(23)”08-04-1984 “Author of the World State by the rights obtained in the Confluence Age”

अव्यक्त मुरली-(23)”08-04-1984 “संगमयुग पर प्राप्त अधिकारों से विश्व राज्य अधिकारी”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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08-04-1984 “संगमयुग पर प्राप्त अधिकारों से विश्व राज्य अधिकारी”

बापदादा आज स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं की दिव्य दरबार देख रहे हैं। विश्व राज्य दरबार और स्वराज्य दोनों ही दरबार अधिकारी आप श्रेष्ठ आत्मायें बनती हो। स्वराज्य अधिकारी ही विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं। यह डबल नशा सदा रहता है? बाप का बनना अर्थात् अनेक अधिकार प्राप्त करना। कितने प्रकार के अधिकार प्राप्त किये हैं, जानते हो? अधिकार माला को याद करो। पहला अधिकार – परमात्म बच्चे बने अर्थात् सर्वश्रेष्ठ माननीय पूज्यनीय आत्मा बनने का अधिकार पाया। बाप के बच्चे बनने के सिवाए पूज्यनीय आत्मा बनने का अधिकार प्राप्त हो नहीं सकता। तो पहला अधिकार – पूज्यनीय आत्मा बने। दूसरा अधिकार – ज्ञान के खजानों के मालिक बने अर्थात् अधिकारी बने। तीसरा अधिकार – सर्व शक्तियों के प्राप्ति के अधिकारी बने। चौथा अधिकार – सर्व कर्मेन्द्रियों जीत स्वराज्य अधिकारी बने। इस सर्व अधिकारों द्वारा मायाजीत सो जगत जीत विश्व राज्य अधिकारी बनते। तो अपने इन सर्व अधिकारों को सदा स्मृति में रखते हुए समर्थ आत्मा बन जाते। ऐसे समर्थ बने हो ना।

स्वराज्य वा विश्व का राज्य प्राप्त करने के लिए विशेष 3 बातों की धारणा द्वारा ही सफलता प्राप्त की है। कोई भी श्रेष्ठ कार्य की सफलता का आधार त्याग, तपस्या और सेवा है। इन तीनों बातों के आधार पर सफलता होगी वा नहीं होगी, यह क्वेश्चन नहीं उठ सकता। जहाँ तीनों बातों की धारणा है वहाँ सेकेण्ड में सफलता है ही है। हुई पड़ी है। त्याग किस बात का? सिर्फ एक बात का त्याग सर्व त्याग सहज और स्वत: कराता है। वह एक त्याग है – देह भान का त्याग, जो हद के मैं-पन का त्याग सहज करा देता है। यह हद का मैं पन तपस्या और सेवा से वंचित करा देता है। जहाँ हद का मै-पन है वहाँ त्याग, तपस्या और सेवा हो नहीं सकती। हद का मैं-पन, मेरा-पन, इस एक बात का त्याग चाहिए। मैं और मेरा समाप्त हो गया तो बाकी क्या रहा? बेहद का। मैं एक शुद्ध आत्मा हूँ और मेरा तो एक बाप दूसरा न कोई। तो जहाँ बेहद का बाप सर्वशक्तिमान है, वहाँ सफलता सदा साथ है। इसी त्याग द्वारा तपस्या भी सिद्ध हो गई ना। तपस्या क्या है? मैं एक का हूँ। एक की श्रेष्ठ मत पर चलने वाला हूँ। इसी से एकरस स्थिति स्वत: हो जाती है। सदा एक परमात्म स्मृति, यही तपस्या है। एकरस स्थिति यही श्रेष्ठ आसन है। कमल पुष्प समान स्थिति यही तपस्या का आसन है। त्याग से तपस्या भी स्वत: ही सिद्ध हो जाती है। जब त्याग और तपस्या स्वरुप बन गये तो क्या करेंगे? अपने पन का त्याग अथवा मैं-पन समाप्त हो गया। एक की लगन में मगन तपस्वी बन गये तो सेवा के सिवाए रह नहीं सकते। यह हद का मैं और मेरा सच्ची सेवा करने नहीं देता। त्यागी और तपस्वी मूर्त सच्चे सेवाधारी हैं। मैंने यह किया, मैं ऐसा हूँ, यह देह का भान जरा भी आया तो सेवाधारी के बदले क्या बन जाते? सिर्फ नामधारी सेवाधारी बन जाते। सच्चे सेवाधारी नहीं बनते। सच्ची सेवा का फाउण्डेशन है – त्याग और तपस्या। ऐसे त्यागी तपस्वी सेवाधारी सदा सफलता स्वरुप हैं। विजय, सफलता उनके गले की माला बन जाती है। जन्म सिद्ध अधिकारी बन जाते। तो बापदादा विश्व के सर्व बच्चों को यही श्रेष्ठ शिक्षा देते हैं कि त्यागी बनो, तपस्वी बनो, सच्चे सेवाधारी बनो।

