AW.(39)09-11-1969/“भविष्य को जानने की युक्तियां”
“भविष्य को जानने की युक्तियां”
दीपावली के शुभ दिवस पर प्राणप्रिय अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य
बापदादा एक-एक दीपक को एक काल (समय) की दृष्टि से देख रहे हैं या तीनों कालों की? बाप तो त्रिकालदर्शी हैं वा दादा भी त्रिकालदर्शी हैं? आप भी त्रिकालदर्शी हो या बन रहे हो? अगर त्रिकालदर्शी हो तो अपने भविष्य को देखते वा जानते हो? जानते हो मैं क्या बनूंगा? पाण्डव सेना में अपना भविष्य जानते हो या स्पष्ट है कि क्या बनोगे। और कौनसी राजधानी में? लक्ष्मी-नारायण भी किस नम्बर में? (हरेक ने अपना विचार बताया) जैसे आप आगे बढ़ते जायेंगे वैसे अपना भविष्य नाम-रूप-देश-काल यह चारों ही स्पष्ट होते जायेंगे कि किस देश में राज्य करना है किस नाम से, किस रूप से और किस समय। पहले राजधानी में भी क्या बनेंगे। दूसरी राजधानी में क्या बनेंगे – यह पूरी जन्मपत्री एक-एक को अपने अन्दर स्पष्ट होगी। बापदादा जब भी किसी को देखते हैं तो तीनों कालों को देखते हैं। पहले क्या था अब क्या है फिर भविष्य में क्या बनने वाले हैं। तो एक-एक दीपक में यह तीनों काल देखते हैं। आप दो काल तो स्पष्ट जानते हो। पहले क्या थे और अब क्या हैं लेकिन भविष्य में क्या होना है, उसको जितना-जितना योगयुक्त होंगे उतना भविष्य भी स्पष्ट जान जायेंगे। जैसे वर्तमान स्पष्ट है। वर्तमान में कभी भी संकल्प नहीं उठता है कि है या नहीं है। ना मालूम क्या है यह कभी संकल्प नहीं उठेगा। इसी रीति से भविष्य भी स्पष्ट होगा। ऐसा स्पष्ट नशा हर एक की बुद्धि में नम्बरवार आता जायेगा। जैसे साकार रूप में मां-बाप दोनों को अपना भविष्य स्पष्ट था। नाम भी, रूप भी स्पष्ट, देश भी स्पष्ट और काल भी स्पष्ट था। इतना स्पष्ट है कि किस सम्बन्ध में आयेंगे? वा सम्बन्ध भी स्पष्ट किस रूप में सामने आयेगा? अभी दिल में थोड़ा बहुत किस-किस को आ सकता है। लेकिन कुछ समय बाद ऐसे ही निश्चय बुद्धि होकर कहेंगे कि यह होना ही है। अभी अगर आप कहेंगे भी तो दूसरे निश्चय करें या न करें। लेकिन थोड़े समय में आपकी चलन, आपकी तदबीर जो है वह आपके भविष्य तस्वीर को प्रसिद्ध करेगी। अब तदबीर और भविष्य में कुछ फर्क है। लेकिन जैसे-जैसे समय और आपका पुरुषार्थ समान होता जायेगा तो फिर कोई को संकल्प नहीं उठेगा।आप सभी ने दीपमाला मनाई। दीपमाला पर क्या करते हैं? एक दीप से अनेक दीप जगाते हैं तो अनेकों का एक के साथ लगन लगता है, यही दीपमाला है। अगर एक-एक दीपक की एक दीपक के साथ लगन है तो यही दीपमाला है। दीपक में क्या है? अग्नि। तो लगन होगी तो अग्नि भी होगी। लगन नहीं तो अग्नि भी नहीं। यही देखना है कि हम दीपक लगन लगाकर अग्नि बने हैं? दीपक कितने प्रकार के होते हैं? जो दुनिया में भी प्रसिद्ध हैं? (हरेक ने अपना-अपना विचार सुनाया) एक है अंधियारे को मिटाकर रोशनी करने वाला मिट्टी का स्थूल दीपक और दूसरा है आत्मा का दीपक, तीसरा है कुल का दीपक और चौथा कौनसा है? आशाओं का दीपक कहते हैं ना। बाप को बच्चों में आशा रहती है। तो चौथा है आशाओं का दीपक। यह चार प्रकार के दीपक गाये जाते हैं। अब इन चार दीपकों से हरेक ने कितने दीपक जगाये