AW.(09)04-03-1969/“जो बीता उसे हो ली करना ही होली मनाना है”
“जो बीता उसे हो ली करना ही होली मनाना है”
(होली के शुभ अवसर पर अव्यक्त महावाक्य)
आज आपकी खास होली है क्या? होली कैसे मनाई जाती है? होली मनाने आती है? संगम की होली कौन सी है? वर्तमान पार्ट अनुसार होली कैसे मनायेंगे? वर्तमान समय कौन सी होली मनाने की आवश्यकता है? होली में कई बातें करनी होती है। रंगा भी जाता है, जलाया भी जाता है और साथ-साथ श्रृंगारा भी जाता है और कुछ मिटाना भी होता है। जो भी बातें होली में करनी हैं, वह सभी इस समय चल रही हैं। जलाना क्या है, मिटाना क्या है, रंगना क्या है और श्रृंगारना क्या है? यह सभी कर लेना इसको कहा जाता है मनाना। अगर इन चारों बातों में से कुछ कमी है तो मनाना नहीं कहेंगे। होली के दिनों में बहुत सुन्दर सज़ते हैं। कैसे सज़ते हैं? देवताओं के समान। आप सभी सज़े हुए हैं? सज़ावट में कोई कमी तो नहीं है। सजावट में मुख्य होली का श्रृंगार कौनसा होता है? सांग जो बनाते हैं उन्हों को पहले-पहले मस्तक में बल्ब लगाते हैं। यह भी इस समय की कॉपी (नकल) की हुई है। आप का भी संगम का मुख्य श्रृंगार है मस्तक पर आत्मा का दीपक जलाना, इसकी निशानी बल्ब जलाते हैं। लेकिन यह सभी बातें होने लिए होली का अर्थ याद रखना है। ”होली“ जो कुछ हुआ वह हो गया। हो लिया। जो सीन हुई हो ली अर्थात् बीत चुकी। वर्तमान समय जो प्वाइन्ट ध्यान में रखनी है वह है यह होली की अर्थात् ड्रामा के ढाल की। जब ऐसे मजबूत होंगे तब वह रंग भी पक्का लग सकेगा। अगर होली का अर्थ जीवन में नहीं लायेंगे तो रंग कच्चा हो जाता है। पक्का रंग रंगने के लिए हर वक्त सोचो हो ली। जो बीता हो ही गया। ऐसी होली मना रहे हो? वा कभी-कभी ड्रामा की सीन देखकर कुछ मंथन चलता है। ज्ञान का मंथन दूसरी बात है। लेकिन ड्रामा की सीन पर मंथन करना क्यों, क्या, कैसे…; यह किस चीज़ का मंथन है? दही को जब मंथन किया जाता है तब मक्खन निकलता है। अगर पानी को मंथन करेंगे तो क्या निकलेगा? कुछ भी नहीं। रिजल्ट में यही होगा एक तो थकावट, दूसरा टाइम वेस्ट। इसलिए वह हुआ पानी का मंथन। ऐसा मंथन करने के बजाये ज्ञान का मंथन करना है। साकार रूप में लास्ट दिनों में सर्विस की मुख्य युक्ति कौन सी सुनाई थी? ”घेराव डालना“ डबल घेराव डालना है एक तो वाणी द्वारा सर्विस का, दूसरा अव्यक्ति आकर्षण का। यह ऐसा घराव डालना है जो खुद न उससे निकल सके, न दूसरे निकल सके। घेराव डालने का ढंग अभी तक प्रैक्टिकल में दिखाया नहीं है। म्युज़ियम बनाना तो सहज है। म्युजियम बनाना यह कोई घराव डालना नहीं है। लेकिन अपने अव्यक्ति आकर्षण से उन्हों को घायल करना यह है घेराव डालना। वह अभी चल रहा है। अभी सर्विस का समय भी