आज का संसार मृत्यु के भय का संसार है। (आंधी तूफान आया) प्रकृति की हलचल में आप तो अचल हो ना! तमोगुणी प्रकृति का काम है हलचल करना और आप अचल आत्माओं का कार्य है प्रकृति को भी परिवर्तन करना। नथिंग न्यू। यह सब तो होना ही है। हलचल में ही तो अचल बनेंगे। तो स्वराज्य अधिकारी दरबार निवासी श्रेष्ठ आत्माओं ने समझा! यह भी राज्य दरबार है ना। राजयोगी अर्थात् स्व के राजे। राजयोगी दरबार अर्थात् स्वराज्य दरबार। आप सभी भी राजनेता बन गये ना। वह हैं देश के राजनेता और आप हो स्वराज्य नेता। नेता अर्थात् नीति प्रमाण चलने वाले। तो आप धर्मनीति, स्वराज्य नीति प्रमाण चलने वाले स्वराज्य नेता हो। यथार्थ श्रेष्ठ नीति अर्थात् श्रीमत। श्रीमत ही यथार्थ नीति है। इस नीति पर चलने वाले सफल नेता हैं।

बापदादा देश के नेताओं को मुबारक देते हैं क्योंकि फिर भी मेहनत तो करते हैं ना। भल वैराइटी हैं। फिर भी देश के प्रति लगन है। हमारा राज्य अमर रहे – इस लगन से मेहनत तो करते हैं ना। हमारा भारत ऊंचा रहे, यह लगन स्वत: ही मेहनत कराती है। अब समय आयेगा जब राज्य सत्ता और धर्म सत्ता दोनों साथ होंगी, तब विश्व में भारत की जय-जयकार होगी। भारत ही लाइट हाउस होगा। भारत की तरफ सबकी दृष्टि होगी। भारत को ही विश्व प्रेरणा पुंज अनुभव करेंगे। भारत अविनाशी खण्ड है। अविनाशी बाप की अवतरण भूमि है। इसलिए भारत का महत्व सदा महान है। अच्छा।

सभी अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा सभी बच्चों को आने की बधाई दे रहे हैं। भले पधारे। बाप के घर के श्रृंगार भले पधारे। अच्छा।

सभी सफलता के सितारों को, सदा एकरस स्थिति के आसन पर स्थित रहने वाले तपस्वी बच्चों को, सदा एक परमात्म श्रेष्ठ याद में रहने वाली महान आत्माओं को, श्रेष्ठ भावना श्रेष्ठ कामना करने वाले विश्व कल्याणकारी सेवाधारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात :-

बाप के घर में वा अपने घर में भले आये। बाप जानते हैं कि सेवा में लगन अच्छी है। कोटों में कोई ऐसे सेवाधारी हैं इसलिए सेवा की मेहनत की आन्तरिक खुशी प्रत्यक्षफल के रुप में सदा मिलती रहेगी। यह मेहनत सफलता का आधार है। अगर सभी निमित्त सेवाधारी मेहनत को अपनायें तो भारत का राज्य सदा ही सफलता को पाता रहेगा। सफलता तो मिलनी ही है। यह तो निश्चित है लेकिन जो निमित्त बनता है, निमित्त बनने वाले को सेवा का प्रत्यक्षफल और भविष्य फल प्राप्त होता है। तो सेवा के निमित्त हो। निमित्त भाव रख सदा सेवा में आगे बढ़ते चलो। जहाँ निमित्त भाव है, मैं-पन का भाव नहीं है वहाँ सदा उन्नति को पाते रहेंगे। यह निमित्त भाव शुभ भावना, शुभ कामना स्वत: जागृत करता है। आज शुभ भावना, शुभ कामना नहीं है उसका कारण निमित्त भाव के बजाए मैं-पन आ गया है। अगर निमित्त समझें तो करावनहार बाप को समझें। करनकरावनहार स्वामी सदा ही श्रेष्ठ करायेंगे। ट्रस्टीपन के बजाए राज्य की प्रवृत्ति के गृहस्थी बन गये हैं, गृहस्थी में बोझ होता है और ट्रस्टी पन में हल्कापन होता है। जब तक हल्के नहीं तो निर्णय शक्ति भी नहीं है। ट्रस्टी हैं तो हल्के हैं तो निर्णय शक्ति श्रेष्ठ है, इसलिए सदा ट्रस्टी हैं। निमित्त हैं, यह भावना फलदायक है। भावना का फल मिलता है। तो यह निमित्त पन की भावना सदा श्रेष्ठ फल देती रहेगी। तो सभी साथियों को यह स्मृति दिलाओ कि निमित्त भाव, ट्रस्टीपन का भाव रखो। तो यह राजनीति विश्व के लिए श्रेष्ठ नीति हो जायेगी। सारा विश्व इस भारत की राजनीति को कॉपी करेगा। लेकिन इसका आधार ट्रस्टीपन अर्थात् निमित्त भाव।

