AW.(12)20-03-1969/“सात बातें छोड़ो और सात बातें धारण करो”
“सात बातें छोड़ो और सात बातें धारण करो”
सभी किस स्मृति में बैठे हैं? किस देश में बैठे हैं। व्यक्त देश में हैं वा अव्यक्त देश में? अव्यक्त को व्यक्त में लाया है वा तुम अव्यक्त हुए हो। अभी की मुलाकात कहाँ कर रहे हो? अव्यक्त को व्यक्त देश में निमन्त्रण दिया था। तो अव्यक्त बापदादा व्यक्त देश में अव्यक्त रूप से मुलाकात कर रहे हैं। अव्यक्त रूप को व्यक्त में लाने के लिए कितना समय चाहिए? (अभी तैयारी है, पुरुषार्थ चल रहा है) कितने समय की आवश्यकता है? सम्पूर्ण स्थिति को इस साकार रूप में लाने लिए कितना समय चाहिए? दर्पण में देख तो सकते हो ना? सम्पूर्ण स्थिति का चित्र साकार में देखा है? साकार तन जो था वह सम्पूर्ण कर्मातीत स्थिति नहीं थी। उसकी भेंट में बताओ। उन जैसा तो बनना ही है। गुणों को ही धारण करना है। तो उनके अन्तिम स्थिति और अपने वर्तमान स्थिति में कितना फर्क समझते हो? उसके लिए कितना समय चाहिए। साकार का सबूत तो इन आंखों से देखा। उनके हर गुण हर कर्म को अपने कर्म और वाणी से भेंट करो तो मालूम पड़ जायेगा। अभी समय के हिसाब से 25 प्रतिशत भी बहुत है। समय पुरुषार्थ का बहुत कम है। इसलिए जैसे याद का चार्ट रखते हो, साथ-साथ अब यह भी चार्ट रखना चाहिए। साकार जो कर्म कर रहे थे, जो स्थिति, जो स्मृति थी उन सभी से भेंट करनी है। अच्छा!
आज कुमारियों का इम्तहान लेते हैं। सभी जो पुरुषार्थ कर रहे हैं उसमें मुख्य सात बातें धारण करनी है और सात बातें छोड़नी हैं। वह कौन सी? (हरेक कुमारी ने अपना-अपना सुनाया) छोड़ने का तो सभी को सुनाते हो। 5 विकार और उनके साथ छठा है आलस्य और सातवां है भय। यह भय का भी बड़ा विकार है। शक्तियों का मुख्य गुण ही है निर्भय। इसलिए भय को भी छोड़ना है। अच्छा अब धारण क्या करना है? अपने स्वरूप को जानना, तो स्वरूप, स्वधर्म, स्वदेश, सुकर्म, स्व-लक्ष्य, स्व-लक्षण और स्वदर्शन चक्रधारी बनना। यह 7 बातें धारण करनी हैं। इनको धारण करने से क्या बनेंगे? शीतला देवी। काली नहीं बनना है। अभी शीतला देवी बनना है। काली बनना है विकारों के ऊपर। असुरों के सामने काली बनना है। लेकिन अपने ब्राह्मण कुल में शीतला बनना है।
अध्याय: सात बातें छोड़ो और सात बातें धारण करो
मुरली विषय: सम्पूर्ण स्थिति, साकार-अव्यक्त मिलन और सात धारणाएँ
मुरली तिथि: दिनांक मूल मुरली के अनुसार सत्यापित करके ही प्रकाशित करें
मुख्य संदेश: विकारों, आलस्य और भय को छोड़कर अपने श्रेष्ठ स्व-स्वरूप को धारण करना।
1. हम किस स्मृति में बैठे हैं?
बापदादा सबसे पहले हमारी स्मृति और स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हैं।
स्वयं से प्रश्न करें:
- मैं किस स्मृति में बैठा हूँ?
- मैं किस देश में बैठा हूँ?
- क्या मैं व्यक्त देश की स्मृति में हूँ या अव्यक्त देश की?