ज्यादा नहीं मिलेगा। समस्यायें ऐसी खड़ी हो जायेंगी जो आपके सर्विस में भी बाधा पड़ने की संभावना होगी। इसलिए जो समय मिल रहा है उसमें जिसको जितनी सर्विस करनी है वह अधिक से अधिक कर ले। नहीं तो सर्विस का समय भी होली (हो ली) हो जायेगा। यानी बीत जायेगा। इसलिए अब अपने को आपे ही ज्यादा में ज्यादा सर्विस के बन्धन में बांधना चाहिए। इस एक बन्धन से ही अनेक बन्धन मिट जाते हैं। अपने को खुद ईश्वरीय सेवा में लगाना चाहिए औरों के कहने से नहीं। औरों के कहने से क्या होगा? आधा फल मिलेगा। क्योंकि जिसने कहा अथवा प्रेरणा दी उनकी भाईवारी हो जाती है। दुकान में अगर दो भाईवार (साझीदार) हों तो बंटवारा हो जाता है ना! एक है तो वह मालिक हो रहता है। इसलिए अगर किसके कहने से करते हैं तो उस कार्य में भाईवारी हो जाती है। और स्वयं ही मालिक बन करके करते हैं तो सारी मिलकियत के अधिकारी बन जाते हैं। इसलिए हरेक को मालिक बनकर करना है लेकिन मालिकपने के साथ-साथ बालकपन भी पूरा होना चाहिए। कहाँ-कहाँ मालिक बनकर खड़े हो जाते हैं, कहाँ फिर बालक होकर छोड़ देते हैं। तो न छोड़ना है न पकड़ना है। पकड़ना अर्थात् जिद से नहीं पकड़ना है। कोई चीज़ को अगर बहुत जोर से पकड़ा जाता है तो उस चीज़ का रूप बदल जाता है ना। फूल को जोर से पकड़ो तो क्या हाल होगा। पकड़ना तो है लेकिन कहाँ तक, कैसे पकड़ना है, यह भी समझना है। या तो पकड़ते अटक जाते हैं वा छोड़ते हैं तो छूट जाते हैं। दोनों ही समान रहे यह पुरुषार्थ करना है। जो मालिक और बालक दोनों रीति से चलने वाला होगा उनकी मुख्य परख यह होगी – एक तो निर्मानता होगी उसके साथ निरंहकारी, निर्मान और साथ-साथ प्रेम स्वरूप। यह चारों ही बातें उनके हर चलन से देखने में आयेंगी। अगर चारों में से कोई भी कम है तो कुछ स्टेज की कमी है। अच्छा।
वतन में आज होली कैसे खेली मालूम है? आप भी होली मना रहे हो ना! वहाँ सन्देशी आई तो एक खेल किया। कौन सा खेल किया होगा? (आप ले चलो तो देखें) बुद्धि का विमान तो है। बुद्धि का विमान तो दिव्य दृष्टि से भी अच्छा है। यहाँ तो वह हो ही नहीं सकता। वह चीज़ ही नहीं। आज सुहेजों का दिन था ना! तो जब सन्देशियां वतन में आई तो साकार को छिपा दिया। एक बहुत सुन्दर फूलों की पहाड़ी बनाई थी उनके अन्दर साकार को छिपाया हुआ था। दूर से देखने में तो पहाड़ी ही नज़र आती थी। तो जब संदेशी आई तो साकार को देखा नहीं। बहुत ढूंढ़ा देखने में ही नहीं आया। फिर अचानक ही जैसे छिपने का खेल करते हैं ना! ऐसा खेल देखा। फूलों के बीच साकार बैठा हुआ नज़र आया। वह सीन बड़ी अच्छी थी।
“होली का असली रहस्य क्या है? जो बीता उसे ‘हो ली’ करो | 04-03-1969 Avyakt Murli”
“जो बीत गया… उसे छोड़ दिया?”
यही है सच्ची होली!