हैं? बापदादा की आशायें जो बच्चों में रहती है – वह दीपक जगाया है? मिट्टी के दीपक तो कई जन्म जगाये हैं। आत्मा का दीपक जगा है? यह चारों प्रकार के दीपक जब जग जाते हैं तब समझो दीपमाला मनाई। ऐसा कोई कर्म न हो जो कुल का दीपक बुझ जाये। ऐसी कोई चलन न हो जो बापदादा बच्चों में आशाओं का दीपक जगाते वह बुझ जाये। एकरस और अटल-अडोल यह सभी दीपक जग रहे हैं? जिसका दीपक खुद जगा हुआ होगा वह औरों का दीपक जगाने बिगर रह नहीं सकता। बापदादा की बच्चों में मुख्य आशायें कौनसी रहती हैं? बापदादा की हर एक बच्चे में यही आशा रहती है कि एक-एक बच्चा पहले नम्बर में जायें अर्थात् हरेक विजयी रत्न बनें। विजयी रत्न की निशानियां क्या होंगी? जो आप सभी ने सुनाया वह तो जो सुना है वही बोला। इसलिए ठीक ही है। जो विजयी होगा उनके लक्षण तो आप सभी ने सुनाये लेकिन साथ-साथ विजयी उनको कहा जाता है – जो खुद तो विजय प्राप्त किया हुआ हो लेकिन औरों को भी अपने से आगे विजयी बनाये। जैसे बापदादा बच्चों को अपने से भी आगे रखते थे ना! वैसे ही जो विजयी रत्न होंगे उनकी विजय की निशानी यह है कि वह अपने संग का रंग सभी को लगायेंगे। जो भी सामने आये वह विजयी बनकर ही निकले। ऐसे विजयी रत्न विजय माला के किस नम्बर में आते हैं? खुद तो विजयी बने हो लेकिन और भी आपके संग के रंग से विजयी बन जायें। यही सर्विस रही हुई है। ऐसे नहीं कि कोटों में कोई ही विजयी बनेंगे। लेकिन जो जैसा होता है वैसा ही बनाता है। ऐसे विजयी रत्न जो अनेकों को विजयी बना सकें वही माला के मुख्य मणके हैं। तो विजयी की निशानी है आप समान विजयी बनाना। अभी यह सर्विस रही हुई है। अनेकों को विजयी बनाना है सिर्फ खुद को नहीं बनाना है। दीपमाला में पूरी दीपमाला जगी हुई होती है। जब दीपमाला कहा जाता है तो अनेक जगे हुए दीपकों की माला हरेक ने गले में डाली है? ऐसे जगे हुए दीपकों की माला हरेक रत्न अपने गले में जब डालेंगे तब विजय का नगाड़ा बजेगा। जैसे दिव्य गुणों की माला अपने में डाली है वैसे अनेक जगे हुए दीपकों की माला अपने गले में डालनी है। जितनी यहाँ दीपकों की माला अपने गले में डालोगे उतनी वहाँ प्रजा बनेगी। कोई-कोई माला बहुत लम्बी-चौड़ी होती है। कोई सिर्फ गले में पहनने तक होती है। तो माला कौनसी पहननी है? बहुत बड़ी। ऐसी माला से अपने आपको श्रृंगार करना है। कितने दीपकों की माला अब तक डाली है? गिनती कर सकते हो वा अनगिनत हैं? दीपक भी अच्छे वह लगते हैं जो तेज जगे हुए होते हैं। टिम-टिम करने वाले अच्छे नहीं लगते। अच्छा।
मधुबन के फूलों में विशेषतायें क्या होनी चाहिए? नाम ही है मधुबन। तो पहली विशेषता है मधुरता। मधुरता ऐसी चीज़ है जो कोई को भी हर्षित कर सकते हैं। मधुरता को धारण करने वाला यहाँ भी महान् बनता है, और वहाँ भी मर्तबा पाता है। मधुरता वालों को सभी महान रूप से देखते हैं। तो यह मधुरता का विशेष गुण होना चाहिए। मधुरता से ही मधुसूदन का नाम बाला करेंगे। यह मधुबन नाम है। मधु अर्थात् मधुरता और बन में क्या विशेषता होती है? बन में वैराग्य वृत्ति वाले जाते हैं। तो बेहद की वैराग्य बुद्धि भी चाहिए। फिर इससे सारी बातें आ जायेंगी। और आप सभी को कॉपी करने के लिए यहाँ आयेंगे। सभी