- क्या मैंने अव्यक्त को व्यक्त में लाया है, या स्वयं अव्यक्त स्थिति में स्थित हुआ हूँ?
- अभी की मुलाकात मैं किस स्थिति में कर रहा हूँ?
अव्यक्त बापदादा ने व्यक्त देश में आकर भी अव्यक्त रूप से मिलन किया। इसलिए केवल स्थान महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हमारी स्थिति और स्मृति महत्वपूर्ण है।
उदाहरण
हम भले ही संसार के बीच बैठे हों, लेकिन यदि बुद्धि परमात्म-स्मृति में स्थिर है, कर्म श्रेष्ठ हैं और मन हल्का है, तो हमारी स्थिति अव्यक्तता की ओर है।
2. सम्पूर्ण स्थिति का दर्पण
बापदादा हमें अपनी स्थिति का दर्पण देखने के लिए प्रेरित करते हैं।
साकार रूप का सबूत हमने अपनी आँखों से देखा है। अब प्रश्न है:
उनकी अंतिम स्थिति और हमारी वर्तमान स्थिति में कितना अंतर है?
केवल यह सोचना पर्याप्त नहीं कि “मुझे उनके जैसा बनना है।”
बल्कि उनके:
- गुण
- कर्म
- वाणी
- स्मृति
- स्थिति
इन सबको अपने जीवन में धारण करना है।
आत्म-चेकिंग
रोज स्वयं से पूछें:
“आज मेरे कर्मों में कौन-सा ऐसा गुण दिखाई दिया जो मुझे अपने आदर्श के समीप ले जा रहा है?”
और साथ में यह भी देखें:
“मेरी कौन-सी कमजोरी अभी मेरे लक्ष्य से दूरी बना रही है?”
3. केवल याद का चार्ट नहीं—स्थिति का भी चार्ट
हम प्रायः याद का चार्ट रखते हैं। अब बापदादा एक और महत्वपूर्ण चार्ट रखने की प्रेरणा देते हैं।
दैनिक स्थिति-चार्ट
| चेकिंग | आज की स्थिति |
|---|---|
| मेरी स्मृति कैसी रही? | ______ |
| मेरी वाणी कैसी रही? | ______ |
| मेरे कर्म कैसे रहे? | ______ |
| कौन-सा गुण धारण किया? | ______ |
| किस कमजोरी को छोड़ा? | ______ |
| कितनी बार आत्म-अभिमान रहा? | ______ |
| कितनी बार निर्भय रहा? | ______ |
यह चार्ट हमें केवल यह नहीं बताएगा कि हमने कितना समय याद में बिताया, बल्कि यह भी बताएगा कि हमारी स्थिति कितनी बदली।
4. सात बातें छोड़नी हैं
कुमारियों के इम्तहान के रूप में बापदादा मुख्य सात बातों की ओर संकेत करते हैं जिन्हें छोड़ना है।
1. काम
विकारों की पहली कमजोरी है काम।
अभ्यास: आत्मिक दृष्टि और आत्म-सम्मान में रहकर हर आत्मा को आत्मा समझना।
2. क्रोध
क्रोध हमारी शीतलता को समाप्त करता है।
अभ्यास: प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुकें और सोचें—
“क्या मेरी वाणी आत्मा को शक्ति देगी या कमजोरी?”
3. लोभ
अधिक पाने की इच्छा मन को अशांत करती है।
अभ्यास: संतुष्ट आत्मा बनें और जो प्राप्त है उसका श्रेष्ठ उपयोग करें।
4. मोह
व्यक्ति और वस्तु से अत्यधिक लगाव बुद्धि को कमजोर करता है।
अभ्यास: सम्बन्ध निभाएँ, लेकिन अपनी बुद्धि की डोर परमात्म-स्मृति से जोड़कर रखें।
5. अहंकार
देह-अभिमान अनेक कमजोरियों का मूल बन जाता है।
अभ्यास: “मैं आत्मा हूँ—गुणों का धारणकर्ता हूँ।”
6. आलस्य
आलस्य पुरुषार्थ की गति को रोक देता है।
अभ्यास: कार्य को टालने के बजाय उसी समय श्रेष्ठ कर्म करने का संकल्प करें।
7. भय
भय को भी एक बड़ा विकार बताया गया है।
शक्तियों का मुख्य गुण है:
निर्भयता।
उदाहरण
यदि कोई परिस्थिति सामने आती है और मन कहता है—
“पता नहीं मैं कर पाऊँगा या नहीं।”
तो उस समय स्वयं को याद दिलाएँ:
“मैं शक्ति-स्वरूप आत्मा हूँ। परिस्थिति बड़ी नहीं, मेरी आंतरिक शक्ति बड़ी है।”
5. सात बातें धारण करनी हैं
अब सबसे सुंदर भाग आता है—क्या धारण करना है?