कुमारों से:- कुमार अर्थात् सर्व शक्तियों को, सर्व खजानों को जमा कर औरों को भी शक्तिवान बनाने की सेवा करने वाले। सदा इसी सेवा में बिजी रहते हो ना। बिजी रहेंगे तो उन्नति होती रहेगी। अगर थोड़ा भी फ्री होंगे तो व्यर्थ चलेगा। समर्थ रहने के लिए बिजी रहो। अपना टाइम-टेबल बनाओ। जैसे शरीर का टाइम-टेबल बनाते हैं ऐसे बुद्धि का भी टाइम-टेबल बनाओ। बुद्धि से बिजी रहने का प्लैन बनाओ। तो बिजी रहने से सदा उन्नति को पाते रहेंगे। आजकल के समय प्रमाण कुमार जीवन में श्रेष्ठ बनना बहुत बड़ा भाग्य है। हम श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा हैं, यही सदा सोचो। याद और सेवा का सदा बैलेन्स रहे। बैलेन्स रखने वालों को सदा ब्लैसिंग मिलती रहेगी।

अध्याय: संगमयुग पर प्राप्त अधिकारों से विश्व राज्य अधिकारी
(अव्यक्त बापदादा मुरली – 08 अप्रैल 1984)


🌸 भूमिका: दिव्य दरबार में श्रेष्ठ आत्माएँ

आज बापदादा स्वराज्य अधिकारी और विश्व राज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं के दिव्य दरबार का अवलोकन कर रहे हैं।

  • स्वराज्य अधिकारी → आत्मा अपने आप के राजे

  • विश्व राज्य अधिकारी → मायाजीत, जगत जीत

  • डबल नशा: बाप का बनना = अनेक अधिकार प्राप्त करना


🔹 अधिकार माला: बाप के दिए अधिकार

  1. परमात्म बच्चे बनने का अधिकार → सर्वश्रेष्ठ, पूज्यनीय आत्मा

  2. ज्ञान के खजानों के अधिकारी → खजाने के मालिक बनना

  3. सर्व शक्तियों के अधिकारी → शक्ति प्राप्ति

  4. सर्व कर्मेन्द्रियों जीत का अधिकार → स्वराज्य अधिकारी बनना

इन अधिकारों के स्मृति में रहते हुए आत्मा समर्थ बन जाती है।


✨ सफलता का आधार: त्याग, तपस्या और सेवा

  • त्याग → देह भान और मैं-पन का त्याग

  • तपस्या → एक की श्रेष्ठ मत पर चलना, एकरस स्थिति

  • सेवा → सच्ची सेवा करने के लिए त्याग और तपस्या अनिवार्य

उदाहरण: यदि “मैं और मेरा” का भान रहे, तो सेवा केवल नामधारी बन जाएगी।
सच्ची सेवा = त्याग + तपस्या