जो बीता उसे “हो ली” करना ही होली मनाना है
Avyakt Murli — 04 March 1969
मुख्य विषय:
होली का आध्यात्मिक अर्थ • ड्रामा की ढाल • ज्ञान का मंथन • सर्विस • मालिक और बालकपन • निर्मानता और प्रेम
Disclaimer
यह वीडियो Brahma Kumaris की 04 March 1969 की Avyakt Murli में दिए गए आध्यात्मिक संदेशों को सरल भाषा, उदाहरणों और वर्तमान जीवन से जोड़कर समझाने का एक प्रयास है।
इस वीडियो का उद्देश्य किसी धार्मिक परंपरा, व्यक्ति या समुदाय की आलोचना करना नहीं है।
यह सामग्री आध्यात्मिक चिंतन और समझ के लिए है। इसमें दिए गए उदाहरण व्याख्या को सरल बनाने के लिए हैं, इन्हें वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।
विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं में “होली”, “ड्रामा”, “आत्मा” और “कर्म” की व्याख्या अलग-अलग हो सकती है।
Murli Reference: 04-03-1969 — “जो बीता उसे हो ली करना ही होली मनाना है।”
Chapter 1 — असली होली क्या है?
आज एक बहुत सुंदर प्रश्न है—
क्या होली केवल रंग खेलने का त्योहार है?
मुरली हमें होली का एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ समझाती है।
होली में केवल रंगना ही नहीं होता।
होली में—
- कुछ जलाना है।
- कुछ मिटाना है।
- कुछ रंगना है।
- और कुछ श्रृंगारना है।
इन चारों को जीवन में practically करना ही वास्तविक अर्थ में होली मनाना है।
उदाहरण
अगर हम केवल बाहर से रंग लगा लें, लेकिन अंदर पुराने क्रोध, दुख और शिकायतें वैसे ही रखें, तो क्या हमारी होली पूरी हुई?
यहीं से सच्ची होली का प्रश्न शुरू होता है।
Chapter 2 — “हो ली” का रहस्य
मुरली का सबसे powerful message है—
जो बीत गया, वह हो गया।
“जो सीन हुई—हो ली।”
अर्थात् जो घटना बीत चुकी है, उसे बार-बार वर्तमान में जीवित करके नहीं रखना है।
उदाहरण — पुरानी बात
किसी ने दस दिन पहले आपको कुछ कह दिया।
घटना दस दिन पहले समाप्त हो गई।
लेकिन अगर आज भी आप सोचते हैं—
“उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
“मुझे ही क्यों कहा?”
“मैंने उस समय जवाब क्यों नहीं दिया?”
तो घटना तो दस दिन पहले समाप्त हो गई, लेकिन हम उसे अपनी बुद्धि में आज भी चला रहे हैं।
होली का अभ्यास है—जो हो गया, उसे “हो ली” करना।
Chapter 3 — ड्रामा की ढाल
मुरली में एक बहुत महत्वपूर्ण point है—
ड्रामा की सीन को देखकर बुद्धि को बार-बार उसी में नहीं उलझाना।
जब हम हर घटना पर—
“क्यों?”
“कैसे?”
“मेरे साथ ही क्यों?”
“ऐसा क्यों हुआ?”
का लगातार मंथन करते रहते हैं, तो यह हमें थका सकता है और समय भी ले सकता है।
उदाहरण
एक व्यक्ति ने आपको गलत समझ लिया।
अब आपके सामने दो रास्ते हैं।
पहला:
पूरे दिन उसी घटना को replay करते रहें।
दूसरा:
सीख लें, आवश्यक action लें और फिर उसे “हो ली” कर दें।
दूसरा रास्ता बुद्धि को हल्का रखता है।
Chapter 4 — पानी का मंथन या ज्ञान का मंथन?