सात स्व-आधारित धारणाएँ:
1. स्व-स्वरूप
अपने वास्तविक स्वरूप को जानना।
मैं कौन हूँ?
मैं देह नहीं, एक चेतन आत्मा हूँ।
2. स्वधर्म
अपने आत्मिक धर्म को धारण करना।
शान्ति, प्रेम, पवित्रता, सुख और शक्ति मेरे श्रेष्ठ आत्मिक गुण हैं।
3. स्वदेश
अपने वास्तविक आत्मिक घर की स्मृति रखना।
बुद्धि को परमधाम की स्मृति से जोड़ना अर्थात अपने मूल स्थान को याद रखना।
4. सुकर्म
हर कर्म को श्रेष्ठ और कल्याणकारी बनाना।
चेकिंग:
“क्या मेरे इस कर्म से स्वयं और दूसरों को सुख मिलेगा?”
5. स्व-लक्ष्य
अपने जीवन के परम उद्देश्य को सामने रखना।
लक्ष्य केवल सुनना नहीं, बल्कि उसके योग्य बनना है।
6. स्व-लक्षण
अपने श्रेष्ठ गुणों को जीवन में प्रकट करना।
जैसे:
- शान्ति
- पवित्रता
- प्रेम
- सहनशीलता
- नम्रता
- निर्भयता
- खुशी
7. स्वदर्शन चक्रधारी
अपने पूरे चक्र और आत्मिक यात्रा की स्मृति में रहना।
अर्थात परिस्थितियों में फँसने के बजाय साक्षी होकर सम्पूर्ण ड्रामा को देखना।
6. सात छोड़ने से सात धारणाएँ स्वतः मजबूत होंगी
यदि हम केवल कमजोरियों को छोड़ने की कोशिश करते रहें, तो कभी-कभी मन खाली महसूस कर सकता है।
इसलिए सिद्धान्त है:
छोड़ना + धारण करना = परिवर्तन।
| छोड़ना है | धारण करना है |
|---|---|
| काम | पवित्रता |
| क्रोध | शान्ति |
| लोभ | संतुष्टता |
| मोह | आत्मिक लगाव |
| अहंकार | आत्म-अभिमान |
| आलस्य | उमंग-उत्साह |
| भय | निर्भयता |
7. शीतला देवी बनना है
बापदादा का विशेष संकेत है कि हमें शीतला देवी बनना है।
शीतला अर्थात—
- शान्त
- शीतल
- स्थिर
- प्रेमपूर्ण
- शक्तिशाली
- सहज
अपने ब्राह्मण परिवार में हमें शीतलता रखनी है।
लेकिन विकारों और असुरता के सामने काली बनना है।
इसका आध्यात्मिक अर्थ है:
परिवार में शीतलता, विकारों के सामने शक्ति।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है, तो उसके क्रोध का जवाब क्रोध से देना काली बनना नहीं है।
अपनी आत्मिक शक्ति में स्थिर रहते हुए क्रोध के प्रभाव में न आना ही वास्तविक शक्ति है।
8. कुमारियों के लिए विशेष इम्तहान
हर कुमारी स्वयं से ये 14 प्रश्न पूछ सकती है:
सात छोड़ने की चेकिंग
- क्या आज काम की वृत्ति से बची?
- क्या क्रोध को जीता?
- क्या लोभ से मुक्त रही?