सोचेंगे यह कैसे ऐसे बने हैं! सभी के मुख से निकलेगा कि मधुबन तो मधुबन ही है। तो यह दो विशेषतायें धारण करनी हैं – मधुरता और बेहद की वैराग्य वृत्ति। दूसरे शब्दों में कहते हैं स्नेह और शक्ति। आप सभी का सभी से जास्ती स्नेह है ना! बापदादा से। और बापदादा का मधुबन वालों से विशेष स्नेह रहता है। क्योंकि भल कैसे भी हैं लेकिन सर्वस्व त्यागी हैं। इसलिए आकर्षित करते हैं। लेकिन सर्वस्व त्यागी के साथ अब स्नेह और शक्ति भी भरनी है। समझा, किस विशेषता को भरना है।कुमारियों को कमाल कर दिखानी है। कुमारियों का हर कर्तव्य कमाल योग्य होना चाहिए। संकल्प और वाणी तथा कर्म कमाल का होना चाहिए। कुमारियां पवित्र होने के कारण अपनी धारणा को तेज बना सकती है। ऐसे कमाल का कर्तव्य कर दिखाना है, जो हर एक के मुख से यही निकले कि इन्हों का कर्तव्य कमाल का है। जैसे बापदादा के हर बोल सुनते हैं तो मुख से निकलता है ना कि आज की मुरली तो कमाल की है। तो कुमारियों के हर कर्म ऐसे कमाल के होने चाहिए। बापदादा को फालो करना है। ऐसे नहीं कहना कि कोशिश करेंगे। जब तक कोशिश करेंगे तब तक कशिश नहीं होगी। अगर कशिश धारण करनी है तो कोशिश शब्द को खत्म कर दो। अभी कशिश रूप बनना है। फालो फादर करना है। बापदादा कभी कहते थे कि कोशिश करेंगे? फिर आप क्यों कहती हो कि कोशिश करेंगी? कुमारियां कमाल करेंगी तो साथी साथ भी देगा। नहीं तो साथी साक्षी हो जायेगा। इसलिए साथी को साथ रखना है। नहीं तो साक्षी बन जायेंगे। साक्षी अच्छा लगता है या साथी? जो मेहनत करते हैं उसका फल भी यहाँ ही मिलता है। यह स्नेह और भविष्य पद मिलता है। सभी का स्नेही बनने के लिए मेहनत करनी है। जो जितनी मेहनत करते हैं वह उतने ही स्नेही बनते हैं। समय पर स्नेही की ही याद आती है। कोई बात में मेहनत की याद आती है। बाबा भी क्यों याद आते हैं? मेहनत की है तब स्नेह है। मेहनत से स्नेही बनना है। जितना जास्ती मेहनत उतना सर्व के स्नेही बनेंगे। मेहनत का फल ही स्नेह है। जो मेहनत करते हैं उनको हरेक स्नेही की नज़र से देखेंगे। जो मेहनत नहीं करेंगे उनको स्नेह की नज़र से नहीं देखेंगे। स्टूडेन्ट को टीचर के गुण जरूर धारण करने हैं। स्नेह ही सम्पूर्ण बनाता है। स्नेह के साथ फिर शक्ति भी चाहिए। दोनों का जब मिलन हो जाता है तो स्नेह और शक्ति वाली अवस्था अति न्यारी और अति प्यारी होती है। जिसके लिए स्नेह है उसके समान बनना है। यही स्नेह का सबूत है। इसमें अपने को चेक करना है – कहाँ तक हम समानता में समीप आये हैं? जितना-जितना समानता में समीप होंगे उतना ही समझो कर्मातीत अवस्था के समीप पहुंचेगे। यही समानता का मीटर है। अपनी कर्मातीत अवस्था को परखना है। सिर्फ स्नेह रखने से भी सम्पूर्ण नहीं बनेंगे। स्नेह के साथ-साथ शक्ति भी होगी तो खुद सम्पूर्ण बन औरों को भी सम्पूर्ण बनायेंगे। क्योंकि शक्ति से वह संस्कार भर जाते हैं। तो अब स्नेह के साथ शक्ति भी भरनी है।