को बढ़ावा देना है। यह किसी धार्मिक मत का विरोध नहीं करता, बल्कि आत्मिक जागृति का मार्ग प्रस्तुत करता है।

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