मुरली में बहुत सुंदर उदाहरण दिया गया है।
दही को मथेंगे तो मक्खन निकलेगा।
लेकिन—
पानी को मथेंगे तो क्या निकलेगा?
कुछ नहीं।
परिणाम?
थकावट और समय की बर्बादी।
इसी तरह हमें अपने जीवन में देखना है—
क्या मैं ज्ञान का मंथन कर रहा हूँ?
या
मैं केवल घटनाओं का मंथन कर रहा हूँ?
Chapter 5 — ज्ञान का मंथन कैसे करें?
घटना पर बार-बार सोचने के बजाय प्रश्न बदलें।
“उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
इसके बजाय—
“इस परिस्थिति से मुझे क्या सीखना है?”
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”
इसके बजाय—
“इस परिस्थिति में मेरी श्रेष्ठ स्थिति क्या हो सकती है?”
“मैंने ऐसा क्यों सहा?”
इसके बजाय—
“अगली बार मैं कौन-सा श्रेष्ठ response दूँगा?”
यही है ज्ञान का मंथन।
Chapter 6 — होली का आत्मिक श्रृंगार
मुरली में बाहरी सजावट के संदर्भ से आत्मिक श्रृंगार की ओर संकेत किया गया है।
जैसे होली के समय सुंदर सजावट की जाती है, वैसे ही संगमयुग का मुख्य श्रृंगार बताया गया है—
मस्तक पर आत्मा का दीपक जलाना।
इसका practical अर्थ हम ऐसे समझ सकते हैं—
जब मस्तक में आत्म-स्मृति का दीपक जलता है, तो विचारों में प्रकाश आता है।
स्वयं से पूछें:
मैं कौन हूँ?
मेरी बुद्धि किस दिशा में जा रही है?
मैं घटना में फँसा हूँ या ज्ञान में स्थित हूँ?
Chapter 7 — डबल घेराव क्या है?
मुरली में सर्विस की एक विशेष युक्ति बताई गई—
डबल घेराव।
इसके दो रूप बताए गए हैं—
- वाणी द्वारा सर्विस
- अव्यक्त आकर्षण द्वारा सर्विस
सिर्फ बोलना ही सर्विस नहीं है।
हमारी स्थिति, vibration, व्यवहार और अव्यक्त आकर्षण भी service का माध्यम बन सकते हैं।
Chapter 8 — म्यूज़ियम बनाना ही घेराव नहीं
मुरली स्पष्ट करती है कि केवल म्यूज़ियम बनाना ही “घेराव” नहीं है।
वास्तविक उद्देश्य है—
अपने अव्यक्त आकर्षण से आत्माओं को प्रभावित करना।
उदाहरण
दो व्यक्ति ज्ञान की बातें करते हैं।
पहला व्यक्ति बहुत बोलता है, लेकिन उसके व्यवहार में वही पुरानी कमजोरियाँ दिखाई देती हैं।
दूसरा व्यक्ति कम बोलता है, लेकिन उसकी स्थिति में शांति, प्रेम और निर्मानता दिखाई देती है।
किसका प्रभाव अधिक होगा?
यही है—
कथनी के साथ करनी।
Chapter 9 — समय को “हो ली” मत होने दो
मुरली में एक practical चेतावनी भी है।
जो समय सर्विस के लिए मिल रहा है, उसका अधिक से अधिक उपयोग करना है।
क्योंकि—
सर्विस का समय भी “हो ली” हो सकता है।
अर्थात् समय निकल सकता है।
उदाहरण
हम सोचते हैं—
“अभी नहीं, बाद में करेंगे।”
फिर—
कल।
फिर—
अगले सप्ताह।
और देखते-देखते अवसर निकल जाता है।
इसलिए—
जो करना है, शुभ समय में करना है।
Chapter 10 — सेवा: किसी के कहने से या स्वयं?