सभी के दिलों पर विजय किन गुणों से प्राप्त कर सकते हो? सभी को सन्तुष्ट करना। बाप में यह विशेष गुण था। वही फालो करना है। सभी मधुबन की लिस्ट में हो या आलराउन्डर की लिस्ट में हो? एक है हद की लिस्ट, दूसरी है बेहद की लिस्ट। आलराउन्डर और एवररेडी। इसी लिस्ट में मालूम है क्या करना होता है? एक सेकेण्ड में तैयार। संकल्पों को भी एक सेकेण्ड में बन्द करना है। मिलेट्री वालों का हर समय बिस्तरा तैयार रहता है। यह संकल्पों का बिस्तरा भी बन्द करना है। बिस्तरा भी एवररेडी रहना चाहिए। एवररेडी बनने वालों का संकल्पों का बिस्तरा तैयार रहना चाहिए। कोई भी परिस्थिति हो उसका सामना करने के लिए पेटी बिस्तरा तैयार हो। अच्छा।रूहानी बच्चो! तुम आत्माओं को वाणी से परे अपने घर जाने के लिए पुरुषार्थ करना है। इसलिए इस पुरानी दुनिया में रहते देह और देह के सम्बन्धों से उपराम-चित्त होना है। पतित दुनिया में रहते हुए बाप पवित्र बनने की शक्ति देते हैं। पुरुषार्थ करके तुमको सदा पवित्र बनना है।बच्चे! सदैव गुणग्राहक बनना है। स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि, जय-पराजय सभी में सन्तुष्ट होकर चलना है और रहमदिल बनना है।
डिस्क्लेमर:(Disclaimer):यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं, अव्यक्त बापदादा के महावाक्यों और राजयोग दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें बताए गए भविष्य, त्रिकालदर्शिता, आत्मिक अवस्था और आध्यात्मिक पुरुषार्थ को धार्मिक/आध्यात्मिक संदर्भ में समझा जाए। इसका उद्देश्य किसी वैज्ञानिक, चिकित्सीय या भविष्यवाणी संबंधी दावे को प्रमाणित करना नहीं है।
अध्याय: भविष्य को जानने की युक्तियां
1. त्रिकालदर्शी बनने की कला
बापदादा तीनों कालों—भूत, वर्तमान और भविष्य—को देखते हैं। हम भी अपने भविष्य को कितना स्पष्ट जान सकते हैं?
उदाहरण:
वर्तमान में हमें अपने संकल्प, कर्म और पुरुषार्थ का अनुभव होता है। जैसे-जैसे योगयुक्त अवस्था बढ़ती है, वैसे-वैसे भविष्य की दिशा भी स्पष्ट होती जाती है।
Murli Note: 9 नवम्बर 1969 — “भविष्य को जानने की युक्तियां”
2. भविष्य की तस्वीर कैसे स्पष्ट होगी?
भविष्य केवल कल्पना करने से स्पष्ट नहीं होता। हमारी तदबीर, चलन, संस्कार और पुरुषार्थ ही भविष्य की तस्वीर को प्रकट करते हैं।
उदाहरण:
यदि किसी आत्मा की वर्तमान चलन में पवित्रता, निश्चय, सेवा और योग स्पष्ट दिखाई देते हैं, तो उसके भविष्य के संस्कारों की झलक भी उसी पुरुषार्थ से मिलती है।
मुख्य सूत्र:
जितना योगयुक्त पुरुषार्थ, उतना भविष्य स्पष्ट।
3. दीपमाला का वास्तविक रहस्य
दीपमाला केवल बाहरी दीपक जलाने का पर्व नहीं, बल्कि जीवित आत्मिक दीपकों की माला का यादगार है।
एक दीपक दूसरे दीपक को जगाता है। इसी प्रकार एक जागृत आत्मा अपने ज्ञान, योग और गुणों से अनेक आत्माओं के जीवन में प्रकाश जगा सकती है।
Murli Note: 9 नवम्बर 1969 में दीपमाला को एक दीप से अनेक दीप जगाने और अनेक आत्माओं के One के साथ लगन लगाने के रूप में समझाया गया है।
4. चार प्रकार के दीपक
मुरली में चार प्रकार के दीपकों का विशेष उल्लेख मिलता है:
1. स्थूल दीपक — अंधकार को मिटाकर प्रकाश देने वाला।
2. आत्मा का दीपक — आत्मिक ज्योति को जगाना।
3. कुल का दीपक — अपने कुल की मर्यादा और मान को कायम रखना।
4. आशाओं का दीपक — बापदादा की बच्चों से जुड़ी आशाओं को पूरा करना।
आत्म-चेक:
क्या मेरा आत्मा का दीपक स्थिर और प्रज्वलित है?