🔄 संसार और अचल आत्मा

  • संसार → मृत्यु और हलचल का संसार

  • अचल आत्मा → प्रकृति की हलचल में भी स्थिर

  • स्वराज्य अधिकारी = अचल, नीति प्रमाण, धर्मनीति पर चलने वाले

बापदादा का संदेश: नीति प्रमाण = श्रीमत, इस पर चलने वाला ही सफल नेता


🌿 भारत का महत्व

  • भारत = अविनाशी खण्ड, बाप की अवतरण भूमि

  • भविष्य में भारत = विश्व का प्रेरणा पुंज, लाइट हाउस

  • सेवा और लगन से भारत की स्थिति सदा ऊंची और प्रेरक बनी रहेगी


🏠 स्वीट होम: बापदादा का स्वागत

  • सभी बच्चे अपने स्वीट होम में पहुँचे

  • बापदादा ने बच्चों को आने की बधाई और याद-प्यार दिया

  • सभी सफलता के सितारे = एकरस स्थिति के आसन पर स्थित तपस्वी बच्चों को


👑 विशेष संदेश: कुमार और ट्रस्टी

  • कुमार → सर्व शक्तियों और खजानों के अधिकारी, दूसरों को शक्तिवान बनाने वाले

  • निमित्त भाव / ट्रस्टीपन → सेवा और निर्णय शक्ति का आधार

  • समर्थ रहने के लिए बिजी रहना और समय-टीमटेबल बनाए रखना आवश्यक

सेवा में निमित्त भाव होने पर स्वत: फल और भविष्यफल प्राप्त होता है।


🌟 सारांश

  • स्वराज्य अधिकारी → सर्व कर्मेन्द्रियों पर अधिकार

  • विश्व राज्य अधिकारी → मायाजीत जगत विजेता

  • सफलता = त्याग + तपस्या + सेवा

  • नीति प्रमाण = श्रीमत → सफल नेतृत्व

  • निमित्त भाव और बिजी रहने की आदत → श्रेष्ठ उन्नति

  • प्रश्न 1 : संगमयुग में आत्मा को कौन-कौन से अधिकार प्राप्त होते हैं?

    उत्तर :

    अधिकार माला – बाप के दिए अधिकार:

    1. परमात्म बच्चे बनने का अधिकार → सर्वश्रेष्ठ, पूज्यनीय आत्मा

    2. ज्ञान के खजानों के अधिकारी → खजाने के मालिक बनना

    3. सर्व शक्तियों के अधिकारी → शक्ति प्राप्ति

    4. सर्व कर्मेन्द्रियों जीत का अधिकार → स्वराज्य अधिकारी बनना

    इन अधिकारों की स्मृति में रहते हुए आत्मा समर्थ बन जाती है।


    प्रश्न 2 : सफलता का आधार क्या है?

    उत्तर :
    सफलता = त्याग + तपस्या + सेवा

    • त्याग → देह भान और मैं-पन का त्याग

    • तपस्या → एक की श्रेष्ठ मत पर चलना, एकरस स्थिति

    • सेवा → सच्ची सेवा करने के लिए त्याग और तपस्या अनिवार्य

    उदाहरण:
    यदि “मैं और मेरा” का भान रहे, तो सेवा केवल नामधारी बन जाएगी।
    सच्ची सेवा = त्याग + तपस्या


    प्रश्न 3 : संसार और अचल आत्मा में क्या भेद है?

    उत्तर :

    • संसार → मृत्यु और हलचल का संसार

    • अचल आत्मा → प्रकृति की हलचल में भी स्थिर

    • स्वराज्य अधिकारी = अचल, नीति प्रमाण, धर्मनीति पर चलने वाले

    बापदादा का संदेश: नीति प्रमाण = श्रीमत, इस पर चलने वाला ही सफल नेता


    प्रश्न 4 : भारत का महत्व संगमयुग में क्यों है?

    उत्तर :

    • भारत = अविनाशी खण्ड, बाप की अवतरण भूमि

    • भविष्य में भारत = विश्व का प्रेरणा पुंज, लाइट हाउस

    • सेवा और लगन से भारत की स्थिति सदा ऊंची और प्रेरक बनी रहती है


    प्रश्न 5 : स्वीट होम में बच्चों को क्या मिला?

    उत्तर :

    • सभी बच्चे अपने स्वीट होम में पहुँचे

    • बापदादा ने आने की बधाई और याद-प्यार दिया

    • सभी सफलता के सितारे = एकरस स्थिति के आसन पर स्थित तपस्वी बच्चों को


    प्रश्न 6 : कुमार और ट्रस्टी का विशेष संदेश क्या है?

    उत्तर :

    • कुमार → सर्व शक्तियों और खजानों के अधिकारी, दूसरों को शक्तिवान बनाने वाले

    • निमित्त भाव / ट्रस्टीपन → सेवा और निर्णय शक्ति का आधार

    • समर्थ रहने के लिए बिजी रहना और समय-टीमटेबल बनाए रखना आवश्यक

    • सेवा में निमित्त भाव होने पर स्वत: फल और भविष्यफल प्राप्त होता है


    प्रश्न 7 : संगमयुग में सफलता कैसे सुनिश्चित होती है?

    उत्तर :

    • स्वराज्य अधिकारी → सर्व कर्मेन्द्रियों पर अधिकार

    • विश्व राज्य अधिकारी → मायाजीत, जगत विजेता

    • सफलता = त्याग + तपस्या + सेवा

    • नीति प्रमाण = श्रीमत → सफल नेतृत्व

    • निमित्त भाव और बिजी रहने की आदत → श्रेष्ठ उन्नति

 Disclaimer

यह वीडियो ब्राह्माकुमारी आध्यात्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसमें साझा किए गए विचार आध्यात्मिक और प्रेरक उद्देश्य के लिए हैं। व्यक्तिगत निर्णय या आचार के लिए आप स्वयं विवेक का उपयोग करें।

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