- क्या मोह में बुद्धि नहीं फँसी?
- क्या अहंकार से बची?
- क्या आलस्य को छोड़ा?
- क्या हर परिस्थिति में निर्भय रही?
सात धारणाओं की चेकिंग
- क्या मुझे अपना स्व-स्वरूप याद रहा?
- क्या मैं स्वधर्म में स्थित रही?
- क्या स्वदेश की स्मृति रही?
- क्या मेरे कर्म सुकर्म रहे?
- क्या मेरा स्व-लक्ष्य स्पष्ट रहा?
- क्या मेरे स्व-लक्षण कर्म और वाणी में दिखाई दिए?
- क्या मैं स्वदर्शन चक्रधारी रही?
9. आज का मुख्य संकल्प
“मुझे विकारों से युद्ध करने वाला नहीं, बल्कि अपने श्रेष्ठ स्वरूप में स्थित रहने वाला बनना है।”
जब स्व-स्वरूप की स्मृति मजबूत होगी, तब विकारों को छोड़ना सहज होगा।
इसलिए प्रतिदिन स्वयं को याद दिलाएँ:
मैं आत्मा हूँ।
मैं शान्त स्वरूप हूँ।
मैं पवित्र स्वरूप हूँ।
मैं शक्तिशाली स्वरूप हूँ।
मैं निर्भय हूँ।
मैं अपने श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर बढ़ रहा/रही हूँ।
मुरली नोट्स — Quick Revision
मुख्य विषय: सात बातें छोड़ो और सात बातें धारण करो।
छोड़ना है:
- काम
- क्रोध
- लोभ
- मोह
- अहंकार
- आलस्य
- भय
धारण करना है:
- स्व-स्वरूप
- स्वधर्म
- स्वदेश
- सुकर्म
- स्व-लक्ष्य
- स्व-लक्षण
- स्वदर्शन चक्रधारी
अंतिम लक्ष्य:
ब्राह्मण कुल में शीतला देवी बनना और विकारों के सामने शक्तिशाली बनना।
दैनिक अभ्यास:
याद के चार्ट के साथ-साथ स्थिति का चार्ट भी रखें।
एक लाइन का सार:
“विकारों को छोड़ो, स्व की स्मृति धारण करो और शीतला देवी बनो।”
Disclaimer: यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन एवं मुरली के संदेश को सरल रूप में समझाने और आत्म-चिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए उदाहरण और व्याख्या समझ को सहज बनाने के लिए हैं। मूल मुरली का अध्ययन/श्रवण ही प्राथमिक स्रोत माना जाए। कृपया मुरली की मूल तिथि और अधिकृत संस्करण से संदर्भ का सत्यापन करें। यह वीडियो किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय के प्रति आलोचना या विवाद उत्पुरली की तारीख नहीं है। इसलिए मैंने तारीख अनुमान से नहीं जोड़ी है—मूल मुरली कीन्न करने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया है।
सात बातें छोड़ो और सात बातें धारण करो
प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1: बापदादा ने सबसे पहले किस बात की स्मृति दिलाई?
उत्तर: बापदादा ने पूछा कि हम किस स्मृति में बैठे हैं—व्यक्त देश की स्मृति में या अव्यक्त देश की स्मृति में। मुख्य बात अपनी स्थिति और स्मृति को चेक करना है।
प्रश्न 2: अव्यक्त बापदादा व्यक्त देश में किस रूप से मिलन कर रहे हैं?
उत्तर: अव्यक्त बापदादा व्यक्त देश में आकर भी अव्यक्त रूप से मुलाकात कर रहे हैं।
प्रश्न 3: सम्पूर्ण स्थिति प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना है?
उत्तर: साकार रूप में देखे हुए बापदादा के गुण, कर्म, वाणी और स्थिति को अपने जीवन में धारण करना है।
प्रश्न 4: हमें किसका दर्पण देखना है?
उत्तर: हमें अपनी वर्तमान स्थिति का दर्पण देखना है और यह चेक करना है कि हमारी स्थिति आदर्श स्थिति से कितनी दूर है।
प्रश्न 5: याद के चार्ट के साथ अब कौन-सा चार्ट रखना चाहिए?