Murli Note: 9 नवम्बर 1969 — चारों दीपकों को जगाना ही सच्ची दीपमाला मनाने की निशानी बताई गई है।
5. विजयी रत्न की पहचान
सच्चा विजयी केवल वह नहीं जो स्वयं विजय प्राप्त करे, बल्कि वह है जो दूसरों को भी विजयी बनाए।
उदाहरण:
यदि किसी के संग में आने के बाद दूसरे व्यक्ति में उमंग, साहस, योग और श्रेष्ठ पुरुषार्थ बढ़ता है, तो वह आत्मा अपने संग के रंग से विजय का अनुभव करा रही है।
मुख्य सूत्र:
“खुद विजयी बनो और अनेकों को विजयी बनाओ।”
6. अपनी विजय की माला कितनी बड़ी है?
दीपमाला अनेक जगे हुए दीपकों की माला है। उसी प्रकार हमारा वास्तविक आध्यात्मिक श्रृंगार यह है कि हम कितनी आत्माओं को ज्ञान, शक्ति और दिव्य गुणों का प्रकाश दे पाए।
उदाहरण:
एक शिक्षक केवल स्वयं पढ़ा हुआ नहीं रहता; वह अनेक विद्यार्थियों को योग्य बनाता है। उसी प्रकार श्रेष्ठ आत्मा स्वयं विजयी बनकर दूसरों को भी विजय का अनुभव कराती है।
7. मधुबन की दो विशेषताएं
मधुबन के फूलों के लिए दो विशेष गुण बताए गए हैं:
मधुरता
बेहद की वैराग्य वृत्ति
दूसरे शब्दों में—
स्नेह + शक्तिउदाहरण:
मधुरता का अर्थ केवल मीठा बोलना नहीं, बल्कि ऐसी वृत्ति रखना है जिससे सामने वाला भी हर्षित और शक्तिशाली अनुभव करे।
8. कुमारियों के लिए विशेष संदेश — “कमाल” करो
कुमारियों का संकल्प, वाणी और कर्म ऐसा हो जो कमाल करके दिखाए।
“कोशिश करेंगे” की मानसिकता से आगे बढ़कर “कशिश रूप” बनना है।
उदाहरण:
हर परिस्थिति में “मैं कोशिश कर रही हूँ” कहने के बजाय अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय रखना—यही पुरुषार्थ को शक्ति देता है।
मुख्य सूत्र:
Follow Father — कोशिश से आगे बढ़कर कशिश रूप बनो।
9. स्नेह के साथ शक्ति भी जरूरी
केवल स्नेह सम्पूर्णता नहीं देता। स्नेह + शक्ति का संगम ही सम्पूर्णता की ओर ले जाता है।
आत्म-चेक:
- क्या मेरा स्नेह मुझे बाप समान बना रहा है?
- क्या मेरे अंदर परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति है?
- क्या मैं स्वयं सम्पूर्ण बनने के साथ दूसरों को भी सम्पूर्ण बनाने में सहयोग देता हूँ?
10. कर्मातीत अवस्था का मीटर — समानता
जितना-जितना हम बाप समान बनने के समीप आते हैं, उतना ही कर्मातीत अवस्था के समीप पहुँचते हैं।
उदाहरण:
यदि सामने परिस्थिति बदल जाए लेकिन हमारी आत्मिक स्थिति, शान्ति और संतुलन न बदले, तो यह आत्मिक शक्ति की निशानी है।
मुख्य सूत्र:
समानता में समीपता = कर्मातीत अवस्था की ओर प्रगति।
11. सभी के दिलों पर विजय कैसे प्राप्त करें?
