(32)29-04-1984 “Different Characteristics of the Spiritual Stars of the Sun of Knowledge”

अव्यक्त मुरली-(32)29-04-1984 “ज्ञान सूर्य के रुहानी सितारों की भिन्न-भिन्न विशेषताएं”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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29-04-1984 “ज्ञान सूर्य के रुहानी सितारों की भिन्न-भिन्न विशेषताएं”

आज ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा अपने वैरायटी सितारों को देख रहे हैं। कोई स्नेही सितारे हैं, कोई विशेष सहयोगी सितारे हैं, कोई सहजयोगी सितारे हैं, कोई श्रेष्ठ ज्ञानी सितारे हैं, कोई विशेष सेवा के उमंग वाले सितारे हैं। कोई मेहनत का फल खाने वाले सितारे हैं, कोई सहज सफलता के सितारे हैं। ऐसे भिन्न-भिन्न विशेषताओं वाले सभी सितारे हैं। ज्ञान सूर्य द्वारा सर्व सितारों को रुहानी रोशनी मिलने कारण चमकने वाले सितारे तो बन गये। लेकिन हरेक प्रकार के सितारों की विशेषता की झलक भिन्न-भिन्न है। जैसे स्थूल सितारे भिन्न-भिन्न ग्रह के रुप में भिन्न-भिन्न फल अल्पकाल का प्राप्त कराते हैं। ऐसे ज्ञान सूर्य के रुहानी सितारों का भी सर्व आत्माओं को अविनाशी प्राप्ति का सम्बन्ध है। जैसा स्वयं जिस विशेषता से सम्पन्न सितारा है वैसा औरों को भी उसी प्रमाण फल की प्राप्ति कराने के निमित्त बनता है। जितना स्वयं ज्ञान चन्द्रमा वा सूर्य के समीप हैं उतना औरों को भी समीप सम्बन्ध में लाते हैं अर्थात् ज्ञान सूर्य द्वारा मिली हुई विशेषताओं के आधार पर औरों को डायरेक्ट विशेषताओं की शक्ति के आधार पर इतना समीप लाया है जो उन्हों का डायरेक्ट ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा से सम्बन्ध हो जाता है, इतने शक्तिशाली सितारे हो ना। अगर स्वयं शक्तिशाली नहीं, समीप नहीं तो डायरेक्ट कनेक्शन नहीं जुटा सकते। दूर होने के कारण उन्हीं सितारों की विशेषता अनुसार उन्हों के द्वारा जितनी शक्ति, सम्बन्ध-सम्पर्क प्राप्त कर सकते हैं उतनी यथा शक्ति प्राप्ति करते रहते हैं। डायरेक्ट शक्ति लेने की शक्ति नहीं होती है। इसलिए जैसे ज्ञान सूर्य ऊंचे ते ऊंचे हैं, विशेष सितारे ऊंचे हैं। वैसे ऊंची स्थिति का अनुभव नहीं कर सकते। यथा शक्ति, यथा प्राप्ति करते हैं। जैसी शक्तिशाली स्थिति होनी चाहिए वैसे अनुभव नहीं करते।

ऐसी आत्माओं के सदा यही बोल मन से वा मुख से निकलते कि होना यह चाहिए लेकिन है नहीं। बनना यह चाहिए लेकिन बने नहीं हैं। करना यह चाहिए लेकिन कर नहीं सकते। इसको कहा जाता है यथाशक्ति आत्मायें। सर्व शक्तिवान आत्मायें नहीं हैं। ऐसी आत्मायें वा स्व के वा दूसरों के विघ्न-विनाशक नहीं बन सकते। थोड़ा-सा आगे बढ़े और विघ्न आया। एक विघ्न मिटाया, हिम्मत में आये, खुशी में आये फिर दूसरा विघ्न आयेगा। जीवन की अर्थात् पुरुषार्थ की लाइन सदा क्लीयर नहीं होगी। रुकना, बढ़ना इस विधि से आगे बढ़ते रहेंगे और औरों को भी बढ़ाते रहेंगे। इसलिए रुकने और बढ़ने के कारण तीव्रगति का अनुभव नहीं होता। कब चलती कला, कब चढ़ती कला, कब उड़ती कला। एकरस शक्तिशाली अनुभूति नहीं होती। कभी समस्या, कभी समाधान स्वरुप क्योंकि यथाशक्ति है। ज्ञान सूर्य से सर्व शक्तियों को ग्रहण करने की शक्ति नहीं। बीच का कोई सहारा जरुर चाहिए। इसको कहा जाता है यथा शक्ति आत्मा।