मुरली में बहुत गहरा point है—
स्वयं को ईश्वरीय सेवा में लगाना चाहिए, केवल दूसरों के कहने से नहीं।
उदाहरण — साझेदारी
अगर किसी कार्य में दो साझेदार हों तो लाभ भी बाँटता है।
लेकिन यदि व्यक्ति स्वयं मालिक बनकर जिम्मेदारी लेता है, तो उसका अधिकार अलग होता है।
इसी प्रकार सेवा में—
प्रेरणा अच्छी है, लेकिन ownership और responsibility अपनी होनी चाहिए।
Chapter 11 — मालिक और बालक दोनों
अब एक बहुत सुंदर balance बताया गया है—
मालिक बनो, लेकिन साथ-साथ बालक भी बनो।
मालिक का अर्थ—
जिम्मेदारी और अधिकार।
बालक का अर्थ—
स्नेह, सरलता, समर्पण और भरोसा।
अगर केवल मालिकपन आ गया तो अहंकार आ सकता है।
अगर केवल बालकपन के नाम पर जिम्मेदारी छोड़ दी तो पुरुषार्थ में कमी आ सकती है।
इसलिए—
मालिक भी और बालक भी।
Chapter 12 — न पकड़ना, न छोड़ना
मुरली में फूल का उदाहरण दिया गया है।
फूल को बहुत जोर से पकड़ेंगे तो उसका रूप बिगड़ सकता है।
इसी प्रकार जीवन में किसी बात को इतनी जिद से पकड़ना भी ठीक नहीं कि बुद्धि उसी में अटक जाए
उदाहरण
किसी ने आपकी आलोचना की।
उसे पूरी तरह ignore करना भी जरूरी नहीं।
उससे सीखना है।
लेकिन उसे पकड़कर बैठ भी नहीं जाना है।
इसलिए—
सीख लो, लेकिन बोझ मत बनाओ।
Chapter 13 — सच्ची स्टेज की पहचान
मुरली में मालिक और बालक दोनों रूप से चलने वाले की कुछ मुख्य पहचान बताई गई हैं।
चार महत्वपूर्ण गुण:
निर्मानता
निरहंकारिता
प्रेम स्वरूप
सरलता से चलना
अगर इनमें कमी है, तो अपनी स्थिति को check करना चाहिए।
Self-Check
आज स्वयं से पूछें—
- क्या मैं अपनी बात मनवाने की जिद करता हूँ?
- क्या मैं अपनी उपलब्धियों का अहंकार करता हूँ?
- क्या मेरे व्यवहार में प्रेम दिखाई देता है?
- क्या मैं दूसरों को सम्मान दे सकता हूँ?
Chapter 14 — वतन की होली का सुंदर खेल
मुरली के अंत में वतन में होली से जुड़ी एक सुंदर सीन सुनाई गई है।
फूलों की एक सुंदर पहाड़ी बनाई गई थी और उसके अंदर साकार रूप को छिपाया गया था।
दूर से केवल फूलों की पहाड़ी दिखाई देती थी।
संदेशी ने ढूँढ़ा, लेकिन साकार रूप दिखाई नहीं दिया।
फिर अचानक फूलों के बीच साकार रूप दिखाई दिया।
यह एक सुंदर छिपने और प्रकट होने के खेल के रूप में वर्णित किया गया है।
Chapter 15 — आज की होली कैसे मनाएँ?
अब पूरी मुरली को practical life में लाएँ।
क्या जलाना है?
कमजोरियों को।
क्या मिटाना है?
पुरानी शिकायतें, व्यर्थ सोच और अनावश्यक बोझ।
किस रंग में रंगना है?
ज्ञान, प्रेम, शांति और ईश्वरीय स्मृति के रंग में।
क्या श्रृंगारना है?
अपनी बुद्धि, वृत्ति, दृष्टि और व्यवहार को।
Chapter 16 — आज का सबसे बड़ा अभ्यास
आज से एक छोटा अभ्यास करें।
जब भी कोई पुरानी घटना याद आए, स्वयं से कहें—
“हो ली।”
फिर प्रश्न बदल दें—
“इस घटना से मुझे क्या सीखना है?”