सभी को संतुष्ट करने का गुण धारण करना है।
सच्ची विजय केवल किसी को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपने गुणों, मधुरता, सन्तुष्टता और रहमदिल वृत्ति से दिल जीतने में है।
12. “एवररेडी” बनने की युक्ति
एवररेडी का अर्थ है—किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार।
लेकिन केवल बाहरी तैयारी नहीं, संकल्पों का बिस्तरा भी एक सेकेण्ड में बन्द करने की शक्ति चाहिए।
उदाहरण:
कोई अचानक परिस्थिति सामने आए और बुद्धि व्यर्थ विचारों में उलझने के बजाय तुरंत शांत, स्थिर और समाधानयुक्त हो जाए—यही एवररेडी अवस्था है।
13. देह और देह के सम्बन्धों से उपराम
रूहानी बच्चे इस पुरानी दुनिया में रहते हुए भी अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित रहें।
मुख्य अभ्यास:
“मैं देह नहीं, आत्मा हूँ।”
पवित्रता, योग और आत्मिक स्मृति द्वारा देह-अभिमान से ऊपर उठने का पुरुषार्थ करना है।
14. गुणग्राहक और रहमदिल बनो
सदा गुणग्राहक बनना है और स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि, जय-पराजय जैसी परिस्थितियों में संतुष्ट रहना है।
उदाहरण:
किसी की कमी देखने के बजाय उसके गुण को देखना और स्वयं को शांत रखना—गुणग्राहक बनने का अभ्यास है।
आज का मुख्य संदेश
दीपमाला मनाना अर्थात् स्वयं का दीपक जगाना और अनेकों दीपकों को जगाना।
भविष्य जानने की श्रेष्ठ युक्ति भविष्य की कल्पना करना नहीं, बल्कि वर्तमान में ऐसा श्रेष्ठ पुरुषार्थ, श्रेष्ठ चलन और श्रेष्ठ संस्कार धारण करना है जो भविष्य की तस्वीर स्वयं स्पष्ट कर दे।याद रखने योग्य 7 सूत्र:
- त्रिकालदर्शी बनो।
- योगयुक्त बनो।
- अपना आत्मिक दीपक जगाओ।
- स्वयं विजयी बनो और दूसरों को विजयी बनाओ।
- मधुरता और बेहद का वैराग्य धारण करो।
- स्नेह के साथ शक्ति भरो।
- एवररेडी, गुणग्राहक और रहमदिल बनो।
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प्रश्न 1. बापदादा बच्चों को किस दृष्टि से देखते हैं?
उत्तर: बापदादा बच्चों को तीनों कालों—भूत, वर्तमान और भविष्य—की दृष्टि से देखते हैं।
प्रश्न 2. त्रिकालदर्शी बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर: भूत में क्या थे, वर्तमान में क्या हैं और भविष्य में क्या बनने वाले हैं—इन तीनों कालों की स्पष्ट समझ होना त्रिकालदर्शी दृष्टि है।
प्रश्न 3. अपना भविष्य किस प्रकार स्पष्ट जान सकते हैं?
उत्तर: जितना-जितना योगयुक्त और श्रेष्ठ पुरुषार्थी बनेंगे, उतना ही अपना भविष्य स्पष्ट जान सकेंगे।
प्रश्न 4. भविष्य की तस्वीर किन बातों से स्पष्ट होती जाएगी?
उत्तर: नाम, रूप, देश और काल—इन चारों की तस्वीर पुरुषार्थ के अनुसार स्पष्ट होती जाएगी।
प्रश्न 5. दीपमाला का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
उत्तर: एक दीप से अनेक दीप जगाना ही दीपमाला का आध्यात्मिक रहस्य है। अर्थात् स्वयं जागृत होकर अनेकों आत्माओं के दीपक जगाना।
प्रश्न 6. दीपक में क्या होता है और लगन का उससे क्या संबंध है?
उत्तर: दीपक में अग्नि होती है। जब परमात्मा से सच्ची लगन होती है तो आत्मिक अग्नि प्रज्वलित रहती है।
प्रश्न 7. मुरली में कितने प्रकार के दीपकों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर: चार प्रकार के दीपकों का उल्लेख है—स्थूल दीपक, आत्मा का दीपक, कुल का दीपक और आशाओं का दीपक।
प्रश्न 8. सच्ची दीपमाला कब मानी जाएगी?