जैसे यहाँ ऊंची पहाड़ी पर चढ़ते हो। जिस भी वाहन पर आते हो, चाहे बस में, चाहे कार में तो इन्जन पावरफुल होती है तो तीव्रगति से और बिना कोई हवा पानी के सहारे सीधा ही पहुँच जाते हो। और इन्जन कमजोर है तो रुककर पानी वा हवा का सहारा लेना पड़ता है। नानस्टाप नहीं, स्टाप करना पड़ता है। ऐसी यथशाक्ति आत्मायें, कोई न कोई आत्माओं का, सैलवेशन का, साधनों का आधार लेने के बिना तीव्रगति से उड़ती कला की मंजिल पर पहुँच नहीं पाते हैं। कभी कहेंगे – आज खुशी कम हो गई, आज योग इतना शक्तिशाली नहीं है, आज इस धारणा करने में समझते हुए भी कमजोर हूँ। आज सेवा का उमंग नहीं आ रहा है। कभी पानी चाहिए, कभी हवा चाहिए, कभी धक्का चाहिए। इसको शक्तिशाली कहेंगे? हूँ तो अधिकारी, लेने में नम्बरवन अधिकारी हूँ। किसी से कम नहीं। और करने में क्या कहते? हम तो छोटे हैं। अभी नये हैं, पुराने नहीं हैं। सम्पूर्ण थोड़ेही बने हैं। अभी समय पड़ा है। बड़ों का दोष है, हमारा नहीं है। सीख रहे हैं, सीख जायेंगे। बापदादा तो सदा ही कहते हैं – सभी को चांस देना चाहिए। हमको भी यह चांस मिलना चाहिए। हमारा सुनना चाहिए। लेने में हम और करने में जैसे बड़े करेंगे। अधिकार लेने में अब और करने में कब कर लेंगे। लेने में बड़े बन जाते और करने में छोटे बन जाते। इसको कहा जाता है यथा शक्ति आत्मा।

बापदादा यह रमणीक खेल देख-देख मुस्कराते रहते हैं। बाप तो चतुरसुजान है। लेकिन मास्टर चतुरसुजान भी कम नहीं। इसलिए यथा शक्ति आत्मा से अब मास्टर सर्वशक्तिवान बनो। करने वाले बनो। स्वत: ही शक्तिशाली कर्म का फल शुभ भावना, श्रेष्ठ कामना का फल स्वत: ही प्राप्त होगा। सर्व प्राप्ति स्वयं ही आपके पीछे परछाई के समान अवश्य आयेगी। सिर्फ ज्ञान सूर्य की प्राप्त हुई शक्तियों की रोशनी में चलो तो सर्व प्राप्ति रुपी परछाई आपेही पीछे-पीछे आयेगी। समझा।