और फिर—
“अब मेरी श्रेष्ठ स्थिति क्या होनी चाहिए?”
यही है—
घटना का मंथन छोड़कर ज्ञान का मंथन करना।
Chapter 17 — आज का मुख्य संदेश
पूरी मुरली का सार कुछ शब्दों में—
जो बीत गया—हो ली।
जो सीख मिली—उसे रखो।
जो बोझ है—उसे छोड़ो।
जो समय मिला है—उसका सदुपयोग करो।
सेवा स्वयं की जिम्मेदारी समझकर करो।
मालिक बनो, लेकिन बालकपन मत छोड़ो।
निर्मान, निरहंकारी और प्रेम स्वरूप बनो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
“जो बीता उसे हो ली करना ही होली मनाना है।”
आज का Self-Reflection
रात को सोने से पहले स्वयं से चार प्रश्न पूछें:
1. आज मैंने कौन-सी पुरानी बात पकड़े रखी?
2. आज मुझे किस बात को “हो ली” करना है?
3. आज मैंने ज्ञान का मंथन किया या व्यर्थ बातों का?
4. आज मेरे व्यवहार में निर्मानता और प्रेम कितना दिखाई दिया?
Closing Message
होली केवल बाहर रंग लगाने का त्योहार नहीं।
सच्ची होली तब है जब—
पुराना बोझ जल जाए,
व्यर्थ बातें मिट जाएँ,
ज्ञान का रंग पक्का हो जाए,
और आत्मा का दीपक मस्तक पर जलता रहे।
इसलिए आज एक संकल्प करें—
“जो बीत गया, उसे हो ली।
जो सीख मिली, उसे जीवन में लाऊँगा।
और जो समय मिला है, उसे श्रेष्ठ कार्य में लगाऊँगा।”
यही है सच्ची होली।
प्रश्न 1: सच्ची होली मनाने का मुख्य अर्थ क्या है?
उत्तर: जो कुछ बीत गया, उसे “हो ली” अर्थात् समाप्त समझकर आगे बढ़ना ही सच्ची होली मनाना है।
प्रश्न 2: संगमयुग की होली में कौन-सी चार बातें करनी हैं?
उत्तर: जलाना, मिटाना, रंगना और श्रृंगारना—इन चारों को जीवन में धारण करना है।
प्रश्न 3: संगमयुग का मुख्य आत्मिक श्रृंगार क्या है?
उत्तर: मस्तक पर आत्मा का दीपक जलाना, अर्थात् आत्म-स्मृति में स्थित रहना।
प्रश्न 4: “हो ली” शब्द को जीवन में कैसे अपनाया जा सकता है?
उत्तर: जो घटना बीत चुकी है, उसे बार-बार बुद्धि में दोहराने के बजाय उसे समाप्त समझकर आगे बढ़ना चाहिए।
प्रश्न 5: ड्रामा की सीन पर बार-बार “क्यों, क्या, कैसे” सोचना किस प्रकार का मंथन है?
उत्तर: यह व्यर्थ का मंथन है। इससे थकावट और समय की बर्बादी होती है।
प्रश्न 6: ज्ञान के मंथन को समझाने के लिए कौन-सा उदाहरण दिया गया है?
उत्तर: दही को मथने से मक्खन निकलता है, लेकिन पानी को मथने से कुछ नहीं निकलता। इसी प्रकार ज्ञान का मंथन सार देता है, व्यर्थ बातों का मंथन केवल थकावट देता है।
प्रश्न 7: हमें किस प्रकार का मंथन करना चाहिए?
उत्तर: ड्रामा की घटनाओं को लेकर व्यर्थ सोचने के बजाय ज्ञान का मंथन करना चाहिए।
प्रश्न 8: साकार रूप में सर्विस की मुख्य युक्ति क्या बताई गई थी?