उत्तर: जब आत्मा का दीपक, कुल का दीपक, आशाओं का दीपक और बाहरी प्रकाश—चारों जागृत रहें, तब सच्ची दीपमाला मानी जाएगी।
प्रश्न 9. विजयी रत्न की मुख्य निशानी क्या है?
उत्तर: विजयी रत्न स्वयं विजय प्राप्त करने के साथ-साथ अनेकों को भी विजयी बनाता है।
प्रश्न 10. अपने संग के रंग से दूसरों को विजयी बनाने का क्या अर्थ है?
उत्तर: हमारे ज्ञान, योग, गुण और श्रेष्ठ चलन से जो भी हमारे सम्पर्क में आए, वह भी उत्साहित होकर विजय का पुरुषार्थ करे।
प्रश्न 11. बापदादा की बच्चों में मुख्य आशा क्या है?
उत्तर: बापदादा की आशा है कि प्रत्येक बच्चा विजयी रत्न बने और श्रेष्ठ पुरुषार्थ करके आगे बढ़े।
प्रश्न 12. मधुबन के फूलों में कौन-सी दो विशेषताएं होनी चाहिए?
उत्तर: मधुरता और बेहद की वैराग्य वृत्ति।
प्रश्न 13. मधुरता और वैराग्य को दूसरे शब्दों में क्या कहा गया है?
उत्तर: स्नेह और शक्ति।
प्रश्न 14. कुमारियों को किस प्रकार का कर्तव्य करना है?
उत्तर: कुमारियों का हर संकल्प, वाणी और कर्म ऐसा होना चाहिए जिसे देखकर सभी कहें—इनका कर्तव्य कमाल का है।
प्रश्न 15. “कोशिश करेंगे” के बजाय कौन-सी अवस्था धारण करनी है?
उत्तर: केवल कोशिश करने की अवस्था से आगे बढ़कर कशिश रूप बनना है।
प्रश्न 16. कुमारियों को किसका अनुसरण करना है?
उत्तर: कुमारियों को “फॉलो फादर” करना है।
प्रश्न 17. स्नेह के साथ और क्या आवश्यक है?
उत्तर: स्नेह के साथ शक्ति भी आवश्यक है। दोनों के मिलन से अवस्था अति न्यारी और प्यारी बनती है।
प्रश्न 18. सच्चे स्नेह का सबूत क्या है?
उत्तर: जिसके प्रति स्नेह है, उसके समान बनने का पुरुषार्थ करना ही सच्चे स्नेह का सबूत है।
प्रश्न 19. समानता का संबंध किस अवस्था से है?
उत्तर: जितना बाप समान बनने के समीप आते हैं, उतना ही कर्मातीत अवस्था के समीप पहुँचते हैं।
प्रश्न 20. सभी के दिलों पर विजय किन गुणों से प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर: सभी को संतुष्ट करने, गुणग्राहक बनने, मधुरता रखने और रहमदिल बनने से सभी के दिलों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न 21. एवररेडी बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए एक सेकेण्ड में तैयार रहना और संकल्पों को भी एक सेकेण्ड में बन्द करने की शक्ति रखना।
प्रश्न 22. रूहानी बच्चों को किस अवस्था के लिए पुरुषार्थ करना है?
उत्तर: वाणी से परे अपने घर जाने के लिए पुरुषार्थ करना है और देह तथा देह के सम्बन्धों से उपराम-चित्त रहना है।
प्रश्न 23. सभी परिस्थितियों में हमें किस प्रकार रहना है?
उत्तर: स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि और जय-पराजय में सन्तुष्ट रहना है तथा रहमदिल बनना है।
प्रश्न 24. भविष्य को स्पष्ट करने की सबसे बड़ी युक्ति क्या है?
उत्तर: वर्तमान में श्रेष्ठ पुरुषार्थ, योगयुक्त अवस्था, श्रेष्ठ चलन और दिव्य संस्कारों को धारण करना। यही पुरुषार्थ भविष्य की तस्वीर को स्पष्ट करता है।
प्रश्न 25. इस महावाक्य का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: स्वयं का दीपक जगाओ, अनेकों के दीपक जगाओ, विजयी रत्न बनो, स्नेह के साथ शक्ति धारण करो और अपने श्रेष्ठ पुरुषार्थ से अपने भविष्य की तस्वीर स्पष्ट करो।