आज यथा शक्ति और शक्तिशाली सितारों की रिमझिम देख रहे थे। अच्छा।

सभी तीव्रगति से भाग-भाग कर पहुँच गये हैं। बाप के घर में पहुँचे तो बच्चों को कहेंगे भले पधारे। जैसा जितना भी स्थान है, आपका ही घर है। घर तो एक दिन में बढ़ेगा नहीं लेकिन संख्या तो बढ़ गई है ना। तो समाना पड़ेगा। स्थान और समय को संख्या प्रमाण ही चलाना पड़ेगा। सभी समा गये हो ना! क्यू तो सभी बात में लगेगी ही। फिर भी अभी भी बहुत-बहुत लकी हो क्योंकि पाण्डव भवन वा जो स्थान है उसके अन्दर ही समा गये। बाहर तक तो क्यू नहीं गई है ना! वृद्धि होनी है, क्यू भी लगनी है। सदा हर बात में खुशी मौज में रहो। फिर भी बाप के घर जैसा दिल का आराम कहाँ मिल सकेगा। इसलिए सदा हर हाल में सन्तुष्ट रहना, संगमयुग के वरदानी भूमि की तीन पैर पृथ्वी सतयुग के महलों से भी श्रेष्ठ है। इतनी बैठने की जगह मिली है, यह भी बहुत श्रेष्ठ है। यह दिन भी फिर याद आयेंगे। अभी फिर भी दृष्टि और टोली तो मिलती है। फिर दृष्टि और टोली दिलाने वाले बनना पड़ेगा। वृद्धि हो रही है, यह भी खुशी की बात है ना। जो मिलता, जैसे मिलता सबमें राजी और वृद्धि अर्थात् कल्याण है। अच्छा।

कर्नाटक विशेष सिकीलधा हो गया है। महाराष्ट्र भी सदा संख्या में महान रहा है। देहली ने भी रेस की है। भल वृद्धि को पाते रहो। यू.पी. भी किसी से कम नहीं है। हर स्थान की अपनी-अपनी विशेषता है। वह फिर सुनायेंगे।

बापदादा को भी साकार शरीर का आधार लेने के कारण समय की सीमा रखनी पड़ती है। फिर भी लोन लिया हुआ शरीर है। अपना तो नहीं है। शरीर का जिम्मेवार भी बापदादा हो जाता है। इसलिए बेहद का मालिक भी हद में बंध जाता है। अव्यक्त वतन में बेहद है। यहाँ तो संयम, समय और शरीर की शक्ति सब देखना पड़ता है। बेहद में आओ, मिलन मनाओ। वहाँ कोई नहीं कहेगा कि अभी आओ, अभी जाओ वा नम्बरवार आओ। खुला निमन्‍त्रण है अथवा खुला अधिकार है। चाहे दो बजे आओ, चाहे चार बजे आओ। अच्छा।

सदा सर्व शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा ज्ञान सूर्य के समीप और समान ऊंची स्थिति में स्थित रहने वाली विशेष आत्माओं को, सदा हर कर्म करने में “पहले मैं” का उमंग-उत्साह रखने वाले हिम्मतवान आत्माओं को, सदा सर्व को शक्तिशाली आत्मा बनाने वाले सर्व समीप बच्चों को, ज्ञान सूर्य ज्ञान चन्द्रमा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से:- बापदादा को आप बच्चों पर नाज़ है, किस बात का नाज़ हैं? सदैव बाप अपने समान बच्चों को देख नाज़ करते हैं। जब बच्चे बाप से भी विशेष कार्य करके दिखाते हैं तो बाप को कितना नाज़ होगा। दिन-रात बाप की याद और सेवा यह दोनों ही लगन लगी हुई है। लेकिन महावीर बच्चों की विशेषता यह है कि पहले याद को रखते फिर सेवा को रखते। घोड़ेसवार और प्यादे पहले सेवा पीछे याद। इसलिए फर्क पड़ जाता है। पहले याद फिर सेवा करें तो सफलता है। पहले सेवा को रखने से सेवा में जो भी अच्छा-बुरा होता है उसके रुप में आ जाते हैं और पहले याद रखने से सहज ही न्यारे हो सकते हैं। तो बाप को भी नाज़ है ऐसे समान बच्चों पर! सारे विश्व में ऐसे समान बच्चे किसके होंगे? एक-एक बच्चे की विशेषता वर्णन करें तो भागवत बन जाए। शुरु से एक-एक महारथी की विशेषता वर्णन करें तो भागवत बन जायेगा। मधुबन में जब ज्ञान सूर्य और सितारे संगठित रुप में चमकते हैं तो मधुबन के आकाश की शोभा कितनी श्रेष्ठ हो जाती है। ज्ञान सूर्य के साथ सितारे भी जरुर चाहिए।