उत्तर: “घेराव डालना”—अर्थात् डबल घेराव: वाणी द्वारा सर्विस और अव्यक्त आकर्षण द्वारा सर्विस।
प्रश्न 9: केवल म्यूज़ियम बनाना ही घेराव क्यों नहीं है?
उत्तर: क्योंकि वास्तविक घेराव केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि अपने अव्यक्त आकर्षण और आध्यात्मिक प्रभाव से आत्माओं को प्रभावित करने से होता है।
प्रश्न 10: सर्विस का समय कम होने की संभावना क्यों बताई गई है?
उत्तर: क्योंकि परिस्थितियाँ ऐसी बन सकती हैं जो सर्विस में बाधा डालें। इसलिए जो समय मिल रहा है, उसमें अधिक-से-अधिक सर्विस कर लेनी चाहिए।
प्रश्न 11: ईश्वरीय सेवा में स्वयं को कैसे लगाना चाहिए?
उत्तर: दूसरों के कहने या प्रेरणा देने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। स्वयं मालिक बनकर ईश्वरीय सेवा में लगना चाहिए।
प्रश्न 12: दूसरों के कहने से सेवा करने पर “आधा फल” क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि जब किसी दूसरे की प्रेरणा या साझेदारी होती है, तो कार्य में भाईवारी अर्थात् साझेदारी हो जाती है। स्वयं मालिक बनकर करने से पूर्ण अधिकार का अनुभव होता है।
प्रश्न 13: मालिक बनने के साथ कौन-सा गुण भी आवश्यक है?
उत्तर: मालिकपने के साथ बालकपन भी पूरा होना चाहिए।
प्रश्न 14: मालिक और बालक दोनों रूप में चलने वाले की पहचान क्या है?
उत्तर: उसमें निर्मानता, निरहंकारिता और प्रेम स्वरूपता दिखाई देगी। उसके व्यवहार में ये गुण स्पष्ट दिखाई देंगे।
प्रश्न 15: किसी चीज़ को बहुत जोर से पकड़ने के बारे में क्या उदाहरण दिया गया है?
उत्तर: फूल को बहुत जोर से पकड़ने पर उसका रूप बिगड़ जाता है। इसी प्रकार किसी बात को जिद से पकड़कर बैठ जाने से स्थिति और संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
प्रश्न 16: “न छोड़ना है, न पकड़ना है” का सही अर्थ क्या है?
उत्तर: किसी बात को जिद से पकड़कर नहीं बैठना और न ही जिम्मेदारी से पूरी तरह हाथ खींच लेना। सही संतुलन के साथ चलना है।
प्रश्न 17: वतन में होली के अवसर पर कौन-सा सुंदर खेल दिखाया गया?
उत्तर: फूलों की एक सुंदर पहाड़ी बनाई गई थी और उसके अंदर साकार रूप को छिपाया गया था। बाद में फूलों के बीच साकार रूप दिखाई दिया।
प्रश्न 18: होली के रंग को “पक्का” कैसे किया जा सकता है?
उत्तर: “जो बीता वह हो ली” की स्मृति को जीवन में उतारने से। यदि अतीत की घटनाओं को बार-बार पकड़कर रखेंगे तो ज्ञान का रंग कच्चा रह सकता है।
प्रश्न 19: आज के समय में हमें अपनी बुद्धि का उपयोग किस प्रकार करना चाहिए?
उत्तर: बीती हुई घटनाओं पर व्यर्थ मंथन करने के बजाय ज्ञान का मंथन करना चाहिए और प्राप्त ज्ञान को जीवन में practical रूप से धारण करना चाहिए।
प्रश्न 20: इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: जो बीत गया उसे “हो ली” करना, व्यर्थ बातों को समाप्त करना, ज्ञान का मंथन करना, समय
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