उत्तर: याद के चार्ट के साथ स्थिति का चार्ट रखना चाहिए—हमारी स्मृति, स्थिति, कर्म और वाणी कैसी रही, इसकी चेकिंग करनी चाहिए।
प्रश्न 6: मुख्य सात बातें कौन-सी छोड़नी हैं?
उत्तर: सात बातें हैं:
- काम
- क्रोध
- लोभ
- मोह
- अहंकार
- आलस्य
- भय
प्रश्न 7: भय को भी विकार क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि शक्तियों का मुख्य गुण निर्भयता है। इसलिए भय को छोड़कर निर्भय बनना आवश्यक है।
प्रश्न 8: हमें कौन-सी सात बातें धारण करनी हैं?
उत्तर:
- स्व-स्वरूप
- स्वधर्म
- स्वदेश
- सुकर्म
- स्व-लक्ष्य
- स्व-लक्षण
- स्वदर्शन चक्रधारी
प्रश्न 9: स्व-स्वरूप को जानने का अर्थ क्या है?
उत्तर: अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना—“मैं आत्मा हूँ” और अपने आत्मिक गुणों को जीवन में धारण करना।
प्रश्न 10: स्वधर्म क्या है?
उत्तर: आत्मा के श्रेष्ठ गुणों को अपने स्वभाव और कर्म में लाना—जैसे शान्ति, पवित्रता, प्रेम, सुख और शक्ति।
प्रश्न 11: सुकर्म किसे कहा जा सकता है?
उत्तर: ऐसा श्रेष्ठ कर्म जिससे स्वयं और दूसरों को सुख, शान्ति और शक्ति मिले, उसे सुकर्म कहा जा सकता है।
प्रश्न 12: स्व-लक्षण का अर्थ क्या है?
उत्तर: अपने श्रेष्ठ आत्मिक गुणों को कर्म और वाणी में प्रत्यक्ष करना ही स्व-लक्षण है।
प्रश्न 13: स्वदर्शन चक्रधारी बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: आत्मिक ज्ञान और सम्पूर्ण चक्र की स्मृति में रहना तथा परिस्थितियों में फँसने के बजाय साक्षी होकर उन्हें देखना।
प्रश्न 14: सात बातें धारण करने से हम क्या बनेंगे?
उत्तर: बापदादा ने कहा कि इन सात बातों को धारण करने से हम शीतला देवी बनेंगे।
प्रश्न 15: हमें काली नहीं, शीतला देवी क्यों बनना है?
उत्तर: अपने ब्राह्मण कुल में हमें शीतल, शांत और प्रेमपूर्ण बनना है। विकारों और असुरता के सामने शक्ति का रूप धारण करना है।
प्रश्न 16: काली किसके सामने बनना है?
उत्तर: विकारों और असुरता के सामने काली अर्थात शक्तिशाली बनना है।
प्रश्न 17: ब्राह्मण परिवार में कैसा रूप रखना है?
उत्तर: ब्राह्मण परिवार में शीतला देवी अर्थात शान्त, शीतल, प्रेमपूर्ण और शक्तिशाली स्वरूप रखना है।
प्रश्न 18: इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: कमजोरियों और विकारों को छोड़कर अपने स्व-स्वरूप, स्वधर्म और श्रेष्ठ गुणों को धारण करना है।
प्रश्न 19: दैनिक जीवन में इसका अभ्यास कैसे करें?
उत्तर: प्रतिदिन स्वयं से पूछें—आज मैंने कौन-सा विकार छोड़ा? कौन-सा गुण धारण किया? मेरी स्मृति, वाणी और कर्म कितने श्रेष्ठ रहे?
प्रश्न 20: इस पूरे पाठ का एक वाक्य में सार क्या है?
उत्तर:
“सात विकारों को छोड़ो, सात श्रेष्ठ बातों को धारण करो और ब्राह्मण कुल में शीतला देवी बनो।”
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