अध्याय : ज्ञान सूर्य और रुहानी सितारों की दिव्य पहचान

 1. ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा और वैरायटी सितारे

मुरली भावार्थ:
आज ज्ञान सूर्य और ज्ञान चन्द्रमा अपने वैरायटी सितारों को देख रहे हैं।

 कोई स्नेही सितारे
 कोई विशेष सहयोगी सितारे
 कोई सहज योगी सितारे
 कोई श्रेष्ठ ज्ञानी सितारे
 कोई सेवा-उमंग वाले सितारे

सभी सितारे ज्ञान सूर्य की रोशनी से चमकते हैं,
लेकिन हर सितारे की चमक और झलक अलग-अलग है।

उदाहरण:
जैसे आकाश में ग्रह अलग-अलग फल देते हैं,
वैसे ही रुहानी सितारे भी आत्माओं को अलग-अलग अविनाशी प्राप्ति कराते हैं।


 2. जितनी समीपता, उतनी शक्ति

मुरली नोट:
जो सितारे ज्ञान सूर्य और ज्ञान चन्द्रमा के जितने समीप,
वे उतने ही औरों को भी डायरेक्ट कनेक्शन में ला सकते हैं।

 स्वयं शक्तिशाली
 स्वयं समीप
 तभी औरों को समीप लाने की शक्ति

जो स्वयं दूर हैं,
वे केवल यथा-शक्ति प्राप्ति ही करा सकते हैं।


 3. “यथा-शक्ति आत्मा” की पहचान

मुरली की गहन परिभाषा:
जो आत्माएँ बार-बार कहती हैं—

होना चाहिए… पर है नहीं
बनना चाहिए… पर बने नहीं
करना चाहिए… पर कर नहीं सकते

 उन्हें कहा जाता है यथा-शक्ति आत्माएँ

ऐसी आत्माएँ—
✔ न स्वयं विघ्न-विनाशक बन पाती हैं
✔ न औरों के विघ्न नष्ट कर पाती हैं


 4. रुकना-चलना-फिर रुकना — तीव्रगति का अभाव

मुरली भाव:
यथा-शक्ति आत्माओं की जीवन-रेखा—

 कभी रुकना
 कभी बढ़ना
 कभी गिरना

इसलिए—
उड़ती कला का अनुभव नहीं
 एकरस शक्तिशाली स्थिति नहीं


 5. पहाड़ी यात्रा का उदाहरण

उदाहरण (मुरली से):
जैसे पहाड़ी पर—

✔ शक्तिशाली इंजन = नॉन-स्टॉप यात्रा
✔ कमजोर इंजन = पानी, हवा, धक्का चाहिए

वैसे ही—
यथा-शक्ति आत्माएँ
 सहारे के बिना
 उड़ती कला तक नहीं पहुँच पातीं


 6. लेने में अधिकारी, करने में कमजोर

मुरली का सूक्ष्म रहस्य:

 लेने में: “हम नम्बर वन अधिकारी हैं”
 करने में: “हम छोटे हैं, नये हैं”

लेने में बड़े,
करने में छोटे —
इसे ही कहा गया यथा-शक्ति आत्मा


 7. बापदादा का सन्देश — अब मास्टर सर्वशक्तिवान बनो

मुरली आदेश:
अब यथा-शक्ति से
सर्व-शक्तिवान आत्मा बनो
करने वाले बनो

मुरली लाइन (भावार्थ):
जब ज्ञान सूर्य की रोशनी में चलोगे,
तो सर्व प्राप्तियाँ परछाईं समान पीछे आएँगी


 8. बाप का घर — दिल का आराम

मुरली भाव:
स्थान भले कम हो,
लेकिन बाप के घर जैसा दिल का आराम कहीं नहीं

 तीन पैर पृथ्वी भी
 सतयुग के महलों से श्रेष्ठ


 9. वृद्धि भी खुशी है

मुरली संकेत:
संख्या बढ़ेगी
 क्यू लगेगी
 व्यवस्थाएँ बदलेंगी

फिर भी—
✔ जो मिला, जैसे मिला — उसमें राजी
✔ वृद्धि = कल्याण


 10. पहले याद, फिर सेवा — सफलता का सूत्र

दादियों का विशेष मुरली नोट:

 महावीर बच्चे = पहले याद, फिर सेवा
 साधारण बच्चे = पहले सेवा, फिर याद

सूत्र:
पहले याद → सहज न्यारे → सदा सफल


 11. ज्ञान सूर्य और सितारों की शोभा

मुरली भाव:
जब ज्ञान सूर्य और सितारे
संगठित रूप में चमकते हैं,
तो मधुबन का आकाश
अत्यन्त दिव्य शोभा से भर जाता है।


 अंतिम संदेश

बापदादा का स्नेह संदेश:
सदा ज्ञान सूर्य के समीप रहकर
 समान ऊँची स्थिति
 सर्व-शक्तिवान अवस्था
 “पहले मैं” का उमंग

यही सच्चे रुहानी सितारे की पहचान है।

प्रश्न 1: ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा और वैरायटी सितारे किसे कहा गया है?

उत्तर:
मुरली के अनुसार आज ज्ञान सूर्य और ज्ञान चन्द्रमा अपने वैरायटी सितारों को देख रहे हैं।
ये वैरायटी सितारे वे आत्माएँ हैं जो ज्ञान सूर्य की रोशनी से चमक रही हैं, लेकिन जिनकी विशेषताएँ अलग-अलग हैं।

 कोई स्नेही सितारे हैं
 कोई विशेष सहयोगी सितारे हैं
 कोई सहज योगी सितारे हैं
 कोई श्रेष्ठ ज्ञानी सितारे हैं
 कोई सेवा-उमंग वाले सितारे हैं

सभी को रोशनी एक ही ज्ञान सूर्य से मिलती है, लेकिन हर आत्मा की झलक और शक्ति की अभिव्यक्ति भिन्न होती है।


प्रश्न 2: सभी सितारे समान क्यों नहीं चमकते, जबकि ज्ञान सूर्य एक ही है?

उत्तर:
जैसे स्थूल आकाश में ग्रह अलग-अलग फल देते हैं, वैसे ही रुहानी सितारे भी आत्माओं को अलग-अलग अविनाशी प्राप्ति कराते हैं।
यह अंतर आत्मा की अपनी स्थिति, समीपता और शक्ति पर आधारित होता है।

 जैसा स्वयं सितारा है
 वैसी ही प्राप्ति वह औरों को करा सकता है


प्रश्न 3: ज्ञान सूर्य के समीप रहने का क्या लाभ है?

उत्तर:
जो सितारे ज्ञान सूर्य और ज्ञान चन्द्रमा के जितने समीप होते हैं,
वे उतने ही औरों को भी डायरेक्ट कनेक्शन में ला सकते हैं।

✔ स्वयं शक्तिशाली
✔ स्वयं समीप
✔ औरों को भी समीप लाने में समर्थ

जो स्वयं दूर हैं, वे केवल यथा-शक्ति प्राप्ति ही करा सकते हैं।


प्रश्न 4: “यथा-शक्ति आत्मा” किसे कहा जाता है?

उत्तर:
मुरली के अनुसार जो आत्माएँ बार-बार यह अनुभव करती हैं—

 होना चाहिए… पर है नहीं
 बनना चाहिए… पर बने नहीं
 करना चाहिए… पर कर नहीं सकते

उन्हें यथा-शक्ति आत्मा कहा जाता है।


प्रश्न 5: यथा-शक्ति आत्माओं की कमजोरी क्या होती है?

उत्तर:
ऐसी आत्माएँ—

✔ न स्वयं विघ्न-विनाशक बन पाती हैं
✔ न औरों के विघ्न नष्ट कर पाती हैं

उनकी जीवन-रेखा सदा—

 कभी आगे
 कभी पीछे
 कभी रुकावट

इस कारण उन्हें तीव्रगति या उड़ती कला का अनुभव नहीं होता।


प्रश्न 6: मुरली में पहाड़ी यात्रा का उदाहरण क्यों दिया गया है?

उत्तर:
यह उदाहरण आत्मिक शक्ति को समझाने के लिए है।

✔ शक्तिशाली इंजन = नॉन-स्टॉप यात्रा
✔ कमजोर इंजन = पानी, हवा, धक्का चाहिए

वैसे ही यथा-शक्ति आत्माएँ
बिना सहारे के उड़ती कला तक नहीं पहुँच पातीं।


प्रश्न 7: “लेने में अधिकारी, करने में कमजोर” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
यथा-शक्ति आत्माओं का सूक्ष्म स्वभाव—

 लेने में: “हम नम्बर वन अधिकारी हैं”
 करने में: “हम छोटे हैं, नये हैं”

लेने में बड़े बन जाते हैं,
लेकिन करने में छोटे रह जाते हैं।
इसी को मुरली में यथा-शक्ति अवस्था कहा गया है।


प्रश्न 8: बापदादा यथा-शक्ति आत्माओं को क्या संदेश देते हैं?

उत्तर:
बापदादा का स्पष्ट आदेश है—

 अब यथा-शक्ति नहीं
 मास्टर सर्वशक्तिवान बनो
 करने वाले बनो

मुरली भावार्थ:
जब ज्ञान सूर्य की रोशनी में चलोगे,
तो सर्व प्राप्तियाँ परछाईं समान पीछे आएँगी।


प्रश्न 9: बाप के घर को सतयुग के महलों से श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?

उत्तर:
मुरली के अनुसार—

स्थान भले छोटा हो
 सुविधाएँ सीमित हों

फिर भी बाप के घर जैसा दिल का आराम कहीं नहीं।
संगमयुग की तीन पैर पृथ्वी भी
सतयुग के महलों से श्रेष्ठ है।


प्रश्न 10: वृद्धि और क्यू (लाइन) को खुशी क्यों कहा गया है?

उत्तर:
संख्या बढ़ेगी तो—

 क्यू लगेगी
 व्यवस्थाएँ बदलेंगी

लेकिन मुरली का सूत्र है—

✔ जो मिला, जैसे मिला — उसमें राजी
✔ वृद्धि = कल्याण

वृद्धि होना स्वयं ईश्वरीय कार्य की सफलता का प्रमाण है।


प्रश्न 11: “पहले याद, फिर सेवा” क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
दादियों का विशेष मुरली नोट—

 महावीर बच्चे = पहले याद, फिर सेवा
 साधारण बच्चे = पहले सेवा, फिर याद

सूत्र:
पहले याद → सहज न्यारे → सदा सफल


प्रश्न 12: ज्ञान सूर्य और सितारों के संगठित रूप की क्या शोभा है?

उत्तर:
जब ज्ञान सूर्य और सितारे संगठित रूप में चमकते हैं,
तो मधुबन का आकाश
अत्यन्त दिव्य शोभा से भर जाता है।

ज्ञान सूर्य के साथ
सितारों का होना भी आवश्यक है।


अंतिम प्रश्न: सच्चे रुहानी सितारे की पहचान क्या है?

उत्तर:
सच्चा रुहानी सितारा वही है जो—

 सदा ज्ञान सूर्य के समीप रहे
 समान ऊँची स्थिति बनाए
 सर्व-शक्तिवान अवस्था में स्थित हो
 हर कर्म में “पहले मैं” का उमंग रखे

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की अव्यक्त मुरली (29-04-1984) पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन हेतु है।
इसका उद्देश्य आत्म-जागृति, आत्म-उन्नति और ईश्वरीय ज्ञान का प्रसार है, न कि किसी धर्म, व्यक्ति या मत का खंडन।

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